इसलिए प्राणायाम साधना द्वारा और लम्बी और गहरी श्वास लेने के अभ्यास को आदत में / मसल मेमोरी में डाल देने से ही स्वस्थ्य शरीर, दीर्घायु जीवन और स्वस्थ हुआ जा सकता है।
2 अनन्त जन्मों के सञ्चित कर्मों में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय के उदय को प्रारब्ध कहते हैं ।
3 प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित ---
देश ( अर्थात लोक, ग्रह, महाद्वीप, राष्ट्र, राज्य, प्रदेश, सम्भाग, जिला, तहसील, ब्लाक, ग्राम/नगर, मोहल्ला/ कॉलोनी)।
काल ( अर्थात कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु , मास, पक्ष, दिनांक, और घटि, पल, विपलात्मक समय।)
वंश, कुल, कुटुम्ब और परिवार में , मात-पिता, बड़े-छोटे भाई- बहन, भाभी - जीजा, ताऊ-काका,भुआ, ताई-काकी, फुफा, मामा-मौसी, मामी-मौसा, चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई- बहन, भाभी - जीजा आदि के बीच जन्म होना, स्व देश, स्व कुल, स्वयम् के परिवार में
या
पर देव, अन्य कुल, किसी अन्य परिवार में पालन- पोषण होना,
शारीरिक बनावट, स्वास्थ्य, सुघड़ता, स्वभाव, आदतें, रुचियाँ-अरुचियाँ, योग्यताएँ- निर्योग्यता, कौशल और पारिवारिक सुख-सुविधाएँ तथा सम्पततियाँ, और आय- व्यय रूपी परिस्थितियों के साथ बच्चे का जन्म होता है।
लेकिन
4 इनमें विकास करना, वहीँ अटके रहना, घटाना ये सब कर्म पर निर्भर करता है।
यह सही है कि, अधिकांश लोग स्वयम् को परिस्थितियों का दास मानकर परिस्थितियों के अनुसार ही कर्म करते हैं।
किन्तु
5 सत्वगुण प्रधान, निश्चयात्मकमिका बुद्धि वाले विवेकी पुरुष (शरीर रूपी पुर मे रहने वाला व्यक्ति) समाज में रह रहे लोगों के गुण-दोषों और उनसे उन्हें हुए लाभ हानि को देख-समझकर और गुरुजनों (वरिष्ठ जनों) द्वारा दी गई शिक्षा को अपना कर शुद्र (सेवक), से वैश्य (स्वामी), और फिर क्षत्रिय (शासक) और विप्र (वेदज्ञ), और ब्राह्मण (वेदों को आत्मसात कर आत्मज्ञानी) हो जाता है।
लेकिन
6 रजोगुण प्रधान आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य के कारण पर्याप्त पराक्रम न करने के कारण कष्ट भोगता हुआ, कुछ सुधार करके जैसे-तैसे जी लेता है।
7 तमोगुणी अविवेकी पुरुष तो स्वयम् में केवल गुण ही देख पाता है, बतलाने पर भी दोष नहीं मानता तो सुधार करने का प्रश्न ही नहीं होता इसलिए परिस्थितियों और दुसरों को दोष देकर
आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य को अनिवार्य (जिना निवारण नहीं हो सकता ऐसा) मानकर सदा कष्टित, पीड़ित और दुःखी रहता है । फिर भी नहीं सुधरता है और जीवन बर्बाद कर लेता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें