सोमवार, 15 अप्रैल 2019

वैदिक सृष्टि उत्पत्ति सिद्धान्त की अगली कड़ी विष्णु पुराण से प्रजापति की सन्तान प्रजापतियों, अग्नि, पितर,रुद्र एवम् स्वायम्भुव मनु का मानव वंश वर्णन

विष्णु पुराण ही क्यों?

क्यों कि, वेदिक प्रवृत्ति मार्गी वैष्णव जन इसे वेदव्यास जी के पिता महर्षि पाराशर की रचना मानते हुए प्रथम पुराण मानते हैं।

वेदिक सृष्टि उत्पत्ति सिद्धान्त से आगे का वर्णन वेदव्यास जी के पिता महर्षि पाराशर की रचना और प्रथम पुराण विष्णु पुराण से मानव सृष्टि/ मानव वंश का वर्णन --
( प्रजापति ब्रह्माजी की मानस सन्तान ) स्वायम्भुव मनु को उनकी पत्नी ( प्रजापति ब्रह्माजी की मानस सन्तान )शतरुपा से उत्तानपाद और प्रियव्रत दो पुत्र और प्रसूति और आकूति नामक दो कन्याएँ उत्पन्न हुई ।
उत्तानपाद की पत्नी सुनीति से ध्रुव, और सुरुचि से उत्तम का जन्म हुआ।
ध्रुव के दो पुत्र शिष्टि और भव्य हुए।
भव्य से   शम्भु हुए ।
शिष्टि की पत्नी सुच्छाया से रिपु, रिपुञ्जय,विप्र, वृकल और वृकतेजा हुए।
रिपु की पत्नी वृहती से चाक्षुष हुए।
वरुण कुल में वीरण प्रजापति की पुत्री पुष्करणी से चाक्षुष के घर छटे मन्वन्तर के मनु चाक्षुष मनु का जन्म हुआ।
चाक्षुष मनु को वैराज प्रजापति की पुत्री नड़वला से कुरु, पुरु, शतधुम्न, तपस्वी,सत्यवान, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र, सुधुम्न, और अभिमन्यु नामक पुत्र हुए।
कुरु की पत्नी आग्नैयी से अङ्ग, सुमना, ख्याति, अङ्गिरा, और शिबि नामक पुत्र हुए।
अङ्ग की पत्नी (मृत्यु की प्रथम पुत्री )सुनीथा से वैन का जन्म हुआ।
वेन की  उरु (यानि जांघ) के मन्थन से ( विन्ध्याचल के आदिवासी) निषाद राज जन्मे । और वैन की दाहिनी भुजा के मन्थन से वैन्य पृथु उत्पन्न हुए।
पृथु से अन्तर्धान और वादी जन्मे। अन्तर्धान की पत्नी शिखण्डनी से हविर्धान का जन्म हुआ।
हविर्धान की पत्नी (अग्नि कुल की ) घीषणी से प्राचीनबर्हि, शुक्र,गय,कृष्ण, बृज और अजिन नामक पुत्र जन्मे।
प्रजापति प्राचीनबर्हि की पत्नी (समुद्र पुत्री) सुवर्णा से दस प्रचेताओं का जन्म हुआ ।
प्रचेता गण के यहाँ (गोमती तट वासी कण्डु ऋषि और प्रम्लोचा अप्सरा की सन्तान वृक्षों द्वारा पालित पुत्री) मारिषा  से दक्ष द्वितीय  का जन्म हुआ।
( वरुण वंशजा,चाक्षुष मनु के श्वसुर वीरण प्रजापति की पुत्री ) असिन्की से दक्ष (द्वितीय) प्रजापति के घर साठ कन्याएँ जन्मी जिनमे  सती (शंकर जी पहली पत्नी ) हुई
उल्लेखनीय है कि,  ब्रह्मा जी के मानस पुत्र दक्ष प्रथम की पत्नी प्रसुति ( जो स्वायम्भुव मनु की पुत्री थी उस प्रसूति )  से  चौवीस कन्याएँ जन्मी थी।
इस प्रकार दोनो दक्ष में पिढियों का अन्तर है।
स्वायम्भुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत की पत्नी ( जो कर्दम पुत्री थी ) उससे सम्राट और कुक्षि (दो) पुत्रियाँ और (दस पुत्र) आग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान, द्युतिमान, मेघा, मेघातिथि,भव्य,सवन,पुत्र , ज्योतिष्मान।मेघा, अग्निबाहु और पुत्र निवृत्तिपरायण हो गये।
आग्नीन्ध्र को जम्मुद्वीप, मेघातिथि को प्लक्षद्वीप, वपुष्मान को शाल्मलद्वीप, ज्योतिष्मान को कुशद्वीप, भव्य को शाकद्वीप, सवन को पुष्करद्वीप,।
आग्नीन्ध्र ने नाभि ( जिन्हे अजनाभ भी कहते है उन नाभि को कोहिमवर्ष या  (अजनाभ वर्ष )  यानि भारतवर्ष का राज्य दिया।
किम्पुरुष को हेमकुटवर्ष।
हरिवर्ष को नैषधवर्ष ।
इलावृत को लावृतवर्ष दिया (जिसके मध्य मे मेरुपर्वत है।)
रम्य को नीलाचल से लगाहुआ वर्ष।
हिरण्यवान को श्वेतवर्ष (रम्य के देश से उत्तर में)।
कुरु को श्रृंगवान पर्वत के उत्तर का देश ।
भद्राश्व को मेरु के पुर्व का देश।
केतुमाल को गन्धमादन पर्वत का देश का राज्य दिया।
सप्त द्वीपों का बटवारा सात पुत्रों में कर आग्नीन्ध्र शालग्राम में तप करने गये।उनके पुत्र नाभि हिमवर्ष (भारतवर्ष) के राजा हुए।

नाभि की पत्नी मेरुदेवी से ऋषभदेव का जन्म हुआ।ये वेदिक ऋषि भी हैं। (ऋग्वेद में) इनका सुक्त भी है जो अहिंसा सुक्त कहलाता है।
त्रषभदेव से भरत हुए  जोभरत/चक्रवर्ती सम्राट कहलाये और बाद में  जड़भरत के नाम से भी प्रसिद्ध हुए। हिम वर्ष का नाम भारतवर्ष इनके नाम पर ही पड़ा।

भरत को उत्तराधिकार सोप ऋषभदेव पुलहाश्रम में वानप्रस्थ तप करने चले गये।जहाँ सन्यास लेकर दिगम्बर ( निर्वस्त्र/ पुर्ण नग्न हो कर घुमने लगे।
इस कारण कालान्तर में जैन सम्प्रदाय ने ऋषभदेव को अपना आद्य तिर्थंकर घोषित कर दिया।

उत्तानपाद शाखा वाले वेदिक संहिताओं और  ईशावास्योपनिषद पर आधारित ब्राह्मण धर्म , यज्ञ, पञ्चमहायज्ञादि  , बुद्धियोग ( निष्काम कर्मयोग) और अष्टांग योग ,और ऋते ज्ञानान मुक्ति और सर्व खल्विदं ब्रह्म और  पर आधारित ब्राह्मण धर्म पालन करते धे।
ये तीन आश्रम ब्रह्मश्चर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ के सफलतापूर्वक निर्वहन के पश्चात संन्यस्थ जीवन जीते थे। पर यज्ञ और वस्त्र  का त्याग नही करते थे।
श्रोत्रिय धर्म पालक ब्रह्मर्षि कालान्तर में ये प्रवृत्ति मार्ग कहलाया और ये वैष्णव कहलाये।

जबकि प्रियव्रत शाखा ब्राह्मण ग्रन्थों  पर आधारित राजधर्म / क्षात्र धर्म ,अष्टांग योग, हटयोग, उग्र तप, और ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तिम अध्याय आरण्यकों और  उपनिषदों पर आधारित ज्ञान मिमान्सा पर आधारित धर्म आचरण कर आयु के अन्तिम पड़ाव पर सन्यास ग्रहण कर नगर के बाहर उन्मुक्त विचरण करते थे।कालान्तर में ये राजर्षी गण निवृत्ति मार्ग , योगी,यति, तपस्वी,सन्यासी और कहलाये और शैव कहलाये।

प्रजापति ब्रह्मा जी की मानस सन्तान
1 दक्ष ( प्रथम)  और उनकी पत्नी प्रसुति ।( जो स्वायम्भुव मनु की पुत्री भी कही गई है)
2 रुचि प्रजापति और उनकी पत्नी आकूति। ( जो स्वायम्भुव मनु की पुत्री भी कही गई है)
3 स्वायम्भुव मनु । और उनकी पत्नी
4 शतरुपा।

दक्ष प्रजापति ( प्रथम) की पत्नी (स्वायंभुव मनु की पुत्री) प्रसूति से चौवीस कन्याएँ हुई।
1 श्रद्धा 2 चला/चंचला (लक्ष्मी) 3धृति 4तुष्टि 5 मेधा 6 पुष्टि 7 क्रिया 8 बुद्धि 9 लज्जा 10 वपु 11 शान्ति 12 सिद्धि 13 कीर्ति इन तेरहों दक्ष कन्याओं का विवाह ब्रह्माजी के मानस पुत्र धर्म से हुआ।
धर्म की पत्नियों (दक्ष पुत्रियों) की सन्तान-
1 श्रद्धा से काम।काम की पत्नी   रति से हर्ष हुआ ।
2 चला ( लक्ष्मी) से दर्प।
3 धृति से नियम।
4 तुष्टि से सन्तोष।
5 पुष्टि से लोभ।
6 मेधा से श्रुत।
7 क्रिया से दण्ड, नय और विनय।
8 बुद्धि से बोध।
9 लज्जा से विनय।
10 वपु से व्यवसाय।
11 शान्ति से क्षेम।
12 सिद्धि से सुख।
13 कीर्ति से यश हुआ।

[ नोट- प्रसंगवश अधर्म कज वंश का वर्णन -
अधर्म की पत्नी हिन्सा है।
अधर्म - हिन्सा से -अनृत (मिथ्या/ झूठ) नामक पुत्र और निकृति नामक पुत्री हुई।
अनृत की जुड़वाँ सन्तान - भय और उसकी पत्नी माया हुए मामा की सन्तान मृत्यु नामक पुत्र हुआ।
मृत्यु पत्नी व्याधि, जरा,शोक, तृष्णा। सभी का न विवाह हुआ न सन्तान हुई।
  अधर्म - हिन्सा से दुसरी ( युग्म/जुड़वाँ) सन्तान नरक और उसकी पत्नी वेदना हुए। रोरव नरक की पत्नी  वेदना की सन्तान दुख हुआ।]

14 ख्याति  (का विवाह भ्रगु से हुआ जो प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान थे)।
भ्रगु -ख्याति से लक्ष्मी जन्मी जिनका विवाह विष्णुजी से हुआ। भ्रगु -ख्याति से  दो पुत्र भी हुए धाता (धातृ) और विधाता।

धाता का विवाह  (मेरु की पुत्री) आयति  से हुआ।
विधाता का विवाह (मेरु की ही दुसरी पुत्री) नियति से  हुआ।

धाता-आयति से प्राण उत्पन्न हुए।
प्राण से द्युतिमान हुए।द्युतिमान से राजवान हुए।

विधाता- नियति से मृकण्डु हुए।मृकण्डु से मार्कण्डेय।मार्कण्डेय से वेदशिरा हुए।

15 सती  का विवाह रुद्र से हुआ जो प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान थे।
रुद्र जन्मते ही  रोने लगे और इधर उधर दोड़ने लगे।ब्रह्माजी ने उनके रोने का कारण पुछा तो रुद्र ने कहा मेरा नाम रख दो ।रोने के कारण ब्रह्माजी ने उनका नाम रुद्र रखा।
रुद्र बाद में फिरसे सात बार और रोये तो हर बार रोने पर ब्रह्माजी ने उनके सात नाम और रखे।  1 रुद्र के अलावा 2 भव  3 शर्व 4 ईशान ,5 पशुपति, 6 भीम, 7 उग्र और 8 महादेव नाम से पुकारा।और उनके स्थान नियत किये जो रुद्र की अष्टमूर्ति  कहलाई ।

1रुद्र का स्थान / मुर्ति सुर्य और उनकी पत्नी सुवर्चला उषा ।जिनके पुत्र शनि हुए।

2 भव का स्थान / मुर्ति  जल और उनकी पत्नी विकेशी ।और उनके पुत्र शुक्र हुए।

3 शर्व का स्थान / मुर्ति पृथिवी और उनकी पत्नी अपरा ।और उनके पुत्र लोहिताङ्ग (मंगल) हुए।

4 ईशान    का स्थान / मुर्ति वायु और उनकी पत्नी शिवा ।और उनके पुत्र मनोजव ( सम्भवतया हनुमानजी) हुए।

5 पशुपति  का स्थान / मुर्ति  अग्नि और उनकी पत्नी स्वाहा। और उनके पुत्र स्कन्द ( कार्तिकेय) हुए।

6 भीम  का स्थान / मुर्ति आकाश और उनकी पत्नी दिशा। और उनके पुत्र सर्ग (स्रष्टि ) हुए।

7 उग्र  का स्थान / मुर्ति  यज्ञ में दीक्षित ब्राह्मण और उनकी पत्नी दीक्षा ।और उनके पुत्र सन्तान  हुए।

8 महादेव  का स्थान / मुर्ति  चन्द्रमा और उनकी पत्नी रोहिणी और उनके पुत्र बुध  हुए। 

ये रुद्र सर्ग कहलाता है।

16 सम्भूति  का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान  मरीचि से हुआ ।
मरीचि- सम्भूति से पुर्णमास नामक पुत्र हुए।पुर्णमास से विरजा और पर्वत दो पुत्र हुए।

17 स्मृति का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान  अंगिरा से हुआ ।
अंगिरा-स्मृति से सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामक पुत्रियाँ  हुई, जो अमावस्या के चार प्रकार हैं।

18 प्रीति का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान  पुलस्य से हुआ ।
पुलस्य- प्रीति से दत्तोलि हुए जो पुर्व जन्म में ( स्वायम्भुव मन्वन्तर में) अगस्त्य कहे जाते थे।

19 क्षमा का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान  पुलह से हुआ ।
पुलह- क्षमा से कर्दम, उर्वरीयान् और सहिष्णु नामक तीन पुत्र हुए।

20  सन्तति का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान  कृतु से हुआ ।
कृतु - सन्तति से  बालखिल्यादि साठ हजार  ऊर्ध्वरेता मुनि हुए जो अङ्गुष्ठ प्रमाण वाले (अंगुठे के पोरुओं के समान शरीर वाले) थे।

21 अनसूया का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान अत्रि से हुआ ।
अत्रि - अनसूया से सोम (चन्द्रमा), दुर्वासा और योगी  दत्तात्रेय हुए।

22 उर्ज्जा  का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान  वशिष्ठ से हुआ ।

वशिष्ठ - उर्जा से रज, गौत्र, उर्ध्वबाहु, सवन, अनध,  सुतपा और शुक्र नामक सात पुत्र हुए। ये तीसरे मन्वन्तर में सप्तर्षि हुए।

23  स्वाहा  का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान अग्नि से हुआ ।

अग्नि - स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए।
इन तीनो के पन्द्रह-पन्द्रह पुत्र हुए।
अग्नि + तीन पुत्र + पैतालीस पौत्र सब मिलकर उनचास अग्नि कहलाते हैं

24 स्वधा का विवाह  प्रजापति ब्रह्मा की मानस सन्तान अनग्निक, अग्निष्वात्ता, साग्निक और बर्हिषद नामक पितरों से हुआ ।
अनग्निक, अग्निष्वात्ता, साग्निक और बर्हिषद नामक पितरो की पत्नी स्वधा से मेना और धारणी दो कन्याएँ हुई। दोनो योगिनी और ब्रह्मवादिनी हुई।

(हिमाचल से मेना की पुत्री पार्वती हुई।)

रुचि प्रजापति और आकूति से  यज्ञ नामक पुत्र और दक्षिणा नामक पुत्री ये दो युगल ( जुड़वाँ) सन्तान हुई।
यज्ञ और दक्षिणा पति -पत्नी हो गये।
यज्ञ की पत्नी दक्षिणा से बारह पुत्र हुए। जो स्वायंभुव मन्वन्तर में याम नामक देवता कहलाये।

नोट -महावीर स्वामी ने सनातन वैदिक परम्परा के ऋषि और जीवन के अन्तिम चरण सन्यास आश्रम में मुनी हुए ऋषभदेव जी को प्रथम तीर्थंकर घोषित कर महावीर स्वामी को चौवीसवाँ  तिर्थंकर घोषित कर इस महायुग की तिर्थङ्कर परम्परा समाप्त घोषित कर यह घोषित कर दिया कि,अगले महायुग में रावण अगला तीर्थंकर  होगा और तिर्थङ्कर परम्परा पुनः आरम्भ होगी।
यह लगभग वैसा ही है जैसे ही दशम गुरु गोविन्द राय जी तक सनातन धर्म भी अपने ही सन्त और गुरु  मानता रहा।
किन्तु गुरु गोविन्द राय ने गुरु गोविन्द सिंह जी कहला कर खालसा पन्थ की स्थापना करने पर उनने गुरु नानकदेव जी को प्रथम गुरु और स्वयम् को अन्तिम गुरु और उनके बाद गुरु ग्रन्थ साहब को आगे सदा के लिये गुरु पद घोषित कर दिया। और खालसा पन्थ स्थापित किया।
इब्राहीमी सम्प्रदाय में भी यहुदियों ने मुसा को ईसाइयों ने ईसा को और इस्लाम ने मोहमद साहब को अन्तिम नबी घोषित कर सिलसिला ए नबुव्वत खत्म होने की घोषणा के साथ ही कयामत के समय कोई मसीहा उतरेगा।जो यहुदियों के अनुसार अभीतक नही हुआ है।ईसाइयों के अनुसार इसा मसीह पुनः.उतरेंगे।
इस्लाम के अनुसार भी ईसा फिरसे उतरेंगे।और मेंहदीआलेसलाम कयामत के समय अन्तिम नबी होंगें।

रविवार, 14 अप्रैल 2019

प्रत्यैक वृत,पर्व, उत्सव के दिन में मतभेद क्यों रहता है।

प्रत्यैक वृत,पर्व, उत्सव के दिन में मतभेद क्यों रहता है।सभी लोग एक ही दिन क्यों नही मनाते हैं?

भारत में धर्मशास्त्र की आँख  सिद्धान्त ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी) है। धर्म ज्योतिष की आँखों से देखता है।धर्म निर्णय में काल निर्धारण हेतु शुद्ध गणना वाली दृग् तुल्य  पञ्चाङ्ग अनिवार्य है। सन 1956 से भारत शासन स्वयम् सनातन धर्मियों के लिये पञ्चाङ्ग प्रकाशित करता है।
इसके अतिरिक्त लाहिरी की इण्डियन इफेमेरिज भी सर्वश्रेष्ठ पञ्चाङ्ग है। इसके बाद व्यंकटेश बापुजी केतकर के सिद्धान्त ज्योतिष के ज्योतिर्गणितम् ,ग्रह गणितम्, वैजयन्ती ग्रन्थों पर आधारित बहुत सी वैध तुल्य  शुद्धसिद्ध केतकी पञ्चाङ्ग काशी / वाराणसी, उज्जैन और महाराष्ट्र के शहरों के अक्षांश देशान्तर के लिये प्रति वर्ष प्रकाशित होती है। जिसमें तिथ्यादि समाप्ति काल, सुर्य चन्द्रादि के राशिनक्षत्र प्रवेशकाल, विभिन्न नगरों में सुर्यचन्द्र ग्रहण,बुध शुक्रादि का पारगमन, युति- प्रतियोगादि दृष्टियोग बनने के समय , विभिन्न नगरों के लग्नारम्भ समय आदि सभी जानकारियाँ भारतीय मानक समय/ स्टेण्डर्ड टाइम में दी जाती है अतः पुरे भारत में समान उपयोगी होती हैं।
ऐसे ही कलेण्डर पञ्चाङ्ग भी उपलब्ध है।
बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय से सुर्यसिद्धान्त की गणनाओं में बीज संस्कार देकर बनाई गई पञ्चाङ्ग भी लगभग ठीक है।
पर लोग केवल विज्ञापन देख सुन कर या परम्परगत रुप से देखी सुनी स्थुल गणित वाली ग्रहलाघवी, मकरन्द आदि ग्रन्थों के आधार पर तैयार होने वाली गलत पञ्चाङ्ग ले आते हैं।उसके पञ्चाङ्गकार कितने ही बड़े धर्मशास्त्री हो पर गलत डाटा/ गलत गणना के आधार पर लिये गये निर्णय  अपने आप गलत हो जाते हैं।

सिद्धान्त ज्योतिष ( एस्ट्रोनॉमी)  से गणना कर --

सायन सौर गणना से --
उत्तरायण- दक्षिणयन, उत्तरतोयन - दक्षिण तोयन, ऋतु,सायन सौर संक्रान्ति,सायन सौर मास , व्यतिपात, वैधृतिपात योग, ग्रहों के उदयास्त, उच्च, नीच, ग्रहण, लोप, दर्शन,धुमकेतु दर्शन, सुर्योदयास्त, चन्द्रोदयास्त, वासर आदि ज्ञात करते हैं। और
नाक्षत्रीय गणनाओं से --
निरयन सौर संक्रान्ति , नाक्षत्रीय सौर मास, सौर संस्कृत चान्द्रमास ,पक्ष, और तिथियाँ, नक्षत्र,करण आदि की गणना की जाती है।
उक्त पञ्चाङ्गीय जानकारी/ डाटा सिद्धान्त ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी) ही प्रदान करता है। इसलिए वैध लेने में समर्थ सिद्धान्त  ज्योतिषी और धर्मशास्त्र का अच्छा ज्ञान रखने वाले विद्वान ही  अच्छे धर्मशास्त्री माने जाते थे।
मयासुर ने सुर्य सिद्धान्त में और भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में निरन्तर वेध लेते रहकर शोधन, संशोधन करते रहने के स्पष्ट निर्देश दिये है।  तदापि  भास्कराचार्य से गणेश देवज्ञ के बीच आकाशीय अन्वेषणकर  वेध लेना लगभग बन्द सा हो गया। इस कारण सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थ बनना भी बन्द होगये और सारणियाँ तथा करणग्रन्थ ही बनने लगे।
गणेश देवज्ञ का ग्रहलाघव, करण कौतूहल भी करण ग्रन्थ ही माना जाता है।
ग्रह गणना में अत्यध्कि त्रुटियाँ आगई। जिसे बीज संस्कार देकर कामचलाऊ सुधार किया जाने लगा। आधुनिक वेध के आधार पर व्यंकटेश बापु जी केतकर रचित ग्रहगणितम्, वैजयन्ती ज्योतिष आदि बहुत से सिद्धान्त गणित ग्रन्थों ने बहुत काल पश्चात इस कमी को पुरा किया।
एस्ट्रोनॉमर्स की कमी के चलते ज्योतिष जैसे वैज्ञानिक विषय में भी बाबा वाक्यम् परम प्रमाणम् की परिपाटी चल निकली।
वैदिक काल में
भूमि के उत्तरीगोलार्ध में सुर्य की स्थिति को उत्तरायण कहते थे और दक्षिण गोलार्ध मे रहने को दक्षिणायन कहते थे। सायन मेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति तक उत्तरायण और सायन मेष संक्रान्ति तक दक्षिणायन।
तथा भूमि की मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर अर्थात सुर्य की उत्तर की ओर  गति को उत्तर तोयन तथा कर्क रेखा से मकर रेखा तक की ओर सुर्य की दक्षिण की ओर गति को दक्षिण तोयन कहते थे।
सायन मकर संक्रान्ति से सायन कर्क संक्रान्ति तक उत्तर तोयन तथा सायन कर्क संक्रान्ति से सायन मकर संक्रान्ति तक दक्षिण तोयन होता था।

सायन मेष संक्रान्ति (वसन्त विषुव) से संवत्सरारम्भ, उत्तरायण आरम्भ, वसन्त ऋतु आरम्भ, मधुमासारम्भ होता था।

सायन मेष और सायन वृष के सुर्य में वसन्त ऋतु रहती थी।आज भी कश्मीर, तिब्बत पामिर और इनके पश्चिम में कश्चप सागर तक का भूभाग जो पहले भारतीय भूभाग थे में इसी समय वसन्त ऋतु होती है।
सायन मेष और सायन वृष के सुर्य में वसन्त ऋतु  ,सायन मिथुन- कर्क में ग्रीष्म ऋतु, सायन सिंह- कन्या में वर्षा ऋतु,सायन तुला वृश्चिक में शरद ऋतु, सायन धनु मकर में हेमन्त ऋतु एवम् सायन कुम्भ- मीन में शिशिर ऋतु होती थी।
नाक्षत्रीय गणनानुसार --
चित्रा तारे को आकाश का मध्य बिन्दु मान कर चित्रा तारे से 180° पर तत्कालीन आकाश में रेवती योगतारा को आकाश का आरम्भ बिन्दु मानकर  से नाक्षत्रीय भ्रचक्र में नक्षत्रीय पट्टी में ग्रहों का भ्रमण  की नाक्षत्रीय गणना यानि निरयन गणना कहते हैं।
नाक्षत्रीय गणनाओं का मिलान  भी वेध लेकर किया जाता था। जिससे डबल क्रास चेकिंग होकर गणना पुर्ण शुद्ध रहती थी।

ऐतिहासिक घटनाओं की मिति/ Date  बतलाने के उद्देश्य से नाक्षत्रीय ग्रह स्थिति और सायन गणना के पात, ग्रहण, लोप आदि की स्थिति का वर्णन कर उसके माध्यम से सटीक काल दर्शाया जाता था।जो कालीदास तक प्रचलित रहा।

वैदिक काल में आर्यावर्त की सीमाएँ पामिर, तिब्बत, तुर्किस्तान से विन्द्याचल तक थी किन्तु दक्षिण भारत में जनसंख्या बहुत कम थी जबसे भारत की सीमा से पामिर तिब्बत हटने लगा और सीमाएँ दक्षिण की ओर बढ़ने लगी तथा दक्षिण में राज्यों मे जनसंख्या घनत्व वृद्धि  और सांस्कृतिक मिलाप  बढ़ने के कारण एवम्  ईरान अफगानिस्तान की ओर से सीमाएँ सिमटते हुए पुर्व में खिसकने लगी तब दक्षिणी भारत में   उत्तरायण में वर्षाऋतु पड़ने से शुभकार्यों संस्कारों के लिये समय कम पड़ने लगा।
अस्तु  सायन मकर संक्रान्ति से सायन कर्क संक्रान्ति तक वैदिक उत्तर तोयन को उत्तरायण नाम कर दिया गया। और वैदिक उत्तरायण को उत्तर गोल नाम दे दिया गया। और वसन्त ऋतु और मधुमासारम्भ सायन सौर मीन संक्रान्ति से माना जाने लगा।
अर्थात उत्तरायण तीन माह आगे होगया।और वसन्तादि ऋतुएँ एक माह आगे बढ़ गई। मधु- माधवादि मासों की सायन सौर राशि बदलगई।

तैत्तरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण और अथर्ववेद में स्पष्ट वर्णित व्यवस्था को बदलने के लिये ऋग्वेद का उपवेद लगध का वेदाङ्ग ज्योतिष ग्रन्थ  को आधार माना गया। यह घटना महाभारत काल से पुष्यमित्र शुङ्ग के काल के बीच हुई होगी। इसी कारण पुराणों में इसी आधार पर उत्तर तोयन की अवधि को उत्तरायण लिखा  मिलता हैं।

ऐसे ही पुर्व काल में चान्द्र मासों को निरयन सौर मास से संस्कार कर चान्द्र वर्ष को सौर वर्ष के अनुरुप करने से पुर्णिमा  के दिन   जिस नक्षत्र में चन्द्रमा भ्रमण करता था उसी नक्षत्र के नाम पर  चान्द्र मास के नामकरण किये गये। मा मतलब चन्द्रमा।अतः पुर्णिमा मतलब पुर्ण चन्द्र।
निरयन सौर मास से संस्कार कर चान्द्र वर्ष को सौर वर्ष के अनुरुप करने के समय  पुर्णिमा और पुर्णमास शब्द साम्य के कारण पुर्णिमान्त मास प्रचलित होगये।
चुँकि उत्तर वैदिक काल तक भी  सायन सौर मेष संक्रान्ति से संवत्सरारम्भ होता था अतः कोई समस्या नही पड़ी।
वैदिक काल में सायन मेष संक्रान्ति से आरम्भ होने वाली वर्ष गणना को उत्तर वैदिक काल के अन्त में आकाश में नक्षत्रों मे सुर्य चन्द्रमा और ग्रहों को  रास्ते में चलते चलते भी देख कर मास, दिन, नक्षत्र देख- समझ सकने की विशेषता वाली नाक्षत्रीय / निरयन पञ्चाङ्ग पद्यति अपना ली गई। जो शक आक्रमण तक अविरत चली और आज भी पञ्जाब, हरियाणा, उड़िसा, बङ्गाल, मणिपुर,तमिलनाड़ु,केरल आदि में प्रचलित है।
किन्तु उत्तर में पेशावर के कुषाण वंशी राजाओं ने मथुरा से और दक्षिण में पैठण के सातवाहन शंशी राजाओं ने अपने अपने राज्य क्षेत्र में चीन की उन्नीस वर्षीय चक्र वाली पद्यति में क्षयमास की पद्यति और जोड़कर तैयार की गई निरयन सौर संस्कृत चान्द्र केलेण्डर पर आधारित शक संवत   आरम्भ करते समय  अमान्त मास के आधार पर  संवत्सर आरम्भ करने, अधिक मास -  क्षय मास की गणना करने हेतु अमान्त मास ग्राह्य किये गये।
तब पुर्णिमान्त मास मानने वालों को एक नई समस्या आगयी  कि, पञ्चाङ्ग में संवत्स आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होने के कारण चैत्र शुक्ल पक्ष के पन्द्रह दिन संवत के आरम्भ में।और चैत्र कृषण पक्ष के पन्द्रह दिन  वर्ष के अन्त  में आते है।
है ना विचित्र किन्तु सत्य!
आगे चलने की आदत हमारे चरित्र में ही है।इसी का परिणाम शीतला अष्टमी के पर्व को शील सप्तमी के दिन शीतला सप्तमी के रुप में मनाना आरम्भ हो गया।, शिवरात्रि की रात्रि की चार प्रहर की पुजा के बजाय शिवरात्रि के पहली वाली रात्रि में मध्य रात्रि या ब्रह्म मुहुर्त में मन्दिर जाकर शिव पुजा कर आना ; और शिवरात्रि की रात्रि में जागरण उपास करने के बजाय मध्यरात्रि में भोजन कर आराम से सोजाना।इन तथ्यों में यह प्रवृत्ति झलकती है।
धर्म शास्त्र का अध्ययन न करने के कारण भी ऐसी विसंगतियाँ उत्पन्न हुई है।
ध्यान रहे  वार प्रवृत्ति सुर्योदय से सुर्योदय तक होती है।अर्थात वार सुर्योदय से सुर्योदय तक चलता है और सुर्योदय से ही वार बदलता है। जबकि मध्य रात्री 00:00 बजे Day & Date  बदलते हैं।मध्यरात्रि से वार नही बदलता।

और रात्रि भोजन निषिद्ध होने से मध्य रात्रि उपरान्त भोजन करना कराना दोनों ही गलत है।
यही स्थिति एकादशी वृत , उत्सवों के दिन निर्धारण में स्मार्त मत से भिन्न परम्पराओं के निर्वहन के कारण प्रत्यैक वृत, प्रत्यैक उत्सव दो- तीन दिन के अन्तर से मनाये जाने लगे।
शास्त्रज्ञों द्वारा दिये गये शास्त्रीय निर्णयों में मतैक्य रहता है।

पञ्चदेवोपासक स्मार्त जन तो पर्वकाल व्यापी तिथि में व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहार मनाते हैं। दो दिन पर्वकाल व्यापी तिथि हो या दोनों दिन पर्वकाल व्यापी तिथि न हो तभी शाकल्य तिथि अर्थात उदिया तिथि जो सूर्योदय पश्चात  दिनमान का दसवाँ भाग तक अर्थात तीन मुहुर्त अर्थात ( लगभग २ घण्टे २४ मिनट) तक हो। या ऐसे ही सूर्यास्त/ मध्याह्न या मध्य रात्रि तक हो ऐसी तिथि मे व्रत करते हैं। इसमें भी दुसरे दिन पारण पर भी ध्यान दिया जाता है।


स्मार्त एकादशी --   एकादशी तिथी में वृत कर द्वादशी में पारण किया जाता है।इसी कारण एकादशी वृत रखने वाले समझदार जन प्रदोष वृत नही रखते। इसमें कोई विवाद नही होता।
किन्तु पौराणिक भागवतो में 56 घटिका वेध  (उत्तर रात्री 04बजकर24 मिनट) , और रामानुजाचार्य एवं स्वामीनारायण सम्प्रदाय,निम्बार्काचार्य एवम् श्रीकृष्ण चेतन्य महाप्रभु (वर्तमान इस्कॉन), मध्वाचार्य, वल्लभाचार्य और रामानन्दाचार्य, रामस्नेही सम्प्रदाय आदि में कोई 55 घटिका वेघ (उत्तर रात्री 04:00 बजे ), कोई 54 घटिका वेध (उत्तर रात्री 03:36 बजे ) , तो कोई 45घटिका वेध (उत्तर रात्री 00:00 बजे ) मानते है।इसमें अनुयायियों के साथ बड़ी असहज स्थिति बनती है।
माना कि किसी समय सोमवार को उत्तर रात्री में दशमी तिथि समाप्त होकर एकादशी तिथि आरम्भ होने/ लगने और   मंगलवार को उदिया एकादशी होकर उत्तर रात्रि में द्वादशी तिथि आरम्भ होने से बुधवार को उदिया तिथि द्वादशी ह माना  कि, सुर्योदय का समय प्रातः 06 बजे मान रहे हैं और सुर्यास्त शाम 18: 00 बजे अर्थात शाम 06:00 बजे। 12 घण्टे का दिन -12 घण्टे की रात्री मानेंगें।
इस उदाहरण से समझते हैं। --

56 घटिका वैध -   सोमवार को उत्तररात्रि 04:24 बजे या उसके बाद दशमी तिथी समाप्त होकर एकादशी तिथि लगे और बुधवार  को उदिया तिथि द्वादशी है तो भी पौराणिक भागवत सम्प्रदाय वाले बुधवार को द्वादशी तिथि में एकादशी का वृत करेंगे!
इसे कहते हैं विचित्र किन्त सत्य। है ना आश्चर्यजनक!

ऐसे ही  जन्माष्टमी और रामनवमी प्रकरण में देखते हैं
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी --
अमान्त श्रावण कृष्णाष्टमी / पुर्णिमान्त भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं।  स्मार्त जन  पर्वकाल अर्थात मध्य रात्रि में अष्टमी को महत्व देते हैं। जिस दिन मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि हो उसी दिन  जन्माष्टमी का वृत एवम् उत्सव  मनाते हैं।
यदि मध्य रात्रि में दो दिन अष्टमी हो या दोनो दिन नही हो तो उदिया तिथि में वृत और उत्सव करते हैं।

यह तो सामान्य है।समझ में आता है।

दुसरा मत  पौराणिक भागवतों का है। वे उदिया अष्टमी  तिथि में ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी वृत उपवास करते हैं। चाहे मध्यरात्रि में नवमी तिथि हो।
कुछ लोगों का तर्क है कि,शाक्त सम्प्रदाय में नवरात्रि प्रकरण में सप्तमी युक्त अष्टमी में पुजन निषिद्ध है अतः नवमी युक्त अष्टमी में (उदिया अष्टमी तिथि में) जन्माष्टमी मनाना ही उचित है।

रामानुज पन्थी निरयन सिंह राशि के सुर्य में जिस दिन  सुर्योदय के समय चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में हो उस दिन जन्माष्टमी वृत और उत्सव मनाते हैं।
है ना विचित्र किन्तु सत्य।

श्रीरामनवमी --

चैत्र शुक्ल नवमी  तिथि में श्रीराम नवमी पर्वोत्सव  मनाने में स्मार्त जन  पर्वकाल मध्यान्ह काल में नवमी तिथि को महत्व देते हैं। जिस दिन मध्याह्न में नवमी तिथि हो उसी दिन  श्रीराम नवमी का पर्व एवम् उत्सव  मनाते हैं।
यदि  मध्याह्न में नवमी दो दिन हो या दोनो ही दिन नही हो तो उदिया तिथि में वृत और उत्सव करते हैं। यह तो सामान्य है।समझ में आता है।

पर पौराणिक भागवत उदिया नवमी  तिथि में  ही  वृत उत्सव करते हैं। चाहे मध्यान्ह में दशमी तिथि हो। यहाँ वे दशमी युक्त नवमी निषेधाज्ञा का नवरात्रि वाला तर्क त्याग देते हैं।
कुछ लोगों का तर्क है कि,शाक्त सम्प्रदाय में नवरात्रि प्रकरण में  दशमी युक्त नवमी में पुजन निषिद्ध है अतः अष्टमी युक्त नवमी  में (पहली अष्टमी तिथि में) राम नवमी मनाना उचित है। यहाँ उदिया तिथि का आग्रह त्याग दिया।

रामानुज पन्थी निरयन मेष राशि के सुर्य में जिस दिन  सुर्योदय के समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में हो उस दिन राम नवमी पर्व और उत्सव मनाते हैं।
है ना विचित्र किन्तु सत्य।

यजुर्वेद पर रावण कृत भाष्य को मुल यजुर्वेद संहिता में गड्डमड्ड करदिये गये  कृष्णयजुर्वेद को दृविड़ वेद के नाम से आदर पुर्वक मान्यता देने वाले दक्षिण भारतीय रामानुजाचार्य की दक्षिण भारतीय परम्परा में  जहाँ  नाक्षत्रीय /  निरयन गणनानुसार सुर्य की राशि और चन्द्रमा के नक्षत्र के आधार पर  पर्वोत्सव के दिन निर्धारित किये जाते है।तिथियों के आधार पर दिन निर्धारित नही करते हैं।
इसी परम्परा को श्री कृष्ण चैतन्य (वर्तमान इस्कॉन) सम्प्रदाय, निम्बार्क सम्प्रदाय, कुछ अंशों में वल्लभ सम्प्रदाय वाले भी मानते हैं।
उनके उत्तरभारतीय अनुयायी जो शक संवत के निरयन सौर संस्कृत  चान्द्र मास की तिथियों से वृतोत्सव मनाते हैं । उनने  उदिया तिथी से वृतोत्सव निर्णय की नई खोज करली।वे अलग ही चलते हैं।
पता नही वे लोग श्राद्ध कर्म में मध्यान्ह व्यापी तिथि के स्थान पर उदिया तिथि में करते हों।
विशेषता यह है कि, महाशिवरात्रि पर्व में शिवरात्रि अर्थात चतुर्दशी के  दिन का महत्व नही होकर केवल चतुर्दशी की  रात्रि का ही महत्व है। शिवरात्रि को रात्रि में प्रत्यैक प्रहर में शिव अभिषेक और पुजन होना चाहिए। किन्तु अधिकांश मन्दिर ही मध्यरात्रि में बन्द हो जाते हैं और लोग पारण/ भोजन कर सो जाते हैं।
लोग  शिवरात्रि  के पहले वाली रात्रि में ही शिव पुजन कर आते हैं यहाँ तक कि, उज्जैन का नागचन्द्रेश्वर मन्दिर भी शिवरात्रि के पहले वाली रात्रि में 00:00मध्य रात्रि में खुल जाता है और शिवरात्रि को मध्यरात्रि 00:00 बजे बन्द हो जाता है।

मुहुर्त शास्त्र में भी घाल मेल कर दिया है --
चतुर्थी, अष्टमी,नवमी, और चतुर्दशी, अमावस्या  निषिद्ध / अशुभ तिथियाँ मानी गई है। आश्विन नवरात्रि की भी शुभता नही मानी गयी है। इन तिथियों में शुभ कार्य, संस्कार आदि नही होते।
चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी रिक्ता तिथियाँ है।अष्टमी और अमावस्या भी अशुभ मानी गई है।कही कहीँ द्वादशी तिथि भी त्याज्य है।
पर आजकल भाद्रपद मास में गणेश चतुर्थी, नवरात्रि में अष्टमी और नवमी तथा महाशिवरात्रि में चतुर्दशी तिथि पर कई शुभकार्यों के मुहूर्त बतलाये जा रहे हैं।
कुछ तो गुरुपुष्यामृत योग में विवाह  का मुहूर्त बतलाते हैं जबकि, गुरुपुष्य के दिन विवाह पुर्ण निषिद्ध है।
जब हमें ऐसे उदाहरण बतलाये जाते हैं तो  मौन धारण करना पड़ता है। अब क्या कहें।निन्दा करने और जो व्यक्ति श्रद्धा पुर्वक उक्त गलत मुहूर्त मे कार्य कर चुका उसके मन में शंका उत्पन्नकर उसे भयभीत करने  से मौन ही भला।
निष्कर्ष यह है कि,
1- गलत पञ्चाङ्ग, भारत शासन को तत्काल प्रभाव से इन गलत पञ्चाङ्ग प्रकाशन बन्द कर देना चाहिए।
2 -   और ज्योतिष का ज्ञान रहित पण्डित (गलत या अज्ञानी धर्मशास्त्री और ज्योतिषी),(ऐसे पण्डितों ने स्वविवेक से स्वयम् को समेट लेना चाहिए।फिर अध्यन कर भलैंही वापस कार्यारम्भ करले।)
और3 -  धर्मशास्त्र की तुलना में  साम्प्रदायिक परम्पराओं को वरीयता देना ।

(नोट -- सम्प्रदायों को अपनी गलतियाँ शोधन कर धर्मशास्त्रानुसार सुधार करना ही चाहिए।)
इन तीन कारणों से कोई भी त्यौहार सर्व सम्मति से एक ही दिन नही मन पाते।

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

रावण की लंका कहाँ थी? लक्षद्वीप में या सिंहल द्वीप मे?

रावण की लंका कहाँ थी? लक्षद्वीप में या सिंहल द्वीप मे?

*लंका की स्थिति*

*जानने का आधार केवल वाल्मीकीय रामायण ही क्यों*--

महर्षि वाल्मीकि जी का निवास अयोध्या के निकट ही होने और उन्हे बहुत काल तक सीता जी का  सानिध्य प्राप्त हुआ इस कारण श्रीरामचन्द्र जी और सीतामाता का प्रमाणिक इतिहास हमे केवल वाल्मीकीय रामायण में ही मिल सकता है ।

श्री राम जी ने लोकोपवाद से बचाव हेतु गर्भवती सीताजी को लक्ष्मण जी के साथ भिजवा कर सीताजी को वाल्मीकि आश्रम में रखा था।जहाँ लव -कुश का बचपन बीता और  लव-कुश का गुरुकुल भी था महर्षि वाल्मीकि का वह आश्रम ही बना जो श्रीराम के राज्यक्षेत्र में और अयोध्या के निकट ही था।

अतः श्रीराम -सीताजी के विषय में किसी एतिहासिक तथ्य की परीक्षा महर्षि वाल्मीकि प्रणीत श्री मद् वाल्मीकीय रामायण से ही प्रमाणित हो सकता है। योग वाशिष्ठ भी कुछ लोग श्रीराम कालीन रचना मानते हैं किन्तु अधिकांश विद्वान आदिशंकराचार्य के बाद की रचना मानते हैं। अतः अन्य कोई ग्रन्थ इतिहास की दृष्टि से प्रामाणिक नही हो सकता।

गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण से श्लोक संख्या अनुवाद --

अब हम वाल्मीकीय रामायण के आधार पर रावण की लंका कहाँ थी कौनसी थी इसकी  की यथार्थ भौगोलिक  स्थिति का परीक्षण करते हैं।

रावण द्वारा सीताजी के अपहरण पश्चात,श्री जटायु द्वारा श्रीराम को बतलाया कि, लंका का राजा राक्षस राज रावण सीताजी का जबरजस्ती अपहरण कर रावण उन्हे दक्षिण दिशा में लंका लंका ले गया है।

सुग्रीव जी की सहायता से सीताजी की खोज की गयी । बालीपुत्र अंगद के नेत्रत्व में  जटायु के भाई सम्पाती जी के मार्गदर्शन से श्री हनुमानजी लंका में सीताजी से मिल कर आये और श्री राम को सीताजी की जानकारी दी।

तब श्रीराम जी ने नल - नील की सहायता से समुद्र पर सेतु बनाकर सीता जी को मुक्त कराया। इतनी जानकारी सबको पता है ।

पर  किसी को सही जानकारी नही मालुम की रावण की लंका कहाँ थी/ कौनसी थी। राम सेतु कितना लम्बा था,और कितने समय में कैसे बना। इसी की जाँच हम वाल्मीकीय रामायण के अरण्य काण्ड, किश्किन्धा काण्ड और युद्ध काण्ड के आधार पर पता लगाने का प्रयत्न करते हैं। सुन्दर काण्ड के अलावा इन्ही तीन काण्डो में लंका की जानकारी दी है।और सेतु निर्माण का विवरण और वर्णन युद्ध काण्ड में है।

सामान्यतया सिंहल द्वीप अर्थात श्रीलंका को रावण की लंका माना जारहा है। जहाँ  रावण ने सीताजी का अपहरण कर उन्हे अशोक वाटिका में अवरुद्ध कर रखा था।

श्रीलंका सरकार का पर्यटन विभाग इसका पुरा लाभ उठाता है।

इसी आधार पर तमिलनाड़ु में धनुष्कोटि, रामसेतु और रामेश्वरम आदि कल्पित किये गये।

जबकि सिंहल द्वीप का नाम श्रीलंका इसलिये पड़ा क्योंकि श्री पाद पर्वत / एडम माउण्टेन पर किन्ही श्रीमान पुरुष के लंक अर्थात पेर के पञ्जे के निशान है।

यहूदियों के अनुसार याहवेह की आज्ञा उल्लघन कर आदम द्वारा बुद्धि वृक्ष का फल खा लेने पर आज्ञा उलंलंघन  के दण्ड स्वरुप आदम को अदन की वाटिका के पुर्वी द्वार से निकाल देने पर वे आदम शिखर पर सिंहल द्वीप पर गिरने सेआदम के पंजे के निशान बन गये ऐसा मानते हैं।

सनातन धर्मी उसे किसी श्रीमान पुरुष के लंक (पेर के पंजे के निशान मानते हैं।इस कारण सिंहल द्वीप को श्रीलंका कहते हैं।केवल लंका नही कहते हैं बल्कि श्रीलंका कहते हैं।

अब देखते हैं वाल्मीकीय रामायण में क्या लिखा है।

काण्ड/सर्ग/ श्लोक संख्या सहित गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण के श्लोकों के अर्थ ही दिये जा रहे हैं।क्योंकि गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन और उनके द्वारा प्रकाशित पौराणिक ग्रन्थों का अनुवाद भी सर्वाधिक प्रामाणिक मान्य है।

जो वाल्मीकीय रामायण स्वयम् पढ़कर विचार करेंगे उनका ज्ञान वर्धन और भ्रम निवारण अधिक होगा।किन्तु जो नही पढ़ पाये उनके लिये प्रस्तुत है।--

आप भी पढ़िये और विचार- मनन कर निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें।

*पहले अरण्य काण्ड से*--

*वाल्मीकि रामायण /अरण्य काण्ड* / *एकोनसप्तितमः सर्ग* / श्लोक क्रमांक---

श्रीराम को जटायु जी प्राण त्याग के ठीक पहले बतलाते हैं कि यहाँ ( जनःस्थान )  से रावण सीता को साथ लिये यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर गया। श्लोक -10

वाल्मीकि रामायण /अरण्य काण्ड* / *अष्टषष्टितमः सर्ग*/

श्रीराम लक्ष्मण सीताजी को खोज करते हुए भी पश्चिम में गये। - 1

सीताजी को खोजने दक्षिण दिशा में गये। श्लोक- 2

*वाल्मीकि रामायण /किष्किन्धा काण्ड/* *एकचत्वारिशः सर्ग*/

पाण्य वंशीय राजाओं के नगरद्वार पर लगे हुए सुवर्णमय कपाट दर्शन करोगे। जो मुक्तामणि यों से विभुषित एवं दिव्य है।

( नोट - यहाँ से पाण्ड्य देश की सीमा आरम्भ होती थी न कि, तंजोर नगर की।किन्तु इस प्रवेश द्वार को  लेण्डमार्क के रुप में देखने भर को ही कहा है।पाण्य देश/ तमिलनाड़ु में प्रवेश करने का निर्देश नही किया है। अर्थात पुर्वी घाट की ओर नही बल्कि पश्चिमी घाट की ओर ही जाने का अप्रत्यक्ष निर्देश है। शायद राक्षसों का प्रभाव लक्षद्वीप से नाशिक तक पश्चिम में ही अधिक था।

कुछ लोग पाण्य देश यानी तमिलनाड़ु देखकर ही उत्साहित होकर पुर्वीघाट की ओर बढ़ने का अनुमान करते हैं। जबकि सुग्रीव ने देखते हुए आगे बढ़ने का निर्देश देते हैं प्रवेश का नही।)

तत्पश्चात समुद्र के तट पर जाकर उसे पार करने के सम्बन्ध में अपने कर्त्तव्य का भली-भाँति निश्चय करके उसका पालन करना।महर्षि अगस्त ने  समुद्र के भीतर एक सुन्दर सुवर्ण मय पर्वत को स्थापित किया, जो महेन्द्र गिरि के नाम से विख्यात है। उसके शिखर तथा वहाँ के वृक्ष विचित्र शोभा सम्पन्न है।वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्र के भीतर गहराई तक घुसा हुआ है। श्लोक- 19 &20

( रावण की लंका का वर्णन) --

*उस समुद्र के उसपार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है।वहाँ मनुष्यों की पहूँच नही है। श्लोक*-23

(नोट -- सौ योजन विस्तार मतलब लगभग 100 वर्ग योजन अर्थात 1288 वर्गकि.मी. =36×36 वर्ग कि.मी. वर्ग किलोमीटर।*

जबकि श्रीलंका का क्षेत्रफल 65610 वर्ग कि.मी. है।अर्थात लक्षद्वीप ही सही बैठता है श्रीलंका / सिंहल द्वीप नही।)

उस शक्तिशाली द्वीप में चारों ओर पूरा यत्न करके सीता की विशेष खोज करना। श्लोक - 24

वही देश दुरात्मा राक्षसराज रावण का निवासस्थान है।जो हमारा वध्य है। श्लोक- 25

उस दक्षिण समुद्र के बीच में अङ्गारका नाम से प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़ कर ही प्राणियों को खीँच लेती है और उन्हे खा जाती है। श्लोक - 26

(नोट - यहाँ अङ्गारका राक्षसी कहा है,नागमाता सुरसा का अन्य नाम अङ्गारका था।)

लंका को लाँघ कर आगे बड़ने पर सौ योजन विस्तृत समुद्र में एक पुष्पितक नामक पर्वत है। श्लोक- 28

पुष्पितक के  चौदह  योजन आगे  सूर्यवान पर्वत बतलाया है। श्लोक - 31 & 32

सुर्यवान पर्वत के बाद वैद्युत पर्वत है। श्लोक- 32

फिर कुञ्जर पर्वत है जिसपर अगस्त्य  का सुन्दर भवन है। श्लोक-34

कुञ्जर पर्वत पर भोगावती नगरी है। श्लोक -36

भोगावती पुरी में सर्पराज वासुकि निवास करते हैं। श्लोक - 38

आगे ऋषभ पर्वत पर चन्दन के पेड़ हैं।जिसका स्पर्ष खतरनाक है। श्लोक 40 & 41

उसके आगे पित्र लोक है जहाँ जाने का निषेध किया है। श्लोक- 44

( नोट रावण की लंका के आसपास इतने सारे द्वीप होना भी लक्षद्वीप को ही सुचित करता है।

सिंहल द्वीप श्रीलंका के आसपास इतने द्वीप नही है।

अब किश्किन्धा काण्ड से --

*वाल्मीकि रामायण/किष्किन्धा काण्ड/पञ्चाशः सर्ग/* 

विन्द्याचल  पर सीता जी की खोज करते करते अंगद, जाम्बवन्त जी और  हनुमानजी सहित वानर विन्द्याचल के नैऋत्य कोण (दक्षिण पश्चिम) वाले शिखर पर जा पहूँचे।वहीँ रहते हुए उनका वह समय जो सुग्रीव ने निश्चित किया था, बीत गया। श्लोक -03

खोजते खोजते उन्हे वहाँ एक गुफा दिखाई दी, जिसका द्वार बन्द नही था। अर्थात खुला था। श्लोक- 07

वह गुफा ऋक्षबिल नाम से विख्यात थी।एक दानव उसकी रक्षा में रहता था। वानर गण बहुत थक गये थे, पानी पीना चाहते थे। श्लोक- 8

लता और वृक्षों से आच्छादित के भीतर से क्रोंच, हंस, सारस,तथा जल से भीगे हुए चक्रवाक पक्षी ( चकवे)  , जिनके अङ्ग कमलों के पराग से रक्त वर्ण के हो रहे थे।, बाहर निकले।उस बिल (गुफा) में उन्हे जल होने का सन्देह हुआ। श्लोक- 9 & 10

हनुमानजी ने कहा निश्चित ही इसमें पानी का कुआँ, या जलाशय होना चाहिये।तभी इस गुफा के द्वारवर्तीवृक्ष हरेभरे हैं। वानरों ने उस गुफा में प्रवेश किया। श्लोक- 16 & 17

उस अन्धेरे बिल (गुफा ) से सिंह,मृग और पक्षी निकलते दिखे। श्लोक - 18

नाना प्रकार के वृक्षों से भरी उस गुफा में वे एक योजन तट एक दुसरे को पकड़े हुए गये। श्लोक- 21

*(एक योजन चलने पर) तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखाई दिया। और अन्धकार रहित वन देखा, वहाँ के सभी वृक्ष सुवर्णमयी थे।* श्लोक - 24

*अर्थात गुफा आरपार खुला था।*

साल,ताल,तमाल,नागकेशर, अशोक,धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर के वृक्ष फुलों से भरे थे। श्लोक- 26

वानरों ने वहाँ इंट,पत्थर,लकड़ी आदि पार्थिव वस्तुओं से निर्मित और स्वर्ण तथा वैदूर्य मणि से अलङ्कृत भवन देखे। वृक्षों में फुल और फल लगे थे। श्लोक- 30 , 31 & 32

मणि और सुवर्ण जटित पलंग, तथा आसन, और सोने,चाँदी, तथा कांसे के फुलपात्र , अगरु,चन्दन, फल, मूल आदि भोजन सामग्री, बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, मुल्यवान वस्त्र, कम्बल, कालीन,मृगचर्म और स्वर्ण के ढेर देखे। श्लोक- 32  से 38

वानरों ने उस गुफा में थोड़ी दूर पर किसी स्त्री को.देखा।जो नियमित आहार करती तपस्या में सलग्न थी। हनुमानजी ने उससे उसका परिचय पुछा। श्लोक- 39 से 41

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *एकपञ्चाशः सर्ग/*

हनुमानजी ने उसे कहा

हम भूख-प्यास से व्यथित हैं।और जानना चाहते हैं कि,यहाँ यह सब वैभव कैसे है? श्लोक- 02 से 09

तब उस बिल( गुफा) में स्थित उस मेरुसावर्णी की पुत्री स्वयम्प्रभा नामक उस तपस्वी स्त्री  ने उत्तर दिया - मयासुर दानव पहले दानवों का विश्वकर्मा था। उसने तपस्या कर  ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर शुक्राचार्य का सारा शिल्प - वैभव प्राप्त किया था।

मयासुर दानव ने यहाँ की सारी वस्तुओं का निर्माण करके कुछ काल तक यहाँ निवास किया था। कुछ काल बाद हेमा नामक अप्सरा से मयासुर दानव का सम्पर्क हो गया, यह जानकर जघानेश पुरन्दर (इन्द्र) ने मयासुर को मार भगाया। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने यह गुफा और वैभव उस अप्सरा हेमा को सोप दिया।मेरी प्रिय सखी हेमा अप्सरा द्वारा प्रदत्त इस भवन की रक्षा करती हूँ। तुमलोग पहले फल-मूल खाकर जलपान कर फिर अपना परिचय और आने का प्रयोजन बतलाना। श्लोक   -11 & 19

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *द्विपञ्चाशः सर्ग/*

भोजन जलपान उपरान्त विश्राम करलेने पर हनुमानजी ने अपने सहित सबका परिचय और  राक्षस रावण और उसके द्वारा अपहृत  सीताजी की खोज का वृतान्त कहकर आने का प्रयोजन बतलाया। श्लोक-  01 से 08

हनुमानजी के निवेदन पर स्वयम्प्रभा ने बाहर निकलने हेतु नैत्र मुन्दने को कहा । वानरों के द्वारा आँखे बन्दकर हाथों से ढँकते ही स्वयम्प्रभा ने उन वानरों को गुफा से बाहर पहूँचा दिया।(उस एक योजन लम्बी अर्थात  लगभग 13 कि.मी लम्बी थी ।)

गुफा के बाहर पहूँचाकर उन्हे बतलाया कि, यह विन्द्यगिरि है, इधर  यह प्रसवण गिरि है।सामने सागर लहरा रहा है। ऐसा बतलाकर स्वयम्प्रभा अपनी गुफा म़े लोट गई। श्लोक - 23 से 32

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *त्रिपञ्चाशः सर्ग/*

तदन्तर उन वानरों ने महासागर देखा । श्लोक - 1

वानरों का वह एकमास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने लोटने का समय निश्चित किया था।  श्लोक- 2

विन्द्यगिरि के पार्श्ववर्ती पर्वत पर बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे। श्लोक-  3

जो वसन्त ऋतु में फलते हैं उन आम आदि वृक्षों की डालियों को मञ्जरी एवम् फूलों के अधिक भार से झुकी हुई तथा सेकड़ो लता बेलों से व्याप्त देख वे सभी सुग्रीव के भय से थर्रा उठे। श्लोक-  4

वे एक दुसरे को बताकर कि, अब वसन्त का समय आना चाहता है, राजा के आदेशानुसार एक माह के भीतर जो काम कर लेना चाहिए था , वह न कर सकने के  या उसे नष्ट कर देने के कारण भय के मारे भूमि पर गिर पड़े। श्लोक- 5

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *चतुःपञ्चाशः सर्ग/*

हनुमानजी जानते थे कि, बालीपुत्र अंगद अष्टाङ्ग बुद्धि, चार प्रकार के बल और चौदह गुणों से सम्पन्न है । श्लोक।-  2

अष्टांग बुद्धि - 1-  सुनने की इच्छा रखना; 2 सुनना, 3 सुनकर ग्रहण करना, 4 ग्रहणकर धारण करना,  5उहापोह करना,6 अर्थ या तात्पर्य को समझना,7 तत्व ज्ञान सम्पन्न होना।

चार प्रकार के बल - 1 साम, 2 दण्ड,  3 भेद और चौथा दण्ड।

चौदह गुण -01 देशकाल ज्ञान,0 2 दृढ़ता,0 3 सब प्रकार के कष्टों को सहन करने की क्षमता,04  सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त करना,0 5 चातुर्य (चतुरता), 06 उत्साह या बल,07 मन्त्रणा को गुप्त रखना,08 परस्पर विरोधी बातें न करना,09 शूरता,10 अपनी और शत्रु की शक्ति का ज्ञान, श्लोक 11 कृतज्ञता, श्लोक 12 शरणाङगत वत्सलता,  13 अमर्षशीलता,   14  और अचाञ्चल्य, ( स्थैर्य या गाम्भीर्य)।

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/षट्पञ्चाशः सर्ग/*

पर्वत के जिस स्थान पर वे सब वानर आमरण उपवास करने बैठे थे उस स्थान पर गृध्रराज सम्पाति आये। श्लोक- 1 - 2

महागिरि विन्ध्य की कन्दरा से निकलकर सम्पाति ने जब वहाँ बैठे वानरों को देखा तब वे हर्षित होकर बोले - आज दीर्घकाल यह भोजन स्वतः मेरे लिये प्राप्त हो गया । वानरों में जो जो मरता जायेगा उसको में क्रमशः भक्षण करता जाऊँगा। श्लोक- 3 से 5

यह सुन अङ्गद हनुमानजी से बोले । श्लोक - 7

विदेह कुमारी सीताजी का प्रिय करने की इच्छा से गृध्रराज जटायु ने जो साहस पुर्ण कार्य किया था , यह सब आप लोगोंने सुना ही होगा। श्लोक- 9

धर्मज्ञ जटायु ने ही श्रीराम का प्रिय किया है। -12

गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं जो युद्ध में रावण के हाथ मारे गये। श्लोक-13

महाराज दशरथ की मृत्यु, जटायु का विनाश और विदेह कुमारी सीता का अपहरण - इन घटनाओं से इस समय वानरों का जीवन संशय में पड़ गया है । श्लोक- 14

श्रीराम और लक्ष्मण को सीता के साथ वन में निवास करना पड़ा, राघव के बाण से बाली का वध हुआ और अब श्रीराम के कोप से  समस्त  राक्षसों का संहार होगा - ये कैकेयी को दिये वरदान से पैदा हुई है। श्लोक 15 &16

अङ्गद के मुख से उस वचन को सुन सम्पाति ने उच्च स्वर में पुछा। श्लोक- 18

यह कौन है जो जो मेरे प्राण प्रिय भाई जटायु के वध की बात कर रहा है। श्लोक - 19

जनः स्थान में राक्षस का गृध्र के साथ किस प्रकार का युद्ध हुआ? अपने भाई का नाम कई दिनों के बाद सुनाई दिया । श्लोक- 20

जटायु मुझसे छोटा गुणज्ञ, और पराक्रम के कारण प्रशंसनीय था। श्लोक- 21

दीर्घकाल के पश्चात आज उसका नाम सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। आप लोग मुझे नीचे उतार दें । - 22

मुझे मेरे भाई का विनाश का वृतान्त सुनने की   इच्छा है। महाराज दशरथ मेरे भाई के मित्र कैसे हुए? श्लोक- 23

मेरे पंख सुर्य  की किरणों से जल गये हैं,इसलिये मैं उड़ नही सकता। किन्तु इस पर्वत से नीचे उतरना चाहता हूँ। श्लोक-24

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/* *अष्टपञ्चाशः सर्ग/*

सप्पाति जी ने कहा-

एक दिन मेने भी देखा,दुरात्मा रावण सब प्रकार के गहनों से सजी हुई एक रुपवती युवती को हरकर लिये जा रहा था। श्लोक - 15

वह भामिनी 'हा राम ! हा राम! हा लक्ष्मण! की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती छटपटा रही थी। श्लोक- 16

श्रीराम का नाम लेनेसे मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षस का घर का पता बतलाता हूँ, सुनो। श्लोक- 18

रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है। वह "लङ्का नामवाली नगरी में निवास करता है।" श्लोक - 19

(ध्यान दें लंका को केवल नगरी कहा है। सिंहल द्वीप/ श्रीलंका जैसा बड़ा स्थान नही हो सकता।) 

*यहाँ से शतयोजन (अर्थात लगभग 1287 कि.मी.) के अन्तर पर समुद्र में एक द्वीप है, वहाँ विश्वकर्मा ने अत्यन्त रमणीय लङ्का पुरी निर्माण किया है।'* श्लोक- 20

(नोट- शत योजन को अनुवादक ने  चार सौ कोस लिखा है अर्थात 1287 कि.मी.।)

उस नगरी की चहारदीवारी बहुत बड़ी है। उसी के भीतर पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने सीता दीन भाव से निवास करती है। श्लोक- 23

(नोट- श्रीलंका के आसपास  चाहरदीवारी होना सम्भव नही है।)

बहुत सी राक्षसियों के पहरे में रावण के अन्तःपुर में अवरुद्घ है। श्लोक- 23

लंका चारों ओर से समुद्र से सुरक्षित है।पुरे सौ योजन (1287 कि.मी.) समुद्र को पार कर उसके दक्षिण तट पर पहूँचने पर रावण को देख सकोगे। श्लोक- 24 & 25

(नोट - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर  लक्षद्वीप समुह  के द्वीप पड़ते है। अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।  जिसकी राजधानी कवरत्ती है (या किल्तान द्वीप में हो सकती है। )

(नोट - उल्लेखनीय है कि, श्री लंका / सिंहल द्वीप जाने के लिये  भारत की मुख्य भूमि से जाया जा सकता है।

समुद्र पार कर नही जाया जा सकता।समुद्री मार्ग से जाने पर भारत की मुख्य भूमि की परिक्रमा कर जाना होगा और   बहुत अधिक दूरी हो जायेगी।)

*अब आगे का विवरण युद्ध काण्ड से* --

*वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/*  *चतुर्थ सर्ग/*

रामचन्द्रजी ने सुग्रीव को कहा --

सुग्रीव ! तुम इसी मुहूर्त में प्रस्थान की तैयारी करो। सुर्य देव दिन के मध्य भाग में पहूँचे हैं।इसलिये इस विजय नामक मुहूर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त  होगी। श्लोक- 3

आज उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र है। कल चन्द्रमा का हस्त नक्षत्र से योग होगा। इसलिये सुग्रीव ! हमलोग आज ही सारी सेनाओं के साथ यात्रा कर दें। चलते चलते  उन्होनें पर्वत श्रेष्ठ सह्यगिरि को देखा। जिसके आसपास भी सेकड़ो पर्वत थे। श्लोक- 37

उस समय वानर राज सुग्रीव और लक्ष्मण से सम्मानित हुए धर्मात्मा श्रीराम सेनासहित दक्षिण दिशा की ओर बड़े जा रहे थे। श्लोक- 42

(आकाश साफ होने का वर्णन। श्लोक - 46 से 49)

वानर सेना दिन- रात चलती रही। श्लोक - 68

उन्होने रास्ते में कहीँ दो घड़ी भी विश्राम नही लिया। श्लोक- 69

चलते चलते वे सह्य पर्वत पर पहूँच कर सब वानर सह्य पर्वत पर चड़ गये। श्लोक- 70

श्री रामचन्द्रजी सह्य और.मलय पर्वत के विचित्र काननों, नदियों, तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहेथे। श्लोक- 71

श्री रामचंद्र जी महेन्द्र पर्वत (शायद कण्णूर का ईजीमाला पर्वत) के पास पहूँच कर उसके शिखर पर चढ़ गये। श्लोक - 92

महेन्द्र पर्वत पर आरुढ़ हो श्री राम जी ने समुद्र को देखा। श्लोक -93

इस प्रकार वे सह्य और मलय  को लाँघकर महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहूँचे। श्लोक- 94

उस (महेन्द्र पर्वत) से उतरकर शीघ्र ही सागर तटवर्ती वन में जा पहूँचे।

रामचन्द्रजी की आज्ञा से सुग्रीव ने समुद्र तटीय वन में सेना को ठहरा दिया। पढ़ाव डाला। श्लोक - 103

(नोट - सुग्रीव बहुत अच्छे भुगोल वेत्ता थे।महेन्द्र  नामक पर्वत बहुत दो से अधिक हैं यह सर्व स्वीकार्य है। सह्य और मलय दोनो पर्वत पश्चिमी घाट पर है। अतः यह महेन्द्र गिरि निश्चित ही पश्चिमी घाँट पर होगा। कुछ लोग विद्वान परम्परा निर्वाह हेतु  *किश्किन्धा काण्ड / एकचत्वारिशः सर्ग/18 से 27* में सुग्रीव जी द्वारा दक्षिणापथ का मार्ग वर्णन करते समय पाण्यदेशान्तर्गत महेन्द्र पर्वत तञ्जोर अथवा तनञ्जोर के निकट बतला कर बंगाल की खाड़ी की ओर जाना बतलाते हैं; उनसे मेरा निवेदन है कि, क्या सुग्रीव जी इतने मुर्ख थे कि,पुर्वी घाट पर उतरने के लिये सेना सहित पहले पश्चिमी पर पहूँच कर श्रम और समय दोनो नष्ट करते? वे पुर्वी घाट पर वे सीधे ही जा सकते थे।)

दिन के अन्त और रात के आरम्भ में चन्द्रोदय होने पर समुद्र में ज्वार आ गया। श्लोक 110- 111 अर्थात जिस दिन सागर तट पर  पहूँचे उस दिन पुर्णिमा थी।

*वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/एकोनविश सर्ग/*

समुद्र की शरण लेने की विभिषण की सलाह श्लोक- 31

विभिषण की सलाह पर सर्व सम्मति। श्लोक - 40

श्रीराम समुद्र तट पर कुशा बिछाकर धरना देने बैठे। श्लोक -41

*वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/एकविंश सर्ग/*

इस प्रकार समुद्र तट पर  तीन रात लेटे लेटे बीतने पर भी समुद्र देव प्रकट नही हुए । श्लोक 11-12

श्रीराम समुद्र पर कुपित हो गये। श्लोक- 13

श्रीराम ने अपने धनुष सेबड़े भयंकर बाण समुद्र पर छोड़े। श्लोक-  27

समुद्र मेंहुई हलचल को देख-

लक्ष्मण ने श्री राम का धनुष पकड़ कर रोका। श्लोक- 33

वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/द्वाविंश सर्ग/

श्रीराम ने ब्रह्मास्त का संधान किया श्लोक-  5

तब समुद्र के मध्य सागर सवयम् उत्थित हुआ। श्लोक- 17

चमकीले सर्पों के साथ जाम्बनद नामक स्वर्णाभूषण युक्त वैदुर्य मणि के सदृष्य श्याम वर्णीय समुद्र प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हुआ। श्लोक - 18

समुद्र ने पार होने का उपाय बतलाने का आश्वासन दिया। श्लोक - 29

श्री राम ने पुछा अमोघ ब्रह्मास्त्र किस स्थान पर छोड़ुँ? श्लोक - 30

समुद्र ने कहा कि,मेरे उत्तर तट पर द्रुमकुल्य नामक स्थान है। श्लोक 32

द्रमकुल्य स्थान में आभीर लोग रहते हैं। वे पापी दस्यु हैं।और मेरा ही पानी पीते हैं। श्लोक- 33

उनके स्पर्ष से मुझे भी पाप लगता है। कृपया उस स्थान पर/ उन पर   ब्रह्मास्त्र छोड़िये। श्लोक - 34

तदनुसार श्री राम ने द्रमकुल्य देश पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। श्लोक - 35

वह स्थान पर मरुस्थल बन गया। श्लोक- 36

उस स्थान का नाम मरुकान्तार पड़ गया।

वह भूमि दुधारू पशुओं और विभिन्न औषधियों से सम्पन्न होगी यह वरदान दिया। श्लोक - 43

समुद्र ने विश्वकर्मा पुत्र नल का परिचय दिया और बतलाया कि नल समस्त विश्वकर्म (इंजीनियरिंग) का ज्ञाता है। श्लोक- 45

यह महोत्साही वानर पिता के समान योग्य है।मैं इसके कार्य को धारण करुँगा। श्लोक - 46

तब नल ने उठकर श्रीराम से बोला - 

मैं पिता के समान सामर्थ्य पुर्वक समुद्र पर सेतु निर्माण करुँगा। श्लोक -  48

समुद्र ने मुझे स्मरण करवा दिया है। मैं बिना पुछे अपने गुणों को नही बतला सकता था।  अतः चुप था। श्लोक- 52

मैं सागर पर सेतु निर्माण में सक्षम हूँ। अतः सभी वानर मिल कर सेतु निर्माण आज ही आरम्भ करदें। श्लोक 53

वानर गण वन से बड़े बड़े वृक्ष और पर्वत शिखर / बड़े बड़े पत्थर/ चट्टानें ले आये। श्लोक- 55

महाकाय  महाबली वानर यन्त्रों ( मशीनों) की सहायता से बड़े बड़े पर्वत शिखर / शिलाओं को तोड़ कर/ उखाड़़ कर समुद्र तक परिवहन (ट्रांस्पोर्ट) कर लाये। श्लोक -60

कुछ बड़े बड़े शिलाखण्डों से समुद्र पाटने लगे।कोई सुत पकड़े हुए था। श्लोक - 61

कोई नापने के लिये दण्ड पकड़े़ था, कोई सामग्री जुटाते थे। वृक्षों से सेतु बाँधा जा रहा था। श्लोक-  64 & 65

पहले दिन उन्होने चौदह योजन लंबा सेतु बाँधा। श्लोक-69

(नोट - तट वर्ती क्षेत्र में केवल भराव करने से काम चल गया अतः  180 कि.मी. पुल बन गया। आगे गहराई बढ़़ने और तरङ्गो/ लहरों का वेग बढ़ने से गति धीमी हो जायेगी।)

दुसरे दिन बीस का योजन सेतु तैयार हो गया । श्लोक 69

(अर्थात दुसरे दिन (20- 14 = 6 योजन  सेतु बना।छः  योजन अर्थात 77 कि.मी. पुल बना कर सेतु की कुल लम्बाई बीस योजन अर्थात 257 कि.मी. हो गई। आगे गहराई बढ़ने और तरङ्गो/ लहरों का वेग बढ़ने से गति धीमी हो गई।दुसरे दिन गति लगभग आधी ही रह गई।)

तीसरे दिन कुल इक्कीस योजन का सेतु निर्माण कर लिया। श्लोक 70

(अर्थात तीसरे दिन एक योजन  यानी 12.87 कि.मी. सेतु बन पाया और सेतु की कुल लम्बाई 21 योजन = 270 कि.मी. हो गई।

(नोट - गति कम पड़़ना स्वाभाविक ही है। दुसरे दिन गति आधी रह गई और तीसरे दिन से तो  एक एक योजन अर्थात  प्रतिदिन 12.87 कि.मी. ही पुल  बनने लगा।)

चौथे दिन वानरों ने बाईस योजन तक का सेतु बनाया। श्लोक- 71

(अर्थात एक योजन / 12.87 कि.मी.वृद्धि हुई और कुल 22 योजन =   283 कि.मी. पुल बना।)

पाँचवें दिन वानरों ने कुल 23 योजन सेतु बना लिया। श्लोक- 72

(अर्थात एक योजन वृद्धि कर सेतु की कुल लम्बाई 23 योजन = 296 कि.मी. हो गई।)

इस प्रकार विश्वकर्मा पुत्र नल ने  ( पाँच दिन में वानरों की सहायता से भारत की मुख्य भूमि से रावण की लंका तक   23 योजन = लगभग 300 कि.मी. का )  सेतु समुद्र में  तैयार कर दिया।

नोट - इस प्रकार भारत की मुख्य भूमि पश्चिमी घाट के केरल की नीलगिरी के कोजीकोड से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीन सौ तीन कि.मी. का सेतु / पुल तैयार कर लिया।)

सुचना - पुरातत्व विदों द्वारा केरल के कण्णूर से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप के बीच वास्तविक रामसेतु खोजा जाना चाहिए।

(सूचना - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट जहाँ से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर  लक्षद्वीप समुह  के द्वीप पड़ते है। तथा  पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कण्णूर  से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी.है।दोनो ठीक बैठती है। अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।  राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में हो सकती है। कण्णूर और लक्ष्यद्वीप का घनिष्ठ राजनीतिक सम्बन्ध भी सदा से रहा है। कण्णूर से सोलोमन के मन्दिर के लिए लकड़ियाँ जहाज द्वारा गई थी। ईराक के उर से व्यापारिक सम्बन्ध भी थे।)

(नोट यह विशुद्ध विश्वकर्म / इंजीनियरिंग का कमाल था। न कि राम नाम लिखने से पत्थर तैराने का  कोई चमत्कार। तैरते पिण्डों को बान्ध कर पुल बनाना भी इंजीनियरिंग ही है किन्तु यहाँ उस तकनीकी का प्रयोग नही हुआ।

किन्तु नाम लिखने से पत्थर नही तैरते बल्कि जैविकीय गतिविधियों से निर्मित कुछ पाषाण नुमा संरचना समुद्र में तैरती हुई कई स्थानों में पायी। जाती है। इसमें कोई चमत्कार नही है। पाषाण नुमा संरचनाएँ जो बीच में पोली / खाली होती है उनमें हवा हरी रह जाती है। ऐसे पत्थरों का घनत्व एक ग्राम प्रति घन सेण्टीमीटर से कम होने के कारण वे भी बर्फ के समान तैरते हैं। )

नोट --श्लोक 76 में सेतु की लम्बाई शत योजन और चौड़ाई दश योजन लिखा है। निश्चित ही यह श्लोक प्रक्षिप्त है क्यों कि,  नई दिल्ली से आन्ध्रप्रदेश के चन्द्रपुर से आगे असिफाबाद तक की दुरी के बराबर  सेतु की लम्बाई 1288 कि.मी. कोई मान भी लेतो 129 कि.मी. चौड़ा पुल तो मुर्खता सीमा के पार की सोच लगती है। दिल्ली से हस्तिनापुर की दुरी भी 110 कि.मी. है। उससे भी बीस कि.मी.अधिक चौड़ा पुल तो अकल्पनीय है।

अस्तु यह स्पष्ट है कि, दासता युग में सूफियों के इन्द्रजाल अर्थात वैज्ञानिक और कलात्मक जादुगरी से प्रभावित कुछ लोगों ने मिलकर पुराने ग्रन्थों में भी ऐसे चमत्कार बतलाने के उद्देश्य से ऐसे प्रक्षिप्त श्लोक डाल दिये। जो मूल रचना से कतई मैल नही खाते। ऐसे ही

श्लोक 78 में वानरों की संख्या सहत्र कोटि यानी एक अरब जनसंख्या बतलाई है।

भारत की जनसंख्या के बराबर एक अरब वा्नर  श्रीलंका में भी नही समा पाते।

अस्तु शास्त्राध्ययन में स्वविवेक जागृत रखना होता है।

खम्बात की खाड़ी के तट कोरोमण्डल दहेज के लूवारा ग्राम के परशुराम मन्दिर  से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर लक्षद्वीप समुह  का किल्तान द्वीप पड़ता है। तथा केरल के  पश्चिमी घाँट के  नीलगिरी के कोजीकोड  के रामनाट्टुकारा और पन्थीराम्कवु या कन्नुर से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीन सौ तीन कि.मी.है। दोनो ठीक बैठती है अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।   राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में रावण की लंका हो सकती है।

पुरे प्रकरण को पढ़कर भारत का नक्षा  एटलस  लेकर जाँचे।

कि,  भारत के पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कण्णूर (केरल) से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी. है। और गुजरात के खम्बात की खाड़ी से दहेज नामक स्थान से किल्तान की दुरी भी लगभग 1290 कि.मी. है।

अस्तु लगभग किल्तान द्वीप के आसपास ही रावण की लंका रही होगी। लक्षद्वीप में किल्तान द्वीप राजधानी करवत्ती से उत्तर में है।

अध्ययन कर पता लगाया जा सकता है कि किल्तान या करवत्ती या कोई डुबा हुआ द्वीप में से रावण की लंका कौनसा द्वीप था।

यह कार्य पुरातत्व विभाग और पुरातत्व शास्त्रियों का कार्य है।

रामेश्वरम कहाँ है ---

परशुराम जी का मूल नाम राम है। परशु धारण करनें के कारण उनका नाम परशुराम पड़ गया। यह भी सम्भव है कि, अयोध्या नरेश श्री राम की ख्याति बड़नें के कारण विशिष्ठिकृत नाम के रूप में परशुराम नाम प्रचलित हुआ हो।

रामायण में श्रीराम द्वारा रामेश्वरम शिवलिङ्ग स्थापना का वर्णन नही है। किन्तु वाल्मीकि रामायण के बहुत बाद के राक्षसों और विशेषकर रावण के प्रति आस्थावान तमिल कवि कम्बन की रचना इरामावतारम् के आधार पर यह मान्य हुआ। 

केरल में त्रिशुर भी गुरुवायूर से 38 कि.मी दूर त्रिशुर के शिवलिङ्ग की स्थापना परशुराम जी ने की थी।

अतः सम्भव है कि, कवि कम्बन ने त्रिशुर वाले रामेश्वरम ज्योतिर्लिङ्ग का वर्णन करनें में स्व स्थान तमिलनाड़ु में वर्णित कर दिया हो या बाद में किसी ने परिवर्तन किया हो। अतः त्रिशुर ही वास्तविक रामेश्वरम होना चाहिए।

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

नित्य, नैमित्तिक कर्म कार्य कर्म , सकामोपासना नशा और टोने टोटके विष हैं।

हम जो कार्य जीवन भर करें वह अन्तिम अवस्था में छोड़ने की आशा करनाऔर जो जीवन भर नही किया वह कार्य अन्तिम अवस्था में करने की आशा करना बहुत बड़ी भूल है।
ईश्वर भक्ति और शास्त्र जिज्ञासा पर हम बच्चों को कहते हैं अभी पढ़ाई पर ध्यान दो, अंग्रेजी, गणित विज्ञान  ही आगे काम आयेगें। कमाना सीखो, बचाना सीखो, समय पर पैसे ही काम आयेंगे।
लोगों से सम्बन्ध बनाओ, सम्पर्क बढ़ाओ जरुरत पड़ने पर काम आयेंगे।
श्रीमद्भगवद्गीता का नित्य पाठ करने वालों को भी यह विश्वास नही होता कि, भगवान ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि,अव्यभिचारी भक्त जो अनन्य आश्रित होकर निरन्तर परमात्मा का चिन्तन करता हुआ अपने कर्त्तव्य कर्म करता हुआ जीवन व्यतीत करता है उसके प्राप्तव्य की व्यवस्था और प्राप्त की रक्षा (योग क्षेम) मैं स्वयम् वहन करता हूँ।
जब उन्हे ही विश्वास नही , वे भी ईश्वर को रिश्वतखोर, चापलूसी प्रिय ऑफिसर समझते हैं।  सकाम उपासना करते हैं,स्वयम् मान लेते हैं, मान पुरी नही करपाने पर डरते हैं। कहते हैं कर्म तो हमें ही करना पड़ेगा, भगवान मुँह में गुलाब जामुन थोड़े ही  डालेंगे।
उन्हे यह पता नही होता कि, पुर्व जन्मों में किये गये कर्मों के संचित के महासागर का थोड़ा सा भाग जो इस जन्म में भोग हेतु प्रारब्ध के रुप में  उदित हो चुका है। (कम्प्यूटर की भाषा में सिलेक्ट हो चुका है) । उसे तो इस जन्म में भोगना ही है। चाहे आप वशिष्ठ ऋषि से बड़े ब्रह्मज्ञानी हों या विश्वामित्र से बड़े क्रियाशील हों या नारद, प्रहलाद, ध्रुव, हनुमान से बड़े भक्त हों या श्रीकृष्ण और शंकरजी के समान योगेश्वर हों या श्रीराम जैसे वीर शस्त्रधारी हों इस जन्म के लिए उदित होचुके प्रारब्ध भोग तो भोगने ही होंगें।
नित्य कर्म की क्रियाओं, कर्मकाण्ड तो कर्त्तव्य है, कार्य कर्म है।जिनका न करना दोष पुर्ण है। नैमित्तिक कर्म करना भी उचित है। न करने में कोई दोष तो नही पर न करके बाद में पछताने से समय पर कर प्रसन्न रहना उत्तम है।
प्रायश्चित और ग्रहशान्ति प्रयोग, विनायक शान्ति प्रयोग, प्रायश्चित के लिये की जाने वाली क्रियाएँ यानी कर्मकाण्ड सकाम उपासना या टोने- टोटके की श्रेणी में नही आते।
ये प्रभावित व्यक्ति को स्वयम् ही करना होते हैं क्योंकि, ये दवाई है, या फिजियो थेरेपी है।जो स्वयम को ही लेना/ करना पड़ते हैं कोई आचार्य सही विधि से क्रियाएँ करवाने में सहायता कर सकते हैं पर करना स्वयम् ही पड़ती है।
सकामोपासना नशा है। जो केवल हानिकारक, दुःख कारक परिणाम ही देता है। सकाम उपासना करना नशा करने के समान है।जिससे अज्ञान ही उपजता है।
टोने- टोटके जहर खाने के समान है। मृत्यु या गंभीर अक्षमता उपजाते हैं।इनसे दूर ही रहना उचित है।
ऋत का ज्ञान होने से ब्रह्मज्ञानी उसे प्राकृतिक गुणों का आपसी व्यव्हार के रुप में देखते हुए अप्रभावित हुए सानन्द भोगते हैं उन्हे कोई सुख- दुःख, क्लेश नही होता।
बुद्धियोगी/ निष्काम कर्मयोगी उसे स्वाभाविक मान कर बगैर सुखी- दुःखी हुए क्लेश रहित, सानन्द भोग लेते हैं।
भक्त ईश्वरीय प्रसाद मानकर कृपानुभूति मानकर सानन्द गृहण करता है।सुखी-दुःखी हुए बगैर अपने इष्ट के ध्यान में - भक्ति में मस्त रहते अन्जान सा रहकर भोग लेते हैं।
पर सकामोपासक हिरण्यकशिपु, और रावण के समान संकट आने पर टोने-टोटके, सकाम क्रिया- कर्मकाण्ड, रिश्वत- चापलूसी, धोंस-दपट,ब्लेकमेलिंग का सहारा लेकर अनततः असफल ही होते हैं।
पर उन्हे सदाचारी - ज्ञानी, बुद्धियोगी, निष्काम कर्मयोगी, भक्त सब कष्टित दिखते हैं और स्वयम् को सफल कहते हुए भी सदैव परेशान, डरे हुए ही रहते हैं। और असफल षड़यन्त्र करते हुए जीवन भर दुःखी ही रहते हैं।

मंगलवार, 12 मार्च 2019

वेदिक शास्त्र अर्थात सनातन धर्म के धर्मशास्त्र

हमारे धर्म ग्रंथ  - वेद, 1ऋग्वेद, 2यजुर्वेद, 3सामवेद और 4अथर्ववेद।

 ब्राह्मण ग्रन्थ

ऋग्वेद :

ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा)

कौषीतकि-(या शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)

सामवेद :

प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण

षडविंश ब्राह्मण

आर्षेय ब्राह्मण

मन्त्र (या छान्दौग्य) ब्राह्मण

जैमिनीय (या तलवाकार) ब्राह्मण

यजुर्वेद

शुक्ल यजुर्वेद :

शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा)

शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा)

कृष्णयजुर्वेद :

तैत्तिरीयब्राह्मण

मैत्रायणीब्राह्मण

कठब्राह्मण

कपिष्ठलब्राह्मण

अथर्ववेद :

गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

1गोपथ, 2 वंश, 3 शतपथ माध्यंदिनि, 4 ताण्ड्य विमांश ,5 छान्दोग्य (आरण्यक सहित)  , 6 आर्षेय, 7 सांख्यायन (आरण्यक सहित) , 8 साम विधान 9 एतरेय (आरण्यक सहित) , 10 तैत्तरेय (आरण्यक सहित) , 11 जेमिनी (आरण्यक सहित), 12 ताण्ड्य सदविमांश, 13 संहितोपनिषद, 14 कौथुम आर्ष्य, 15 दैवताध्याय, 16 काण्व शतपथ,17 वधुला अनवाख्यान, 18  काठक । 

ऋग्वेद का ब्राह्मण ग्रन्थ  ऐतरेय ब्राह्मण।

शुक्ल यजुर्वेद माद्यन्दिनि/ वाजसनेयी शाखा का शतपथ ब्राह्मण।

कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का तैत्तिरीय आरण्यक

सामवेद की तलवाकार शाखा के जैमिनीय शाखा का जैमिनीय ब्राह्मण  और छान्दौग्य ब्राह्मण

अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा और शौनक शाखा का गोपथ ब्राह्मण।


इनमें निम्नांकित पाँच ब्राह्मण ग्रन्थों में आरण्यक भी हैं और  मैत्रायणी आरण्यक (सामवेद के मैत्रायणीय ब्राह्मण का भाग है।

आरण्यक

1जैमिनी, 2सांख्यायन, 3छान्दोग्य, 4 एतरेय, 5 तैत्तरीय  और 6 मैत्रायणी (प्रथक है।) 

इन्ही ब्राह्मण आरण्यकों का अन्तिम भाग वेदान्त या ब्रह्मविद्या, ब्रह्मसूत्र, और उपनिषद कहलाते हैं। तेरह उपनिषद मुख्य हैं। उपनिषद

ऐतरेय आरण्यक के चौथे, पाँचवे और छटे अध्याय अर्थात 1 ऐतरेयोपनिषद और 2 कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्

शुक्ल यजुर्वेद संहिता माध्यन्दिन शाखा का चालिसवाँ अध्याय 3 ईशावास्योपनिषद है। यह शुक्ल यजुर्वेद की कण्व शाखा में भी थोड़े से अन्तर से उपलब्ध है।

 शुक्ल यजुर्वेद के काण्वी शाखा के वाजसनेयी ब्राह्मण के अन्तर्गत आरण्यक भाग के वृहदाकार होनें के कारण 4 वृहदारण्यकोपनिषद नाम से प्रसिद्ध है।

कृष्णयजुर्वेदीय 5 श्वेताश्वतरोपनिषद तथा कृष्णयजुर्वेदीय कठ शाखा का 6 कठोपनिषद तैत्तरीय शाखा के तैत्तरीय आरण्यक के दस अध्यायों में से सातवें, आठवें और नौवें अध्याय अर्थात 7 तैत्तरीयोपनिषद कहलाता है।

सामवेद के तलवाकार ब्राह्मण के तलवाकार उपनिषद जिसे जेमिनीयोपनिषद भी कहते हैं इसके प्रथम मन्त्र के प्रथम शब्द  केनेषितम् शब्द के कारण 8 केनोपनिषद नाम से प्रसिद्ध है तथा सामवेद के तलवाकार शाखा के छान्दोग्य ब्राह्मण के दस अध्याय में से तीसरे अध्याय से दसवें अध्याय तक को 9 छान्दोग्योपनिषद कहते हैं।

अथर्वेदीय पिप्पलाद शास्त्रीय ब्राह्मण के 10 प्रश्नोपनिषद एवम् अथर्ववेद की शौनक शाखा के 11 मुण्डकोपनिषद और 12 माण्डूक्योपनिषद्

तथा मैत्रायणी आरण्यक का अन्तिम अध्याय 13 मैत्रायणी उपनिषद है।

1ईश,2 केन 3 कठ, 4 मण्डुक, 5 माण्डूक्य, 6 एतरेय, 7 तैत्तरीय, 8 प्रश्न, 9 श्वेताश्वतर, 10 वृहदारण्यक, 11 छान्दोग्य, उक्त ग्यारह उपनिषदों पर भगवान शंकराचार्य जी ने भाष्य लिखे हैं अतः ये विशेष माने जाते हैं। इनके अलावा दो और वेदिक उपनिषद हैं।12 कौषीतकि, 13 मैत्रायणी उपनिषद।

वेदों की व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थ में है।  जिसमें यज्ञ विध, संस्कार विधि, देश चयन (वास्तु ),काल चयन (ज्योतिष ),पात्र चयन (अधिकारी /अनधिकारी चयन ), मण्डप, बेदी विधि,  (यज्ञ कुण्ड ) निर्माण विधि,धर्माधर्म निर्णय सब कुछ विस्तार से बतलाया  / समझाया है।

बुद्धियोग/ कर्मयोग शास्त्र-  किसी भी कर्म को किस आशय और उद्दैश्य से कैसे किया जाय कि, कर्म का लेप न हो की विधि कर्मयोग शास्त्र, बुद्धियोग (वर्तमान में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता है);

फिर ब्राह्मण ग्रन्थों की विषयवार क्रियात्मक  व्याख्या / प्रेक्टिकल  बुक सुत्र ग्रन्थों का वर्णन वेदाङ्ग वर्णन में  कल्प के अन्तर्गत किया है।

उपवेद - चारों वेदों के उपवेद हैं-

ऋग्वेद - स्थापत्य वेद/ शिल्पवेद - हारीत संहिता

स्थापत्य वेद - आर्किटेक्चर का ज्ञान - विज्ञान है। यह शुल्ब सुत्रों का सहयोगी शास्त्र है। इस से लगभग हर व्यक्ति परिचित है क्योंकि भवन निर्माण, रेल पथ, सड़क, हवाई अड्डे, बन्दरगाह, सेतु, पुल पुलिया आदि का निर्माण हमारे समक्ष होता रहता है। इसी का ज्ञान शिल्पवेद है।

यजुर्वेद - धनुर्वेद - भेल संहिता

धनुर्वेद - क्षत्रियोचित देहयष्टि तैयार कर अस्त्र- शस्त्र ,आग्नेयास्त्र, राकेट आदि निर्माण कर उनका सफल संचालन, निवारण ,सुरक्षा और संरक्षण का सैन्य शास्त्र। वैमानिकी शास्त्र, रथ, भूमि वाहन,सेतु निर्माण, दुर्ग रंरचना, निर्माण, व्यवस्थापन और संरक्षण, जहाज, नौकायन , विशाल यान्त्रिकी का ज्ञान, विज्ञान  हैं।

सामवेद -  गन्धर्ववेद -  कश्यप संहिता।

गन्धर्व वेद - संगीत, गायन , वादन, वाद्य यंत्र निर्माण, अनुरक्षण, संधारण,  नाट्य, नृत्य, अभिनय, मंच निर्माण, सुत्रधार कर्म आदि का ज्ञान विज्ञान।

अथर्वेद-  आयुर्वेद- चरक संहिता- सुश्रुत संहिता- वाग्भट्ट संहिता, भावप्रकाश संहिता, शार्ङधर संहिता, माधव निदान संहिता।

आयुर्वेद - स्वस्थ्य तन- मन पुर्वक जीवन जीने की कला और अस्वस्थ्य होने पर उपचार विधि, चिकित्सा शास्त्र।
वर्तमान में औशध शास्त्र में चरक संहिता और शल्य चिकित्सा हेतु सुश्रुत संहिता ही उपलब्ध है।
गवायुर्वेद, श्वायुर्वेद, हस्ति आयुर्वेद आदि भी इसी के भाग हैं।

वेदाङ्ग - वेदांग छः हैं। कल्प, ज्योतिष,   निरुक्त, शिक्षा, व्याकरण  और छन्द

कल्प जिसमें श्रोत सुत्र, गृह्य सुत्र, शुल्ब सुत्र और धर्म सुत्र।
सुत्र ग्रन्थ -
श्रोत सुत्रों - में बड़े यज्ञों की विधि है;
ग्रह्य सुत्रों - में संस्कार विधि, उत्सव (त्योहार) और पर्व  मनाने की विधि, जन्म दिन आदि मनाने की विधि है;
शुल्बसुत्रों - में यज्ञ और क्रियाओं/ कर्मकाण्ड के लिये / संस्कारों के लिये ज्योतिष गणना (सिद्धान्त ज्योतिष) और उचित समय निर्धारण (मुहूर्त),उचित स्थान चयन मण्डप और यज्ञ वेदी बनाने की विधि (वास्तुशास्त्र) का ज्ञान प्रदान किया गया है।
धर्म सुत्र - उचित, अनुचित पात्र, उचित अनुचित कर्म निर्णय, कर्त्तव्याकर्त्तव्य निर्णय अर्थात कार्य अकार्य निर्णय), कर्त्तव्यों की अवहेलना या अकार्य कर्म होने के प्रायश्चित विधि आदि सब धर्म व्याख्या है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि इनके ही पुरक सहायक ग्रन्थ है।

ज्योतिष - त्रीस्कन्ध ज्योतिष के अन्तर्गत 1 सिद्धान्त ज्योतिष गणिताध्याय (ग्रह गणित), एवम् 2 सिद्धान्त ज्योतिष गोलाध्याय (खगोल) 3 संहिता ज्योतिष (नारद संहिता, गर्ग संहिता, रावण संहिता, वराह संहिता,और भद्रबाहु संहिता) मेदिनी यानी राष्ट्रीय भविष्य ज्ञान, मुहुर्त, वास्तु, शकुन शास्त्र, अंकविद्या आदि अनेक विभिन्न विषयों के सम्मिलित ज्ञान को संहिता कहते हैं।  तथा 4 फलित ज्योतिष को होराशास्त्र ( जिसमें  ताजिक अर्थात वर्षफल और प्रश्न ज्योतिष सम्मिलित है।) और 

निरुक्त - भाषा शास्त्र इसी का भाग है। वर्तमान में यास्क का निरुक्त और पाणिनि की अष्टाध्यायी एवम् अमरकोश ग्रन्थ उपलब्ध है।
शब्द व्युत्पत्ति इसका मुख्य विषय है। वेदिक ग्रन्थों को समझने के लिये निरुक्त और मिमांसा का ज्ञान अत्यावश्यक है।
वर्तमान में यास्काचार्य का निरुक्त उपलब्ध है।

प्रतिशाख्य - शिक्षा

ऋग्वेद एवम् सामवेद - पुष्पसुत्र ।

शुक्ल यजुर्वेद कृष्ण यजुर्वेद - तैत्तरीय संहिता।

अथर्वेद - चतुराध्याय।

फोनेटिक्स इसी का भाग है। शब्दों, वाक्यांशों , वाक्यों और पदों का उच्चारण, पठन, पाठन शिक्षा के अन्तर्गत आता है।
चारों वेदों की शिक्षा (उच्चारण पद्यति) के अलग अलग शिक्षा ग्रन्थ हैं।
रुद्राभिषेक और यज्ञों में यजुर्वेदीय शिक्षा के दर्शन होते है। लगभग सभी ने वह श्रवण लाभ लिया है।
ठुमरी और थाट के रसिकों को सामवेदीय शिक्षा का अनुभव हुआ होता है।
श्रीसुक्त पाठ श्रवण में ऋग्वेदीय शिक्षा का अनुभव मिलता है।
अथर्ववेद में ऋग्वेद और यजुर्वेद दोनो का मिश्रण होता है।
इसी कारण वेद त्रयी कहा जाता है। कविताओं के समान पढ़े जाने वाले ऋक ऋग्वेद में, गद्य के समान पढ़े जाने वाले मन्त्र यजुर्वेद में, गायन योग्य गान/ साम सामवेद में रखे गये हैं। इसी को वेदों का संहिता करण कहते हैं।

व्याकरण -  वर्तमान में पाणिनी रचित अष्टाध्यायी उसपर पतञ्जलि का महाभाष्य और वररुचि कात्यायन  का वार्तिक उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है।
इनकी सर्वश्रेष्ठ कुञ्जी / मेड ईजी लघुसिद्धान्त कौमुदी, मध्यमसिद्धान्त कौमुदीऔर वृहत्सिद्धान्त कौमुदी ग्रन्थ है।
भाषा जानने यानि जिसे बोलना, पढ़ना और लिखना आता है उसकी भाषा परिमार्जित करने में व्याकरण का महत्व है।
पहले जब संस्कृत लोकभाषा थी तब सीधे व्याकरण से आरम्भ होता था जैसे इंग्लेण्ड में ग्रामर स्कूलों  (प्राथमिक शालाओं ) में ग्रामर यानी इंगलिश व्याकरण पढ़ाया जाता है।

छन्द - वर्तमान उपलब्ध ग्रन्थ पिङ्गल शास्त्र के कारण पिंगलशास्त्र नाम रुड़ होगया है।
इसमें दोहा चौपाई सोरठा कुण्डलियाँ आदि लगभग सभी ने माध्यमिक शिक्षा तक हिन्दी में पढ़े हैं।
संस्कृत में श्लोक शब्द सभी ने सुना है।जिसकी खोज महर्षि वाल्मिकी ने की थी।इसे विश्व का पहला काव्य कहाजाता है। जिसमें णार पद होते हैं और चारों षदों में समान मात्राएँ होती है। अतः यह मात्रिक छन्द अनुष्टप छन्द कहलाता है। अधिकांश ध्यान मन्त्र  और स्तुतियाँ / स्तोत्र अनुष्टप छन्द में ही हैं।
वार्णिक छन्द में वर्णों की संख्या समान होती है।
गायत्री छन्द सभी जानते है। सावित्री मन्त्र का नाम ही गायत्री मन्त्र इसके छन्द के कारण ही पड़ गया।
द्विअर्थी संवाद रुप श्लेष अलंकार से भी ज्यादातर लोग परिचित हैं ।उपमा अलंकार का प्रयोग भी सब करते हैं। यह अर्थालंकार है तो कुछ शब्दालंकार जैसे अनुप्रास अलंकार ।
ये सब भी पढ़े हुए लगे होंगे। अलंकार काव्य और भाषा के भुषण हैं।
यही सब ज्ञान छन्दशास्त्र में है।

इन वेदाङगों के ज्ञान प्राप्त करे बगैर वेदों को समझना असम्भव है।

ज्ञानमिमांसा - ब्रह्मसूत्र/ शारीरक सुत्र (बादरायण का उपलबद्ध है) में शुक्ल यजुर्वेद के  अन्तिम चतुर्थांश  अध्याय 30 से 39 और अध्याय 40 यानी ईशावास्योपनिषद  और ब्राह्मण ग्रन्थों के उत्तरार्ध आरण्यकों और  आरण्यकों के अन्तिम अध्याय  उपनिषदों की मिमांसा और व्याख्या है;

धर्म मिमांसा/ कर्म मिमांसा -
पुर्व मिमांसा दर्शन (जेमिनी का पुर्व मिमांसा दर्शन उपलब्ध है। जिसपर शबर स्वामी का भाष्य, कुमारील भट्ट का कातंत वार्तिक और श्लोक वार्तिक माधवाचार्य का जेमिनीय न्यायमाला भाष्य ) में ब्राह्मण ग्रन्थों के पुर्वार्ध क्रियात्मक भाग की मिमांसा और व्याख्या है ; प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि नामक साधनों की चर्चा की गई है। यह यज्ञ प्रधान और स्वर्ग को अन्तिम गति मानने वाला दर्शन है।

सांख्य दर्शन -  में तत्व मिमांसा है, पुरुषसुक्त की स्रष्टि उत्पत्ति विवरण और वर्णन की मिमांसा और व्याख्या है। इसे ब्रह्मसूत्र का सहायक भाग कह सकते हैं।(वर्तमान में ईश्वर कृष्ण की सांख्ययोग कारिकाओं के अतिरिक्त कपिल का सांख्य दर्शन उपलब्ध है।

योग दर्शन - में अष्टाङ्ग योग में  स्वस्थ्य चित्त और स्वस्थ्य, सुघड़, बलिष्ठ देह और धृतिमान होकर सफल जीवन की कला सिखाई गई है।
अष्टाङ्ग योग धनुर्वेद और आयुर्वेद के लिये बहुत बड़ा सहयोगी ग्रन्थ है। वर्तमान में पतञ्जलि का योग दर्शन और उसपर व्यास भाष्य और उसपर भी व्यास वृत्ति सहित गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित उपलब्ध है।

वैशेषिक दर्शन में भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान की दृष्टि से सृष्टि उत्पत्ति वर्णन है  यह सांख्य शास्त्र का सहयोगी है।वर्तमान में कणाद का वैशेषिक दर्शन उपलब्ध है।

न्याय दर्शन - में तार्किक दृष्टिकोण से गहन और विषद तर्कों के माध्यम से सृष्टि उत्पत्ति समझाई गई है।
इसका सर्वाधिक उपयोग मिमांसा दर्शनों में हुआ है।फिर भी इसे वैशेषिक दर्शन का सहयोगी दर्शन माना जाता है।

दर्शन - सभी दर्शनों का उद्देश्य परमात्मा से आज तक की जैविक और भौतिक सृष्टि तक विकास/ पतन चक्र के आधार पर परमात्मा - जीव और जगत के पारस्परिक सम्बन्ध की व्याख्या करना है। जगजीवन राम ( जगत- जीवन - ब्रह्म / ईश्वर) का ज्ञान ही दर्शन है।

अठारह स्मृतियाँ और अठारह  उप स्मृतियाँ है।

स्मृति

1 अङ्गिरा,2 व्यास,3 आपस्थम्ब, 4 दक्ष, 5 विष्णु, 6 याज्ञवल्क्य, 7 लिखित, 8 संवत, 9 शंख, 10 ब्रहस्पति,11 अत्रि, 12 कात्यायन, 13 पाराशर, 14 मनु, 15औशनस, 16 हारीत, 17गोतम,18 यम।

उपस्मृति

1कश्यप, 2पुलस्य, 3 नारद,  4 विश्वामित्र,  5 देवल,  6  मार्कण्डेय,  7 ऋष्यशङ्ग 8 आश्वलायन,   9 नारायण,  10 भारद्वाज,  11  लोहित,   12 व्याग्रपद,   13 दालभ्य,   14 प्रजापति,  15 शाकातप, 16 वधुला, 17 गोभिल, 18

निबन्ध  - अन्त में आते हैं निबन्ध ग्रन्थ, जिनमें उक्त भिन्न भिन्न विषयों पर उनके रचना काल की परिस्थितियों के अनुकूल / अनुरूप और अनुसार आधुनिक तरीकों से निर्णय दिये गये है। या उपपत्ति समझाई गई है।

जैसे ज्योतिष में सुर्यसिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणी, गर्ग संहिता,वृहत्पाराशर होराशास्त्र, वराह संहिता, मुहूर्त चिन्तामणी से केतकी ग्रहगणितम्,  तक ,
धर्म शास्त्र में हेमाद्रि, कालमाधव से
निर्णय सिन्धु धर्म सिन्धु तक।
आयुर्वेद में चरक संहिता, सुश्रुत संहिता से रसराज महोदधि तक ,
वास्तु मे विश्वकर्मा प्रकाश, और मय वास्तु और राजा भोज की से वर्तमान की अनेक पुस्तकों तक।