भारत की दुर्दशा के प्रमुख कारण गुरुकुलों की समाप्ति, वेदाध्ययन , पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग साधना बन्द होना तथा विदेश यात्रा पर प्रतिबन्ध के कारण कुप मण्डुकता रहे।
जिन्हें आज दलित और पिछड़ा कहा जा रहा है इन सब कुलों/ वंशों का लगभग एक हजार वर्ष पहले बल्कि कई स्थानों पर तो उससे भी आगे तक किसी ना किसी क्षेत्र में शासन रहा है।
ऊँच-नीच के सर्व प्रथम प्रमाण जैन-बौद्ध साहित्य में ही पाए जाते हैं। स्पष्ट है कि, किसी का भी मत परिवर्तन के लिए ऐसे दुष्प्रचार आवश्यक रहे होंगे।
फिर इनके व्यवसाय के नाम पर जाति मान लिया गया।
इन सभी व्यवसायों का भी अपरिहार्य महत्वपूर्ण स्थान हमारे समाज में मान्य था। कोई ऊँच नीच का भेद-भाव नहीं रहा।
इस्लामी आक्रांताओं के भारत में आगमन पूर्व कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि, इन लोगों के प्रति कोई दुर्भावना या भेद-भाव या अत्याचार हुआ हो। यह सत्य है कि, इस्लामी आक्रांताओं के जासूस पीर फकिरों की जादूगरी से चमत्कृत होने, जजिया कर देने से बचने और आक्रांताओं के अत्याचार से बचने के लिए सर्वाधिक मतांतरण इन्हीं लोगों का हुआ। इसलिए सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म को बदनाम करने लगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें