वन से जड़ी-बूटियों और खदानों से अयस्क लाकर, सङ्ग्रहण कर, चुर्ण, आसव-अरिष्ट, रसायन बनाने के लिए होम- हवन कर, भट्टियाँ लगा कर रस रसायन बना करऔषधि तैयार कर के रखते थे।
नियमित जीवन के लिए पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग फिर भी दुर्घटना या युद्ध आदि के कारण घायल और रुग्ण होने पर नाड़ी परिक्षा और रक्त, कफ, मल- मुत्र परिक्षण करवा कर फिर प्राकृतिक चिकित्सा, औषधियों से चिकित्सा, पञ्चकर्म चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और हाथ- पैर मोड़ना, दबाना, छिद्रण, मालिश, जोक से रक्त चुसवाना जैसे अनेक प्रकार से चिकित्सा करते थे। यह कार्य एक प्रकार की तपस्या ही है।
यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद और अर्थशास्त्र क्षत्रियों ने अपनाया।
सामाजिक व्यवस्थापन हेतु दिन-रात सजग रहना, क्षेत्र रक्षण, देश की सुरक्षा हेतु युद्ध, बलिदान होने को तैयार रहना भी तप ही है।
सामवेद का उपवेद गन्धर्ववेद (नाट्य सङ्गीत) वैश्यों ने अपनाया क्यों कि, इसमें खर्च बहुत अधिक लगता है।
इस लिए धनार्जन करना और व्ययन, निवेश करना , बचत करना और अकाल आदि के समय कर्मियों, कलाकारों का भरण-पोषण करना भी एक त्याग- तपस्या ही है।
अथर्ववेद का उपवेद कार्मिक शुद्रों ने अपनाया।
ये लोग राजन्य वर्ग और सम्पन्न वैश्यों के आदेश- निर्देश पर पथ, सेतु, बांध, भवन, कुए-बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, विद्यालय, चिकित्सालय-औषधालय आदि के भवन बनाना और शिल्पकला और चित्र कला द्वारा सजाने का कार्य करते हैं।
भारी भरकम बोझ ढोकर समुचित स्थान पर लगाकर सन्तुलन बनाए रखना जैसे कठिन कार्य भी एक प्रकार का तप करना ही है।
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