सोमवार, 8 जून 2026

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर होता है।
किसी भी विषय से सम्बन्धित ज्ञानेंन्द्रि के सम्पर्क में आने के साथ उस ज्ञानेन्द्रि से मन का संयोजन होने पर उस विषय के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। आकर्षण उत्पन्न होते ही कर्मेंन्द्रियाँ उस विषय भोग के लिए सक्रिय और तत्पर हो उठती है। या यूं कहें कि, उस विषय से सम्बन्धित वस्तु, स्थान या व्यक्ति को प्राप्त करने में लग जाती है।
आकर्षण का विरोधी भाव विकर्षण है। जिसका परिणाम उच्चाटन होता है । व्यक्ति उससे दूर हो जाना चाहता है। लेकिन मन ही मन स्मरण बढ़ता जाता है।
मतलब आकर्षक आसानी से समाप्त नहीं होता।

आकर्षण से उस विषय की स्मृति बारम्बार होती रहती है, या कहें चित्त में बनी रहती है। परिणाम स्वरूप उस विषय (वस्तु, व्यक्ति या स्थान) के प्रति लगाव हो जाता है। इसी लगाव के लिए उपयुक्त शब्द आसक्ति है। वह विषय व्यक्ति से चिपक जाता है। हटाये नहीं हटता। बल्कि और दृढ़ता से चिपकता जाता है।

परिणाम स्वरूप उसके प्रति राग उत्पन्न होता है। उससे व्यक्ति को सुखानुभूति होने लगती है। इससे अनुराग उत्पन्न हो कर व्यक्ति अनुरक्त हो जाता है। उसी में घुल-मिल जाता है।

परिणाम स्वरूप व्यक्ति को हर समय, प्रत्येक गतिविधि में उस विषय की अनुभूति होने लगती है। यह उसका भ्रम होता है।

लेकिन जब व्यक्ति उस भ्रम को ही सत्य समझने लगता है तो भ्रम के स्थाई भाव को मोह कहते हैं।
परिणाम स्वरूप व्यक्ति उस विषय में मोहित हो जाता है। जिसे फारसी भाषा में दीवानह' कहा जाता है, जिसका अर्थ उन्मादग्रस्त, विक्षिप्त या पागल होता है। किसी व्यक्ति के प्रति आसक्ति में मोहित होकर उन्मादी हुए व्यक्ति को उर्दू में दीवाना कहते हैं।

प्रेम इन सबसे पूर्णतः भिन्न भावना है।
प्रेम का आधार गुणों के प्रति श्रद्धा होता है।
किसी भी सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति के प्रति प्रायः सभी सदाचारियों को सहज ही प्रेम उपजता है। प्रेम उमड़ता है।
बालक के गुणों से उपजे प्रेम को वात्सल्य कहते हैं।
आजकल लोग भाषाई अज्ञान वश वात्सल्य भाव को माँ की ममता कहते हैं। जबकि ममता का अर्थ मेरापन होता है। ममता अहंकार का परिणाम है। इसीलिए अहन्त- ममता अर्थात मैं- मेरा शब्द साथ में ही आते हैं।
प्रेम प्राकृतिक भाव है। प्रेम न किया जाता है, न हो जाता है। बल्कि प्रेम सनातन भाव है; जो सदा से था। है और सदा रहेगा।
प्रेम सद्गुणों के प्रति श्रद्धा से होता है; ज्ञान से होता है। प्रेम किसी विषय, व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति नहीं होता।

जब प्रेम में आदर, सम्मान जुड़ जाता है तब वही प्रेम भक्ति कहलाता है।

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