रविवार, 5 मार्च 2023

होली पर्व, उत्सव और त्योहार का अर्थ एवम् महत्व।

*वैदिक पर्व, उत्सव और त्योहारों का आधार भी वैदिक काल गणना ही हो।* 

 *वैदिक ज्योतिष पत्रक/ केलेण्डर और वर्तमान पञ्चाङ्ग में अन्तर* 

*वैदिक काल में तिथियों के नाम पर केवल अर्धचन्द्र अर्थात अष्टका एकाष्टका (अष्टमी तिथि का मध्य भाग), पूर्णचन्द्र अर्थात पूर्णिमा (सूर्य से चन्द्रमा १८०° पर) और चन्द्रमा का अदर्शन/ लोप अर्थात अमावस्या (सूर्य और चन्द्रमा की युति/ सूर्य और चन्द्रमा में अन्तर ०००° का।) बस इनका ही उल्लेख आता है।* 
अर्थात वर्तमान में प्रचलित सूर्य और चन्द्रमा में प्रत्येक १२° अन्तर के आधार पर बनी तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। ऐसे ही
 *स्थिर ताराओं के समुह से बनी आकृति वाले असमान भोग वाले अट्ठाइस नक्षत्र प्रचलित थे।*
अर्थात अलग अलग नक्षत्रों के अंश कला विकला असमान थे। चित्रा नक्षत्र का भोग केवल ००°२३'३१" ही था, स्वाती नक्षत्र का भोग २०°५०'५७" था, जबकि धनिष्ठा नक्षत्र का भोग २५°१४'०८" था; ऐसे ही सभी नक्षत्रों के भोगांश अलग अलग थे न कि, वर्तमान में प्रचलित १३°२०'।*

 *अलग अलग कार्यों के लिए तीन प्रकार से दिनांक की गणना प्रचलित थी।

(१) समस्त प्रयोजनार्थ आधारभूत ज्योतिष पत्रक में ३६५. २४२१९ दिन का सायन सौर वर्ष , सायन संक्रान्तियों पर आधारित मास और सायन संक्रान्ति से गत दिवस (गते)। तथा
(२) धार्मिक प्रयोजनार्थ सायन सौर संक्रान्तियों से प्रारम्भ होनें वाले सायन सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र के आधार पर मिति/ तिथि या दिनांक धार्मिक प्रयोजन में प्रचलित थे।
इनके साथ ही -
सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित उत्तरायण/ दक्षिणायन और उत्तर तोयन/ दक्षिण तोयन। तथा सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित ऋतुएँ प्रचलित थी। जिनका विवरण आगे प्रस्तुत दिया जा रहा है।
(३) व्यवसाय/ व्यवहार में ३६० दिन का सावन वर्ष, ३० दिन का सावन माह और तीस मुहुर्त (साठ घटिका) का सावन दिन और दशाह के दस वासर (वार)। जो वेतन/ मजदूरी देनें में उपयोग किये जाते थे।

१ अयन -
१ (क) जब सूर्य भूमि के उत्तरी गोलार्ध में गतिशील दिखे तब उत्तरायण पौराणिक काल से इसे उत्तर गोल कहा जाने लगा है एवम् 
१ (ख) जब सूर्य भूमि के दक्षिणी गोलार्ध में गतिशील दिखे तब दक्षिणायन। पौराणिक काल से इसे दक्षिण गोल कहा जाने लगा है।
२ तोयन - 
२(क) जब सूर्य मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर जाते दिखे अर्थात दक्षिण से उत्तर दिशा में गतिशील दिखे तब उत्तर तोयन। पौराणिक काल से इसे उत्तरायण कहा जाने लगा है।एवम्  
२(ख) जब सूर्य कर्क रेखा से मकर रेखा की ओर जाते दिखे तब दक्षिण तोयन अर्थात उत्तर से दक्षिण दिशा में गतिशील दिखे तब दक्षिण तोयन। पौराणिक काल से इसे दक्षिणायन कहा जाने लगा है।

३ ऋतुएँ - 
सायन संक्रान्तियों पर आधारित ऋतुएँ। जो दो सायन सौर मास के बराबर होती थी। लेकिन अलग अलग गोलार्धों मे अलग अलग ऋतुएँ होती है साथ ही अलग-अलग अक्षांशों पर भी अलग-अलग ऋतुएँ होती है।

४ मास
सायन सौर संक्रान्तियों से प्रारम्भ होनें वाले सायन सौर मास।
 और 
५ दिनांक/ मिति/ तिथि - 
चन्द्रमा के नक्षत्र के आधार पर मिति/ तिथि या दिनांक धार्मिक प्रयोजन में प्रचलित थे।

वैदिक काल में न राशियाँ प्रचलित थी न सूर्य और चन्द्रमा के १२° अन्तर के आधार पर बनी तिथियाँ प्रचलित थी। न अर्ध तिथिमान वाले करण प्रचलित थे। तो भद्रा के विचार का प्रश्न ही उपस्थित नही होता था।

न ही चन्द्रमा के १३°२०' अन्तर वाले २७ नक्षत्र प्रचलित थे। न सत्ताईस योग प्रचलित थे‌।

वर्तमान में तिथि, वार, नक्षत्र, योग करण वाली पञ्चाङ्ग का आधार ३६५.२५६३६३ दिन वाला नाक्षत्रीय/ निरयन सौर वर्ष और नक्षत्र मण्डल के ३०° वाले १२ विभाग जिसे राशि कहा जाता है के आधार वाले निरयन सौर मास तथा सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक १२° अन्तर वाली तिथियों, और सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक ०६° अन्तर वाले करण, एवम् भचक्र के प्रत्येक १३°२०' पर अलग अलग सत्ताईस नक्षत्र पर आधारित ज्योतिष पत्रक है।

सूर्य और और चन्द्रमा के निरयन भोगांशो के योग को सत्ताईस से भाग देकर योग ज्ञात किया जाता है। जिसका कोई वैज्ञानिक आधार कोई नही जानता। जबकि सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगों का योग १८०° होनें पर व्यतिपात और सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगों का योग ३६०° होनें पर वैधृतिपात पूर्णतः वैज्ञानिक पात हैं।

होली/ होलिका दहन ---

पौराणिक काल से वर्तमान काल तक भी वसन्त ऋतु के आरम्भ में प्रदोष व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा होली का पर्व दिवस माना जाता है। और प्रदोषकाल होली का पर्वकाल माना जाता है। जिसमे होलिका दहन होना चाहिए।
धार्मिक दृष्टि से सभी पुर्णिमा और अमावस्याओं में प्रदोषकाल और महानिशिथ काल का ही महत्व होने से प्रदोषकाल व्यापी और महानिशिथ काल व्यापी पूर्णिमा और अमावस्या ग्रहण की जाती है।

लेकिन मुहुर्त वादी ज्योतिषियों ने व्रत पर्वों में भी मुहुर्त का प्रवेश करा दिया।
पौराणिक काल में वराह मिहिर की वराह संहिता के प्रभाव से मुहुर्त का महत्व अत्यधिक बढ़ गया। हर कार्य का मुहुर्त देखा जाने लगा। तब से भद्रा,भद्रा मुख, और भद्रा पुच्छ का विचार किया जाने लगा।
अन्यथा वैदिक दृष्टि से न श्रावणी कर्म में न ही होलिका दहन में किसी भी धार्मिक पर्व में भद्रा का कोई विचार नही किया जाना चाहिए। 

*होली पर्व का अर्थ एवम महत्व।* 
 *होलाका नव सस्येष्टि का वैदिक पर्व है। जिसमे वसन्त ऋतु में होनें वाली कृषि उपज का हवन किया जाता है। इसे ही वर्तमान में होली का पर्व कहते हैं। पञ्जाब में आज भी होला ही कहते हैं।* 
हरे चने (छोड़) को घाँस में सेंक कर होला खाने की परम्परा आज भी विद्यमान है। ऐसे ही हरे गेहूँ की बाली (उम्बी) सेंक कर भी खाई जाती है। हरी मटर भी सेंक कर खाई जाती है। यही होला इस पर्व के नामकरण का आधार है।
गेहूँ की बाली, चना (छोड़), मटर की फली सेकने पर उसकी छिलका जल जाता है और पका हुआ बीज खाया जाता है। छिलके से उत्पत्ति नही होनें के कारण माता तो नही कहा जा सकता लेकिन छिलके द्वारा बीज को गर्भ में धारण करने के आधार पर छिलके को बीज की माता के समान माना जाता है। माता की बहन मौसी (मासी) कही जाती है और पिता की बहन भुआ को भी माँ के समान ही माना जाता है। 
विष्णु के अर्पण कर्म को यज्ञ कहा जाता है। यज्ञ में विष्णु को आहुति दी जाती है। इष्टि में भी विष्णु को आहुति दी जाती है। अर्थात नव सस्येष्टि में नवान्न विष्णु अर्पण किया जाता है।
इसी प्रक्रिया को रूपकात्मक वर्णन करते हुए कहा गया कि,(बीज/दाना अर्थात) विष्णु भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर उसकी भूआ होलिका (छिलका) अग्नि में प्रवेश कर गई। होलिका (छिलका) तो जल गया, लेकिन प्रह्लाद तप कर और निखर गया।
यही होला या होली या होला मोहल्ला पर्व, उत्सव और त्योहार का कारण और आधार है।

गुरुवार, 2 मार्च 2023

सायन राशियों और सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्रमासों के नवीन नामकरण आवश्यक है।

भारत में भचक्र को अट्ठाईस नक्षत्रों में विभाजन किया गया है। ये नक्षत्र (अंश,कला, विकला) असमान भोग वाले हैं। १३°२०'के समान भोग वाले नही हैं।
इराक के बेबिलोनियाई ज्योतिषियों और उनसे प्रभावित युनान के ज्योतिषियों द्वारा भचक्र का बारह राशियों में विभाजन कर राशियों के नाम भचक्र में ताराओं के समुह से बने आकार के आधार पर राशियों का नामकरण किया गया था। सन २८५ ईस्वी में जब अयनांश शुन्य था तब तो निरयन राशियों के उक्त नाम सायन राशियों पर भी लागू हो जाते थे। लेकिन अब जबकि अयनांश २४° हो गया अर्थात लगभग पूरी एक राशि का अन्तर हो गया तो निरयन मेष राशि सायन मीन राशि हो गई, और निरयन वृष राशि सायन मेष राशि हो गई। अतः सायन राशियों का नवीन नामकरण आवश्यक हो गया है।
ऐसे ही निरयन सौर मासों से संस्कारित चान्द्रमासों के नाम भी सायन संक्रान्तियों से संस्कारित चान्द्रमासों के नाम से भिन्न होने लगे हैं। अतः सायन संक्रान्तियों से संस्कारित चान्द्रमासों के भी नवीन नामकरण आवश्यक हो गया है। 
*अर्थात सायन सौर मासों से संस्कारित चान्द्रमासों के नाम चैत्र वैशाखादि निरयन सौर संस्कारित चान्द्रमास और मधु माधवादि सायन सौर मासों के नाम से अलग नाम रखना होगा।

 १ *चैत्र मास मतलब जिस मास की पूर्णिमा के समय चन्द्रमा चित्रा तारे के आसपास रहे। स्वाभाविक है उस समय सूर्य निरयन मेषादि बिन्दु के आसपास ही रहेगा।

१ (क) --- ईसापूर्व १२६०५ वर्ष में जब अयनांश १८०° रहा होगा तब चैत्र पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा तारे के साथ था। उस पूर्णिमा के समय सूर्य चित्रा तारे से १८०° पर अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर ही था। 
*जबकि उस समय सूर्य का सायन भोग १८०° (सायन तुला ००°) था। लेकिन वैदिक ईष मास और पौराणिक ऊर्ज मास होने के आधार पर उस पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा तो नही कहा जा सकता।* 
*बल्कि वह चैत्र पूर्णिमा ही कही जाएगी। क्योंकि, पूर्णिमा के समय चन्द्रमा चित्रा के योगतारा के साथ था।* 

और ऐसे ही 
१(ख) --- आगामी वर्ष १३१७५ ईस्वी में जब अयनांश १८०° रहेगा तब भी चैत्र पूर्णिमा के समय चन्द्रमा चित्रा तारे के साथ रहेगा उस समय सूर्य चित्रा तारे से १८०° पर अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर ही रहेगा। 
*जबकि सूर्य का सायन भोग १८०° (सायन तुला ००°) रहा रहेगा। लेकिन वैदिक ईष मास और पौराणिक ऊर्ज मास होने के आधार पर उस पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा तो नही कहा जा सकेगा।* 
 *बल्कि वह चैत्र पूर्णिमा ही कही जाएगी। क्योंकि, पूर्णिमा के समय चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र के योगतारा के साथ रहेगा।* 

 २ *माघ मास मतलब जिस मास की पूर्णिमा के समय चन्द्रमा मघा नक्षत्र के योग तारा (मघा) के आसपास रहे। स्वाभाविक है उस समय सूर्य निरयन कुम्भ राशि के आरम्भ बिन्दु के आसपास ही रहेगा।

२ (क)--- ईसापूर्व १६९०२ में जब अयनांश १२०° था तब भी मघा नक्षत्र के योग तारा का निरयन भोगांश १२०° (निरयन सिंह००° बिन्दु) था। 
उस समय जब पूर्णिमा को चन्द्रमा मघा तारे के साथ रहा होगा तब सूर्य निरयन कुम्भ ००° (३००°) पर था। तो उस पूर्णिमा को माघ पूर्णिमा कहा जाना ही उचित था।
*उस समय सूर्य का सायन भोग ६०° रहा था। अतः वैदिक शुक्र मास/ पौराणिक शचि मास आरम्भ होने के आधार पर उसे आषाढ़ की पूर्णिमा नही कहा जा सकता।* 
*क्योंकि, उस पूर्णिमा के समय चन्द्रमा मघा नक्षत्र के योग तारा के साथ था। अतः वह पूर्णिमा माघ की पूर्णिमा ही कही जा सकती है।*

ऐसे ही 
२(ख)--- ईस्वी सन ८८७८ में जब अयनांश १२०° होगा तब भी मघा नक्षत्र के योग तारा का निरयन भोगांश १२०° (निरयन सिंह राशि के प्रारम्भ बिन्दु) पर रहेगा। उस समय जब पूर्णिमा को चन्द्रमा मघा तारे के साथ रहा होगा तब सूर्य निरयन कुम्भ ००° (३००°) पर रहेगा। तो उस पूर्णिमा को माघ पूर्णिमा कहा जाना उचित ही होगा।
 *उस समय सूर्य का सायन भोग ६०° होगा।अतः वैदिक शुक्र मास/ पौराणिक शचि मास प्रारम्भ होने के आधार पर उसे आषाढ़ी पूर्णिमा कहना अनुचित ही होगा।*
*क्योंकि पूर्णिमा के समय चन्द्रमा मघा नक्षत्र के योग तारा के साथ स्थित रहेगा। अतः वह माघ पूर्णिमा ही कही जा सकती है।*

वैदिक कालीन संवत्सर प्रणाली में पौराणिक पञ्चाङ्ग संशोधन।

वैदिक काल से लेकर आज तक संवत्सर आरम्भ का मुख्य आधार वसन्त सम्पात ही रहा है।
लोकमान्य बालगङ्गाधर तिलक जी, श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित, श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट, श्री नीलेश ओक आदि कई विद्वान सिद्ध कर चुके हैं कि, ब्राह्मण ग्रन्थों के रचना काल से पौराणिक काल तक में भी वसन्त सम्पात चैत्र वैशाखादि अलग अलग मासों में होनें के कारण संवत्सर का चैत्र वैशाख आदि मास परिवर्तित होता रहा है। यही कार्य नेपाल के धर्म शास्त्री पुनः करना चाहते हैं। शायद वे वैशाख मास से संवत्सर प्रारम्भ करना चाहते हैं।
उक्त विद्वानों द्वारा यह भी प्रमाणित किया गया है कि, वैदिक काल में संवत्सर प्रारम्भ, उत्तरायण का प्रारम्भ वसन्त ऋतु प्रारम्भ और मधुमास का प्रारम्भ वसन्त सम्पात से ही माना जाता था। 
महाभारत युद्ध के बाद और विशेषकर पुष्यमित्र शुंग के राज्यकाल से आरम्भ होकर धारानगरी के राजा भोज तक की अवधि में पुराणों में अत्यधिक संशोधन हुआ। इसी अवधि को पौराणिक काल कह सकते हैं। उत्तर भारत में कुशाण वंशिय राजाओं ने और दक्षिण भारत में उन्ही के समकालीन सातवाहन राजाओं ने पूराण संशोधन कार्य में भरपूर राजकीय सहयोग दिया।
उक्त पौराणिक काल में ही सिद्धान्त ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी) और संहिता ज्योतिष के अधिकांश ग्रन्थ रचे गये। पूराणों, ज्योतिष सिद्धान्त ग्रन्थ और संहिता ज्योतिष ग्रन्थों में वर्षा काल में पड़ने वाले मुहुर्तों को तीन माह पहले करने के लिए वैदिक उत्तरायण को उत्तर गोल, और वैदिक उत्तर तोयन को उत्तरायण घोषित कर दिया। वैदिक काल में संवत्सर, उत्तरायण और वसन्त ऋतु एक साथ वसन्त सम्पात से प्रारम्भ के स्थान पर पौराणिको नें उत्तरायण के मध्य से संवत्सर प्रारम्भ करने, वसन्त ऋतु के मध्य से संवत्सर प्रारम्भ किया जानें लगा। मधुमास के स्थान पर संवत्सर का प्रथम मास माधव मास कर दिया और  मधुमास को संवत्सर का अन्तिम मास कर दिया। उत्तरायण के प्रथम तीन माह (आधा उत्तरायण) संवत्सर के प्रारम्भ में और उत्तरायण के अन्तिम तीन माह (आधा उत्तरायण) संवत्सर के अन्त होने लगा।  वसन्त ऋतु का द्वितीय मास संवत्सर के प्रारम्भ में और वसन्त ऋतु का प्रथम मास संवत्सर के अन्त में होने लगा। मधुमास के स्थान पर माधव मास संवत्सर का प्रथम मास हो गया और तपस्य मास के स्थान पर मधुमास संवत्सर का अन्तिम मास हो गया। बाद में तो चैत्र शुक्ल पक्ष संवत के प्रारम्भ में  और चैत्र कृष्ण पक्ष संवत के अन्त में हो गया। अर्थात आधा उत्तरायण, आधी वसन्त ऋतु, मधु मास व्यतीत वर्ष के अन्त में और आधा भाग नव संवत्सर में हो गया। 
इन संशोधनों से वैदिक काल में मध्य देश ( मध्य भारत में) शुभकार्यों के जो मुहुर्त और विवाहादि कार्यक्रम वर्षाकाल में पड़ते थे उसके स्थान पर पौराणिक काल और वर्तमान काल में शीत काल में होने लगे। और वर्षाकाल को आराधना उपासना का समय घोषित कर दिया।
वैदिक सायन सौर संवत्सर प्रणाली और सावन वर्ष के स्थान पर इराक के बेबीलोन तुर्की और पश्चिम चीन में प्रचलित उन्नीस वर्षीय चक्र वाला सौर चान्द्र वर्ष निरयन सौर संस्कारित चैत्र वैशाख और तीसरे वर्ष में अधिक मास और १९,१२२ और १४१ वर्ष में क्षय मास वाला, चान्द्रमासों वाली पद्यति अपनाई पर आधारित निरयन सौर चान्द्र संवत्सर अपनाया गया गया।
नक्षत्र प्रधान संहिता ज्योतिष को ध्यान में रखते हुए ऋतु आधारित सायन गणना के स्थान पर निरयन गणना को ही स्थापित किया गया। 
एक साथ कुछ ही वर्षों में इतनी उठापटक  हो गई कि, धर्म और ज्योतिष जनता जनार्दन की समझ से परे के विषय हो गये। और जनता धर्म विमुख हो गई। जैन और बौद्ध मत ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया।
ईरान में वैदिक धर्म के स्थान पर ज़रथुष्ट्र के नेतृत्व में पारसी सम्प्रदाय आरम्भ हो गया,  तुर्क और अफगानिस्तान में वैदिक सनातन धर्म समाप्त होने लगा। दक्षिण पूर्वी टर्की के हित्ती सम्प्रदाय और संस्कृति और सुमेरियाई सम्प्रदाय और संस्कृति, चीन के ताओ मत, मिश्र के सम्प्रदाय और संस्कृति, क्रीट और युनान के पन्थ, सम्प्रदाय और संस्कृति से प्रभावित इराक के असुर पन्थ और संस्कृति तथा बेबीलोन का बाल पन्थ और बेबिलोनियाई संस्कृति का जन्म हुआ। इसी का नवीनतम स्वरूप इब्राहिमी मत, पन्थों यहुदी, ईसाई, और इस्लाम के रूप में जन्मे।
बाद में भारतीय सम्राटों का प्रभाव तुर्की और अफगानिस्तान से समाप्त हो गया। कुछ वर्षो पश्चात महाभारत युद्ध में क्षत्रिय विहीन भारतीय प्रदेशों पर तुर्को और अफगानों और युनानियों के हमले होनें लगे। कमजोरी पकड़कर यहा उनके राज्य भी स्थापित होनें लगे। उधर सऊदी अरब में इस्लाम के उदय के बाद ईराक के खलीफा नें भी भारत पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। और धीरे धीरे भारत का बड़ा भूभाग दास होनें लगा।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

शनि के ३०,००० पौराणिक मन्त्र जप विधि।

*शनि की दान सामग्री एवम् जप विधि* ----

*नोट -- पहले शनि का पौराणिक मन्त्र अच्छी तरह याद करलें।* --

अन्वय -- उच्चारण की सुविधा हेतु।

नीलाञ्जन समाभासम् 
रविपुत्रम् यमाग्रजम्।
छाँया मार्तण्ड सम्भूतम् 
तम् नमामि शनैश्चरम्।।


शनि का पौराणिक मन्त्र --

*नीलाञ्जन समाभासम् रविपुत्रम्यमाग्रजम्।*
*छाँयामार्तण्ड सम्भूतम् तम् नमामि शनैश्चरम्।।*

फिर निम्नांकित सामग्रियाँ शुक्रवार तक एकत्र कर अपने घर के देवस्थान या भण्डारगृह या रसोईघर में सुरक्षित रख लें।सम्भव हो/ घर में ही पौधे में लगा हो तो कृष्ण/ नील पुष्प शनिवार को सुबह भी ले सकते हैं।
शनिवार को सुर्योदय के पहले ही स्नान कर निम्नांकित समस्त दान सामग्री लेकर निकटतम किसी भी देवस्थान पर पहूँच जायें क्योंकि शनिवार को सुर्योदय होते ही तत्काल बाद में किन्तु बीस मिनट के अन्दर ही निकटतम किसी भी देवस्थान में ये दान सामग्रियाँ ईश्वरार्पण कर प्रार्थना करें कि है प्रभु ( गोत्र सहित अपना नाम लेकर) मैं शनि को बल प्रदान करने के निमित्त शनि की अनुकूलता प्राप्तर्थ्य दान कर रहा हूँ। कृपया योग्य पात्र तक पहूँचाने की कृपा करें। क्योंकि योग्य पात्र खोजना मेरे सामर्थ्य में नही है। यह निवेदन कर दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के पहले।

शनि के पौराणिक मन्त्र --

नीलाञ्जन समाभासम् 
रविपुत्रम् यमाग्रजम्।
छाँया मार्तण्ड सम्भूतम् 
तम् नमामि शनैश्चरम्।।

का एक बार जप कर दान सामग्री ईश्वर को समर्पित करदें।

आपको ईश्वर को समर्पित करना है अतः मन्दिर बन्द हो तो द्वार पर रखदें। मन्दिर खुला हो किन्तु पुजारी हो या न हो केवल मन्दिर में दान रखने की जगह रखदें।किसी से कोई बात नही करना है।

शनि की दान सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं--

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 
2 -- नीलम / नीलमणि (Sapphire)
कश्मीर या सुमजावा की खान का 10 या 11 रत्ती का नीरम लें। 
(अथवा कोलम्बिया की खान का पन्ना Emerald लें।
या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- महिषी / देशी भैस

यदि सामर्थ्य न हो तो --
लोह पत्र या चान्दी के पत्रे पर उभरी या उकेरी महिषी या भैंस या शनि की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- लोह / लोहा का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार कढ़ाई, खोँचा, सढ़सी, चिमटा,तवी तक कुछ भी लेलें (चलेगा)।

5 -- काली भेड़ के उन से बना काला कम्बल या काली शाल।

6 -- खड़े काले उड़द (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव खड़े काले उड़द लेलें चलेगा।)

7 -- काले तिल का तेल। (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव कालेतिल का तेल ही लें।)

8 -- कृष्ण (काला) पुष्प।

काला गुलाब या नीला गुलाब या कोई भी Indigo निले रंग का ये भी न मिले तो आसमानी Blue रंग का फुल भी चलेगा।
या बैंगनी Violet या जामुनी Purple रंग का फुल लें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- यम सुक्त, अर्यमा सुक्त, या अश्विनीकुमारों का सुक्त या कठोपनिषद या यमगीता की पुस्तक यथा सामर्थ्य लें।

10 -- बिछवा या बाच्छोल या जलजमनी की जड़ । (बिछवा या बाच्छोल या जलजमनी की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- शमि या खेजड़ी, का पौधा लें। 
(नगर/ ग्राम या घर के पश्चिम दिशा में रोपना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात शनि का पौराणिक मन्त्र -- 

नीलाञ्जन समाभासम् 
रविपुत्रम् यमाग्रजम्।
छाँया मार्तण्ड सम्भूतम् 
तम् नमामि शनैश्चरम्।।

का जप करें।एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

उक्त समस्त क्रियाओं के क्रियान्वयन शनिवार को सुर्योदय के पश्चात सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही करना है। अतः चाहें तो एक दिन पहले रिहल्सल करलें।

*घर पर जप करने हेतु--*

घर आने के बाद जब भी समय मिले दिन में, रात में, देवस्थान/ देवघर में या सोफे पर जहाँ कर सकें शान्ति से बैठकर शनि का पौराणिक मन्त्र --

नीलाञ्जन समाभासम् 
रविपुत्रम् यमाग्रजम्।
छाँया मार्तण्ड सम्भूतम् 
तम् नमामि शनैश्चरम्।।

का जप करें।

नोट --

इस बीच हर दिन कम से कम एक। बार 108 बार या अति विकट स्थिति में कम से कम ग्यारह बार पौराणिक मन्त्र का मान्सिक जप अवश्य करें। अपरिहार्य परिस्थितियों में भी कम से कम एकबार तो जप करें ही।
चाहे घर में या स्वयम् को जनन अशोच (बिरदी), मरण अशोच (सुतक) हो, स्त्रियों का मासिक धर्म अवधि हो, घरमें कोई बिमार हो और उसकी सेवा में व्यस्त हों स्वयम् बिमार हो,या यात्रा में हो या कही कर्त्तव्य पर तैनात हों,वैवाहिक आदि किसी कार्यक्रम मे व्यस्त हों,किसी कारण स्नान न कर पाये हों कैसी भी परिस्थिति हो 108 बार या 11 बार या एक बार तो मान्सिक जप कर ही लें।
एक बार में कम से कम 108 मनकों की एक माला जप पुर्ण होने पर एक लिख लें।
यथा सम्भव एक माला अवश्य जपें।

एक माला जपने पर 100 ( एक सौ) मन्त्र ही गिनती में माने।
दो माला पर दो सौ मन्त्र माने।
माला तुलसी की हो। 108 मनकों की ही लें।
फुल / सुमेरु पर्वत आने पर माला पलट दें क्योंकि सुमेरु का उल्लङ्घन नही करना है।
आसन पर बैठें तो आसन छोड़ने के पहलें आसन थोड़ उँचा कर भूमि पर जल छिड़क कर भूमि का जल नैत्रों पर या भृकुटि मध्य लगाकर ही आसान से उठें।

*निर्धारित जप संख्या 30,000 (तीस हजार) यानि 300 माला पुर्ण होने के बाद अगले शनिवार को सुर्योदय होते ही सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर के कार्य कर्म --*

30,000 (तीस हजार ) मन्त्र जप यानि 108 मनकों की 300 माला जप पुर्ण होंने के बाद जो भी शनिवार आये उस दिन पुनः सुर्योदय के तत्काल पश्चात किन्तु सुर्योदय के बीस मिनट के अन्दर 

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी लेलें चलेगा।)
 
2 -- नीलम / नीलमणि (Sapphire)
कश्मीर या सुमजावा की खान का 10 या 11 रत्ती का नीरम लें। 
(अथवा कोलम्बिया की खान का पन्ना Emerald लें।
या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- महिषी / देशी भैस

यदि सामर्थ्य न हो तो --
लोह पत्र या चान्दी के पत्रे पर उभरी या उकेरी महिषी या भैंस या शनि की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- लोह / लोहा का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार कढ़ाई, खोँचा, सढ़सी, चिमटा,तवी तक कुछ भी लेलें (चलेगा)।

5 -- काली भेड़ के उन से बना काला कम्बल या काली शाल।

6 -- खड़े काले उड़द (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव खड़े काले उड़द लेलें चलेगा।)

7 -- काले तिल का तेल। (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव कालेतिल का तेल ही लें।)

8 -- कृष्ण (काला) पुष्प।

काला गुलाब या नीला गुलाब या कोई भी Indigo निले रंग का ये भी न मिले तो आसमानी Blue रंग का फुल भी चलेगा।
या बैंगनी Violet या जामुनी Purple रंग का फुल लें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- यम सुक्त, अर्यमा सुक्त, या अश्विनीकुमारों का सुक्त या कठोपनिषद या यमगीता की पुस्तक यथा सामर्थ्य लें।

10 -- बिछवा या बाच्छोल या जलजमनी की जड़ । (बिछवा या बाच्छोल या जलजमनी की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- शमि या खेजड़ी, का पौधा लें। 
(नगर/ ग्राम या घर के पश्चिम दिशा में रोपना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात शनि के पौराणिक मन्त्र -- 

नीलाञ्जन समाभासम् 
रविपुत्रम् यमाग्रजम्।
छाँया मार्तण्ड सम्भूतम् 
तम् नमामि शनैश्चरम्।।

का जप करें। जप ईश्वरार्पण करके एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

शनि का पौराणिक मन्त्र जाप बन्द करदें अब नही करना है।

अनुष्ठान पुर्ण हो चुका है।
माता- पिता, गुरु- अतिथि, गौ- ब्राह्मणों ,सुर्य - चन्द्रमा,शुक्र, बृहस्पत्ति, विद्युत- पर्जन्य, आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि को प्रणाम करके सबका उपकार माने और धन्यवाद दें।

 *सहयोगी उपाय ---* 

शनि के अधिदेवता यमराज हैं और प्रत्यधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा हैं।
शनि सूर्य और सरण्यु की बहन छाँया के पुत्र और शनिदेव सूर्य और सरण्यु (संज्ञा) के पुत्र यमराज और यमुना तथा सूर्य और (सरण्यु के ही रूप) अश्विनी की सन्तान नासत्य और दस्र यानि आयुर्वेद के आदि वैद्य अश्विनी कुमारों के भाई हैं। 
नासत्य की पत्नी का नाम देवी है। जो मानव शरीर की अधिष्ठात्री देवी मानी गई है। तथा दस्र की पत्नी मायाद्री (माया की देवी) मानी गई है।
सृष्टि में सर्वप्रथम मरनें वाले यमराज को मृत्यु का देवता नियुक्त कर मृत्युलोक का नियन्ता/ शासक बनाया गया।
शनि की सगी बहन मान्दी है। मान्दी को ताजिक (वर्षफल) में ग्रह मानी गई है।

अतः शनि को बलवान बनानें के लिए तथा शनिदेव को प्रसन्न करनें के लिए सबसे महत्वपूर्ण धर्माचरण, सदाचारी जीवन, आयुर्वेद के नियमों का दृढ़ता पूर्वक पालन करते हुए जीना है। 
 यमराज और देवताओं के भी पितामह प्रजापति की पूजन करके पीपल के वृक्ष की पुजा करके ताम्बे के कलश में पानी में दो चम्मच कच्चा दूध, दो बून्द शहद डाल कर उस जल से सिंचते हुए पिपल की सात प्रदक्षिणा रोज करें। काली गाय को रोटी में थोड़े से उड़द और काले तिल रखकर खिलाना चाहिए।

केतु के २३,००० पौराणिक मन्त्र जप विधि ।

*केतु की दान सामग्री एवम् जप विधि* ----

*नोट -- पहले केतु का पौराणिक मन्त्र अच्छी तरह याद करलें।* --

अन्वय -- उच्चारण की सुविधा हेतु।

पलाश पुष्प सङ्काश् 
ताराका ग्रह मस्तकम्।
रोद्रम् रौद्रात्मकम् घोरम् 
तम् केतुम् प्रणमाम्यहम्।।

केतु का पौराणिक मन्त्र --

*पलाशपुष्पम्सकाश् ताराकाग्रहमस्तकम्।*
*रोद्रम् रौद्रात्मकम् घोरम् तम् केतुम् प्रणमाम्यहम्।।*

फिर निम्नांकित सामग्रियाँ शुक्रवार तक एकत्र कर अपने घर के देवस्थान या भण्डारगृह या रसोईघर में सुरक्षित रख लें।सम्भव हो/ घर में ही पौधे में लगा हो तो कृष्ण/ नील पुष्प शनिवार को सुबह भी ले सकते हैं।
शनिवार को सुर्योदय के पहले ही स्नान कर निम्नांकित समस्त दान सामग्री लेकर निकटतम किसी भी देवस्थान पर पहूँच जायें। 
शनिवार को सुर्योदय होते ही तत्काल बाद में किन्तु बीस मिनट के अन्दर ही निकटतम किसी भी देवस्थान में ये दान सामग्रियाँ ईश्वरार्पण कर प्रार्थना करें कि, -- है प्रभु ( गोत्र सहित अपना नाम लेकर) मैं केतु की अनुकूलता प्राप्तर्थ्य दान कर रहा हूँ। कृपया योग्य पात्र तक पहूँचाने की कृपा करें।
 क्योंकि योग्य पात्र खोजना मेरे सामर्थ्य में नही है। यह निवेदन कर फिर 

केतु के पौराणिक मन्त्र --

पलाश पुष्प सङ्काश् 
ताराका ग्रह मस्तकम्।
रोद्रम् रौद्रात्मकम् घोरम् 
तम् केतुम् प्रणमाम्यहम्।।

का एक बार जप कर दान सामग्री ईश्वर को समर्पित करदें।

आपको ईश्वर को समर्पित करना है अतः मन्दिर बन्द हो तो द्वार पर रखदें। मन्दिर खुला हो किन्तु पुजारी हो या न हो केवल मन्दिर में दान रखने की जगह रखदें।किसी से कोई बात नही करना है।

केतु की दान सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं--

1-- चान्दी का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार चान्दी का काँटा, कंगन से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 
2 -- लहसुनिया / लहसुन्या (Cat eye ) म्यांमार की गोमोक खान का 3,या 5 या 6 या 7 कैरेट का लहसुनिया / लहसुन्या (Cat eye ) लें। 
किन्तु 2 या 4 या 12 या 13 रत्ती का न लें।

(या गोदन्ती मणि लें या
 सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- कोई भी अनाज या अन्न/ धान्य/ सस्य ले लें।

या केतु की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- ताम्र / ताम्बा Copper का बर्तन लें ।

सामर्थ्य अनुसार ताम्र / ताम्बा Copper की, आचमनी,या तरभाणा,या कलश या जग, घड़ा यथा सामर्थ्य जो लेसकें ले लें ।

5 -- कृष्ण वस्त्र / काला कपड़ा ।

(सुती या शुद्ध रेशमी कृष्ण वस्त्र / काला रंग का शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल लेलें।

6 -- काले तिल (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव काले तिल लेलें ।)

7 -- काले तिल का तेल। (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव कालेतिल का तेल ही लें।)

8 -- कृष्ण (काला) पुष्प।

काला गुलाब या नीला गुलाब या कोई भी Indigo निले रंग का ये भी न मिले तो आसमानी Blue रंग का फुल भी चलेगा।
या बैंगनी Violet या जामुनी Purple रंग का फुल लें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- गणेश पुराण या कल्याण का गणेश अङ्क या अष्टविनायक तिर्थ का विवरण, कथा, आरती आदि की पुस्तक यथा सामर्थ्य लें।

10 -- अश्वगन्धा की जड़ या असगन्ध की जड़ ।

(अश्वगन्धा की जड़ या असगन्ध की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- कुश / कुशा का पौधा लें। 

(कुश एक घाँस जो पवित्री के रुप में और श्राद्ध में पिण्डदान के पिण्ड का आसन के रुप में काम आती है। नगर/ ग्राम या घर के वायव्य कोण यानि उत्तर पश्चिम दिशा में रोपना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात केतु का पौराणिक मन्त्र -- 

पलाश पुष्प सङ्काश् 
ताराका ग्रह मस्तकम्।
रोद्रम् रौद्रात्मकम् घोरम् 
तम् केतुम् प्रणमाम्यहम्।।

का जप करें।एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

उक्त समस्त क्रियाओं के क्रियान्वयन शनिवार को सुर्योदय के पश्चात सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही करना है। अतः चाहें तो एक दिन पहले रिहल्सल करलें।

*घर पर जप करने हेतु--*

घर आने के बाद जब भी समय मिले दिन में, रात में, देवस्थान/ देवघर में या सोफे पर जहाँ कर सकें शान्ति से बैठकर केतु का पौराणिक मन्त्र --

पलाश पुष्प सङ्काश् 
ताराका ग्रह मस्तकम्।
रोद्रम् रौद्रात्मकम् घोरम् 
तम् केतुम् प्रणमाम्यहम्।।

का जप करें।

नोट --

इस बीच हर दिन कम से कम एक। बार 108 बार या अति विकट स्थिति में कम से कम ग्यारह बार पौराणिक मन्त्र का मान्सिक जप अवश्य करें। अपरिहार्य परिस्थितियों में भी कम से कम एकबार तो जप करें ही।
चाहे घर में या स्वयम् को जनन अशोच (बिरदी), मरण अशोच (सुतक) हो, स्त्रियों का मासिक धर्म अवधि हो, घरमें कोई बिमार हो और उसकी सेवा में व्यस्त हों स्वयम् बिमार हो,या यात्रा में हो या कही कर्त्तव्य पर तैनात हों,वैवाहिक आदि किसी कार्यक्रम मे व्यस्त हों,किसी कारण स्नान न कर पाये हों कैसी भी परिस्थिति हो 108 बार या 11 बार या एक बार तो मान्सिक जप कर ही लें।

एक बार में कम से कम 108 मनकों की एक माला जप पुर्ण होने पर एक लिख लें।
यथा सम्भव एक माला अवश्य जपें।

एक माला जपने पर 100 ( एक सौ) मन्त्र ही गिनती में माने।
दो माला पर दो सौ मन्त्र माने।
माला तुलसी की हो। 108 मनकों की ही लें।
फुल / सुमेरु पर्वत आने पर माला पलट दें क्योंकि सुमेरु का उल्लङ्घन नही करना है।
आसन पर बैठें तो आसन छोड़ने के पहलें आसन थोड़ उँचा कर भूमि पर जल छिड़क कर भूमि का जल नैत्रों पर या भृकुटि मध्य लगाकर ही आसान से उठें।

*निर्धारित जप संख्या 23,000 (तेईस हजार ) यानि 230 माला पुर्ण होने के बाद अगले शनिवार को सुर्योदय होते ही सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर के कार्य कर्म --*

23,000 (तेईस हजार ) मन्त्र जप यानि 108 मनकों की 230 माला जप पुर्ण होंने के बाद जो भी शनिवार आये उस दिन पुनः सुर्योदय के तत्काल पश्चात किन्तु सुर्योदय के बीस मिनट के अन्दर 

1-- चान्दी का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार चान्दी का काँटा, कंगन से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 
2 -- लहसुनिया / लहसुन्या (Cat eye ) म्यांमार की गोमोक खान का 3,या 5 या 6 या 7 कैरेट का लहसुनिया / लहसुन्या (Cat eye ) लें। 
किन्तु 2 या 4 या 12 या 13 रत्ती का न लें।

(या गोदन्ती मणि लें या
 सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- कोई भी अनाज या अन्न/ धान्य/ सस्य ले लें।

या केतु की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- ताम्र / ताम्बा Copper का बर्तन लें ।

सामर्थ्य अनुसार ताम्र / ताम्बा Copper की, आचमनी,या तरभाणा,या कलश या जग, घड़ा यथा सामर्थ्य जो लेसकें ले लें ।

5 -- कृष्ण वस्त्र / काला कपड़ा ।

(सुती या शुद्ध रेशमी कृष्ण वस्त्र / काला रंग का शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल लेलें।

6 -- काले तिल (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव काले तिल लेलें ।)

7 -- काले तिल का तेल। (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव कालेतिल का तेल ही लें।)

8 -- कृष्ण (काला) पुष्प।

काला गुलाब या नीला गुलाब या कोई भी Indigo निले रंग का ये भी न मिले तो आसमानी Blue रंग का फुल भी चलेगा।
या बैंगनी Violet या जामुनी Purple रंग का फुल लें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- गणेश पुराण या कल्याण का गणेश अङ्क या अष्टविनायक तिर्थ का विवरण, कथा, आरती आदि की पुस्तक यथा सामर्थ्य लें।

10 -- अश्वगन्धा की जड़ या असगन्ध की जड़ ।

(अश्वगन्धा की जड़ या असगन्ध की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- कुश / कुशा का पौधा लें। 

(कुश एक घाँस जो पवित्री के रुप में और श्राद्ध में पिण्डदान के पिण्ड का आसन के रुप में काम आती है। नगर/ ग्राम या घर के वायव्य कोण यानि उत्तर पश्चिम दिशा में रोपना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात केतु के पौराणिक मन्त्र -- 

पलाश पुष्प सङ्काश् 
ताराका ग्रह मस्तकम्।
रोद्रम् रौद्रात्मकम् घोरम् 
तम् केतुम् प्रणमाम्यहम्।।

का जप करें। जप ईश्वरार्पण करके एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

अब केतु का पौराणिक मन्त्र जाप बन्द करदें अब नही करना है।

अनुष्ठान पुर्ण हो चुका है।
माता- पिता, गुरु- अतिथि, गौ- ब्राह्मणों ,सुर्य - चन्द्रमा,शुक्र, बृहस्पत्ति, विद्युत- पर्जन्य, आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि और अष्ट विनायकों को प्रणाम करके सबका उपकार माने और धन्यवाद दें।

राहु के २४,००० पौराणिक मन्त्र जप विधि।

*राहु की दान सामग्री एवम् २४० माला जप विधि* ----

*नोट -- पहले राहु का पौराणिक मन्त्र अच्छी तरह याद करलें।* --

अन्वय -- उच्चारण की सुविधा हेतु।

अर्धकायम् महा वीर्यम् 
चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ सम्भूतम् 
तम् राहुम् प्रणमाम्यहम्।।


राहु का पौराणिक मन्त्र --

*अर्धकायम् महावीर्यम् चन्द्रादित्यविमर्दनम्।*
*सिंहिकागर्भ सम्भूतम् तम् राहुम् प्रणमाम्यहम्।।*

फिर निम्नांकित सामग्रियाँ शुक्रवार तक एकत्र कर अपने घर के देवस्थान या भण्डारगृह या रसोईघर में सुरक्षित रख लें।सम्भव हो/ घर में ही पौधे में लगा हो तो कृष्ण/ नील पुष्प शनिवार को सुबह भी ले सकते हैं।
शनिवार को सुर्योदय के पहले ही स्नान कर निम्नांकित समस्त दान सामग्री लेकर निकटतम किसी भी देवस्थान पर पहूँच जायें। 
शनिवार को सुर्योदय होते ही तत्काल बाद में किन्तु बीस मिनट के अन्दर ही निकटतम किसी भी देवस्थान में ये दान सामग्रियाँ ईश्वरार्पण कर प्रार्थना करें कि, -- है प्रभु ( गोत्र सहित अपना नाम लेकर) मैं राहु की अनुकूलता प्राप्तर्थ्य दान कर रहा हूँ। कृपया योग्य पात्र तक पहूँचाने की कृपा करें।
 क्योंकि योग्य पात्र खोजना मेरे सामर्थ्य में नही है। यह निवेदन कर फिर 

राहु के पौराणिक मन्त्र --

अर्धकायम् महा वीर्यम् 
चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ सम्भूतम् 
तम् राहुम् प्रणमाम्यहम्।।

का एक बार जप कर दान सामग्री ईश्वर को समर्पित करदें।

आपको ईश्वर को समर्पित करना है अतः मन्दिर बन्द हो तो द्वार पर रखदें। मन्दिर खुला हो किन्तु पुजारी हो या न हो केवल मन्दिर में दान रखने की जगह रखदें।किसी से कोई बात नही करना है।

राहु की दान सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं--

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 

2 -- गोमेद / पीला गोमेद (Zircon or Hessonite) सिंहल द्वीप/ श्रीलंका की खान का 6 या 11 या 13 कैरेट का गोमेद / पीला गोमेद (Zircon or Hessonite) लें। 
किन्तु 3 या 6 केरेट का न लें।

(या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- अरबी कृष्णाश्व / अरबी काला घोड़ा लें।

यदि सामर्थ्य न हो तो --
सीसा/ कथीर के पत्रे या चान्दी के पत्रे पर उभरी या उकेरी गई कृष्ण अश्व या काले घोड़े या राहु की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- सीसा / कथीर Lead की छड़ या प्लेट जो मिले ले लें ।

सामर्थ्य अनुसार छड़ या प्लेट कुछ भी लेलें (चलेगा)। बेटरी सेल का खोल सीसे का होता है। यह निकल और टीन से मिलता जुलता किन्तु अलग धातु है। बोहरोंक्षके पास मिल सकता है।पहले छत की चद्दर / पतरे पर वायसर लगाने के काम आता था।
कटोरी में रख कर गरम करने पर पिघल जाता है।और कागज के पेन्सिल नुमा साँचे में डालो तो ठण्डा होते ही जम जाता है।कागज पर पेन्सिल मार्क जैसा इससे लिख भी सकते हैं।

5 -- नीला Indigo या आसमानी Blue वस्त्र।

(सुती या शुद्ध रेशमी नीले रंग Indigo का शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल लेलें।

6 -- काले तिल (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव काले तिल लेलें ।)

7 -- काले तिल का तेल। (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव कालेतिल का तेल ही लें।)

8 -- कृष्ण (काला) पुष्प।

काला गुलाब या नीला गुलाब या कोई भी Indigo निले रंग का ये भी न मिले तो आसमानी Blue रंग का फुल भी चलेगा।
या बैंगनी Violet या जामुनी Purple रंग का फुल लें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- नाग मन्त्र, निऋति सुक्त, रक्षोहा सुक्त, यातुधान सुक्त, महाभारत आस्तिक पर्व या भैरवाष्टक, भैरव आरती की पुस्तक यथा सामर्थ्य लें।

10 -- मलय चन्दन की जड़ ।

(मलय चन्दन की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- दुर्वा / दुब का पौधा लें। 

(दुर्वा एक घाँस जो गणेशजी को प्रिय है। नगर/ ग्राम या घर के नैऋत्य कोण यानि दक्षिण पश्चिम दिशा में रोपना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात राहु का पौराणिक मन्त्र -- 

अर्धकायम् महा वीर्यम् 
चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ सम्भूतम् 
तम् राहुम् प्रणमाम्यहम्।।

का जप करें।एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

उक्त समस्त क्रियाओं के क्रियान्वयन शनिवार को सुर्योदय के पश्चात सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही करना है। अतः चाहें तो एक दिन पहले रिहल्सल करलें।

*घर पर जप करने हेतु--*

घर आने के बाद जब भी समय मिले दिन में, रात में, देवस्थान/ देवघर में या सोफे पर जहाँ कर सकें शान्ति से बैठकर राहु का पौराणिक मन्त्र --

अर्धकायम् महा वीर्यम् 
चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ सम्भूतम् 
तम् राहुम् प्रणमाम्यहम्।।

का जप करें।

नोट --

इस बीच हर दिन कम से कम एक। बार 108 बार या अति विकट स्थिति में कम से कम ग्यारह बार पौराणिक मन्त्र का मान्सिक जप अवश्य करें। अपरिहार्य परिस्थितियों में भी कम से कम एकबार तो जप करें ही।
चाहे घर में या स्वयम् को जनन अशोच (बिरदी), मरण अशोच (सुतक) हो, स्त्रियों का मासिक धर्म अवधि हो, घरमें कोई बिमार हो और उसकी सेवा में व्यस्त हों स्वयम् बिमार हो,या यात्रा में हो या कही कर्त्तव्य पर तैनात हों,वैवाहिक आदि किसी कार्यक्रम मे व्यस्त हों,किसी कारण स्नान न कर पाये हों कैसी भी परिस्थिति हो 108 बार या 11 बार या एक बार तो मान्सिक जप कर ही लें।
एक बार में कम से कम 108 मनकों की एक माला जप पुर्ण होने पर एक लिख लें।
यथा सम्भव एक माला अवश्य जपें।

एक माला जपने पर 100 ( एक सौ) मन्त्र ही गिनती में माने।
दो माला पर दो सौ मन्त्र माने।
माला तुलसी की हो। 108 मनकों की ही लें।
फुल / सुमेरु पर्वत आने पर माला पलट दें क्योंकि सुमेरु का उल्लङ्घन नही करना है।
आसन पर बैठें तो आसन छोड़ने के पहलें आसन थोड़ उँचा कर भूमि पर जल छिड़क कर भूमि का जल नैत्रों पर या भृकुटि मध्य लगाकर ही आसान से उठें।

*निर्धारित जप संख्या 24,000 (चौवीस हजार ) यानि 240 माला पुर्ण होने के बाद अगले शनिवार को सुर्योदय होते ही सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर के कार्य कर्म --*

24,000 (चौवीस हजार ) मन्त्र जप यानि 108 मनकों की 240 माला जप पुर्ण होंने के बाद जो भी शनिवार आये उस दिन पुनः सुर्योदय के तत्काल पश्चात किन्तु सुर्योदय के बीस मिनट के अन्दर 

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी लेलें चलेगा।)
 
2 -- गोमेद / पीला गोमेद (Zircon or Hessonite) सिंहल द्वीप/ श्रीलंका की खान का 6 या 11 या 13 कैरेट का गोमेद / पीला गोमेद (Zircon or Hessonite) लें। 
किन्तु 3 या 6 केरेट का न लें।

(या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- अरबी कृष्णाश्व / अरबी काला घोड़ा लें।

यदि सामर्थ्य न हो तो --
सीसा/ कथीर के पत्रे या चान्दी के पत्रे पर उभरी या उकेरी गई कृष्ण अश्व या काले घोड़े या राहु की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- सीसा / कथीर Lead की छड़ या प्लेट जो मिले ले लें ।

सामर्थ्य अनुसार छड़ या प्लेट कुछ भी लेलें (चलेगा)। बेटरी सेल का खोल सीसे का होता है। यह निकल और टीन से मिलता जुलता किन्तु अलग धातु है। बोहरोंक्षके पास मिल सकता है।पहले छत की चद्दर / पतरे पर वायसर लगाने के काम आता था।
कटोरी में रख कर गरम करने पर पिघल जाता है।और कागज के पेन्सिल नुमा साँचे में डालो तो ठण्डा होते ही जम जाता है।कागज पर पेन्सिल मार्क जैसा इससे लिख भी सकते हैं।

5 -- नीला Indigo या आसमानी Blue वस्त्र।

(सुती या शुद्ध रेशमी नीले रंग Indigo का शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल लेलें।

6 -- काले तिल (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव काले तिल लेलें ।)

7 -- काले तिल का तेल। (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव कालेतिल का तेल ही लें।)

8 -- कृष्ण (काला) पुष्प।

काला गुलाब या नीला गुलाब या कोई भी Indigo निले रंग का ये भी न मिले तो आसमानी Blue रंग का फुल भी चलेगा।
या बैंगनी Violet या जामुनी Purple रंग का फुल लें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- नाग मन्त्र, निऋति सुक्त, रक्षोहा सुक्त, यातुधान सुक्त, महाभारत आस्तिक पर्व की पुस्तक यथा सामर्थ्य लें।

10 -- मलय चन्दन की जड़ ।

(मलय चन्दन की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- दुर्वा / दुब का पौधा लें। 

(दुर्वा एक घाँस जो गणेशजी को प्रिय है। नगर/ ग्राम या घर के नैऋत्य कोण यानि दक्षिण पश्चिम दिशा में रोपना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात राहु के पौराणिक मन्त्र -- 

अर्धकायम् महा वीर्यम् 
चन्द्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ सम्भूतम् 
तम् राहुम् प्रणमाम्यहम्।।

का जप करें। जप ईश्वरार्पण करके एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

अब राहु का पौराणिक मन्त्र जाप बन्द करदें अब नही करना है।

अनुष्ठान पुर्ण हो चुका है।
माता- पिता, गुरु- अतिथि, गौ- ब्राह्मणों ,सुर्य - चन्द्रमा,शुक्र, बृहस्पत्ति, विद्युत- पर्जन्य, आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि को प्रणाम करके सबका उपकार माने और धन्यवाद दें।

गुरु बृहस्पति के २५,००० पौराणिक मन्त्र जप विधि।

*बृहस्पति की दान सामग्री एवम् जप विधि* ----

*नोट -- पहले बृहस्पति का पौराणिक मन्त्र अच्छी तरह याद करलें।* --
 
अन्वय -- उच्चारण की सुविधा हेतु।

देवानाम् च ऋषिणाम् च 
गुरुम् काञ्चन सन्निभम्।
बुद्धि भूतम् त्रिलोकेशम् 
तम् नमामि बृहस्पतिम्।।

बृहस्पति (गुरु) का पौराणिक मन्त्र --

*देवानाम् च ऋषिणाम् च गुरुम्काञ्चनसन्निभम्।*
*बुद्धिभूतम् त्रिलोकेशम् तम्नमामि बृहस्पतिम्।।*

फिर निम्नांकित सामग्रियाँ बुधवार तक एकत्र कर अपने घर के देवस्थान या भण्डारगृह या रसोईघर में सुरक्षित रख लें।सम्भव हो/ घर में ही पौधे में लगा हो तो पीला पुष्प गुरुवार को सुबह भी ले सकते हैं।

 गुरुवार को सुर्योदय के पहले ही स्नान कर निम्नांकित समस्त दान सामग्री लेकर निकटतम किसी भी देवस्थान पर पहूँच जायें क्योंकि गुरुवार को सुर्योदय होते ही तत्काल बाद में किन्तु बीस मिनट के अन्दर ही निकटतम किसी भी देवस्थान में ये दान सामग्रियाँ ईश्वरार्पण कर प्रार्थना करें कि है प्रभु ( गोत्र सहित अपना नाम लेकर) मैं बृहस्पति ( गुरु) को बल प्रदान करने के निमित्त बृहस्पति ( गुरु) की अनुकूलता प्राप्तर्थ्य दान कर रहा हूँ। कृपया योग्य पात्र तक पहूँचाने की कृपा करें। क्योंकि योग्य पात्र खोजना मेरे सामर्थ्य में नही है। यह निवेदन कर दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के पहले।

बृहस्पति (गुरु) का पौराणिक मन्त्र --

देवानाम् च ऋषिणाम् च 
गुरुम् काञ्चन सन्निभम्।
बुद्धिभूतम् त्रिलोकेशम् 
तम् नमामि बृहस्पतिम्।।

का एक बार जप कर दान सामग्री ईश्वर को समर्पित करदें।

आपको ईश्वर को समर्पित करना है अतः मन्दिर बन्द हो तो द्वार पर रखदें। मन्दिर खुला हो किन्तु पुजारी हो या न हो केवल मन्दिर में दान रखने की जगह रखदें।किसी से कोई बात नही करना है।

बृहस्पति (गुरु) की दान सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं--

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 
2 -- पुष्पराग / पुखराज ( Topaz .)

ब्राजील की खान का जो माणिक्य के साथ मिला हो ऐसा का पीला पुखराज 7 या 12 केरेट का लें। किन्तु 6 या 11 या 15 केरेट ना लें।
(सामर्थ्य न हो तो सुनेला या पीला सोनेला ( साइट्रोन ) ले लें।

या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही लेलें।)

3 -- गज (हाथी) ।

यदि सामर्थ्य न हो तो --
काँसे या चान्दी के पत्रे पर उकेरी/ उभरी हुई हाथी या बृहस्पति की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- काँस्य पात्र यानि काँसे का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार प्लेट, थाली, कटोरी से लेकर घड़े तक कुछ भी लेलें (चलेगा)।

5 -- पीत वस्त्र / पीला कपड़ा

(यानि शुद्ध रेशम का या शुद्ध काटन का पीले रङ्ग का कपड़ा (भगवान विष्णु के पीताम्बर के रंग का कपड़ा। )

(शुद्ध रेशम या सुती शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल यथा सामर्थ्य जो ले सकें।लेलें)

6 -- देशी चने की दाल (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव , देशी / काँटेवाले/ कत्थई रंग के चने की दाल ले लें।)

7 -- शकरा यानि खाण्ड / खाण्डसारी यानि पीली शकर (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव खाण्ड / खाण्डसारी यानि पीली शकर ही लें।)

8 -- पीत पुष्प / पीला रङ्ग का फुल ले लें।

(पीला गुलाब या वैजन्ती या कदली पुष्प या पीली कनेर (करवीर) का फुल ले लें)

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- ब्रह्मणस्पत्ति सुक्त या बृहस्पति सुक्त या ब्रह्म पुराण या ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि पुस्तक यथा सामर्थ्य कुछ भी लें।

10 -- नारङ्गी यानि मोसम्बी की जड़ । 
(नारङ्गी यानि मोसम्बी की जड़ 
आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।नारङ्गी का फल सन्तरा / सन्तरे और कीनु के फल से भिन्न फल है । यह उपर और नीचे चपटी होती है।)

11 -- पीपल का पौधा का पौधा लें।
 (नोट -- नगर/ ग्राम / घर के उत्तर में लगाना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात बृहस्पति (गुरु) का पौराणिक मन्त्र -- 

देवानाम् च ऋषिणाम् च 
गुरुम् काञ्चन सन्निभम्।
बुद्धिभूतम् त्रिलोकेशम् 
तम् नमामि बृहस्पतिम्।।

का जप करें। एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

उक्त समस्त क्रियाओं के क्रियान्वयन गुरुवार को सुर्योदय के पश्चात सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही करना है। अतः चाहें तो एक दिन पहले रिहल्सल करलें।

*घर पर जप करने हेतु--*

घर आने के बाद जब भी समय मिले दिन में, रात में, देवस्थान/ देवघर में या सोफे पर जहाँ कर सकें शान्ति से बैठकर बृहस्पति का पौराणिक मन्त्र --

देवानाम् च ऋषिणाम् च 
गुरुम् काञ्चन सन्निभम्।
बुद्धिभूतम् त्रिलोकेशम् 
तम् नमामि बृहस्पतिम्।।

का जप करें।

नोट --

इस बीच हर दिन कम से कम एक। बार 108 बार या अति विकट स्थिति में कम से कम ग्यारह बार पौराणिक मन्त्र का मान्सिक जप अवश्य करें। अपरिहार्य परिस्थितियों में भी कम से कम एकबार तो जप करें ही।
चाहे घर में या स्वयम् को जनन अशोच (बिरदी), मरण अशोच (सुतक) हो, स्त्रियों का मासिक धर्म अवधि हो, घरमें कोई बिमार हो और उसकी सेवा में व्यस्त हों स्वयम् बिमार हो,या यात्रा में हो या कही कर्त्तव्य पर तैनात हों,वैवाहिक आदि किसी कार्यक्रम मे व्यस्त हों,किसी कारण स्नान न कर पाये हों कैसी भी परिस्थिति हो 108 बार या 11 बार या एक बार तो मान्सिक जप कर ही लें।

एक बार में कम से कम 108 मनकों की एक माला जप पुर्ण होने पर एक लिख लें।
यथा सम्भव एक माला अवश्य जपें।

एक माला जपने पर 100 ( एक सौ) मन्त्र ही गिनती में माने।
दो माला पर दो सौ मन्त्र माने।
माला तुलसी की हो। 108 मनकों की ही लें।
फुल / सुमेरु पर्वत आने पर माला पलट दें क्योंकि सुमेरु का उल्लङ्घन नही करना है।
आसन पर बैठें तो आसन छोड़ने के पहलें आसन थोड़ उँचा कर भूमि पर जल छिड़क कर भूमि का जल नैत्रों पर या भृकुटि मध्य लगाकर ही आसान से उठें।

*निर्धारित जप संख्या 25,000 (पच्चीस हजार) यानि 250 माला पुर्ण होने के बाद अगले गुरुवार को सुर्योदय होते ही सुर्योदय से बीस मिनट के अन्दर के कार्य कर्म --*

25,000 (पच्चीस हजार ) मन्त्र जप यानि 108 मनकों की 250 माला जप पुर्ण होंने के बाद जो भी गुरुवार आये उस दिन पुनः सुर्योदय के तत्काल पश्चात किन्तु सुर्योदय के बीस मिनट के अन्दर 

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 
2 -- पुष्पराग / पुखराज ( Topaz .)

ब्राजील की खान का जो माणिक्य के साथ मिला हो ऐसा का पीला पुखराज 7 या 12 केरेट का लें। किन्तु 6 या 11 या 15 केरेट ना लें।
(सामर्थ्य न हो तो सुनेला या पीला सोनेला ( साइट्रोन ) ले लें।
या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही लेलें।)

3 -- गज (हाथी) ।

यदि सामर्थ्य न हो तो --
काँसे या चान्दी के पत्रे पर उकेरी हाथी या बृहस्पति की मुर्ति (जो वास्तु पुजा में लगती है) ले लें।

4 -- काँस्य पात्र यानि काँसे का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार प्लेट, थाली, कटोरी से लेकर घड़े तक कुछ भी लेलें (चलेगा)।

5 -- पीत वस्त्र / पीला कपड़ा

(यानि शुद्ध रेशम का या शुद्ध काटन का पीले रङ्ग का कपड़ा (भगवान विष्णु के पीताम्बर के रंग का कपड़ा। )

(शुद्ध रेशम या सुती शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल यथा सामर्थ्य जो ले सकें।लेलें)

6 -- देशी चने की दाल (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव , देशी / काँटेवाले/ कत्थई रंग के चने की दाल ले लें।)

7 -- शकरा यानि खाण्ड / खाण्डसारी यानि पीली शकर (सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव खाण्ड / खाण्डसारी यानि पीली शकर ही लें।)

8 -- पीत पुष्प / पीला रङ्ग का फुल ले लें।

(पीला गुलाब या वैजन्ती का पुष्प या कदली पुष्प या पीली कनेर (करवीर) का फुल ले लें)

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 -- ब्रह्मणस्पत्ति सुक्त,या बृहस्पति सुक्त या ब्रह्म पुराण या ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि पुस्तक यथा सामर्थ्य कुछ भी लें।

10 -- नारङ्गी यानि मोसम्बी की जड़ । 
(नारङ्गी यानि मोसम्बी की जड़ 
आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें। 
नारङ्गी का फल सन्तरा / सन्तरे और कीनु से भिन्न फल है । यह उपर और नीचे चपटी होती है।)

11 -- पीपल का पौधा का पौधा लें।
 (नोट -- नगर/ ग्राम / घर के उत्तर में लगाना चाहिए।)

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात बृहस्पति (गुरु) के पौराणिक मन्त्र -- 

देवानाम् च ऋषिणाम् च 
गुरुम् काञ्चन सन्निभम्।
बुद्धिभूतम् त्रिलोकेशम् 
तम् नमामि बृहस्पतिम्।।

का जप करें। जप ईश्वरार्पण करके एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

 बृहस्पति (गुरु) का पौराणिक मन्त्र जाप बन्द करदें अब नही करना है।

अनुष्ठान पुर्ण हो चुका है।
माता- पिता, गुरु- अतिथि, गौ- ब्राह्मणों ,सुर्य - चन्द्रमा, , बृहस्पत्ति,ध्रुव तारा, विद्युत- पर्जन्य, आकाश,वायु,अग्नि, जल और भूमि को प्रणाम करके सबका उपकार माने और धन्यवाद दें।

 *सहायक कर्म* 

देवगुरु ब्रहस्पति के अधिदेवता - हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हैं। और प्रजापति ब्रह्मा, देवगुरु ब्रहस्पति देवता, ब्रह्मणस्पति और वाचस्पति की आराधना उपासना से भी ब्रहस्पति प्रसन्न रहते हैं।
ब्रहस्पति के प्रत्यधिदेवता देवराज इन्द्र हैं। लक्ष्मीनारायण के साथ इन्द्र की पूजन से भी देवगुरु ब्रहस्पति प्रसन्न होते हैं।

केले के पौधे की पूजा करके ताम्बे के कलश में पानी में दो चम्मच कच्चा दूध, दो बून्द शहद डाल कर उस जल से सिंचते हुए केले के पौधे की सात प्रदक्षिणा रोज करें। देशी गाय का घीँ लगी रोटी में देशी चनें की दाल रखकर खिलाना।
देशी चना यानी कत्थई रङ्ग का नोंकवाला चना जिसे काला चना भी बोलते हैं। या काँटे वाला चना भी बोलते हैं।