गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

हिन्दू फारसी भाषा में कहा गया अपशशब्द है न कि, संस्कृत शब्द।

सिन्धु शब्द के स का उच्चारण ह होनें का सिद्धान्त सरासर मिथ्या है। क्योंकि, भारत में सिकन्दर के आक्रमण के पहले से ईरान में प्रचलित हिन्दू शब्द प्राचीन ईरानी साहित्य में प्रचलित था।

एक लेख में उल्लेख है कि, जरथुस्त्र रचित- उनके धर्म गृन्थ की आयत 163 वें में लिखा है –

” अकनु विर हमने व्यास नाम अज हिन्द आमद दाना कि अकल चुनानेस्त वृं व्यास हिन्दी वलख आमद ,गस्ताशप जरतस्त रख ,ख्वानंद मन मरदे अम हिन्दी निजात व हिन्दुवा जगस्त”

मतलब ईरान में हिन्दू शब्द जरथुस्त्र के समय से प्रचलित है।

फारसी के प्राचीन शब्दकोशों के अनुसार हिन्दूशब्द का अर्थ काला, कलूटा,दास दस्यु ,चोर, डाकू, लुटेरा, सेंधमार , लूच्चा, लफङ्गा, बदमाश, मिथ्या भाषी (झूठा), आदि अर्थों में प्रयुक्त होता था।

अतः सिन्धु शब्द का फारसी उच्चारण हिन्दू कदापि सत्य नही हो सकता।

किन्तु सिकन्दर के आक्रमण के समय तो ठीक शकों और हूणों के आक्रमण तक भी किसी भारतीय नें अथवा भारतीय ग्रन्थ में हिन्दू जाति, हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, या हिन्दूदेश हिन्दूस्थान या हिन्दूस्तान शब्द के प्रयोग भारतीय या संस्कृत ग्रन्थ और भारतीय इतिहास में नही पाया जाता है।

हिन्दू-कुश को संस्कृत साहित्य और इतिहास में पारियात्र पर्वत कहा जाता था और बाद में यह हिन्दू-कुश के नाम से प्रसिद्ध हो गया | फारसी भाषा में कुश शब्द का अर्थ होता है क़त्ल करना | जिस स्थान पर हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ हो वह स्थान हिन्दू-कुश कहलाता है, – जैसे खुद-कुशी |

भविष्य पुराण में हिन्दूस्थान शब्द आया है।किन्तु उसमें तो राजाभोज का इतिहास तो है ही पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द , अकबर और विक्टोरिया तक का इतिहास भविष्यकालिन रूप में नही बल्कि भूतकालिक रूप में दिया है।

बृहस्पति आगम -- आचार्य बृहस्पतिजी ने विशालाक्ष शिव द्वारा रचित राजनीति शास्त्र के ग्रन्थ का सार संक्षेप बार्हस्पत्य शास्त्र नामक ग्रन्थ में किया। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता की रचना की। बृहत्संहिता की रचनाके बाद लगभग 300 ई. में बृहस्पति-आगम की रचना हुई। अतः ब्रहस्पति आगम में हिन्दू शब्द या भारत को हिन्दस्थान कहना कोई आश्चर्यजनक नही है। क्योंकि, उस समय मुस्लिम शासकों ने यही शब्द प्रचलित कर दिया था।

शैव तन्त्र के मेरुतंत्र नामक ग्रन्थ को बने हुए 300-400 वर्ष ही हुए हैं । अतः इसमें आये हिन्दू शब्द और उसका अर्थ देना कोई महत्व नही है।

पारिजात हरण नाटक लगभग 1325 ई. के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के समकालीन मिथिलानिवासी उमापति उपाध्याय ने पारिजात हरण नाटक की रचना की थी। अतः इसमें आये हिन्दू शब्द और उसका अर्थ देना कोई महत्व नही है।

सम्राट विक्रमादित्य के समय 58 ई.पू. से 34 ई. के बीच रचित अमरकोश उपलब्ध कोषों में सबसे प्राचीन कोश है जिसमें हिन्दू शब्द नही है। शेष सभी कोश राजा भोज के समय 1000ई के बाद के हैं। उनमें से एक कल्पद्रुम नामक शब्दकोश भी परवर्ती ही है।कल्पद्रुम लक्ष्मीधर रचित है ।लक्ष्मीधर गडहवाल वंशी कन्नोजके राजपूत राजा गोपीचंद का मन्त्री था। जयचन्द गोपीचन्द का ही वंशज था जो ईसा की तेरहवीं सदी का है। अतः इसमें आये हिन्दू शब्द और उसका अर्थ देना कोई महत्व नही है।

माधव या माधव विद्यारण्य का समय 1296 -1386 का है वे विजयनगर साम्राज्य हरिहर राय और बुक्काराय के गुरु, संरक्षक,दार्शनिक सन्त थे। अतः माधवविजय भी ईसा की चौदहवीं सदी का ग्रन्थ है।

कालिका पुराण दसवी शताब्दी का ग्रन्थ है। औरशारंगधर पद्धति रचना 1363 ई. मे हुई |

अर्थात उक्त समस्त ग्रन्थ भारत में इस्लामिक शासन स्थापित होजाने के पश्चातवर्ती हैं। अतः मुस्लिमों द्वारा भारतियों के प्रति कहेजानेवाले अपमानजनक शब्द हिन्दू को संस्कृत शब्द घोषित करना उनलोगों रचनाकारों द्वारा शर्म छुपाने का प्रयास मात्र था।

कुछ आलेखों में कहा गया कि ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में द्वितीय सुक्त के 41 वें मन्त्र में विवहिन्दू नामक किसी दानी राजा का वर्णन है। किन्तु श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी का ऋग्वेद सुबोध भाष्य में 08/02/41 में विवहिन्दु नही मिला। विभिन्दो या विऽभिन्दो शब्द को भ्रमवश विवहिन्दू समझने की भूल हुई होगी।

मूल मन्त्र प्रस्तुत है---

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:2» मन्त्र:41 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:24» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:41

देवता: विभिन्दोर्दानस्तुतिः ऋषि: मेधातिथिः छन्द: पादनिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः

शिक्षा॑ विभिन्दो अस्मै च॒त्वार्य॒युता॒ दद॑त् । अ॒ष्टा प॒रः स॒हस्रा॑ ॥

पद पाठ

शिक्ष॑ । वि॒भि॒न्दो॒ इति॑ विऽभिन्दो । अ॒स्मै॒ । च॒त्वारि॑ । अ॒युता॑ । दद॑त् । अ॒ष्ट । प॒रः । स॒हस्रा॑ ॥ ८.२.४१

पदार्थान्वयभाषाः -(विभिन्दो) हे शत्रुकुल के भेदन करनेवाले (ददत्) दाता ! आप (अस्मै) मेरे लिये (अष्टा, सहस्रा, परः) आठ सहस्र अधिक (चत्वारि, अयुता) चार अयुत (शिक्षा) देते हैं ॥४१॥

भावार्थभाषाः -सूक्त में क्षात्रधर्म का प्रकरण होने से इस मन्त्र में ४८००० अड़तालीस हज़ार योद्धाओं का वर्णन है अर्थात् कर्मयोगी के प्रति जिज्ञासुजनों की यह प्रार्थना है कि आप शत्रुओं के दमनार्थ हमको उक्त योद्धा प्रदान करें, जिससे शान्तिमय जीवन व्यतीत हो ॥४१॥

अन्य प्रकार से अर्थ ऐसा हो सकता है।

पदार्थान्वयभाषाः -(विभिन्दो) हे पुरन्दर=दुष्ट जनों का विशेषरूप से विनाश करनेवाले और शिष्टों के रक्षक ईश ! (ददत्) यद्यपि तू आवश्यकता के अनुसार सबको यथायोग्य दे ही रहा है। तथापि (अस्मै) इस मुझ उपासक को (चत्वारि) चा२र (अयुता) अयुत १०००× दश सहस्र=१००००×४=४०००० अर्थात् चालीस सहस्र धन (शि३क्ष) दे तथा (परः) इससे भी अधिक (अष्ट+सहस्रा) आठ सहस्र धन दे ॥४१॥

भावार्थभाषाः -यद्यपि परमात्मा प्रतिक्षण दान दे रहा है, तथापि पुनः-पुनः उसके समीप पहुँच कर अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्त्यर्थ निवेदन करें और जो नयनादि दान दिए हुए हैं, उनसे काम लेवें ॥४१॥

टिप्पणी:१−विभिन्दु−भिदिर् विदारणे। पुरन्दर और विभिन्दु दोनों एकार्थक हैं। जो दुष्टों के नगरों को छिन्न-भिन्न करके नष्ट कर देता है, वह विभिन्दु।

सम्भवतः वि॒भि॒न्दो॒ या विऽभिन्दो शब्द से यह भ्रम हुआ है।


हीनम् च दुष्यतेव्हिन्दूरित्युच्च ते प्रिये ।

और हीनम् दुष्यति इति हिन्दूः

में हीन शब्द में ही दीर्घ मात्रा है जबकि हिन्दू में हि लघु मात्रा है। अत्ः शब्द व्युत्पत्ति ठीक ठीक नही बनती। यदि कोई विद्वान इसे सिद्ध करना चाहे तो सादर स्वागत है।

अब उचित समय है इस शब्द को त्याग कर वेदिकालीन शब्द ब्राह्म धर्म (अर्थात वेदिक धर्म) या परम्परागत सनातन धर्म ही अपनाना ही उचित होगा।

उल्लेखनीय है कि, वेदमन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं अतः वेद आधारित धर्म होने से ब्राह्म धर्म कहते हैं। 
श्रुति आधारित धर्म श्रोत्रिय धर्म और वेद आधारित धर्म होने से वैदिक धर्म कहलाता है।
ब्राह्म धर्म का  दृढ़तापूर्वक आचरण करनें वाले व्यक्ति को ब्राह्मण कहते हैं। ऐसे ब्राह्मण के द्वारा आचरित और ब्राह्मण ग्रन्थों में व्याख्यायित धर्म ब्राह्मण धर्म कहलाता है।
ऋषियों द्वारा आचरित धर्म होनें से आर्षधर्म कहलाता है। तथा श्रेष्ठ जनों द्वारा आचरित धर्म होने से आर्यधर्म कहलाता है। और शाश्वत रूप से सनातन काल से प्रचलित धर्म होने से सनातन धर्म कहलाता है।
स्वायम्भुव मनु द्वारा रचित मानव धर्मशास्त्र के अनुसार आचरण किया गया मानव धर्म कहलाता था और स्वायम्भुव मनु से पाँचवी पीढ़ी में जन्में भरत चक्रवर्ती (भरत मुनि/ जड़भरत) के राज्य का  मानव धर्मशास्त्र आधारित संविधान के अनुसार आचरण भारतीय धर्म कहलाता है।

ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शुद्र जाति नही थी गुण कर्माधारित वर्ण हैं। 
श्रोत्रिय, वेदिक और ब्राह्मण समानार्थी शब्द हैं। वेद ज्ञाता विप्र कहलाते हैं। संस्कारवान व्यक्ति द्विज कहलाता हैं। 
समाज के रक्षक क्षत्रीय कहलाते हैं। व्यवहार कुशल, व्यावहारिक व्यक्ति वैश्य कहलाते हैं। सेवा करके ज्ञानार्जन के अभिलाषी शुद्र कहलाते हैं। 
शुद्र ही वैष्य बनता है फिर उत्तरोत्तर क्षत्रीय और फिर वैदज्ञ होकर विप्र और ब्रह्मज्ञ होकर ब्राह्मण होता है। यह वर्ण व्यवस्था है।
इसलिए वर्णाश्रम धर्म भी कहलाता है।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

अयन, तोयन, ऋतु, मास और व्रत, उत्सव का सम्बन्ध सायन संक्रान्तियों से।

वैदिक काल में तो वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति (२०/२१ मार्च) से ही संवत्सर आरम्भ, उत्तरायण आरम्भ, वसन्तऋतु आरम्भ  और मधुमास आरम्भ होता था। 
शरद सम्पात सायन तुला संक्रान्ति (२२/२३ सितम्बर) से वैदिक दक्षिणायन आरम्भ, शरद ऋतु आरम्भ और ईष मास आरम्भ होता था।
उत्तर परम क्रान्ति , सायन मकर संक्रान्ति (२१/२२ दिसम्बर) से उत्तर तोयन और सहस्य मासारम्भ होता था। तथा 
दक्षिण परम क्रान्ति, सायन कर्क संक्रान्ति (२२/२३ जून) से दक्षिण तोयन, शचि मास आरम्भ होता था।
इन सबका निर्धारण सायन सौर संक्रान्तियों के अनुसार ही होते थे। 
३० दिन के सावन मास भी प्रचलित थे। इस कारण पाँच वर्ष में दो अधिकमास करके संवत्सर आरम्भ वसन्त सम्पात से ही किया जाता था। 
साथ ही अमावस्या, पुर्णिमा को अन्वाधान अर्थात यज्ञ वेदी में समिधा डालने तथा दुसरे दिन इष्टि (हवन) होता था, अर्धचन्द्रमा का दिन (अष्टमी) को अष्टका, एकाष्टका के पर्व मनाते जाते थे।

परवर्ती ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल और विशेषकर शुल्बसुत्र, श्रोतसुत्र, गृह्यसुत्र,धर्मसुत्रों के रचनाकाल में कहीँ अमान्त चान्द्रमास तो कहीँ पुर्णिमान्त चान्द्रमास प्रचलन में आये। 
किन्तु संवत्सर आरम्भ, अयनारम्भ, तोयनारम्भ, और ऋतु आरम्भ सायन सौर संक्रान्तियों से ही होता रहा। 
चान्द्र वर्ष को सायन सौर वर्ष के तुल्य करने के लिए दो संक्रान्तियों के बीच पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति काल से चान्द्रमास आरम्भ माना जाता था। मासो के नाम पूर्णिमान्त मे पड़ने वाले नक्षत्र के नाम के आधार पर पड़े। 
जिन दो संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़ जाती वह (मास अहनस्पति का) अधिक मास माना जाने लगा। लेकिन जिन दो संक्रान्तियों के बीच कोई अमावस्या न पड़े बल्कि दो अमावस्याओं के बीच दो संक्रान्ति का दुर्लभ संयोग बने उसे क्षय मास कहने लगे। ऐसा योग प्रायः १९ वर्ष और फिर १४१ वर्ष के चक्र में पड़ता है। किन्तु संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के पहले पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति काल से ही माना जाता है। फिर वह कोई सा भी चान्द्रमास क्यों न हो।

पौराणिक युग में विष्णु पुराण में भी संवत्सर, उत्तरगोल (वैदिक उत्तरायण) का आरम्भ वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति (२०/२१ मार्च) से आरम्भ होना और दक्षिण गोल (वैदिक दक्षिणायन) शरद सम्पात (२२/२३ सितम्बर) से आरम्भ होना होना बतलाया है। 
विष्णु पुराण और शिव पुराण में पौराणिक उत्तरायण (वैदिक उत्तर तोयन) उत्तर परमक्रान्ति दिवस सायन मकर संक्रान्ति (२१/२२ दिसम्बर) से आरम्भ होना और पौराणिक दक्षिणायन (वैदिक दक्षिण तोयन) दक्षिण परमक्रान्ति दिवस, सायन कर्क संक्रान्ति (२२/२३ जून) से ही आरम्भ करने का वर्णन है। 
साथ ही ऋतुएँ भी तदनुसार सायन सोर संक्रान्तियों से ही आरम्भ करने के निर्देश हैं।

किन्तु वराहमिराचार्य, सूर्यसिद्धान्त रचियता मयासुर, और सिद्धान्त शिरोमणि (लीलावती गणितम् ग्रहगणिताध्याय, गोलाध्याय) के रचयिता भास्कराचार्य ने शकाब्ध को नाक्षत्रिय वर्ष गणना से जोड़कर, संवत्सर आरम्भ और चान्द्रमासों को निरयन सौर संक्रान्तियों से जोड़ दिया।
जिन दो निरयन संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़ जाती वह अधिक मास माना जाने लगा। लेकिन जिन दो निरयन संक्रान्तियों के बीच कोई अमावस्या न पड़े बल्कि दो अमावस्याओं के बीच दो निरयन संक्रान्ति का दुर्लभ संयोग बने उसे क्षय मास कहने लगे। ऐसा योग प्रायः १९ वर्ष, १२२ वर्ष और फिर १४१ वर्ष के चक्र में पड़ता है। किन्तु संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के पहले पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति काल से ही माना जाता है। फिर वह कोई सा भी चान्द्रमास क्यों न हो।

लेकिन इस निरयन संक्रान्तियों से संस्कृत चान्द्र मासो के कारण व्रत,पर्व, उत्सव और मुहुर्त सभी का सम्बन्ध वास्तविक ऋतुओं और वैदिक मासों से हट गया।
पहले पहल वाराणसी (काशी के ज्योतिषाचार्य) बापू शास्त्री जी ने इस गलती को सुधारने हेतु ब्राह्मण काल/ सुत्र रचनाकाल में प्रचलित सायन संक्रान्तियों से संस्कृत चान्द्रमासो वाली पञ्चाङ्ग प्रकाशित की। लेकिन कर्मकाण्डी पण्डितों ने इसे नही अपनाया, अस्तु जनता द्वारा स्वीकृत नही होने के कारण श्री बापू शास्त्री जी को प्रकाशन रोकना पड़ा। और बाद में सूर्यसिद्धान्त आधारित पञ्चाङ्ग प्रकाशित होने लगी।

आचार्य दार्शनेय लोकेश ने उक्त गलतियों को पकड़ा और सही पञ्चाङ्ग अपने पिताश्री के शुभ नाम से जारी किया जो श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम् नाम से प्रति वर्ष प्रकाशित हो रहा है।

रविवार, 6 फ़रवरी 2022

वसन्त सम्पात जिस नक्षत्र पर होता था तदनुसार व्रत पर्वों के आरम्भ में

वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। ,वेदों पर आधारित होनें के कारण हमारा सनातन वेदिक धर्म ब्राह्म धर्म है। 
 वेदों से लेकर पुराणों तक संवत्सर आरम्भ वसन्त विषुव दिवस अर्थात वसन्त सम्पात दिवस से होता है।वेदिककाल में वसन्त विषुव से उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमासारम्भ होता था। 
जिसदिन भूकेन्द्रीय ग्रह गणनानुसार सूर्य वसन्त सम्पात यानी सायन मेषादि बिन्दु पर होता है। इसदिन सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर होकर उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है। उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होता है, दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है। तथा दिनरात बराबर होते हैं। वह दिन वसन्त महाविषुव दिवस कहलाता है। वेदों में इस दिन से संवत्सरारम्भ, उत्तरायण आरम्भ, वसन्त ऋतु आरम्भ, और मधुमास आरम्भ दिवस कहा गया है। क्योंकि, उसी अवधि में आर्यावर्त और ब्रह्मावर्त में वसन्त ऋतु आरम्भ होती है।
अर्थात वसन्त विषुव दिवस से ही पञ्जाब,हरियाणा, सिन्ध, कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान, पकजाकिस्तान, उजाबेगिस्तान, पामीर तथा ईरान,अफगानिस्तान,में वसन्त ऋतु आरम्भ होती है।
वेदों में वसन्त विषुव से उत्तरायण आरम्भ, वसन्त ऋतु आरम्भ, और मधुमास आरम्भ कहा गया है।तथा मुख्यरूप से 1 मधु, 2 माधव, 3 शुक्र, 4 शचि, 5 नभः, 6 नभस, 7 ईष, 8 ऊर्ज, 9 सहस, 10 सहस्य,11 तपस और 12 तपस्य नामक (सायन) सौर  मास प्रचलित थे। 
उत्तरायण मधु मास आरम्भ से नभस मासान्त तथा ईश मासारम्भ तक रहता था।  उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षाऋतु आती थी। दक्षिणायन  ईष मासारम्भ से तपस्य मासान्त तक अर्थात मधुमासारम्भ के दिन तक होती थी। दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
उत्तरायण और ग्रीष्म ऋतु के मध्य में उत्तर तोयन और दक्षिणायन और हेमन्त ऋतु के मध्य में दक्षिण तोयन होता था।
इसके अतिरिक्त ऋग्वेदोक्त पवित्र आदि मास भी इसी प्रकार प्रचलित रहे।
उत्तर वेदिक काल में तैत्तरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण के अनुसार चित्रा तारे को नक्षत्र मण्डल का मध्य स्थान मानकर चित्रा तारे  से 180° पर नक्षत्र मण्डल का आरम्भ बिन्दू माना गया। इसे निरयन मेषादि बिन्दु कहा जाता है।
वर्तमान में 23 सितम्बर को पड़नें वाले शरद विषुव जिसदिन भूकेन्द्रीय ग्रह गणना से  सूर्य भूमध्य रेखा पर होकर भूमध्य रेखा से दक्षिण (दक्षिण गोलार्ध) में प्रवेश करता है उस समय से दक्षिणायन, शरद ऋतु, और ईष मास का आरम्भ होता था।
इसी प्रकार वर्तमान में 22/23 दिसम्बर को पड़ने वाली सूर्य की उत्तर परमक्रान्ति दिवस (सायन) कर्क संक्रान्ति जिसदिन सूर्य कर्क रेखा पर होता है उस समय वेदिककाल में उत्तर तोयन तथा शचि मास आरम्भ होता था। इसी प्रकार वर्तमान में 22/ 23 दिसम्बर को पड़नें वाली  दक्षिण परमक्रान्ति दिवसको  (सायन) मकर संक्रान्ति को जब सूर्य मकर रेखा पर होता है उस समय वेदिककाल में दक्षिण तोयन और सहस्य मास आरम्भ होता था।


 किन्तु वेदिक काल में  न तो 1 मेष, 2 वृष, 3 मिथुन, 4 कर्क,5 सिंह, 6 कन्या,7  तुला, 8 वृश्चिक, 9 धनु, 10 मकर,11 कुम्भ और 12 मीन (निरयन) राशियाँ प्रचलित थी। और 1 चैत्र, 2 वैशाख, 3 ज्यैष्ठ, 4 आषाढ़, 5 श्रावण, 6 भाद्रपद, 7 आश्विन, 8  कार्तिक, 9 मार्गशीर्ष, 10 पौष, 11 माघ, और 12 फाल्गुन मास भी अप्रचलित थे। 

जब निरयन मेषादि मास और निरयन सौर संस्कृत चैत्रादि मास प्रचलित हुए तब भी जो मास वसन्त सम्पात / वसन्त विषुव दिवस के आसपास आरम्भ होता उसी मास को प्रथम मास माना जाता था। 
ऋग्वेद  में तो निरयन शब्द सायन कर्कसंक्रान्ति और सायन मकर संक्रान्ति दिवस के लिए हुआ है। 
संवत्सरारम्भ सदैव सायन मेष संक्रान्ति से ही होता था। निरयन संक्रान्तियों में वसन्त सम्पात आने के कारण उन निरयन संक्रान्तियों को और उन निरयन संक्रान्तियों से सम्बद्ध चैत्रादि मासान्त अमावस्या या मासारम्भ तिथियों में पर्वोत्सव या पुर्णिमा में  मनाये जाते थे जिनकी परम्परा आज भी प्रचलन में है।
इसके उदाहरण नीचे है।⤵️
सन 25515 ई.पू. तथा सन 285 ईस्वी में वसन्त सम्पात (निरयन) मेष 00° पर था अर्थात (निरयन) मेष संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ फाल्गुन अमावस्यान्त / चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ीपड़वा) से होता था। चैत्री नवरात्रि ईसी कारण मनाते हैं।

24440 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मीन 15° पर था। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को नवसस्येष्टि पर्व एवम् होलीका उत्स्व इसी कारण मनाते हैं।

सन 23365 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मीन 00° पर था अर्थात (निरयन) मीन संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ माघी अमावस्यान्त /  फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था।  महा शिवरात्रि पर्व एवम् मौनी अमावस्या व्रत इसी उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

22290 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कुम्भ 15° पर था। माघी पूर्णिमा। विश्वकर्मा जयन्ती एवम् दाण्डा रोपिणी पूर्णिमा इसी उपलक्ष्य में मनाते हैं ।

सन 21215  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कुम्भ 00° पर था अर्थात (निरयन) कुम्भ संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ पौषी अमावस्यान्त /  माघ शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। 
गुप्त नवरात्रि आरम्भ एवम् वसन्त पञ्चमी इसी उपलक्ष्य में मनाते हैं।

20140  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मकर 15° पर था। पौष शुक्ल पूर्णिमा शाकम्भरी जयन्ती पर्व।

सन 19065  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मकर 00° पर था अर्थात (निरयन) मकर संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ मार्गशीर्ष अमावस्यान्त (पित्र) अमावस्यान्त/  पौष  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। 

17990 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) धनु 15° पर था। मार्गशीर्ष पूर्णिमा दत्त जयन्ती पर्व।

सन 16915  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) धनु 00° पर था अर्थात (निरयन) धनु संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ कार्तिक अमावस्यान्त /  मार्गशीर्ष  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। 

15840 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) वृश्चिक15° पर था। कार्तिक पूर्णिमा / काशी में देवदिवाली/ छोटी दिवाली पर्व।

सन 14765  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) वृश्चिक 00° पर था अर्थात (निरयन) वृश्चिक संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ आश्विन अमावस्यान्त दिवाली/  कार्तिक  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। पञ्चदिवसीय  दिवाली पर्वोत्सव धन्वन्तरि जयन्ती, नर्क चतुर्दशी, दिवाली, बलिप्रतिपदा, अन्नकूट एवम् / यम द्वितीय इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 13690 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) तुला 15° पर था। आश्विन पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा उत्सव, कोजागरी पूर्णिमा व्रत पर्व।

सन 12615  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) तुला 00° पर था अर्थात (निरयन) तुला संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ भाद्रपद अमावस्यान्त /  आश्विन  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। सर्वपितृ अमावस्या और शारदीय नवरात्रि इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 11540 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कन्या 15° पर था। भाद्रपद पूर्णिमा, प्रोष्टपदी पूर्णिमा व्रत । महालय आरम्भ।

सन 10465  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कन्या 00° पर था अर्थात (निरयन) कन्या संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ  श्रावण अमावस्यान्त /  भाद्रपद  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। पितृ अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या, हरियाली अमावस्या, पिठोरा अमावस्या, हरतालिका तृतीया, नाग पञ्चमी और  इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 9390 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  सिंह 15° पर था। श्रावण पूर्णिमा, यजुर्वेदी उपाकर्म, राखी ।

सन 8315  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) सिंह  00° पर था अर्थात (निरयन) सिंह संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ  आषाढ़ अमावस्यान्त /  श्रावण  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। पितृ अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या, हरियाली अमावस्या, पिठोरा अमावस्या, हरतालिका तृतीया, नाग पञ्चमी और  इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 7240 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  कर्क 15° पर था। आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा/ गुरु पूर्णिमा ।

सन 6165  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कर्क  00° पर था अर्थात (निरयन) कर्क संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ  ज्यैष्ठ अमावस्यान्त /  आषाढ़  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। गुप्त नवरात्रि  इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 5090 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  मिथुन 15° पर था। ज्यैष्ठ पूर्णिमा,वट सावित्री पूर्णिमा ।

सन 4015  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मिथुन  00° पर था अर्थात (निरयन) कर्क संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ वैशाख  अमावस्यान्त /  ज्यैष्ठ  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। वट सावित्री अमावस्या  इसी उपलक्ष्य में मनती है। 

 2940 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  वृष 15° पर था। वैशाख पूर्णिमा,कुर्म जयन्ती, नृसिह जयन्ती।(सिद्धार्थ गोतम बुद्ध पूर्णिमा।)

सन 1865  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) वृष  00° पर था अर्थात (निरयन) वृषभ संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ चैत्र  अमावस्यान्त /  वैशाख  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। अक्षय तृतीया  इसी उपलक्ष्य में मनती है। 

790  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  वृष 15° पर था। चैत्र पूर्णिमा, हनुमान जयन्ती।

सन 285  ईस्वी में वसन्त सम्पात (निरयन) मेष  00° पर था अर्थात (निरयन) मेष संक्रान्ति को  हुआ था। 

तब संवत्सरारम्भ फाल्गुनी  अमावस्यान्त /  चैत्र  शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी)  से आरम्भ होना आरम्भ हुआ था। गुड़ीपड़वाँ चैत्री और नवरात्रि  इसी उपलक्ष्य में मनती है। 

1360  ईस्वी में वसन्त सम्पात (निरयन)  मेष 15° पर था। फाल्गुनी पूर्णिमा, होली।

यही स्थिति 22 मार्च 285 ईस्वी के आसपास का इतिहास देखिये।⤵️

जैसे ईस्वी सन 285 के 22 मार्च को जब  वसन्त सम्पात चित्रा नक्षत्र से 180° पर अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर आया तो उस कालावधि से चैत्र मास प्रथम मास कहलाता है। 
इस समय को इतिहासकारों की दृष्टि से देखें तो निम्नानुसार स्थिति बनती है।⤵️
1 अयनांश 355° से 05° तक।
 सन 75ई.पू. से 645 ई. तक। 
शुंगवंश और *कण्व वंश* से  हर्षवर्धन, व्हेनसांग के यात्रा काल और दक्षिण में चालुक्य वंश के आरम्भ  का समय तक वसन्त सम्पात निरयन मेषादि बिन्दु अर्थात चित्रा तारे से 180° पर रहा। 
2 अयनांश 350° से 10° तक ।
सन 430ई.पू. से 1000ई. तक।
बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु  और उज्जैन में शिशुनाग के शासन से राजा भोज के शासन , मोहमद गजनी के आक्रमण  और दक्षिण में चालुक्य वंश के अन्त और चोल वंश के उदय तक।
3  अयनांश 345° से 15° तक।
सन 790 ई.पू. से 1369 ई. तक।
ईतिहासकारों की दृष्टि से महाभारत रचनाकाल या महाकाव्य काल से  मोहम्मद तुगलक तक। इब्नबतूता के यात्राकाल तक।

मतलब ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में वेदिक परम्पराओं का टूटना आरम्भ होकर पौराणिक स्थापनाएँ जमनें लगी थी।


मतलब  चैत्रादि मास अत्याधुनिक हैं।
वेदिक काल में (सायन) सौर गणनानुसार ही संवत्सर , अयन, तोयन, ऋतुएँ और मास और गतांश तथा संक्रान्ति गते के रूप में दिनांक प्रचलित रहे।
तत्पश्चात महाभारत के बाद चित्रा नक्षत्र से 180° पर सूर्य होनें के दिन/ समय से नाक्षत्र वर्ष , मास , और गतांश और गते प्रचलित हुए। जो पञ्जाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, बङ्गाल, उड़िसा, तमिलनाड़ु, केरल में आजतक प्रचलित है। 

पौराणिक काल में संवत्सर , अयन, तोयन, ऋतुएँ तो (सायन) सौर गणनानुसार ही रहे पर चैत्रादि चान्द्रमास और तिथियाँ प्रचलित हो गये। जिन्हें (निरयन) संक्रान्तियों से अधिक मास क्षय मास कर नाक्षत्रीय वर्ष के बराबर कर उत्तर भारत में कुषाण वंशिय कनिष्क नें शकाब्द नाम से कश्मीर, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार में प्रचलित किया और दक्षिण भारत में सातवाहन वंश ने और विशेषकर गोतमीपुत्र सातकर्णी नें शालिवाहन शकाब्द नाम से  आन्ध्रप्रदेश,तेलङ्गाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, गुजरात प्रचलित किया। 
किन्तु यह (निरयन) सौर संस्कृत शकाब्द और इसके चान्द्रमासों का सम्बन्ध परम्परागत (सायन) सौर संवत्सर और ऋतुचक्र से संयुक्त रखनें का प्रयास जारी रहता है। किन्तु यह जुगाड़ बहुत लम्बे समय सम्भव नही होगा।
अतः उचित होगा कि,
1 वेदिक परम्परानुसार ही संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु, मधु माधवादि मास, संक्रान्ति गतांश, और संक्रान्ति गते तथा दशाह के वासर पुनः प्रचलित किये जायें।
यथा सम्भव मुख्य मुख्य व्रतोत्सव भी उक्त गतांश अनुसार ही निर्धारित किये जायें।
किन्तु  अमावस्या, पूर्णिमा या अर्धचन्द्र से सम्बन्धित व्रतोत्सव को तिथियों से मनाते हैं। 
2  सौर संक्रान्तियों और नक्षत्रों पर आधारित व्रतोत्सव को नक्षत्र योगतारा को केन्द्र में रखकर आसपास के तारासमुह को मही नक्षत्र मानकर असमान भोगांश वाले नक्षत्रों पर चन्द्रमा और सूर्य और बृहस्पति आदि ग्रहों की स्थिति अनुसार भी मनाये जासकते हैं। किन्तु इसमें वर्तमान प्रचलित 30° की (निरयन) राशि और 13°20"' के काल्पनिक नक्षत्रों को कोई महत्व नही दिया जावे। नक्षत्र भोग फिर से निर्धारित किये जाये।
3  इस विषय में आचार्य दार्शनेय लोकेश नें मोहन कृति आर्ष पत्रक में (सायन) सौर संक्रान्तियों पर आधारित (सायन) सौर संस्कृत चान्द्रमास और नक्षत्र योगतारा को आरम्भ बिन्दु मानकर असमान भोग वाले अट्ठाइस नक्षत्रों को भी मान्यता दी जा सकती है। 
4   चित्रा नक्षत्र से 180° से आरम्भ  फिक्स झोडिएक में  नक्षत्र योगतारा को केन्द्र में रखकर आसपास के तारासमुह को मही नक्षत्र मानकर असमान भोगांश वाले 88 आधुनिक नक्षत्रों और  28 वेदिक नक्षत्रों पर सौर मण्डल के चलित पिण्डों /सूर्य, चन्द्र और ग्रहों की पोजीशन (स्थिति) भी दर्शाई जाये। यह संहिता ज्योतिष में अति महत्वपूर्ण होंगे।
5  चित्रा तारे से 180° पर स्थित (निरयन) मेषादि बिन्दु से भी अंशात्मक स्थिति दर्शाई जाये। यह इतिहास निर्धारण में भविष्य में उपयोगी होगा।

सोमवार, 31 जनवरी 2022

निम्बार्काचार्य का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन भाग २

निम्बार्क का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन ---

 निम्बार्काचार्य जीव (चित्) और जगत (अचित्)  के ब्रह्म (ईश्वर/ श्रीहरि) से भेदान्वित अभेद सम्बन्ध को प्रतिपादित करते हैं। मतलब जीव और जगत का ब्रह्म से भेद होते हुए भी उनमें आधारगत अभेद सम्बन्ध है।

निम्बार्काचार्य अपने स्वाभाविक द्वैताद्वैतवाद में जीव और ब्रह्म में समान रूप से भेद और अभेद स्वीकार करने से भेदवादी भक्त और अभेदवादी ज्ञानी को सन्तुष्ट रखने में समर्थ हुए।  इसी प्रकार वे फलदाता ईश्वर और कर्म के कर्ता भोक्ता भक्त जीव के प्राथक्य पर आधारित कर्मकाण्ड प्रधान धर्माचरण वादियों और संसार में व्याप्त अनेकता में एक्य स्थापित करने वाले, एक से ही अनेक की उत्पत्ति की समुचित व्याख्या करने में समर्थ दार्शनिकों दोनों की आवश्यकताओं को  सन्तुष्ट करनें में समर्थ हुए।
क्योंकि, स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन कर्मवादी भक्त और ज्ञानी के मध्य का दर्शन है तथा धार्मिक और दार्शनिक अतियों के मध्य का दर्शन है।

निम्बार्काचार्य समान रूप से सत्य और नित्य तीन द्रव्यों में विश्वास करते हैं।
१ नियन्ता ब्रह्म जो सभी दिव्य गुणों के आश्रय श्रीहरि हैं जिन्हें वे वे ही राधा कृष्ण भी कहते हैं।  
२ चित् जीवात्माएँ जो संख्या में अनन्त अणुरूप है, ज्ञाता और ज्ञान दोनों है तथा कर्ता-भोक्ता है। और
३ अचित यानी जड़ जगत जो भोग्य पदार्थ है।

निम्बार्काचार्य का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन के अनुसार  ब्रह्म इस विश्व का निमित्तोपादान कारण है। यह समस्त जगत-व्यापार उसकी लीला है और जगत उत्पत्ति उसकी लीला का परिणाम है।
ब्रह्म अन्तर्वर्ति और लोकातीत  (Immanent & Transcendent) दोनों है। वह विश्व के कण-कण में व्याप्त है फिर भी यह सम्पूर्ण विश्व उसका एक पाद (चरण) मात्र है। शेष तीन पाद उससे अतीत है।
अणुरूप जीवात्माएँ ब्रह्म (श्रीहरि) से वैसे ही सम्बन्धित है जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से सम्बन्धित है। 
जैसे सागर से अलग लहरों की कोई सत्ता नही है अतः सागर से अभिन्न है लेकिन लहरें स्वयम् सागर नहीं है अतः सागर से भिन्न भी है। इसी प्रकार जीव, जगत और ब्रह्म में स्वाभाविक भेदाभेद है।
जीव ब्रह्म (ईश्वर) का वास्तविक अंश हैं । लेकिन जीव और जगत का ब्रह्म से न पूर्ण एक्य है न पूर्ण भेद है। यही उनके बीच भेदाभेद सम्बन्ध है।
जीव और जगत ब्रह्म से अभिन्न हैं क्योंकि, ब्रह्म जीव और जगत में अन्तर्वर्ति होनें से उनमें व्याप्त है और उनका स्वरूप निर्माण करता है। साथ ही जीव और ब्रह्म जगत से भिन्न भी है क्योंकि, ब्रह्म जीव और जगत से अतीत है और उनके गुण भी ब्रह्म से भिन्न है। इस भिन्नता और अभिन्नता का कोई कारण नहीं है। 
ब्रह्म साकल्य और जीव अंश है इस प्रकार अभिन्न है। ब्रह्म नियन्ता और जीव नियन्त्रित है। इस प्रकार भिन्न भी है। अतः जीव भक्त और ब्रह्म भगवान है।
 
निम्बार्काचार्य के अनुसार जीव दो प्रकार के होते हैं। बद्ध और मुक्त।
मुक्त जीवों में भी कुछ नित्य मुक्त हैं। ऐसे नित्य मुक्त जीव गरुड़ और विश्वक्षेण संजीव हैं तथा ईश्वर की बांसुरी और उनके आभुषण जैसे निर्जीवों को भी नित्य मुक्त जीव माना है। 
मुक्त जीवों को उनके जन्म के समय ईश्वर की कृपादृष्टि पड़नें के कारण मुमुक्षु प्रवृत्ति होजानें से गुरुकृपा प्राप्त कर गुरु के मार्गदर्शन में सद्कर्म और उपासना कर विद्या प्राप्त कर अर्थात ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण रूप प्रपत्ति और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण रूप गुरुपासत्ती के द्वारा अन्तःकरण शुद्ध कर लेनें पर ईश्वरीय कृपा से  सांसारिक सुखों से विरक्त और मुमुक्षु भक्त के विदेहमुक्ति प्राप्त करने योग्य होनें पर प्रारब्ध भोग पर्यन्त जीवन व्यतीत कर  मरणकाल में ईश्वर के ध्यान में मग्न भक्त को गुरुकृपा से ईश्वर ने कृपा कर उन्हे क्रममुक्ति प्रदान की हैं। 
जबकि कुछ जीवों के जन्म के समय उनपर ईश्वर की कृपा दृष्टि पड़ने से मुमुक्षु हो सद्कर्म और ईश्वरोपाससना कर विद्याप्राप्ति कर निर्मल अन्तःकरण से प्रपत्ति और गुरुपासत्ती के माध्यम से मुक्ति के मार्ग में अग्रसर हैं। 
लेकिन कुछ जीव अभी भी सांसारिक भोगों में रस लेनें के कारण बद्धावस्था में ही हैं। 
निम्बकाचार्य जी के अनुसार द्विज अर्थात  ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैष्य वर्णीय भक्त को सद्कर्म, उपासना और विद्या प्राप्ति/ ज्ञान प्राप्ति से भी ईश्वर कृपा से मुक्ति की पात्रता प्राप्त हो सकती हैं लेकिन शुद्र की मुक्ति में प्रपत्ति (पूर्ण ईश्वर समर्पण) और  गुरुपासत्ती (सद्गुरु पर पूर्ण समर्पण) ही उपाय हैं।

समस्त वैष्णवाचार्यों की भाँति निम्बार्काचार्य भी सद्योमुक्ति को स्वतोव्याघाती पद कहकर असम्भव मानते हैं। उनके अनुसार जीव द्वारा शरीर त्यागनें पर देवयान मार्ग से यात्रा कर ईश्वरीय कृपा से क्रमशः वैकुण्ठ वास यानी सालोक्य मुक्ति, भगवान के समान वैभव/ ऐश्वर्य प्राप्ति रूप सार्ष्टि मुक्ति, सदैव भगवान के ही निकट रहना सामीप्य मुक्ति, श्रीवत्स चिन्ह और कोस्तुभ मणि को छोड़कर श्रीहरि का रूप मिलना यानी सारूप्य और अन्त में भगवान श्रीहरि से ही युक्त हो जाना/  जुड़ जाना/  किन्तु लय नहीं होना रूप सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है।

मुक्तावस्था में जीव ब्रह्म और जगत के सम्बन्धों को जान कर जगत के नानात्व से भ्रमित नहीं होकर जगत के नानात्व को ब्रह्म से स्वतन्त्र देखता है तथा  स्वयम् के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास की अवस्था प्राप्त कर ब्रह्म के श्रीवत्स चिह्न और कौस्तुभ मणि को छोड़ भगवान के श्री हरि स्वरूप प्राप्त करले था है। और  जगत सम्बन्धी कार्य और व्यापार तथा दिव्य कृपा प्रदान करनें के ईश्वरीय अधिकारों को छोड़ भगवान श्री हरि के शेष गुणों को भी प्राप्त कर लेता है।  जीव मुक्त अवस्था में सदा सर्वदा ईश्वर भक्ति में ही लीन रहता है। 
निम्बार्काचार्य भी सभी वैष्णवाचार्यों की भाँति ही मुक्ति को भक्ति की दासी मानते हैं।   

रविवार, 30 जनवरी 2022

नारद पुराणोक्त एकादशी व्रत।

एकादशी के सम्बन्ध में नारद पुराण में राजा रुक्माङ्गद की कथा । 
कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६१२ से ६३९ तक देखें।
नारद पुराण में  एकादशी व्रत दृढ़तापूर्वक करने वाले राजा रुक्माङ्गद  द्वारा ब्रह्मा की मानस पुत्री मोहिनी को कार्तिक मास की महिमा बतलाते हुए एकादशी को व्रत रखने के उल्लेख और अगले अध्याय में राजा रुक्क्माङ्गद की आज्ञा से रानी संध्यावली द्वारा कार्तिक मास में कृच्छ्व्रत आरम्भ करने और राजा रुकमाङ्गद एकादशी व्रत दृढ़तापूर्वक करने की घोषणा, उसके बाद मोहिनी द्वारा बुलवाये गये गोतम ब्राह्मणों द्वारा एकादशी व्रत अवैदिक बतलाने पर भी राजा रुक्माङ्गद का वैष्णवों के लिए एकादशी व्रत की अनिवार्यता बतलाने के प्रकरण से एकादशी तिथि को व्रत रखने की परम्परा का आरम्भ माना जाता है। 

[विशेष सुचना --- गोतम ब्राह्मणों का कथन असत्य नही था। वेदों में तिथियों का उल्लेख नही है, उस समय सौर गणना (केलेण्डर) प्रचलित थी। सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार जैसे आज भी दक्षिण भारत में व्रत उत्सव होते हैं, बङ्गाल में दुर्गा पूजा में तिथियों की तुलना में चन्द्रमा के नक्षत्रों के अनुसार दुर्गा का आव्हान, पूजन, बलिदान और विसर्जन निर्धारित किया जाता है, वैसे ही कुछ व्रत उत्सव सायन सौर मधु - माधवादि मासों और चन्द्रमा के नक्षत्रों के अनुसार निर्धारित होते थे। तिथियों का उल्लेख तो वाल्मीकि कृत मूल रामायण में भी नही है। महाभारत में अवश्य तिथियों का उल्लेख है।
अतः एकादशी वैदिक व्रत नही है यह गोतम ब्राह्मणों की का कथन पूर्ण प्रामाणिक सत्य था।
राजा मोरध्वज से पुत्र का बलिदान करवानें की कथा में उक्त बलिदान करवानें वाले दिन एकादशी तिथि थी। इस आधार पर मेसोपोटामिया के चन्द्रवंशियों में एकादशी तिथि प्रचलन में आई थी। तब भारत में ऐसा कोई व्रत प्रचलित नही था। चन्द्रवंशियों द्वारा भारत में तिथि वाला उन्नीस वर्षीय चक्र वाली सौर चान्द्र गणना (केलेण्डर) प्रचलित किया। जिसे अन्त में विक्रमादित्य के समय वराहमिहिर ने प्रचलित करवाया।]

इस प्रकार राजा रुक्माङ्गद नें चन्द्र वंशियों में प्रचलित परम्परा अनुसार एकादशी व्रत भारत में भी आरम्भ करवाया।
जिसमें एकादशी के पूर्वदिन सायंकालीन भोजन का त्याग, एकादशी के दिन प्रातः कालीन भोजन का त्याग और द्वादशी के दिन निराहार उपवास करना उल्लेखित है।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३७ से ६३८ तक में राजा रुक्माङ्गद की उक्त कथा में ब्राह्मणों के शाप से मोहिनी को किसी भी लोक में स्थान न पाने पर ब्रह्मा जी ने मोहिनी को दशमी तिथि अन्तिम भाग में स्थान देकर के तेरहवें मुहुर्त के पश्चात अरुणोदय से सूर्योदय तक व्रत में रहकर दशमी विद्धा एकादशी करने वाले ब्राह्मणों के एकादशी व्रत के पुण्य फल प्राप्त करने का अधिकार दिया।  इसलिए एकादशी व्रत करने वाले दशमी विद्धा एकादशी में व्रत नहीं करते। किन्तु वैध कब से आरम्भ हो इसपर स्मार्त, पौराणिक और महाभागवतों में मतभेद हैं।

एकादशी में दशमी वैध -- 

गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३७ से ६३८ तक में उल्लेख के अनुसार दशमी तिथि समाप्ति और एकादशी तिथि आरम्भ के समय के अनुसार तीन प्रकार के वैध बतलाते गये हैं।

१ गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३७ पर श्रोत्रिय/ वैदिकों और स्मार्तों अर्थात केवल वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों, उपवेदों, वेदाङ्गो, षड्शास्त्रों (षड दर्शनों) और स्मृतियों को ही धर्मशास्त्र मानने वाले स्मार्तों के लिए सूर्योदय समय या सूर्योदय के बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ होने पर दूसरे दिन / परा अर्थात् उदिता एकादशी में व्रत करना। 

[विशेष सुचना --- लेकिन वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, ग्रह्य सुत्रों, श्रोतसुत्रों सभी में एक निश्चित नियम है कि, व्रत की पूर्णता व्रत के पारण पर ही होती है, इसलिए व्रत रखनें की अगली तिथि में पारण आवश्यक है।
यदि एकादशी का व्रत करना है तो द्वादशी में पारण आवश्यक है। यदि द्वादशी में पारण नही होता तो एकादशी का व्रत अपूर्ण माना जाएगा।]

२ गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३८ पर पौराणिक वैष्णवों के लिए अरुणोदय विद्धा एकादशी का त्याग कहा है। और रात्रि के अन्तिम दो मुहुर्त को अरुणोदय बतलाया है। 
सामान्यतया पौराणिक वैष्णव छप्पन घटि का वैध मानते हैं। अर्थात सूर्योदय से २२ घण्टे २४ मिनट बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ हो तो पौराणिक वैष्णव दुसरे दिन उदिता एकादशी न हो तो द्वादशी तिथि में  एकादशी का व्रत करते हैं।
 रामानुजन सम्प्रदाय वाले अरुणोदय पचपन घटि पर मान कर पचपन घटि का वैध मानते हैं अर्थात सूर्योदय से २२ घण्टे बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ हो तो रामानुजन सम्प्रदाय वाले वैष्णव दुसरे दिन उदिता एकादशी न हो तो द्वादशी तिथि में में एकादशी का व्रत करते हैं।

३  गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ  ६३८ में उल्लेख निष्काम एवम् विरक्त वैष्णव परम भागवत जन अर्धरात्रि के समय भी दशमी विद्ध एकादशी को त्याग देते हैं वचन के अनुसार  निम्बार्क सम्प्रदाय मध्यरात्रि या पैंतालीस घटि का वेद मानते हैं। तदनुसार मध्यरात्रि या सूर्योदय के अठारह घण्टे बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ हो तो निम्बार्क सम्प्रदाय वाले वैष्णव दुसरे दिन उदिता एकादशी न हो तो द्वादशी तिथि में में एकादशी का व्रत करते हैं।

निम्बार्काचार्य का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन भाग १

स्वाभाविक भेदाभेद
श्रीनिम्बार्काचार्य ने ब्रह्म ज्ञान का कारण एकमात्र​ शास्त्र को माना है। सम्पूर्ण धर्मों का मूल वेद है। वेद के विपरीत​ मत वाली स्मृतियाँ अमान्य हैं। जहाँ श्रुति में परस्पर द्वैध (भिऔन्न रूपत्व) भी​ आता हो वहाँ श्रुति रूप होने से दोनों ही वचन धर्म हैं। किसी एक वचन को​ उपादेय तथा अन्य वचन को हेय नहीं कहा जा सकता। तुल्य बल होने से​ सभी श्रुतियाँ प्रधान हैं। किसी के प्रधान व किसी के गौण भाव की​ कल्पना करना उचित नहीं है।
इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भिन्न​ रूप श्रुतियों का भी समन्वय करके निम्बार्क दर्शन ने परमात्मा, जीव और जगत के बीच स्वाभाविक भेदाभेद सम्बन्ध को स्वीकृत किया है। इसमें समन्वयात्मक दृष्टि होने से भिन्न रूप श्रुति का भी​ परस्पर कोई विरोध नहीं होता। अतएव निम्बार्क दर्शन को ‘अविरोध​ मत’ के नाम से भी अभिहित करते हैं।
कुछ श्रुति वाक्यों में भेद का बोध  होता हैं तो कुछ श्रुति वाक्य अभेद का​ निर्देश देते हैं। 
यथा- 
‘सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छा० ६/२/ १)
 आत्मा वा इदमेकमासीत्’  (तै०२/१) तत्त्वमसि’ (छा./१४/ ३) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृ० २/५/१६) सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छा.३/१४/१) और  
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि गणा इव’ (गी, ७/७/) इत्यादि अभेद का बोध कराती हैं।
जबकि,
‘पराऽय शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविक ज्ञान बल-क्रिया च’ (श्वे० ६/८) 
‘सर्वांल्लोकानीशते ईशनीभिः’ (श्वे० ३/१) 
‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति’ (तै० ३/१/१) । 
‘नित्यो नित्यानां चेतश्नचेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् (कठ० ५/१३)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।’ (गीता १०/८) 
‘पराऽय शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविक ज्ञान
बल-क्रिया च’ (श्वे० ६/८)
‘सर्वांल्लोकानीशते ईशनीभिः’ (श्वे० ३/१)
इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म,जीव और जगत के भेद का प्रतिपादन करती हैं।
 श्रुति​ स्मृतियों का निर्णय है कि,वेद सर्वांशतया प्रमाण है।। अतः तुल्य होने से भेद दर्शक वचन और अभेद दर्शक वचन दोनों को ही प्रधान​ मानना होगा। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह सम्भव नहीं। भेद अभेद नहीं हो सकता और अभेद को भेद नहीं कह सकते। ऐसी स्थिति में कोई ऐसा मार्ग निकालना होगा कि दोनों में विरोध न हो तथा समन्वय हो​ जावे। यह समन्वय ही भेदाभेद दर्शन है।
‘ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है। उपादान अपने कार्य से​ अभिन्न होता है। स्वयं मिट्टी ही घड़ा जब बन जाती है।तब मिट्टीके बिना घडे​ की कोई सत्ता नहीं। कार्य अपने कारण में अति सूक्ष्म रूप में विद्यमान ररहता हैं। उस समय नाम रूप का विभाग न होने के कारण कार्य का पृथक्​ रूप से ग्रहण नहीं होता पर अपने कारण में उसकी सत्ता अवश्य​ रहती है। इस प्रकार कार्य व कारण की ऐक्यावस्था को ही अभेद कहते हैं।’
 ‘सदेव सौम्येदमग्र आसीत् ०’ इत्यादि श्रुतियों का यह ही​ अभिप्राय है। इसी से सत् ख्याति की उपपत्ति होती है। सद्रूप होने​ से यह अभेद सवाभाविक है। दृश्यमान जगत् ब्रह्म का ही परिणाम है।
अपनी शक्ति का विक्षेप करके जगत् की सृष्टि करता है। यह​ ही शक्ति-विक्षेप लक्षण परिणाम है। यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः। स्वभावतो देव एकः । समावृणोति स नो दधातु ब्रह्माव्ययम्।। (श्वे० ६/१०) ‘यदिदं किञ्च तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत् (​तै. २/६) इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। ब्रह्म ही प्राणियों को अपने-अपने किये कर्मों का फल​ भुगताता है।
अतः जगत् का निमित्त कारण होने से ब्रह्म और जगत्​ का भेद भी सिद्ध होता है, जो कि अभेद के समान स्वाभाविक ही​ है।
श्रुतियों में कुछ भेद का बोध कराती हैं तो कुछ अभेद का​ निर्देश देती हैं।
यथा-
ब्रह्म मकड़ी के जाले के​ समान अपनी शक्ति का विक्षेप करके जगत् की सृष्टि करता है। यह​ ही शक्ति-विक्षेप लक्षण परिणाम है।
यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः।
स्वभावतो देव एकः । समावृणोति स नो दधातु ब्रह्माव्ययम्।। (श्वे० ६/१०)
‘यदिदं किञ्च तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत् ।(​तै. २/६)
इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं।

बुधवार, 26 जनवरी 2022

निम्बार्क सम्प्रदाय

निम्बार्क संप्रदाय के चिन्ह (शंख, चक्र व उर्ध्वपुंड निम्बार्क तिलक)
 निम्बार्काचार्य, निम्बार्क सम्प्रदाय और स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन/स्वाभाविक द्वेताद्वेत दर्शन।
(स्रोत - विकिपीडिया)
निम्बार्काचार्य और निम्बार्क सम्प्रदाय
निम्बार्क सम्प्रदाय सनक सम्प्रदाय के नाम से भी विख्यात है। इस सम्प्रदाय का मानना है कि श्री निम्बार्काचार्य का प्रादुर्भाव द्वापर के अन्त में श्री कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ और परीक्षित के पुत्र जनमेजय के समय ३०९६ ईसापूर्व में कार्तिक पूर्णिमा को सायंकाल में महाराष्ट्र के औरंगाबाद के निकट मूंगीपैठनमें वैदुर्यपत्तन (दक्षिण काशी) के तैलंगदेशीय सुदर्शनाश्रम में भृगुवंशीय अरुण ऋषि की धर्मपत्नी श्रीजयन्तीदेवी जी के गर्भ से श्रीसुदर्शन चक्र के अवतार के रूप में हुआ। 
जन्म के समय इनका नाम 'नियमानन्द' रखा गया और बाल्यकाल में ही ये ब्रज में आकर बस गए। मान्यतानुसार अपने गुरु नारद की आज्ञा से नियमानंद ने गोवर्धन की तलहटी को अपनी साधना-स्थली बनाया। श्रीनिम्बार्काचार्य ने स्वाभाविक द्वैताद्वैतवाद अर्थात स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन प्रतिपादित किया।
श्रीमद्‌भागवत में परीक्षित द्वारा भागवतकथा श्रवण के प्रसंग सहित अनेक स्थानों पर इनके पिता अरुण ऋषि की उपस्थिति को विशेष रूप से उल्लेख है। 
एक बार गोवर्धन स्थित इनके आश्रम में केवल दिन में भोजन करने वाले दिवाभोजी यति सन्यासी आये।  शास्त्र-चर्चा में काफी समय व्यतीत हो गया और सूर्यास्त हो गया। दिवाभोजी यति बिना भोजन किए जाने लगे। तब बालक नियमानन्द ने  सुदर्शन चक्र को नीम के वृक्ष पर स्थापित कर नीम के वृक्ष की ओर संकेत करते हुए कहा कि अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है, आप भोजन कर लीजिए। यति जी भोजन करके उठे तो देखा कि रात्रि के दो पहर बीत चुके थे। यति के रूप में वास्तव में ब्रह्माजी थे। ब्रह्माजी ने कहा- आपने मुझे निम्ब पर अपना तेज दिखलाया अतः अब आप लोक और शास्त्र में निम्बार्क नाम से प्रख्यात होंगे।
 हे चक्रराज सुदर्शन ! आपका अवतार जिस कार्य के लिए हुआ है अब आप वही कार्य कीजिये। थोड़े ही समय बाद यहाँ नारदजी भी पधारने वाले हैं। वे आपको सनकादिक से प्राप्त ज्ञान देंगे। ऐसा कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये।
अरुण ऋषि के सुपुत्र होने के कारण 'आरुणी', जयन्ती के लाल होने के कारण 'जायन्तेय' एवं वेदार्थ का विस्तार करने के कारण आप 'नियमानन्द' नाम से विख्यात हुए। 
थोड़े ही समय के पश्चात् वहाँ वीणा बजाते हुए नारदजी पहुँचे। नियमानन्द (श्रीनिम्बार्काचार्य) ने उनकी पूजा की और सिंहासन पर विराजमान करके प्रार्थना की- जो तत्व आपको श्रीसनकादिकों ने बतलाया था उसका उपदेश कृपाकर मुझे कीजिये। तब नारदजी ने श्रीनिम्बार्काचार्य को विधिपूर्वक पञ्च संस्कार करके श्रीगोपाल अष्टादशाक्षर मन्त्रराज की दीक्षा दी। उसके पश्चात् श्रीनिम्बार्काचार्य ने नारदजी से और भी कई प्रश्न किये, देवर्षि ने उन सबका समाधान किया।  इनका संकलन- 'श्रीनारद नियमानन्द गोष्ठी' के नाम से प्रख्यात हुआ। 
एकादशी व्रत
निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुसार यदि दशमी तिथि मध्य रात्रि (४५ घटि) तक रहने के उपरान्त एकादशी तिथि लगे तो एकादशी तिथि में व्रत न करते हुए द्वादशी तिथि में व्रत किया जाता है।
अरुण ऋषि ने स्वयम् के सुपुत्र श्रीनिम्बार्काचार्य के मुख से आध्यत्मिक ज्ञान प्राप्त करके सन्यास गृहण कर तीर्थाटान पर चले गए। श्रीनिम्बार्काचार्य ने माता जी को भी इसी प्रकार धर्मोपदेश किया ।
सम्प्रदाय का आचार्यपीठ श्रीनिम्बार्कतीर्थ,किशनगढ़, अजमेर,राजस्थान में स्थित है।
संक्षिप्त में स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन/
स्वाभाविक द्वेताद्वेत दर्शन।
श्रीनिम्बार्काचार्य ने ब्रह्म ज्ञान का कारण एकमात्र वेद शास्त्र को माना है। सम्पूर्ण धर्मों का मूल वेद है। वेद के विपरीत​ मत वाली स्मृतियाँ अमान्य हैं। जहाँ श्रुति में परस्पर द्वैध (भिन्न रूपत्व) भी​ आता हो वहाँ श्रुति रूप होने से दोनों ही वचन धर्म हैं। किसी एक वचन को​ उपादेय तथा अन्य वचन को हेय नहीं कहा जा सकता। तुल्य बल होने से​ सभी श्रुतियाँ प्रधान हैं। किसी के प्रधान व किसी के गौण भाव की​ कल्पना करना उचित नहीं है।
इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भिन्न​ रूप श्रुतियों का भी समन्वय करके निम्बार्क दर्शन ने परमात्मा, जीव और जगत के बीच स्वाभाविक भेदाभेद सम्बन्ध को स्वीकृत किया है। इसमें समन्वयात्मक दृष्टि होने से भिन्न रूप श्रुति का भी​ परस्पर कोई विरोध नहीं होता। अतएव निम्बार्क दर्शन को ‘अविरोध​ मत’ के नाम से भी अभिहित करते हैं।
कुछ श्रुति वाक्यों में भेद का बोध  होता हैं तो कुछ श्रुति वाक्य अभेद का​ निर्देश देते हैं। 
यथा- 
‘सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छा० ६/२/ १)
 आत्मा वा इदमेकमासीत्’  (तै०२/१) 
तत्त्वमसि’ (छा./१४/ ३) 
‘अयमात्मा ब्रह्म’ (बृ० २/५/१६) 
सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छा.३/१४/१) और  
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि गणा इव’ (गी, ७/७/) इत्यादि अभेद का बोध कराती हैं।
जबकि,
‘पराऽय शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविक ज्ञान बल-क्रिया च’ (श्वे० ६/८) 
‘सर्वांल्लोकानीशते ईशनीभिः’ (श्वे० ३/१) 
‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति’ (तै० ३/१/१) । 
‘नित्यो नित्यानां चेतश्नचेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् (कठ० ५/१३)
‘पराऽय शक्तिर्विविधैव श्रूयते, स्वाभाविक ज्ञान
बल-क्रिया च’ (श्वे० ६/८)
‘सर्वांल्लोकानीशते ईशनीभिः’ (श्वे० ३/१)
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।’ (गीता १०/८) 
इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म,जीव और जगत के भेद का प्रतिपादन करती हैं।
श्रुति​ स्मृतियों का निर्णय है कि,वेद सर्वांशतया प्रमाण है। अतः तुल्य होने से भेद दर्शक वचन और अभेद दर्शक वचन दोनों को ही प्रधान​ मानना होगा। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह सम्भव नहीं। भेद अभेद नहीं हो सकता और अभेद को भेद नहीं कह सकते। ऐसी स्थिति में कोई ऐसा मार्ग निकालना होगा कि दोनों में विरोध न हो तथा समन्वय हो​ जावे। यह समन्वय ही भेदाभेद दर्शन है।
‘ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है। उपादान अपने कार्य से​ अभिन्न होता है। स्वयं मिट्टी ही जब घड़ा बन जाती है तब मिट्टीके बिना घडे़​ की कोई सत्ता नहीं। कार्य अपने कारण में अति सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता हैं। उस समय नाम रूप का विभाग न होने के कारण कार्य का पृथक्​ रूप से ग्रहण नहीं होता पर अपने कारण में उसकी सत्ता अवश्य​ रहती है। इस प्रकार कार्य व कारण की ऐक्यावस्था को ही अभेद कहते हैं।’
 ‘सदेव सौम्येदमग्र आसीत् ०’ इत्यादि श्रुतियों का यह ही​ अभिप्राय है। इसी से सत् ख्याति की उपपत्ति होती है। सद्रूप होने​ से यह अभेद सवाभाविक है। दृश्यमान जगत् ब्रह्म का ही परिणाम है।
अपनी शक्ति का विक्षेप करके जगत् की सृष्टि करता है। यह​ ही शक्ति-विक्षेप लक्षण परिणाम है। यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः। स्वभावतो देव एकः । समावृणोति स नो दधातु ब्रह्माव्ययम्।। (श्वे० ६/१०) ‘यदिदं किञ्च तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत् (​तै. २/६) इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं कि, ब्रह्म ही प्राणियों को अपने-अपने किये कर्मों का फल​ भुगताता है।
अतः जगत् का निमित्त कारण होने से ब्रह्म और जगत्​ का भेद भी सिद्ध होता है, जो कि अभेद के समान स्वाभाविक ही​ है।
श्रुतियों में कुछ भेद का बोध कराती हैं तो कुछ अभेद का​ निर्देश देती हैं।
यथा-
ब्रह्म मकड़ी के जाले के​ समान अपनी शक्ति का विक्षेप करके जगत् की सृष्टि करता है। यही शक्ति-विक्षेप लक्षण परिणाम है।
यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः।
स्वभावतो देव एकः । समावृणोति स नो दधातु ब्रह्माव्ययम्।। (श्वे० ६/१०)
‘यदिदं किञ्च तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत् ।(​तै. २/६)
इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं।

विशेष -
एकादशी के सम्बन्ध में नारद पुराण में राजा रुक्माङ्गद की कथा । 
कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६१२ से ६३९ तक देखें।
नारद पुराण में  एकादशी व्रत दृढ़तापूर्वक करने वाले राजा रुक्माङ्गद  द्वारा ब्रह्मा की मानस पुत्री मोहिनी को कार्तिक मास की महिमा बतलाते हुए एकादशी को व्रत रखने के उल्लेख और अगले अध्याय में राजा रुक्क्माङ्गद की आज्ञा से रानी संध्यावली द्वारा कार्तिक मास में कृच्छ्व्रत आरम्भ करने और राजा रुकमाङ्गद एकादशी व्रत दृढ़तापूर्वक करने की घोषणा, उसके बाद मोहिनी द्वारा बुलवाये गये गोतम ब्राह्मणों द्वारा एकादशी व्रत अवैदिक बतलाने पर भी राजा रुक्माङ्गद का वैष्णवों के लिए एकादशी व्रत की अनिवार्यता बतलाने के प्रकरण से एकादशी तिथि को व्रत रखने की परम्परा का आरम्भ माना जाता है। 
जिसमें एकादशी के पूर्वदिन सायंकालीन भोजन का त्याग, एकादशी के दिन प्रातः कालीन भोजन का त्याग और द्वादशी के दिन निराहार उपवास करना उल्लेखित है।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३७ से ६३८ तक में राजा रुक्माङ्गद की उक्त कथा में ब्राह्मणों के शाप से मोहिनी को किसी भी लोक में स्थान न पाने पर ब्रह्मा जी ने मोहिनी को दशमी तिथि अन्तिम भाग में स्थान देकर के तेरहवें मुहुर्त के पश्चात अरुणोदय से सूर्योदय तक व्रत में रहकर दशमी विद्धा एकादशी करने वाले ब्राह्मणों के एकादशी व्रत के पुण्य फल प्राप्त करने का अधिकार दिया।  इसलिए एकादशी व्रत करने वाले दशमी विद्धा एकादशी में व्रत नहीं करते। किन्तु वैध कब से आरम्भ हो इसपर स्मार्त, पौराणिक और महाभागवतों में मतभेद हैं।

एकादशी में दशमी वैध -- 
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३७ से ६३८ तक में उल्लेख के अनुसार दशमी तिथि समाप्ति और एकादशी तिथि आरम्भ के समय के अनुसार तीन प्रकार के वैध बतलाते गये हैं।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३७ पर श्रोत्रिय/ वैदिकों और स्मार्तों अर्थात केवल वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों, उपवेदों, वेदाङ्गो, षड्शास्त्रों (षड दर्शनों) और स्मृतियों को ही धर्मशास्त्र मानने वाले स्मार्तों के लिए सूर्योदय समय या सूर्योदय के बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ होने पर दूसरे दिन / परा अर्थात् उदिता एकादशी में व्रत करना।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ ६३८ पर पौराणिक वैष्णवों के लिए अरुणोदय विद्धा एकादशी का त्याग कहा है। और रात्रि के अन्तिम दो मुहुर्त को अरुणोदय बतलाया है। 
सामान्यतया पौराणिक वैष्णव छप्पन घटि का वैध मानते हैं। अर्थात सूर्योदय से २२ घण्टे २४ मिनट बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ हो तो पौराणिक वैष्णव दुसरे दिन उदिता एकादशी न हो तो द्वादशी तिथि में  एकादशी का व्रत करते हैं।
 रामानुजन सम्प्रदाय वाले अरुणोदय पचपन घटि पर मान कर पचपन घटि का वैध मानते हैं अर्थात सूर्योदय से २२ घण्टे बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ हो तो रामानुजन सम्प्रदाय वाले वैष्णव दुसरे दिन उदिता एकादशी न हो तो द्वादशी तिथि में में एकादशी का व्रत करते हैं।
 गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित संक्षिप्त नारद पुराण पृष्ठ  ६३८ में उल्लेख निष्काम एवम् विरक्त वैष्णव जन अर्धरात्रि के समय भी दशमी विद्ध एकादशी को त्याग देते हैं वचन के अनुसार  निम्बार्क सम्प्रदाय मध्यरात्रि या पैंतालीस घटि का वेद मानते हैं। तदनुसार मध्यरात्रि या सूर्योदय के अठारह घण्टे बाद दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी आरम्भ हो तो निम्बार्क सम्प्रदाय वाले वैष्णव दुसरे दिन उदिता एकादशी न हो तो द्वादशी तिथि में में एकादशी का व्रत करते हैं।

 वैध रहस्य तन्त्रोक्त मतानुसार --
परमादरणीय गुरुदेव श्री ब्रजेन्द्र शरण श्रीवास्तव महोदय के लेख के अनुसार श्री स्वामी विष्णु तीर्थ ने श्रीचक्र की व्याख्या में बतलाया है कि, तन्त्रशास्त्र के अनुसार पञ्चदशी के अक्षरों के सम्बन्ध प्रतिपदा से पूर्णिमा तक के पन्द्रह तिथियों से है।तथा षोडशी का सोलहवाँ अक्षर चितिरूपा अमावस्या है। तदनुसार मूलाधार से आज्ञा चक्र के उपर निरोधिका तक दशमी तिथि आती है। निरोधिका पर एकादशी आती है और नाद पर द्वादशी तिथि का स्थान है।
ऐसे ही तिथियों का सम्बन्ध पञ्च कर्मेंद्रियों, पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, अन्तःकरण चतुष्ठय और अमावस्या का सम्बन्ध समाधि से है। विश्वैदेवाः की एकादशी तिथि मन से सम्बन्धित तथा विष्णु की तिथि द्वादशी को बुद्धि से सम्बन्धित मानते हैं। यदि एकादशी अर्थात मन इन्द्रियों यमराज की दशमी तिथि से सम्बद्ध हो तो मन/ एकादशी (अन्तर्मुखी) निराहार  यानी उपोष्या (उपास रखा हुआ) नहीं मान सकते। जबकि द्वादशी यानी बुद्धि युक्त एकादशी अर्थात मन अन्तर्मुखी अर्थात उपोष्य (निराहार) रहता है।
उक्त आधार पर दशमी विद्धा एकादशी को व्रत न करने के निर्देश की सार्थकता सिद्ध करते हैं।