शनिवार, 13 जून 2026

भारत में मूर्ति पूजा के पूरातत्वीय प्रमाण

1   बघोर-I के मूल 1983 के शोध-पत्र "An Upper Palaeolithic Shrine in India?"के अनुसार 1980–82 में सीधी जिले की सोन घाटी में स्थित बघोर-I स्थल का उत्खनन G. R. Sharma और J. Desmond Clark के नेतृत्व  में किया गया।उनके साथ Jonathan Mark Kenoyer तथा J. N. Pal भी जुड़े थे।

 पूजा-मंच की संरचना, त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र 
  उत्खनन में पत्थरका एक वृत्ताकार पूजा-मंच (platform) मिला, जिसके मध्य में एक प्राकृतिक त्रिकोणाकार रंगीन पत्थर रखा हुआ था। त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र मिला।
इस स्थल को उत्तर पुरापाषाण (Upper Palaeolithic) काल के अंतिम चरण का माना गया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसकी तिथि लगभग 10,000–9,000 ईसा पूर्व (या लगभग 11,000–12,000 वर्ष पूर्व) मानी जाती है। 
पुरातत्वविदों ने देखा कि निकटवर्ती क्षेत्र के कोल और बैगा समुदाय आज भी त्रिकोणाकार प्राकृतिक पत्थरों को "माई" (मातृदेवी) के रूप में पूजते हैं। बघोर-I में मिला पत्थर भी उसी प्रकार का था और एक विशेष मंच पर स्थापित था। इस आधार पर उत्खननकर्ताओं ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि यह संभवतः किसी देवी अथवा स्त्री-तत्त्व (female principle) का पूजा-स्थल रहा होगा। इसे एक अनुष्ठानिक (ritual) स्थल माना जाता है।
स्वयं उत्खननकर्ताओं ने भी "मूर्ति-पूजा" का सबसे प्राचीन बहुत प्रबल संभावना" (strong probability) की बात कही थी, न कि पूर्ण निश्चितता की। 

2  उड़ीसा (ओडिशा) की राजधानी भुवनेश्वर (Bhubaneswar) के निकट  उदयगिर गुफा (Udayagiri Caves) में स्थित हाथी गुम्बा (Hāthigumphā) में
कलिङ्ग के राजा खारवेल (Kharavela) का पहली शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख का संबंधित भाग कुछ स्थानों पर क्षतिग्रस्त है और उसके पाठ (reading) को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं उसके आधार पर ऐसा दावा किया जाता है कि, किसी नन्दराज द्वारा नन्द राजा ने कलिङ्ग पर आक्रमण किया। कोई जैन प्रतीक, जिन-प्रतिमा या धार्मिक धरोहर या एक पूजनीय वस्तु अथवा प्रतिमा ले जाई गई थी, और मगध में स्थापित किया था।परन्तु उसका सटीक स्वरूप निश्चित नहीं है।
कई शताब्दियों बाद खारवेल ने मगध पर अभियान किया।
उसने उस प्रतिमा को पुनः कलिङ्ग वापस लाकर प्रतिष्ठित किया।
जैन परम्परा का मत है कि वह अग्रजिन (Agra-Jina) अथवा प्रथम जिन, अर्थात् (आदिनाथ) ऋषभदेव  (Rishabhanatha)  की प्रतिमा थी।

 ईसा पूर्व चौथी–पाँचवीं शताब्दी तक पूर्वी भारत में जैन प्रतिमा-पूजा का कोई विकसित रूप विद्यमान था। किसी नन्द शासक ने कलिङ्ग से एक जैन पूज्य वस्तु या जिन-प्रतिमा मगध ले गई थी; बाद में खारवेल ने उसे वापस प्राप्त किया। उस नन्द शासक की पहचान महापद्म नन्द के रूप में करना सम्भावित है, परन्तु पूर्णतः सिद्ध नहीं है।

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