बुधवार, 25 दिसंबर 2024

सनातन धर्म के मुख्य संवत्सर पत्रक (केलेण्डर) और विषुव तथा अयनान्त संक्रान्ति का समय।

वैदिक सनातन धर्म के अनुसार वसन्त विषुव (नव संवत्सर प्रारम्भ) के समय, शारदीय विषुव और और उत्तरायण - दक्षिणायन के अयनान्त के समय तीर्थ स्नान, होम- हवन, अग्निहोत्र और दान किया जाता है।
दुसरे दिन सूर्योदय के पूर्व संध्या, गायत्री मन्त्र जप और सूर्योदय समय वैदिक अग्निहोत्र तथा पैड़-पौधों, गो, कुकर, पक्षियों, पिप्पलिका (चींटी) और यथायोग्य विद्यार्थियों, बिमारों, अपाहिजों, वृद्धों की सेवा की जाती है।

वसन्त विषुव (Vernol Equinox) दिनांक 20 मार्च 2025 गुरुवार को 14:31 बजे अर्थात दोपहर 02:31 बजे होगा। इस समय हमारा वैदिक नव संवत्सर (नव वर्ष) प्रारम्भ होता है। जिसे धार्मिक दृष्टि से इसके बाद सूर्योदय से (21 मार्च 2025 शुक्रवार से) लागू माना जाता है। वसन्त विषुव के समय सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते हुए भूमि की भूमध्य रेखा के शीर्ष पर पहूँच जाता है। और दक्षिण गोलार्ध से उत्तर गोलार्ध में प्रवेश करता है। उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय और दक्षिणी ध्रुव पर सूर्यास्त हो जाता है। वेदों के अनुसार इसे देवों कि दिन प्रारम्भ और पितरों की रात्रि प्रारम्भ कहा गया है।
वैदिक नव संवत्सर प्रारम्भ दिवस —- वसन्त विषुव या वसन्त सम्पात दिवस (20/21 मार्च) जिस दिन दिन रात बराबर होते हैं।  यह एक मात्र पूर्णतः वैज्ञानिक ऋतुबद्ध संवत है। इसे कलियुग संवत से दर्शाया जाता है। लेकिन वर्तमान में हिन्दुओं नें वेदों से परहेज़ कर लिया है इसलिए यह वैदिक, वैज्ञानिक, और वास्तविक नववर्ष दिवस मनाना बन्द कर दिया है।
वसन्त विषुव प्रति वर्ष 20 या 21 मार्च को पड़ता है। क्योंकि कलियुग संवत और ग्रेगरी केलेण्डर दोनों ही सायन सौर केलेण्डर हैं। गोल, ऋतु और ग्रेगोरी केलेण्डर के अनुसार माहों के प्रारम्भ दिनांक और मास अवधि निम्नानुसार है ---
उत्तर गोल। 
वसन्त ऋतु।
1 मधु मास , 21 मार्च से, 31 दिन।
2 माधव मास, 21 अप्रेल से, 31 दिन। 
ग्रीष्म ऋतु।
3 शुक्र मास, 22 मई से, 31 दिन।
4 शचि मास, 22 जून से, 31 दिन। 
वर्षा ऋतु 
5 नभः मास, 23 जुलाई से, 31 दिन।
6 नभस्य मास, 23 अगस्त से, 31 दिन।
दक्षिण गोल।
शरद ऋतु।
7 ईष मास, 23 सितम्बर से, 30 दिन।
8 उर्ज मास, 23 अक्टूबर से, 30 दिन।
हेमन्त ऋतु।
9 सहस मास, 22 नवम्बर 30 दिन।
10 सहस्य मास, 22 दिसम्बर से 29 दिन।
शिशिर ऋतु।
11 तपः मास, 20 जनवरी से, 30 दिन।
12 तपस्य मास, 19 फरवरी से, 30 या 31 दिन होते हैं।
साधारण तीन वर्ष में 30 दिन और प्रत्येक चौथे वर्ष (अधिवर्ष में) 31 दिन का मास होता है।
मासावधि मन्दोच्च पर आधारित होती है। मन्दोच्च 13,384 वर्ष में आवर्तन पूर्ण करता है। अत: प्रत्येक 1074 वर्ष में एक माह पहले वाला माह 29 दिन का और उसका सातवाँ माह 31. 5 दिन का हो जाता है। लेकिन अभी लम्बे समय तक ये ही स्थिति रहने वाली है।

ऐसे ही उत्तरायण या ग्रीष्म अयनान्त (Summer solstice) दिनांक 21 जून 2025 शनिवार को प्रातः 08:11 बजे तथा दूसरे दिन सूर्योदय समय भी होगा।  इस दिन सबसे बड़ा दिन, सबसे छोटी रात्रि होती है। सूर्य की उत्तर परम क्रान्ति होती है अर्थात सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ते हुए अन्तिम सीमा भूमि की कर्क रेखा के शीर्ष पर पहूँचकर उत्तर की ओर होने लगता है। कर्क रेखा हमारे निकट उज्जैन नगर से होकर गुजरती है। इसलिए इस दिन उज्जैन, शिप्रा सङ्गम स्नान और महाकाल वन क्षेत्र की यात्रा का विशेष महत्व है।
एवम्

शरद विषुव (Autumn Equinox) दिनांक 22 सितम्बर 2025 सोमवार को 23:49 बजे अर्थात रात्रि 11:49 बजे  होगा अतः  इस समय और दूसरे दिन 23 सितम्बर 2025 को सूर्योदय समय भी उपर लिखितानुसार तीर्थ स्नान, यज्ञ, होम, दान-पुण्य कर्म किया जाएगा ।

इसके बाद दक्षिणायन या दक्षिण अयनान्त (Winter Solstice) 21 दिसम्बर 2025 रविवार को 20:32 बजे अर्थात रात्रि 8:32 बजे होगा। अतः दूसरे दिन 22 दिसम्बर 2025 को सूर्योदय समय तीर्थ स्नान, यज्ञ, होम, दान-पुण्य कर्म किया जाता है ।



2 नक्षत्रीय नव संवत्सर प्रारम्भ दिवस —- वेदों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत और उसके आसपास आठ-आठ अंश चौड़ी नक्षत्र पट्टी का मन्ध्य बिन्दु कहा गया है। अतः
जब सूर्य के केन्द्र से भूमि का केन्द्र चित्रा तारे के सम्मुख पड़ता है। अर्थात भूमि के केन्द्र से सूर्य का केन्द्र चित्रा तारे से 180° पर होता है। अर्थात अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु पर सूर्य होता है। तब नक्षत्रीय नव संवत्सर प्रारम्भ होता है। उत्तर वैदिक काल और सुत्र ग्रन्थों के रचना काल से पौराणिक काल तक नक्षत्रीय नव संवत्सर का विशेष महत्व रहा। इसमें वर्तमान में ग्रेगोरी केलेण्डर के अनुसार माहों के प्रारम्भ दिनांक और मास अवधि निम्नानुसार है ---

1 मेष मास, 13 अप्रेल से, 31 दिन। (वैशाखी से)
2 वृषभ मास, 14 मई से, 31 दिन।
3 मिथुन मास, 14 जून से, 32 दिन ।
4 कर्क मास, 16 जुलाई से, 31 दिन ।
5 सिंह मास, 16 अगस्त से,31  दिन ।
6 कन्या मास, 16 सितम्बर से, 31 दिन ।
7 तुला मास, 17 अक्टूबर से, 30 दिन ।
8 वृश्चिक मास, 16 नवम्बर से, 29  दिन ।
9 धनु मास, 15 दिसम्बर से, 30 दिन ।
10 मकर मास, 14 जनवरी से, 29 दिन ।
11 कुम्भ मास, 12 फरवरी से, 30 दिन ।
और 
12 मीन मास,14 मार्च से, 30 दिन ‌होते हैं।
लेकिन ये 71 वर्ष में अगले दिनांक से प्रारम्भ होने लगेगें।
मासावधि मन्दोच्च पर निर्भर है। अतः हर 1074 वर्ष में  31 दिन, 30 दिन या 29 दिन वाली मासावधि  एक माह पीछे वाले माह में चली जाती है।

आज भी पञ्जाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड में वैशाखी पर्व और विक्रम संवत प्रारम्भ दिवस के रूप में मनाते हैं। बङ्गाल, उड़ीसा, असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर त्रिपुरा, में भी इस दिन नव संवत्सर प्रारम्भ होने का पर्वोत्सव मनाते हैं। इसे विषु के नाम से जाना जाता है।
इसी प्रकार तमिलनाडु और केरल में भी यह दिवस नव संवत्सर के रूप में मनाया जाता है। इसे मेषादि के नाम से मनाते हैं। विषु भी कहते हैं। ऋतुओं से इस संवत का सम्बन्ध स्थिर नहीं रहता, इसलिए यह संवत ऋतु बद्ध नहीं है।
धनुर्मास और मीन मास को खर मास कहते हैं, इसमें संस्कार आदि शुभकार्य वर्जित होते हैं।

3 निरयन सौर चान्द्र शकाब्द —- 
दक्षिण भारत में सात वाहन वंश द्वारा शासित क्षेत्रों महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलङ्गाना, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत में कुषाण वंश द्वारा शासित या प्रभावित गुजरात, राजस्थान, उत्तरी मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में  विषु या नक्षत्रीय नव संवत्सर के पहले पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से प्रारम्भ होने वाला शकाब्द को चैत्रादि, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा या गुड़ी पड़वा के नाम से मनाया जाता है। लेकिन यह संवत भी ऋतुबद्ध नहीं है। इसमें पूर्णिमा के दिन जिस नक्षत्र पर या जिस नक्षत्र के आसपास चन्द्रमा होता है उस नक्षत्र के नाम के आधार पर निम्नलिखित माह होते हैं। ये प्रायः 29 या 30 दिन की अवधि के होते हैं। प्रत्येक 38 से 58 माह में चैत्र से कार्तिक मास के बीच एक अधिक मास पड़ता है।
इसलिए वह संवत्सर तेरह माह का होता है। इस अधिक मास को मल मास कहते हैं। इसमें संस्कार आदि शुभ कार्य नहीं होते हैं। और 19 वर्ष बाद, फिर 122 वर्ष बाद फिर 141 वर्ष बाद एक क्षय मास पड़ता है। लेकिन क्षय मास के एक-दो मास पहले और क्षय मास के बाद एक अधिक मास पड़ता है। इस कारण क्षय मास वाले संवत्सर में भी तेरह माह होते हैं।
मासारम्भ के दिनांक निम्नानुसार हैं।
सुचना ---
पुराणों में लिखा है कि, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की।
लेकिन जब चन्द्रमा की उत्पत्ति ही नहीं हुई थी। तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि होना सम्भव ही नहीं है।
1 चन्द्रमा भूमि का उपग्रह है। इसलिए पहले भूमि बनी तभी उसका उपग्रह चन्द्रमा बन पाया।
 चन्द्रमा की उत्पत्ति का वैज्ञानिक सिद्धान्त है कि, किसी ग्रह या उल्का के भूमि के टकराव से भूमि का एक टुकड़ा टूट कर भूमि की परिक्रमा करने लगा जो चन्द्रमा कहलाया, और भूमि पर उस स्थान पर प्रशान्त महासागर बन गया।
2 पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रमा 
(क) चन्द्रमा की उत्पत्ति मन से हुई।
(ख) चन्द्रमा की उत्पत्ति देवराज पुरन्दर इन्द्र और असुर राजा बलि के समय समुद्र मन्थन में हुई।
(ग) महर्षि अत्रि और अनुसुया का पुत्र चन्द्रमा हुआ।
तीनों सिद्धान्त यह मानते हैं कि, चन्द्रमा की उत्पत्ति सृष्टि उत्पत्ति के बहुत बाद में हुई।
तो चैत्र मास, शुक्ल पक्ष और प्रतिपदा तिथि भी चन्द्रमा की उत्पत्ति के बाद ही हो सकती है।


1 चैत्र, 14 मार्च से 12 अप्रैल के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से प्रारम्भ होता है।

2 वैशाख, 14 अप्रेल से 13 मई के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

3 ज्येष्ठ, 14 मई से 13 जून के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

4 आषाढ़, 14जन से 15 जुलाई के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

5 श्रावण,16 जुलाई से 15 अगस्त के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

6 भाद्रपद, 16 अगस्त से 15 सितम्बर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

7 आश्विन, 16 सितम्बर से 16 अक्टूबर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

8 कार्तिक, 17 अक्टूबर से 15 नवम्बर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

9 मार्गशीर्ष, 16 नवम्बर से 14 दिसम्बर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

10 पौष, 15 दिसम्बर से 13 जनवरी के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

11 माघ, 14 जनवरी से 11 फरवरी के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।
और
12 फाल्गुन 12 फरवरी से 13 मार्च के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से मास प्रारम्भ होता है।

वर्तमान में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा/ गुड़ी पड़वा निरयन सौर चान्द्र शकाब्द का प्रारम्भ दिन 14 मार्च से 14 अप्रैल के बीच पड़ता है। प्रत्येक 71 वर्ष में ये एक दिनांक बाद में आने लगता है।

4 सायन सौर चान्द्र संवत —- वसन्त विषुव अर्थात वसन्त सम्पात दिवस के पहले पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से प्रारम्भ होने वाला संवत है। इसे भी शकाब्द और विक्रम संवत दोनों से जोड़ा गया है। ग्रेटर नोएडा के आचार्य दार्शनेय लोकेश द्वारा रचित, सम्पादित और प्रकाशित श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम के माध्यम से इसे प्रचलित किया गया है। यह संवत्सर सायन संक्रान्तियो पर आधारित चान्द्रमास वाला पत्रक (केलेण्डर) है; जो, 18 फरवरी से 21 मार्च के बीच में प्रारम्भ होता है इसलिए यह संवत अधिकतम एक महीने के अन्तर से सदैव ऋतुबद्ध रहता है।
इस पत्रक (केलेण्डर) में भी माह  प्रायः 29 या 30 दिन की अवधि के होते हैं। प्रत्येक 38 से 58 माह में चैत्र से कार्तिक मास के बीच एक अधिक मास पड़ता है।
इसलिए वह संवत्सर तेरह माह का होता है। इस अधिक मास को मल मास कहते हैं। इसमें संस्कार आदि शुभ कार्य नहीं होते हैं। और 19 वर्ष बाद, फिर 122 वर्ष बाद फिर 141 वर्ष बाद एक क्षय मास पड़ता है। लेकिन क्षय मास के एक-दो मास पहले और क्षय मास के बाद एक अधिक मास पड़ता है। इस कारण क्षय मास वाले संवत्सर में भी तेरह माह होते हैं।
मासारम्भ के दिनांक निम्नानुसार हैं।

1 चैत्र, 19 फरवरी से 20 मार्च के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से मास प्रारम्भ होता है।

2 वैशाख, 21 मार्च से 20 अप्रैल के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

3 ज्येष्ठ, 21 अप्रेल से 21 मई के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

4 आषाढ़, 22 मई से 21 जून के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

5 श्रावण, 22 जन से 22 जुलाई के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

6 भाद्रपद, 23 जुलाई से 22 अगस्त के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

7 आश्विन, 22 अगस्त से 22 सितम्बर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

8 कार्तिक, 23 सितम्बर से 22 अक्टूबर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

9 मार्गशीर्ष, 23 अक्टूबर से 22 नवम्बर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

10 पौष, 22 नवम्बर से 21 दिसम्बर के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।

11 माघ, 22 दिसम्बर से 19 जनवरी के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से।
और
12 फाल्गुन, 20 जनवरी से 18 फरवरी के बीच पड़ने वाली अमावस्या समाप्ति से मास प्रारम्भ होता है।

चीनी केलेण्डर भी सायन सौर संस्कृत चान्द्र केलेण्डर है। जिसमें नव वर्ष सायन सौर संस्कृत चान्द्र माह के अनुसार सायन कुम्भ संक्रान्ति और सायन मीन संक्रान्ति के बीच पड़ने वाली अमावस्या के बाद से नववर्ष होता है। 

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