गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

बाइबल

"यहुदियों और ईसाइयों का ईश्वर-याहवेह (यहोवा), यहुदियों के ऋषि - इब्राहिम, सुलेमान राजा, दाउद, और मूसा । यहुदियों के ग्रन्थ --- तनख दाऊद की किताब जुबेर, मूसा की किताब तोराह (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट)। 
ये पुस्तकें सीरिया खाल्डिया और बेबीलोनिया (इराक) की पुरानी अरामी भाषा ( पश्चिमी आरमाईक) भाषा में लिखित है। हिब्रू भाषा भी अरामी भाषा का रूप ही है।
"हिब्रू बाइबल या तनख़ यहूदियों का मुख्य धार्मिक ग्रन्थ है। इसकी रचना 600 से 100 ईसा पूर्व के समय में विभिन्न लेखकों द्वारा विभिन्न देशों में की गई है। हिब्रू बाइबल तीन अलग अलग शास्त्रों का संकलन है। जो कि प्राचीन यहूदी परम्परा का आधार हैं। अतः तनख़ के तीन भाग हैं-"

"निम्नांकित 39 किताबे प्रोटेस्टेंट बाइबिल के पूर्वार्ध (पुराना नियम/ ओल्ड टेस्टामेंट) में हैं, 
"विधान -- १ उत्पत्ति, २ निर्गमन, ३ लैव्य व्यवस्था, ४ गिनती और ५ व्यवस्था विवरण"
"इतिहास --- १ यहोशु २ न्यायियों ३ रूत ४ प्रथम शमुऐल ५ द्वितीय शमुऐल ६ प्रथम राजाओं का व्रतांत ७ द्वितीय राजाओं का व्रतांत ८ इतिहास (प्रथम) ९ इतिहास (द्वितीय)"।
"भजन --- १ एज्रा २ नहेम्याह ३ ऐस्तर ४ अय्यूब ५ भजन संहिता ६ नीति वचन ७ सभोपदेशक ८ श्रेष्ठगीत"।
"नबी --- १ यशायाह २ यिर्मयाह ३ विलापगीत ४ यहेजकेल ५ दानिय्येल ६ होशे ७ योएल ८ आमोस ९ ओबध्याह १० योना ११ मीका १२ नहूम १३ हबक्कूक १४ सपन्याह १५ हाग्गै १६ जकर्याह १७ मलाकी।"
५+९+८+१७ =३९ पुस्तकें।
"यह 39 किताबे प्रोटेस्टेंट बाइबिल के पूर्वार्ध में हैं, तथा कैथोलिक बाइबिल के पूर्वार्ध में 46, जबकि ऑर्थोडॉक्स बाइबिल के पूर्वार्ध में 49 किताबें शामिल हैं। ये चार भागों में विभाजित हैं
ईसाइयों के ऋषि उपर्युक्त के अलावा यीशु। और ईसाइयों के ग्रन्थ उपर्युक्त के अलावा एन्जिल (बायबल नया नियम) यह ग्रीक (युनानी) भाषा में लिखित है।"

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

जातियाँ

आर्य जाति/ प्रजाति नही होती। वेदों में आर्य श्रेष्ठ, सदाचारी व्यक्ति को कहते हैं। किसी जाति विशेष को नहीं।
वास्तविक जातियाँ 

देव ---केस्पियन सागर क्षेत्र ताजिकिस्तान और चीन के शिंजियांग स्वायत्तशासी क्षेत्र उइग़ुर ख़ाङ्नत आदि के सीमांत प्रदेश, ,ईरानी बलोचिस्तान के कजान ख़ानत या ख़ाङ्नत, और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्रों,अफगानिस्तान का पाकिस्तान से लगा भाग नूरीस्तान ,पाकिस्तानी बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा,और भारत के पश्चिमोत्तर अर्थात आधूनिक नूरीस्तान के निवासी थे। 
संक्षेप में ताजिकिस्तान (कम्बोज), किर्गिज़स्तान, कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, कश्मीर, लद्दाख और तिब्बत के तरीम बेसिन और टकला मकान क्षेत्र में शिंजियांग उइगुर प्रान्त के निवासी थे 
मानव --- (स्वायम्भूव मनु- शतरुपा की सन्तान  मनुर्भरत), दृविड़ / दृविण (धर्म वसु की पत्नी दृविण की सन्तान), गन्धर्व (बलूच, अफगान), किन्नर (हिमाचल, उत्तराखण्ड के किन्नौर वासी), यक्ष (तिब्बत और पश्चिम चीन वासी), प्रमथ-मङ्गोल,  सूर (सीरिया वासी) असुर (इराक केअसीरिया) वासी, देत्य अरब प्रायद्वीप के निवासी, दानव (डेन्युब नदी तट वासी युरोपीय) और राक्षस (अफ्रीकी) जातियाँ थी।

ब्राह्मण -- प्रजापति ब्रह्मा-सरस्वती की मानस सन्तान (1) दक्ष (प्रथम)- प्रसुति, (2) मरीची-सम्भूति, (3) भृगु-ख्याति, (4) अङ्गिरा-स्मृति, (5) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (6) अत्रि-अनसुया, (7) पुलह-क्षमा, (8) पुलस्य-प्रीति, (9) कृतु-सन्तति नौ ब्रह्मा कहलाते हैं। 
प्रजोत्पत्ति करने के कारण ये सभी प्रजापति के तुल्य माने जाते हैं। सबसे प्राचीन ऋषि होने से इन्हें अगले मन्वन्तर में वैदिक ज्ञान अन्तरित करने का कार्यभार सोपा जाता है। इसलिए अलग-अलग मन्वन्तर में इनमें से कुछ ऋषि सप्तर्षि कहलाते हैं।
ये कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के आसपास के ऋषिदेश (मालवा प्रांत, गोड़ देश) के निवासी थे।

मानव क्षत्रिय --  गेहूँए रङ्ग वाले स्वायम्भूव मनु की सन्तान - स्वायम्भूव मनु - प्रियव्रत - आग्नीध्र - नाभि/ अजनाभ - ऋषभदेव - भरत चक्रवर्ती की सन्तान मनुर्भरत को हम आर्य समझते हैं ।

चान्द्र --  जबकि ब्रहस्पति की पत्नी तारा और चन्द्रमा के पुत्र बुध, वैवस्वत मनु की पुत्री इला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा (एल, ईलाही/ अल्लाह), उर (इराक) की निवासी, तिब्बत-कश्मीर- लद्दाख, पूर्वी तुर्किस्तान (उइगुर) प्रान्त स्थित स्वर्ग के राजा इन्द्र की नर्तकी उर्वशी और एल पुरुरवा का पुत्र दक्षिण-पूर्वी टर्की (तुर्किये) के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में जन्मे आयु (आदम) के वंशज औराजा खत्तुनस की प्रजा खत्ती (हित्ती) / खाती/ खत्री अर्थात चन्द्रवंशियों को मेक्समूलर ने आर्य माना।
पुरानी/ पश्चिमी आरामी भाषा में रचित तनख (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट की पहली पुस्तक उत्पत्ति) के अनुसार यहोवा (एल पुरुरवा) ने आदम (आयु) को दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था।
ये चन्द्रवंशी हैं, अनु, दुह, *यदु* , *पुरू* और तुर्वसु जिनने तृत्सु वंशीय मनुर्भरत - दिवोदास और उनके पुत्र सुदास पर आक्रमण किया था जिसे ऋग्वेद में दशराज युद्ध कहा गया है।
परिणाम स्वरूप पुरू वंशीय प्रयागराज में बसाये गए। तुर्वसु के वंशजों को आदित्यों के क्षेत्र तुर्किस्तान में बसाया, यदु वंशीय पूर्वी भारत में अङ्ग देश में बसे। ये चन्द्रवंशी गोरे और डेन्युब नदी किनारे बसे दानव (युरोपीयन) से मिलते-जुलते थे, इसलिए इन्हें आर्य कहा।

 असुर -- इराक के असीरिया प्रान्त के प्राणवान, बलिष्ट असुर  असीरिया (इराक), मेसापोटामिया, बेबीलोन, सऊदी अरब  में बसे। ये रुद्र भक्त शिवाई  (साबई), बालदेव (नन्दी) उपासक असुर हुए। इनने शुक्राचार्य को अपना गुरु माना। शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने युनान के पास  क्रीट में शाक्तपन्थ की स्थापना की।
परशु--  असुरों के आचार्य जरथ्रुस्त्र ने ईरान के मीड और मगों को आसुरी मत में बदला। ये अग्नि को प्रतिक मानकर असुरमहत् (अहुरमज्द) के उपासक हो गये।

दैत्य -- महर्षि कश्यप और दिति के पुत्र दैत्यगण मिश्र और  अम्मानके पास जोर्डन की जेरिको सभ्यता, इज्राइल, स्वेज और लेबनान (फोनिशिया सभ्यता) में बसे। पश्चिम एशिया दैत्यों का क्षेत्र था ।
दक्षिण भारत पर कब्जा जमाये राजा बलि को वामन / विष्णु द्वारा केरल (भारत)  से निकालने पर  राजा बलि भी भारत के दास, दस्यु ,चोल, चालुक्यों को लेकर पहले लेबनान (फोनिशिया) ही गया था। फिर लेबनान से निकलकर  दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के बोलिविया बसा। 

दानव ---महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र यानि  दनु (डेन्यूब नदी) के वंशज दानव  युगोस्लाविया  की लेपेन्स्की वीर सभ्यता (Lepennki Vir )  और प्राग(चेकोस्लोवाकिया) से जर्मनी  तक और युनान रोम की युरोपीय सभ्यता दानवों की है। सेल्ट या केल्ट लोग दानव थे ये इंग्लेण्ड में तप करते थे।
राक्षस -- राक्षस अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका महाद्वीप के निवासी थे जिन्हें वर्तमान में निग्रो कहते हैं। क्योंकि ये रक्षा का कार्य करते थे। विशेष कर अरब और युरोप में लोग इन्हें अङ्गरक्षक नियुक्त करते थे। रावण के नाना और उनके भाई मालि - सुमाली अफ्रीकी निग्रो थे। जबकि श्वसुर मयासुर मय संस्कृति का रेड इण्डियन था।
इसमें मानवों को छोड़कर अधिकांश विदेशी जातियाँ शिव परिवार की मूर्तियों को पूजने वाले थे।
रावण ने भी लक्षद्वीप स्थित रावण की लङ्का में उसकी कुलदेवी निकम्भला के बहुत से मन्दिर बनवा कर निकुम्भला की मूर्तियाँ स्थापित कर पूजा करता था और तान्त्रिक हवन करता था।
वाल्मीकी रामायण युद्ध काण्ड के अनुसार हनुमान जी ने निकुम्भला के कई मन्दिर और मुर्तियाँ तोड़ी।
लक्ष्मण जी ने मेघनाद का तान्त्रिक हवन ध्वन्स कर रोक दिया।
तो क्या रावण और मेघनाद सदाचारी वैदिक (धार्मिक) हो गये तथा हनुमान जी और लक्ष्मण नास्तिक, अनीश्वरवादी और दुराचारी अधर्मी हो गये?
पौराणिकों नें इसी भ्रम को फैला कर रावण और बली की प्रशंसा में भरपूर गीत गाए हैं। लेकिन वैदिक लोगों को सत्य समझता है। इसलिए वे इन दैत्य - राक्षसों को अधर्मी ही मानते हैं।

हमने ब्राह्म धर्म -> ब्राह्मण धर्म -> प्राजापत्य धर्म -> आर्ष धर्म -> मानव धर्म छोड़ कर हमारे धर्म का नाम सनातन धर्म रखा। तुर्क, अफगान, ईरान, इराक और कजाक मुस्लिम और युरोपीय ईसाइयों के चक्कर में हम हिन्दू और इण्डियन बन बैठे। और दासत्व की इस उपाधि पर गर्व करने लगे।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

दासता से बन्धा हिन्दू

वैसे तो भारत भूमि पर असुरों, दैत्यों, दानवों, राक्षसों तक के आक्रमण हुए लेकिन उनका स्थाई प्रभाव कम ही रहा।
लेकिन उससे सीमाएँ कमजोर होती रही और एक समय स्थाई प्रभावकारी दशराज युद्ध का सामना मनुर्भरतों के तृत्सु वंश के राजा दिवोदास और उनके पुत्र सुदास को करना पड़ा। जिसमें समझोते में अनु, दृह्यु, यदु, पुरु, तुर्वसु वंशियों को भारतभूमि में प्रवेश और निवास तथा अपने शासन स्थापित करने की अनुमति देना पड़ी। परिणाम स्वरूप बाद में नाग और आग्नेय भी आ गये और उनने भी भारत भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया।
ऋषियों की सन्तान ब्राह्मण, स्वायम्भूव मनु की सन्तान मनुर्भरत क्षत्रिय और उनके निकट सम्बन्धी सूर्यवंशी दबते गये और ये आक्रान्ता पुरु और यदु वंशीय और नाग वंशीय विकास करते गये। महाभारत युद्ध ने तो सबकुछ बदल दिया। वैदिक ब्राह्मण धर्म सनातन धर्म हो गया। जैन और बौद्ध पन्थ जन्मे, और भारत में सनातन वैदिक धर्म संस्कृति समाप्त प्राय होकर नवीन स्मार्त और पौराणिक संस्कृति जन्मी।
शक हूण आदि तुर्क, अफगान, ईरानी, कजाक आक्रमणकारियों नें धार्मिक और सांस्कृतिक हमला भी बोला। 
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन ज्योतिष और कालगणना में आया। वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाला नव युगाब्द संवत्सर, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधु मास के स्थान पर पहले निरयन मेष संक्रान्ति से प्रारम्भ होने वाले निरयन सौर युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत चले। उत्तरायण वसन्त सम्पात/ सायन मेष संक्रान्ति के स्थान पर सायन मकर संक्रान्ति से प्रारम्भ होने लगा। वसन्त ऋतु वसन्त सम्पात/सायन मेष संक्रान्ति के स्थान पर सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होने लगी। मधु मास भी वसन्त सम्पात/सायन मेष संक्रान्ति के स्थान पर सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होने लगा। और उसके स्थान पर मेष, वृषभादि निरयन मास प्रचलित होगये। आज भी दक्षिण भारत में चलते हैं।
कुषाण आक्रमण ने तो तुर्किस्तान में प्रचलित सायन सौर 
संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष के भारतीय संस्करण निरयन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष शकाब्द प्रचलित कर दिया। अब वैदिक सायन सौर मधु- माधव मास और गतांश के स्थान पर चैत्र - वैशाख आदि चान्द्र-सौर मास और तिथियों का महत्व हो गया। सौर मास और गतांश विस्मृत हो गये।
केवल ग्रहों के उच्चांश और पञ्च बाण में ही सिमट गये।
दशाह के स्थान पर सप्ताह चल गया।

लेकिन तुर्क, अफगान, ईरानी, कजाक और ईराकी मुस्लिम आक्रमणों ने भारत पर प्रथम बार एकदम विपरीत मानसिकता, पूर्णतः विपरीत विचारों वाले धार्मिक- सांस्कृतिक हमले हुए। जिसने यहाँ का आत्मविश्वास डिगा दिया। स्वाभिमान नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। हम मानसिक दास होगये। हमने स्वयम् को हिन्दू अर्थात दास मान लिया। फारसी भाषा प्रधान हो गई। संस्कृत केवल शास्त्रियों तक सीमित हो गई। सलवार कुर्ता प्रचलित हो गये। विवाह में श्वेत और पीत (पीले) वस्त्रों के स्थान पर निषिद्ध अशुभ माने लाल कपड़े पहने जाने लगे। भूत-प्रेत की नवीन अवधारणा आ गई । भूत-प्रेत लगने और तन्त्र - मन्त्र से उतारने वाले जादूगर जासूस पीरों फकीरों का धन्धा चल निकला।
रही बची-खुची कसर युरोपीय आक्रमणकारियों ने पूर्ण करदी।
अब भारत में भारतीयता ही नहीं बची। हम थोड़े- थोड़े अरबी और काले अंग्रेज हो गये। हमारा अपना कुछ नहीं बचा । सनातन वैदिक धर्म की जगह हिन्दू धर्म बन गया। न त्रिकाल संध्या, न पञ्चमहायज्ञ, न गौ सेवा बस सुबह शाम प्रार्थना करलो कर्तव्य पूर्ण।न संस्कार बचे न संस्कृति बची।
 गुरुकुल स्कूल-कॉलेज में बदल गये। संस्कृत की जगह हिन्दी भाषा आ गई। वैदिक काल गणना , संवत्सर की जगह ग्रेगोरी केलेण्डर और रात बारह बजे बदलने वाले डेट एण्ड डे आगये।, न भाव, न श्रद्धा, न वेशभूषा न रहन सहन, न संयुक्त परिवार न भोजन, न चिकित्सा,
प्राकृतिक चिकित्सा की जगह फिजियोथेरेपी, आयुर्वेद की जगह एलोपैथी, चिकित्सालय की जगह हॉस्पिटल हो गये।न उद्योग-धन्धे, न कारोबार- व्यापार- व्यवसाय- वाणिज्य, न इतिहास कुछ भी तो अपना नहीं बचा।

रविवार, 7 अप्रैल 2024

देवी उपासना के विशेष योग।

*देव्यथर्वशीर्षम् महात्म्य कथित भोमाश्विनी योग (मङ्गलवार और अश्विनी नक्षत्र, महामृत्युतारक अमृत सिद्धि योग) में ऋग्वेदोक्त देवी सूक्तम पाठ कर देव्यथर्वशीर्ष का पाठ करना महामृत्युतारक है।
देखें देव्यथर्वशीर्ष महात्म्य का अन्तिम भाग। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित दूर्गा सप्तशती पृष्ठ १८६ से १८८ तकपर देवी सूक्तम तथा पृष्ठ ४४ से ५२ तक देव्यथर्वशीर्षम्
तथा
दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के महात्म्य के अनुसारअमावस्या को शतभिषा नक्षत्र पर चन्द्रमा हो उस दिन मङ्गलवार हो तब दूर्गा अष्टोत्तर शतनाम लिखकर पाठ करें तो सम्पत्तिशाली होता है।
अमावस्या को चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर  होगा तो सूर्य भी शतभिषा नक्षत्र पर ही रहेगा।
शतभिषा नक्षत्र के तारे का निरयन भोग कुम्भ 17°43'09" है। और वर्तमान नक्षत्र प्रणाली में शतभिषा नक्षत्र का निरयन भोग कुम्भ 10°06'40" से कुम्भ 20°00'00" तक है। 
तदनुसार 
जब शतभिषा नक्षत्र के तारे पर अमावस्या को चन्द्रमा होगा, तो सूर्य भी शतभिषा नक्षत्र पर कुम्भ 17°43'09" पर होगा। अर्थात वर्तमान में 01 - 02 मार्च के दिन अमावस्या हो। या
वर्तमान में दिनांक 19 फरवरी से 04 मार्च के बीच होने वाली अमावस्या को जब सूर्य और चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र में होगा उस समय होने वाली अमावस्या अर्थात अमान्त माघ पूर्णिमान्त फाल्गुन कृष्ण अमावस्या को जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हो, और उस दिन मंगलवार हो तो दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के महात्म्य के अनुसार (अमान्त माघ पूर्णिमान्त फाल्गुन कृष्ण अमावस्या को जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र पर हो, और  मंगलवार हो तो उस दिन)  अष्टोत्तर शतनाम लिखकर पाठ करने से सम्पत्तिशाली होता है। कृपया देखें - गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्री दुर्गा सप्तशती पृष्ठ 09 से 12 तक।

वट-पीपल आदि की पूजा का तात्पर्य।

पूजा मतलब सेवा, सफाई करना, बान्दे हटाना, स्वच्छता रखना, जल सिञ्चन, खाद देना, आसपास की मिट्टी खोदना (गुड़ाई करना) (हलना- बखरना जैसा काम है), आश्रित पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना, सूर्योदय पूर्व अन्धेरे में और सूर्यास्त पश्चात सायंकाल में अन्धकार छाने पर (प्रदोषकाल में) पथिकों के लिए दीपक लगाना ये सब पीपल आदि वृक्षों के माध्यम से भूत यज्ञ का भाग है।
जो जनेऊ- और नाड़ा (लच्छा), वस्त्र आदि चढ़ाया जाता है उसका आषय यह है कि, इमरजेंसी में जरुरत मन्द वहाँ से प्राप्त कर सकता है और उसे किसी के सामने बोलना भी नहीं पड़ेगा।
जैसे किसी कारण पथिक की जनेऊ टूट गई, अब बोलकर मांगे बिना तो कोई अपरिचित से जनेऊ ले नहीं सकता, और जनेऊ टूटने पर नवीन जनेऊ धारण करने तक मौन रहना आवश्यक है। ऐसे में वह ऐसे स्थानों से प्राप्त कर लेता था।

इतना सेवा भावी धर्म है हमारा, जिसके मर्म को कोई नहीं समझकर कोरे कर्मकाण्ड करते हैं।

पुराणोक्त नौ ब्रह्मा

प्रजापति ब्रह्मा-सरस्वती की मानस सन्तान (1) दक्ष (प्रथम)- प्रसुति, (2) मरीची-सम्भूति, (3) भृगु-ख्याति, (4) अङ्गिरा-स्मृति, (5) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (6) अत्रि-अनसुया, (7) पुलह-क्षमा, (8) पुलस्य-प्रीति, (9) कृतु-सन्तति नौ ब्रह्मा कहलाते हैं। प्रजोत्पत्ति करने के कारण ये सभी प्रजापति के तुल्य माने जाते हैं। सबसे प्राचीन ऋषि होने से इन्हें अगले मन्वन्तर में वैदिक ज्ञान अन्तरित करने का कार्यभार सोपा जाता है। इसलिए अलग-अलग मन्वन्तर में इनमें से कुछ ऋषि सप्तर्षि कहलाते हैं।
ये कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के आसपास के ऋषिदेश (मालवा प्रांत, गोड़ देश) के निवासी थे।

शनिवार, 6 अप्रैल 2024

कलियुग संवत 5125 का वर्षेश बृहस्पति और युधिष्ठिर संवत 5162 का मन्त्री रवि (सूर्य) रहेगा।

इस वर्ष वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति २० मार्च २०२४ को दशाह का बृहस्पतिवार था। तथा निरयन मेष संक्रान्ति १३ अप्रेल २०२४ को दशाह का रविवार था।
अतः वर्षेश बृहस्पति और मन्त्री रवि (सूर्य) है।