व्रात्य का अर्थ ऐसे श्रमण जो संस्कार विहिन हो, निरग्नि हो, निर्ग्रन्थ हो, आचार भ्रष्ट हो, यहाँ तक कि, जिसने जननेन्द्रिय की नस मार ली हो समाज से बहिष्कृत ऐसे लोग व्रात्य कहलाते थे।
व्रात्य लोगों में, सन्यास आश्रम में ऋषभदेव, जड़ भरत जैसे ज्ञानी भी हुए और जैन मुनि बाहुबली भी हुए तो अघोरी भी व्रात्य की श्रेणी में आते हैं।
पहले शंकर जी और बाद में विनायक गजानन भी व्रात्यपति कहलाए।
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