गुरुवार, 11 जून 2026

अण्डाकार शिवलिङ्ग और अण्डाकार विष्णु लिङ्ग शालिग्राम पूजन।

वैदिक काल में भी तन्त्र मतावलम्बियों में चोरी-चुपके मूर्ति पूजा प्रचलित थी ही।  वैदिक उन्हें शिश्नेदेवाः कहते थे। और उनके संसर्ग को भी पाप समझते थे।

वैवस्वत मन्वन्तर में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय यज्ञ विध्वंस के बाद प्रजापति ने विधि- विधान में संशोधन कर यज्ञ में रुद्र का भाग देना स्वीकार कर लिया तो शुक्राचार्य और दधिचि आदि ने शैव मत की स्थापना कर दी।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने शाक्त मत की स्थापना कर दी और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ने तन्त्र मत की स्थापना कर दी। भारत में  दत्तात्रेय और उनके शिष्य कार्तवीर्य सहस्रार्जुन तथा रावण ने तन्त्र मत का प्रचार किया।
रामायण काल तक भारत में मूर्ति पूजा प्रचलित नहीं थी। अयोध्या में भगवान विष्णु के स्थान (स्थानक) और जनकपुरी में भगवती उमा के स्थान (स्थानक) का उल्लेख है। लेकिन लक्ष्यद्वीप में किल्तान द्वीप में स्थित रावण की राजधानी लङ्का में राक्षसों द्वारा पूजित यक्षिणी निकुम्भला की मूर्ति वाले मन्दिरों का ही उल्लेख पाया जाता है।
महाभारत में भी राक्षसों में ही मूर्ति पूजा और बलि प्रथा का उल्लेख मिलता है।
बाद में कुछ वन वासियों को नर्मदा घाटी में जब डायनासोर के अण्डों के जीवाश्म मिले तो उन लोगों ने उन्हें पूजना प्रारम्भ कर दिया।
उनके देखा देखी बाणासुर ने भी नर्मदा के जल प्रपात धाराजी में प्राकृतिक रूप से बनने वाले अण्डाकार पत्थरों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ कर दिया। जिसे वनवासियों ने भी अपना लिया। अण्डाकार शिवलिङ्ग को स्थिर खड़ा रखने के लिए एक आधार बनाया जिसे जलाधारी कहा जाता है।
उधर वेद विरोधी नास्तिक अनीश्वरवादी जैन लोगों ने अरब प्रायद्वीप में प्रचलित विनायक और भैरव आदि की मूर्ति पूजा प्रारम्भ की तो, वैदिक वर्णाश्रम धर्मावलम्बी विष्णु उपासकों ने भी नेपाल में काली गण्डकी नदी में हिमालय काटकर बहाकर लाये जीवाश्मों को  मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में सेफैलोपॉड
(कपालपाद) की सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा से बनी प्रतिमा स्वरूप (Suture Pattern) के शालिग्राम को विष्णु के चिह्न (विष्णु लिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ कर दिया।
फिर ईरान की मीड संस्कृति के पुरोहितों को भगवान श्रीकृष्ण ने   साम्म के कुष्ठ रोग निवारण हेतु बुलाया तो पहले तो वे अथर्ववेदीय यज्ञ करते रहे। किन्तु जनमेजय के बाद उन्होंने ईरान में प्रचलित सूर्य पूजा के लिए सूर्य की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने और गुजरात और उड़ीसा में मन्दिर बनाना प्रारम्भ कर दिया।
महाराष्ट्र और तमिलनाडु में विनायक गजानन की प्रतिमा पूजन प्रारम्भ हो गया। बङ्गाल में दूर्गा प्रतिमा पूजा होने लगी तो फिर दक्षिण भारत में वैष्णवों ने भी विष्णु, नारायण और श्रीहरि की मूर्ति बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया।

अर्थात शैवों ने साढ़े छः हजार वर्ष पुराने जीवाश्म डायनासोर के अण्डों को शिव चिह्न (शिवलिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ किया तो वैष्णवों ने भी चालिस करोड़ वर्ष पहले के और
सोलह करोड़ से अठारह करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के स्थान पर ऋग्वेद में उल्लेखित उत्तर सागर (टेथिस सागर) था; तब जुरासिक काल में समुद्र में विलुप्त हो चुके समुद्री अकशेरुकी जीवों का एक उपवर्ग अमोनोइडिया (Ammonoidea) जिन्हें आम तौर पर अमोनाइट्स (Ammonites) कहते हैं; समुद्री जीवों का एक विलुप्त हो चुका उपवर्ग (subclass) है। ये जीव कड़क (सख्त) चक्राकार खोल के अन्दर रहते थे। इस उपवर्ग का ऑक्टोपस - स्वविड के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  है। जो लाखों वर्ष में दबाव के कारण पत्थर जैसे बन गये केल्सियम और सिलिका से भरने से बने छिद्र और रेखाओ वाले कवच का जीवाश्म है।
हिमालय बनने पर उत्तर 
सागर उठा तब काली गण्डकी नदी ने हिमालय काटकर इन जीवाश्मों को बहाकर मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में  सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा (Suture Pattern) बनी हैं।
जिनमें  
1 अमोनाइट का चक्राकार कवच सुदर्शन शालिग्राम सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

2 पास-पास दो कुण्डलित कवच वाला लक्ष्मी नारायण शालिग्राम,
 
3 पत्तीनुमा धारियों वाले वनमाली कवच, 

4 कवच का खुला सिरा टूटने से बना घोड़े के मूह जैसा कवच हयग्रीव शालिग्राम,
और

5 चपटा बहने से मछली के आकार वाला कवच मत्स्य शालिग्राम,
ये पाँच अधिक प्रसिद्ध है।

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