*धर्म -- मूलतः अहिन्सा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह अर्थात पञ्च यम की साधना ही आत्म साधन हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय ईश्वरार्पण सौद्देष्य निष्काम सामाजिक कर्तव्य निर्वहन कर्म प्रधान संस्कृति जिसे संक्षिप्त में यज्ञ कहा जाता है।*
* यज्ञ -- ईश्वरीय कार्यों में सहयोगार्थ वेदों में पञ्चमहायज्ञ की व्यवस्था है।*
*व्रत -- आत्म साधना हेतु सर्वप्रथम कृच्छ्र चांद्रायण व्रत किया जाता है।*
जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का मर्म भली-भांति समझ गया, जो पञ्च महायज्ञों का नियमित सेवन करता है और जिसने धर्म पालन पूर्वक ग्रहस्थ आश्रम में जिसने क्रच्छ चान्द्रायण व्रत पूर्वक समस्त यज्ञों का सम्पादन करते हुए व्यावहारिक जीवन जी लिया। जिसके समस्त सांसारिक कर्तव्य पूर्ण हो चुके वही व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम में गुरुकुल स्थापित कर आत्म साधना करते हुए नई पीढ़ी को धर्माचरण का शिक्षिण- प्रशिक्षण प्रदान करता है। साथ ही आवश्यकता पड़ने पर बड़े-बड़े यज्ञों में आचार्य का पद ग्रहण करते हैं।
समस्त वैदिक वैज्ञानिक अनुसंधान इन्हीं ऋषियों द्वारा किया गया। ब्राह्मण ग्रन्थ आदि समस्त वैदिक शास्त्र इन्हीं ऋषियों की रचना हैं। समस्त यज्ञ पूर्ण कर चुके धर्म तत्व के ऐसे मर्मज्ञ जब वानप्रस्थ के कर्तव्य पूर्ण हुआ जानकर सर्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान प्रारम्भ करते हैं। अर्थात यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद अन्तर्मुखी होकर धारणा - ध्यान और समाधि की अवस्था में देह के अन्दर की झलक देखते हैं। उस अवस्था में ही वे पुरुष सूक्त, नासदीय सुक्त और अस्यवामिय सुक्त और देवी सूक्त, श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त,और शुक्लयजुर्वेद का अध्याय ३१ (पुरुष सूक्त और उत्तर नारायण सूक्त ) तथा बत्तीसवां अध्याय (सर्वमेध यज्ञ) और चालिसवां अध्याय (ईशावास्य उपनिषद्) के दृष्टा होते हैं।एवम् कृष्ण यजुर्वेद संहिता का श्वेताश्वतरोपनिषद; केनोपनिषद, कठोपनिषद, प्रश्नोपनिषद, एतरेयोपनिषद, तैत्तरियोपनिषद, मण्डुकोपनिषद, माण्डुक्योपनिषद, छान्दोग्योपनिषद, वृहदारण्यकोपनिषद, मेत्रायणी उपनिषद, कौशितकी ब्राह्मणोपनिषद और इन ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों में किया गया है।
उक्त ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों के आधार पर रचित पुर्व मिमांसा दर्शन , उत्तर मिमांसा दर्शन (शारीरिक सुत्र) के अलावा सांख्य कारिकाएँ, कपिल का सांख्य दर्शन, पतञ्जली का योग दर्शन, अक्षपाद गोतम का न्याय दर्शन, कणाद का वैशेषिक दर्शन में किया गया है।
ऐसी ही अवस्था में वैदिक ऋषियों द्वारा पुरुष सूक्त, (यजुर्वेद का अध्याय ३१ उत्तर नारायण सूक्त सहित पुरुष सूक्त), नासदीय सूक्त और अस्यवामिय सूक्त और ,श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त,और देवी सूक्त और शुक्लयजुर्वेद का एकतीसवां और बत्तीसवां और चालिसवां अध्याय के दृष्टा होने के समय किया गया अनुभव शुक्ल यजुर्वेद के बत्तीसवां अध्याय (सर्वमेध यज्ञ) में उल्लेखित इसी अवस्था के अनुभवों का विवरण एवम् वर्णन सारांश में निम्नलिखित हैं।⤵️
२ पिण्ड (1) सुशुम्ना (2) पिङ्गला और (3) ईड़ा का संयुक्त संघात है। एटम के मुख्य भाग प्रोटॉन, न्रूटॉन और इलेक्ट्रॉन हैं; जिनका संघात एटम है। कोशिका के मुख्य भाग प्रोटोप्लाज्म, साइटोप्लास्म और एण्डोप्लाज्म है; जिनका संघात कोशिका है।
आगे का वर्णन अध्यात्म परक (देहान्तर्गत तत्व सम्बन्धित) ही किया जाएगा। ताकि अति विस्तार न हो। जहाँ-जहाँ आवश्यक होगा वहाँ-वहाँ ही भौतिक विज्ञान और मनोविज्ञान से जुड़े तथ्य लिखे जाएँगे।
३ सुशुम्ना (नाड़ी) कारण-शरीर (साध्यगण) से उत्पन्न हुई है।
सुशुम्ना के अधिदेवता दस विश्वैदेवगण (विश्वैदेवगणों के प्रमुख प्रचेताओं के पुत्र और सति के पिता, शंकरजी के श्वसुर दक्ष द्वितीय हैं।)
दस विश्वैदेवगण - [(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान हैं।
(2) पिङ्गला (नाड़ी) सुक्ष्मशरीर से हुई।
पिङ्गला के अधिदेवता शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं। जो देवताओं के पुरोहित होकर भी चुपके से असुरों को यज्ञभाग देते थे। इन्द्र नें जिनका वध किया था। ये वत्रासुर के अग्रज भाई थे।
(ईळा से ईड़ा तक के क्रम में।)
(3) ईड़ा (नाड़ी) लिङ्ग शरीर (यह्व) से हुई है।
ईड़ा के अधिदेवता एल भैरव ईला नामक रौद्री के पुत्र हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला या बुध के पुत्र एल पुरुरवा हैं)।
४ सर्वमेधयाजी ने कारण - शरीर को देखा और जाना कि, अथर्ववेद में वर्णित अष्टचक्र और हटयोग और तन्त्रमत के चार मुख्य चक्र और चार उप चक्र को जाना।
कारण शरीर के अधिदेवता के अधिदेवता द्वादश साध्यगण[ (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण )] हैं। अष्ट चक्रों के स्वरूप में जाने जानेवाला तत्व कारण शरीर है।
अथर्ववेद में वर्णित अष्टचक्र और हटयोग और तन्त्रमत के चार मुख्य चक्र और चार उप चक्र [(1) ब्रह्मरन्ध्र चक्र - आज्ञा चक्र, (2) अनाहत- विशुद्ध चक्र, (3) मणिपुरचक्र - स्वाधिस्ठानचक्र और (4) मूलाधार चक्र - कुण्डलिनी)] को देखा और जाना कि, चक्रों के अधिदेवता चौरासी सिद्धगण हैं ।
सुचना - हठ योग और तन्त्र में कुण्डलिनी को चक्र नाम नही दिया गया किन्तु अथर्ववेद में अष्ट चक्र और नौ द्वार का उल्लेख है। तथा चक्रों से सीधा सम्बन्ध कुण्डलिनी को उपचक्र के रूप में ही दर्शाता है।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, कारण-शरीर अधिदेव (अष्टादित्य) से उत्पन्न हुआ है।
सर्वमेधयाजी ने (2) सुक्ष्म शरीर को देखा ,जिसके अधिदेवता देवशिल्पी विश्वकर्मा प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र हैं।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, सुक्ष्म शरीर को संस्थान और तन्त्र के रूप में जानते हैं।[(1)मस्तिष्क - तन्त्रिका तन्त्र, (2) हृदय - श्वसन तन्त्र, (3) यकृत - पाचन तन्त्र और (4) लिङ्ग - जनन तन्त्र) के रूप में जानते है।] इन ग्रन्थियों / अङ्गो - तन्त्रों के अधिदेवता त्वष्टा (शुक्राचार्य के पुत्र) हैं।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, सुक्ष्म शरीर जिसके अधिदेवता प्रभास वसु और वरस्त्री है। अध्यात्म (द्वितीयअष्टवसु) से हुआ।
सर्वमेधयाजी ने (3) लिङ्ग शरीर को देखा । जिसके अधिदेवता यह्व ( महादेव) हैं।
ऋग्वेद में अग्नि को भी यह्व कहा है।(यह्व का मतलब महादेव है।) यह्व शब्द से ही यहुदियों के परमेश्वर यहोवा या याहवेह (शब्द) बना है।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, लिङ्गशरीर को हम अष्ट सिद्धि (चार मुख्य सिद्धि एवम चार उप सिद्धि) [(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) के रूप में जानते हैं। सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक हैं। [(1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र हैं] ये आठों पिशाच हैं और शिवगण हैं।)
(सुचना - ये अष्ट विनायक मूलतः पिशाच हैं। ये शुभकार्यों में विघ्नकर्ता ग्रह (ग्रसने वाले) हैं। तन्त्र में विनायक शान्ति प्रयोग द्वारा विघ्नबाधाएँ दूर करनें का विधान है। )
४ सर्वमेधयाजी ने जाना कि, लिङ्ग शरीर अधिभूत (अष्टमूर्ति एकादश रुद्र) से उत्पन्न हुआ।
५ सर्वमेधयाजी ने (1) अधिदेव को देखा। अधिदेव का देवता अष्टादित्य हैं जो कश्यप और अदिति के पुत्र हैं।[ (1) मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा)] हैं ।
अधिदेव को भौतिकि में दृष्य़ आकाश (Sky) और मनोविज्ञान में साक्षात या प्रत्यक्ष अनुभूति (कांशियस Councious) कहते है। (कृपया इसे चेतना न समझें। चेतना प्राण अर्थात देही को कहते हैं। आगे जिसका वर्णन भूतात्मा हिरण्यगर्भ में दिया गया है।)
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, अधिदेव को पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण [(1) उदान -देवदत्त, (2) व्यान - धनञ्जय, (3) प्राण - कृकल, (4) समान - नाग, (5) अपान -कुर्म)] के रूप में जाना जाता हैं। प्राण- उपप्राण के अधिदेवता द्वादश तुषितगण [(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ] के रूप में भी जाने जाते हैं।
५ अधिदेव (अष्टादित्य) सात्विक स्वभाव / स्वाहा भारती (मही) से उत्पन्न हुआ है।
सर्वमेधयाजी ने (2)अध्यात्म को देखा जिसके देवता दुसरे अष्ट वसु [(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु )] हैं। ये बाद में बतलाये जाने वाले अष्ट वसु से भिन्न हैं। इसे भौतिकि में समय (Time) या तथा मनोविज्ञान का आंशिक प्रकट या तन्द्रा (सब कांशियस Subcouncious) कहते है।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, अध्यात्म को पञ्चज्ञानेन्द्रिय तथा पञ्च कर्मेन्द्रिय [(१)श्रोत - वाक (कण्ठ) , (२) त्वक - हस्त , (३) चक्षु - पाद , (४) रसना - उपस्थ (शिश्न या भग) और (५) घ्राण - पायु (गुदा)] के रूप में जाना जाता हैं।
इन्द्रियों के अधिदेवता शक्तियों सहित उनचास मरुद्गण है।
उनचास मरुद्गणों में सात प्रमुख माने गये हैं
(1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है। इनके प्रत्येक के छः छः स्वरूप (या पुत्र) अर्थात बयालीस मिलाकर उनचास मरुद्गण हुए।
ये भी सुकर्मों के फलस्वरूप देवता श्रेणी में पदोन्नत हुए।अतः कर्मदेव कहलाते हैं।
अध्यात्म (दुसरे अष्टवसु) राजसी स्वभाव/ वषट सरस्वती से उत्पन्न हुआ है।
सर्वमेधयाजी ने कि, (3) अधिभूत को देखा। अधिभूत का देवता दुसरे एकादश रुद्र [(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध या मतान्तर] से अन्य नाम [(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।] हैं। जो बाद में बतलाये जाने वाले एकादश रुद्रों से भिन्न हैं। इसे भौतिकि में अन्तरिक्ष (Spece) और मनोविज्ञान में परोक्ष या सुप्त (अन् कांशियस Uncouncious) कहते हैं।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि अधिभूत को पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा [(1)आकाश -शब्द, (2) वायु - स्पर्ष, (3) अग्नि - रूप, (4) जल - रस और (5) भूमि - गन्ध ] के रूप में जाना जाता हैं। महा भूतों के अधिदेवता अनेकरुद्र हैं।
तन्मात्राओं का सम्बन्ध उर्जाओं से जोड़ा जा सकता है --[(1) शब्द -ध्वनि से, (2) स्पर्ष विद्युत से, (3) रूप प्रकाश से सीधे सम्बंधित हैं, (4) रस का सम्बन्ध भी पकानें के रूप में ऊष्मा से लगता है। किन्तु (5) गन्ध का ही सीधा सम्बन्ध चुम्बकत्व नही दिखता है लेकिन भूमि का सम्बन्ध गुरुत्वाकर्षण बल से है। जो चुम्बकीय प्रभाव वाला है।)]
अनेक रुद्र का स्वरूप (विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) (पाईला) और सीपी (युनियो), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र हैं।)
५ अधिभूत तामसी स्वभाव/ स्वधा/ ईळा से उत्पन्न हुआ है।
६ (क) सर्वमेधयाजी ने स्वभाव (स्व भाव) को देखा और जाना कि, स्वभाव की अधिदेवता मही है।
"शुचिर्देवेष्वर्पिता होत्रा मरुत्सु भारती। इळा सरस्वती मही बर्हिः सीदन्तु यज्ञिया: ॥" ऋग्वेद 01/142/09
इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः।। ऋग्वेद 01/13/09
स्व की शक्ति "स्वभाव" है। स्व के बिना स्वभाव का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।
"स्वभाव" का अधिदेवता मही देवी हैं। भूमि को भी मही कहा जाता है। भू देवी को वराह की पत्नी भी कहते हैं
स्व और स्वभाव तत्व भौतिकि के डार्क मेटर (Dark matter) और डार्क इनर्जी (Dark Energy) से भी मैल रखते हैं और भौतिकि की सिंग्युलरिटी (Singularity) और इनर्जी Energy से भी स्व और स्वभाव की तुलना कर सकते हैं। पर इसका अर्थ यह नही कि, ये यही भौतिक तत्व हैं।
सर्वमेधयाजी ने तीन प्रकारों में विभक्त स्वभाव को देखा और जाना कि,
"शुचिर्देवेष्वर्पिता होत्रा मरुत्सु भारती। इळा सरस्वती मही बर्हिः सीदन्तु यज्ञिया: ॥" ऋग्वेद 01/142/09
इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः।। ऋग्वेद 01/13/09
स्वभाव तीन स्वरूप में विभक्त हुआ है ---
(1) वैकारिक स्वभाव अर्थात स्वाहा (स्व का हनन या समर्पण)। स्वाहा का अधिदेवता भारती देवी हैं। यह भौतिकि विज्ञान की दृष्टि से यह आधिदैविक शक्ति कहाती है। मनोविज्ञान में इसे में सुपर ईगो कहते है।
(2) तेजस स्वभाव या वषटकार (मस्तिष्क सम्बन्धी/ वैचारिक) का अधिदेवता सरस्वती देवी है। भौतिकि में अध्यात्मिक शक्ति और मनोविज्ञान में यह ईगो कहाता है। येही मान्सिकता शक्ति (क्षमता) (willpower) है।
(3) भूतादिक स्वभाव अर्थात स्वधा (स्व को धारण करना है अर्थात स्वार्थ) का अधिदेवता ईळादेवी हैं। मनोवैज्ञानिक इड (Id) और भौतिकि की कास्मिक ईनर्जी (Cosmetic Energy) की तुलना स्वधा से कर सकते हैं।
६ (ख) सर्वमेधयाजी ने स्व को देखा और जाना कि,
स्व अङ्गुष्ठ तुल्य पुरुषाकृति है। मनसात्मा के लिए स्व देह के समान है।
मनसात्मा को सदसस्पति (सभापति) के रूप में जानते हैं। लोकसभा अध्यक्ष से इनकी तुलना हो सकती है।
मनसात्मा से "स्व" उत्पन्न हुआ था।
७ सर्वमेधयाजी ने मनसात्मा को देखा और जाना कि,
मनसात्मा अङ्गुष्ठ तुल्य,अङ्गुष्ठ आकर के हैं।
मनसात्मा को आधिदैविक दृष्टि से गणपति कहते हैं। गणपति की पत्नियाँ (शक्ति) ऋद्धि और सिद्धि कही जाती है। ये गणपति सूण्डधारी विनायक से भिन्न हैं।
इनकी तुलना समुदाय के अध्यक्ष या राष्ट्रपति से कर सकते हैं। अतः सोम राजा और वर्चा प्रथम गणपति रहे। या मतान्तर से स्वायम्भूव मनु और शतरूपा प्रथम गणपति रहे।
सुचना --- प्रमथ गणों के गणपति विनायक को गणाधिपति शंकर जी नें रुद्रगणों का गणपति पद पर नियुक्त किया । और निधिपति के पद पर कुबेर को नियुक्त किया जबकि, गणानान्त्वाम्ँ गणपति हवामहे वाले ये गणपति सभी गणों के अध्यक्ष हैं। निधिपति भी हैं, प्रियपति भी हैं अर्थात ये विनायक नही हो सकते।
मनसात्मा (गणपति) को मन और संकल्प के रूप में समझ सकते है। मन की संकल्प शक्ति के बराबर और विपरीत विकल्प शक्ति भी है। विकल्प भी सृष्टि संचालन में आवश्यक तत्व है। किन्तु विवेक (निश्चयात्मिका बुद्धि) के अभाव में संकल्प की दृढ़ता न होनें पर यही विकल्प पारसी धर्म का शैतान कहलाता है।
आधिदैविक दृष्टि से मन और संकल्प विकल्प का अधिदेवता अन्तरिक्ष में सप्तवीश नक्षत्र में मृगशीर्ष नक्षत्र का स्वामी सोम राजा या वैवस्वत मनु को जाना जाता है। सोम का वास मृगशीर्ष नक्षत्र में है। जैसे श्रोत्रियों/वैदिको के मुख्य देवता नारायण हैं ऐसे ही मिश्र के मुख्य देवता सोम हैं। पिरामिड मृगशीर्ष नक्षत्र की अनुकृति ही है। पिरामिड से मृगशीर्ष नक्षत्र सीधा दिखता है। ऐसा माना जाता है कि, अवेस्ता के होम मूलतः वैदिक देवता सोम ही हैं। सेमेटिक वंश सोमवंश भी कहलाता है। जबकि भूस्थानीय स्वायम्भूव मनु और शतरूपा (स्वायम्भूव मन्वन्तर के मनु) मन और संकल्प के अधिदेवता हैं।
मन उस कर्म के प्रति अपनें सङ्कल्प विकल्प तैयार कर अगली क्रियाओं के लिये मान्सिकता तैयार कर लेता है। जो रिफ्लेक्स के रूप में प्रकट होती है।
तब मस्तिष्क की तन्त्रिकाएँ कर्मेन्द्रियों को व्यवहार करनें के सिगनल दे देती है। लेकिन संकल्प चेहरे के हावभाव बदल देता है जिससे देखनें वालों को वह क्रिया कर्म के रूप में समझ आनें लगती है और देखने समझने वाले तदनुसार प्रतिक्रिया करते हैं।
मनसात्मा (गणपति), लिङ्गात्मा (पशुपति) से हुआ। मनसात्मा लिङ्गात्मा के लिए देह के समान है।
८ सर्वमेधयाजी ने लिङ्गात्मा को देखा। और जाना कि, लिङ्गात्मा के अधिदेवता पशुपति हैं।
लिङ्गात्मा भी अङ्गुष्ठ तुल्य,अङ्गुष्ठ आकर के हैं। लिङ्गात्मा को आधिदैविक दृष्टि से पशुपति के नाम से जाना जाता है। हिरण्यगर्भ के प्रथम मानस पुत्र एकरुद्र का तपस्या से जब उत्थान हुआ तब उन्हें पशुपति पद सोपा गया।
लिङ्गात्मा पशुपति को अहंकार और अस्मिता के रूप में समझा जा सकता है। इन्हे आधिदैविक दृष्टि से शंकर और उमा के रूप में जानते हैं; जिनने स्वयम् शक्तियों/ रौद्रियों सहित आदि एकादश रुद्र [(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर))] के रूप में प्रकट किया। ये अधिकांशतः कैलाश पर्वत से टर्की तक, और अफ्रीका महाद्वीप कै उत्तर पूर्व में फैले हुए थे।
(एकादश रुद्र भी कई प्रकार के हैं। इसलिए इन्हे आदि एकादश रुद्र लिखा है।)
अहङ्कार उसमें अहन्ता- ममत्व (मैं - मेरा) जोड़ कर क्रियाओं का स्वरूप में तो कोई परिवर्तन नही करता। किन्तु अहंकार क्रियाओं में अहन्ता - ममता (मैं-मेरा) जोड़कर क्रिया को कर्म में परिवर्तित कर देता है।
कर्म के हेतु, आशय और उद्देश्य के अनुरूप संस्कार बनकर चित्त के स्वरूप में विकृति उत्पन्न करता है। जिसका प्रभाव देही (प्राण) पर भी पड़ता है। जीव के जन्म मृत्यु का कारण ये कर्म ही होते हैं।
लिङ्गात्मा (पशुपति) ज्ञानात्मा (ब्रहस्पति) से हुआ। लिङ्गात्मा (पशुपति), ज्ञानात्मा (ब्रहस्पति) के लिए देह के समान है।
९ सर्वमेधयाजी ने ज्ञानात्मा को देखा। और जाना कि, ज्ञानात्मा अङ्गुष्ठ तुल्य,अङ्गुष्ठ आकर के हैं।
ज्ञानात्मा का अधिदेवता ब्रहस्पति है। ब्रहस्पति की तीन पत्नियाँ (शक्ति) है - १ शुभा, २ ममता और ३ तारा।
ज्ञानात्मा को बुद्धि और बोध या बुद्धि और मेधा के रूप में समझा जाता है। आधिदैविक दृष्टि से इन्हे शक्तियों सहित प्रथम अष्ट वसु [(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् )] के नाम से जाना जाता है।
वसुगण मूलतः प्रथम आदित्यों के सहचारी रहे लेकिन इनकी सन्तान सम्पूर्ण भारतवर्ष में फैल गई।
ज्ञानात्मा (ब्रहस्पति) विज्ञानात्मा (ब्रह्मणस्पति) से हुआ।
विज्ञानात्मा के लिए ज्ञानात्मा देह के समान है।
१० सर्वमेधयाजी ने विज्ञानात्मा को देखा। और जाना कि, विज्ञानात्मा सुक्ष्मातिसुक्ष्म होकर सम्पूर्ण देह में व्याप्त रहते हैं। विज्ञानात्मा का अधिदेवता ब्रह्मणस्पति हैं। ब्रह्मणस्पति की पत्नी (शक्ति) सुनृता है।
विज्ञानात्मा को चित्त और चेत या चित्त और वृत्तियों के रूमें समझा जा सकता है। चित्त में ही सारे संस्कार, प्रत्येक घटना अंकित रहती है। अन्तःकरण चतुष्ठय (चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन) का यह प्रथम तत्व है।
आधिदैविक दृष्टि से इन्हे इनकी शक्तियों सहित (प्रथम) द्वादश आदित्य (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) के नाम से जाना जाता है।
भूमि पर आदित्यों का वासस्थान कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, पश्चिम चीन और युक्रेन तक था। विवस्वान की सन्तान वैवस्वत मनु नें अयोध्या को राजधानी बनाया।
उपनिषदों का महत और सांख्य दर्शन का महत्तत्व (महत् तत्व) चित्त ही है। हृदयस्थ बुद्धि गुहा में अतिसुक्ष्म चित्त का निवास माना जाता है। किन्तु कुछ विज्ञानियों के अनुसार यह तत्व वैज्ञानिक दृष्टि से कोशिकाओं के केन्द्रक (Nucleus) में माना जाता है। क्योंकि, हृदय (Heart) नामक संस्थान केवल मानवादि विकसित जीवो में ही पाया जाता है। हृदय प्रत्यारोपण (Heart replacement) की स्थिति में अन्तःकरण चतुष्टय का क्या होगा? इस प्रश्न का कोई समाधान नही निकलता।
वस्तुतः ये सब तत्व वैशेषिक के परमाणु अर्थात इलेक्ट्रॉन,फोटॉन आदि मूल कणों का भी मूल परम अणु में स्थित हैं। क्योंकि, तथाकथित जड़ योनियों में भी ये समस्त तत्व होते हैं। मात्रात्मक अन्तर से सक्रीयता और चेतन्य दिखता है। किन्तु कम हो या ज्यादा हो पर होता सभी में है। अर्थात सभी में चित्त होता ही है ।
जबतक चित्त स्थिर है, चित्त में तरङ्ग नही उठ रही तब तक शरीर समाधिस्थ है।
जैसे ही तरङ्गे लहराने लगे/उठनें लगे शरीर जागृत कहलाता है।
तरङ्गे तो है, लेकिन ताल में है तो तन्द्रावस्था।
तरङ्गे बहूत मन्द मन्द हैं तो निन्द्रा /सुषुप्ति अवस्था।
यदि तरङ्गे बे तरतीब हो तो अशान्त चित्त होता है। विक्षिप्त कहलाता है।
१० विज्ञानात्मा (ब्रह्मणस्पति) अणुरात्मा से हुआ।
११ सर्वमेधयाजी ने अणुरात्मा को देखा और जाना कि, अणुरात्मा परमाणु तुल्य, परम अणु आकार हैं। आयु एक मन्वन्तर (तीस करोड़, सड़सठ लाख, बीस हजार वर्ष) है।
अणुरात्मा के अधिदेवता वाचस्पति हैं। वाचस्पति की पत्नी (शक्ति) वाक कहलाती है। वाक वाणी से भिन्न तत्व है। वाचस्पति आजानज देव (जन्मजात देवता) हैं। इन्हें "ख" भी कहते हैं।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, अणुरात्मा वाचस्पति को तेज और विद्युत के रूप में समझते हैं। तेज भी अभिकरण है।
जबतक शरीर में तेज-विद्युत है तबतक शरीर सक्रिय रहता है।
कुछ विज्ञानियों के अनुसार यह तत्व वैज्ञानिक दृष्टि से कोशिकाओं के केन्द्रक में माइक्रोकोंण्ड्रिया में माना जा सकता है। किन्तु यह मत विश्वसनीय नही है।
तेज- विद्युत के कारण शरीर सक्रिय रहता है। तेज मतलब शरीर की उर्जा। तन्त्रिकाओं में दोड़ने वाले रासायनिक सिगनल भी इसी तेज - विद्युत पर आधारित है।
अणुरात्मा (वाचस्पति) में सुत्रात्मा (प्रजापति) नें स्वयम् को प्रकट किया।
१२ सर्वमेधयाजी ने सुत्रात्मा को देखा और जाना कि, सुत्रात्मा अभिकरण है। सुत्रात्मा प्रथम जीव वैज्ञानिक तत्व हैं। विशाल अण्डाकार हैं। लेकिन शीर्ष चपटे हैं।
सुत्रात्मा को आधिदैविक रूप से प्रजापति कहते हैं। क्योंकि ये जैविक सृष्टि के रचियता हैं। प्रजापति की पत्नी (शक्ति) सरस्वती कहलाती है। प्रजापति भी अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं।
प्रजापति विश्वरूप (अर्थात ब्रह्माण्ड स्वरूप) हैं। इनकी आयु एक कल्प (चार अरब, बत्तीस करोड़, वर्ष) है। प्रजापति देवताओं में सबसे वरिष्ठ होने से पितामह और महादेव कहलाते हैं।
सुचना --- सुत्रात्मा प्रजापति विशाल अण्डाकार हैं। लेकिन शीर्ष चपटे होने के कारण चतुर्मुख कहलाते हैं।
इसलिए पुराणों में कथा है कि, पहले ब्रह्मा के पाँच मुख थे उन्हीं से उत्पन्न रुद्र ने उनका एक सिर काट दिया तो उनके चार सिर रह गये। जबकि हिरण्यगर्भ दीर्घ गोलाकार या लगभग अण्डाकार है इसलिए पञ्चमुखी कहे गए हैं और प्रजापति भी अण्डाकार हैं लेकिन शिर्ष चपटा होने से चतुर्मुखी कहे गए हैं।
ये देवताओं में सबसे वरिष्ठ होने से पितामह और महादेव कहलाते हैं। लेकिन शैवमत में एकरुद्र प्रजापति से पहले उत्पन्न होने के कारण महादेव मानेगये। (बादमें पुराणों में शंकरजी को महादेव कहने लगे।)
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, सुत्रात्मा प्रजापति को समझने की दृष्टि से ओज और आभा (Ora) या रेतधा और स्वधा कहा जाता है।
ओज अभिकरण है। (दुसरा अभिकरण तेज है।)
बुद्धि केवल नापतोल आदि मापन का विश्लेषण कर चित्त को सुचनाएँ देती है। चित्त जब संस्कार रूप तदाकार वृत्ति से तुलना कर निर्णय करता है कि, यह क्या पदार्थ या वस्तु है। तब, तदानुसार ओज निर्णय करता है कि, इसके प्रति क्या प्रतिक्रिया देना है और कार्यादेश का सिगनल तेज को भेजदेता है।
ओज और आभा को आधिदैविक दृष्टि से इन्हें मुख्यरूप से तीन प्रजापतियों की जोड़ी बतलाया गया है।
(1) दक्ष प्रजापति (प्रथम)-प्रसुति, (2) रुचि प्रजापति-आकुति और (3) कर्दम प्रजापति-देवहूति।
प्रसुति, आकुति और देवहूति भी ब्रह्मा की मानस सन्तान है किन्तु इन्हे स्वायम्भुव मनु-शतरूपा की पुत्री भी कहा जाता है।
सुत्रात्मा (प्रजापति) के स्वरूप में भूतात्मा (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा) ने स्वयम् को प्रकट किया।
प्रजापति के ब्रह्मज्ञानी शिष्य इन्द्र-शचि देवेन्द्र और देवराज हैं। इन्द्र के अधीन (द्वादश) आदित्य गण, (अष्ट) वसुगण, (एकादश) रुद्रगण हैं।
(1) प्रजापति, (2) इन्द्र, (3 से 14 तक) द्वादश आदित्य, (15 से 22 तक) अष्ट वसु तथा (23 से 33 तक) एकादश रुद्र मिलकर तैंतीस देवता कहलाते हैं। कुछ लोग इन्द्रसभा में प्रजापति और इन्द्र के स्थान पर (1) दस्र और (2) नासत्य नामक अश्विनीकुमारों को रखकर इन्द्रसभा के तैंतीस देवता मानते हैं।
(1) प्रजापति अजयन्त देव हैं और इन्द्र आजानज देव है। और शेष इकतीस देवता वैराज देव हैं।
(2) अग्नि-स्वधा - द्यु स्थानी देवता होते हुए भी स्वः में सूर्य, भूवः में विद्युत (तड़ित) और भूः में सप्तज्वालामय अग्नि के रूप में प्रकट होने वाले स्वर्ग अन्तरिक्ष और भू लोक में व्याप्त है।
(3) सप्त पितरः अन्तरिक्ष स्थानी देवता हैं।-
(1) अर्यमा पितरों के प्रमुख हैं। अर्यमा आदित्य भी हैं।
(2) अनल कहीँ-कहीँ अग्निक नाम भी आता है। अनल /अग्नि वसु भी हैं। और त्रिलोकी में व्यापक हैं।
(3) सोम का वास मृगशीर्ष नक्षत्र में है। ये वसु भी हैं।
(4) यम (यम मनु पुत्र होकर मानवों में प्रथम मरने वाले, मृत्यु के स्वामी के रूप में नियुक्त हैं।)
(1) अर्यमा, (2) अनल, (3) सोम और (4) यम ये चारों साकार पितरः हैं। इनके अलावा ये तीन निराकार पितर हैं।
(5) अग्निष्वात कहीँ-कहीँ अग्निष्वाताः और कहीँ-कहीँ साग्निक नाम भी आता है,
(6) बहिर्षद और
(7) कव्यवाह ये तीनों निराकार हैं।
(4) सोम राजा - वर्चा या स्वायम्भुव मनु- शतरूपा भूलोक के इन्द्र ही हैं, इन्द्र के साथ ही उत्पन्न होते और इन्द्र के साथ ही लय भी होते हैं तथा भूस्थानी प्रजापति भी हैं। स्वायम्भूव मनु की सन्तान मनुर्भरत (राजन्य / क्षत्रिय) कहलाती है। इनका राज्यक्षेत्र यों तो समुचि भूमि ही थी। लेकिन इनका वासस्थान या राजधानी क्षेत्र पञ्जाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल, जम्मू, कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, सिन्ध, बलुचिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान तक था ।
१३ सर्वमेधयाजी ने भूतात्मा को देखा और जाना कि, भूतात्मा , अधिभूत है, भूतात्मा प्रथम अनुभव गम्य तत्व हैं।
(सुचना --- कास्मिक सूप से तुलना करें।)
भूतात्मा हिरण्यगर्भ अति विशाल आकार, दीर्घगोलाकार (लगभग अण्डाकार होने से पञ्चमुखी कहलाते हैं।)
भूतात्मा के अधिदेवता हिरण्यगर्भ हैं। भूतात्मा हिरण्यगर्भ की आयु दो परार्ध (इकतीस नील,दस खरब, चालिस अरब वर्ष) है।
हिरण्यगर्भ की पत्नी (शक्ति) वाणी कहलाती है। पुरुषसूक्त के विश्वकर्मा हिरण्यगर्भ ही हैं। हिरण्यगर्भ अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं। ये महादिक हैं। इन्हे "क" भी कहते हैं।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, भूतात्मा हिरण्यगर्भ को प्राण और धारयित्व अथवा चेतना और धृति अथवा देही और अवस्था के रूप में जाना जाता है। प्राण भी अधिकरण है।
आधिदैविक दृष्टि से इन्हें त्वष्टा और रचना कहते हैं। त्वष्टा भी अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं। ये ईश्वरीय सत्ता मे मात्र ईश्वर ही कहे जाते हैं। ये भौतिक जगत के रचियता हैं। ऋग्वेद के अनुसार त्वष्टा नें ब्रहाण्ड के गोलों को सुतार की भाँति घड़ा।
जो बालक, कुमार, किशोर, युवा, अधेड़ वृद्धावस्था में परिवर्तनशील दिखता है वह प्राण ही देही और शरीरी कहलाता है। शरीर से प्राण (देही) निकल जाने पर वापसी भी सम्भव है। जबतक शरीर में प्राण है तभी तक आन्तरिक शारिरीक क्रियाएँ चलती है। शरीर में संज्ञान रहता है, शरीर सचेष्ट रहता है।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान (1) त्वष्टा-रचना के अलावा (2) सनक, (3) सनन्दन, (4) सनत्कुमार और (5) सनातन तथा (6) नारद , (7) प्रजापति, और (8) एकरुद्र हैं।
सुचना - इन अर्धनारीश्वर एकरुद्र ने ही कालान्तर में स्वयम् को नर और नारी स्वरूपों में अलग-अलग विभाजित कर शंकर और उमा के स्वरूप में प्रकट किया। बादमें शंकर ने स्वयम् को दश रुद्रों के रूप में प्रकट किया और उमा भी दश रौद्रियों के स्वरूप में प्रकट हुई। ये सब एकादश रुद्र कहलाये। अतःएव एकरुद्र भी प्रजापति आदि के तुल्य हैं और शंकरजी, दक्ष (प्रथम), रुचि और कर्दम आदि प्रजापतियों के तुल्य हुए। एवम् शेष दश रुद्र तो प्रजापति की सन्तानों (मरीचि, भृगु आदि) के तुल्य हुए।
सुचना --- हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के इन मानस पुत्रों के अलावा ग्यारह मानस पुत्र और भी हैं। जिनमें से दो देवस्थानी प्रजापति (1) इन्द्र - शचि और (2) अग्नि - स्वाहा एवम् एक (3) देवर्षि नारद मुनि हैं अविवाहित होने से प्रजापति नहीं हैं।
प्रजापति से उत्पन्न आठ भूस्थानी प्रजापति ये हैं (4) मरीची-सम्भूति, (5) भृगु-ख्याति, (6) अङ्गिरा-स्मृति, (7) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (8) अत्रि-अनसुया, (9) पुलह-क्षमा, (10) पुलस्य-प्रीति, (11) कृतु-सन्तति। ये सभी ब्रह्मर्षि भूस्थानी प्रजापति हुए। और इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और उनकी पत्नी प्रसुति की पुत्रियाँ थी। इन ब्रह्मर्षियों का वासस्थान ब्रह्मर्षि देश कहलाता है। (ब्रह्मर्षि देश यानी हरियाणा में गोड़ देश अर्थात कुरुक्षेत्र के आसपास का क्षेत्र मालवा प्रान्त) एवम इनकी सन्तान ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण हुए।
इन्द्र - शचि और अग्नि - स्वाहा और नारद जी के अलावा निम्नलिखित स्वर्गस्थानी देवगण हुए
(12) रुद्र- रौद्री (शंकर - सति पार्वती) - रुद्र मूलतः अन्तरिक्ष स्थानी देवता है लेकिन भूलोक में हिमालय में शंकरजी कैलाश वासी भी हैं।
(13) धर्म - और उनकी तेरह पत्नियाँ । (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) ये देवस्थानी प्रजापति हैं। इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और प्रसुति की कन्याएँ थी । धर्म द्युलोक का अर्थात स्वर्गस्थानी देवता है। लेकिन भूमि पर कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहाजाता है। इनके अलावा (14) पितरः - स्वधा अन्तरिक्ष स्थानी प्रजापति हुए। पितरः ने स्वयम् सप्त पितरों और उनकी शक्ति (पत्नी) को में प्रकट किया। जिनमें से (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद बाल ब्रह्मचारी ही रहे। अतः प्रजापति के स्थान पर मुनि और देवर्षि ही कहे जाते हैं।
१३ भूतात्मा (हिरण्यगर्भ) के स्वरूप में जीवात्मा अपरब्रह्म ने स्वयम् को प्रकट किया।
१४ सर्वमेधयाजी ने जीवात्मा को देखा और जाना कि, जीवात्माअधिकरण है। जीवात्मा स्वभाव (स्व भाव) हैं, अध्यात्म हैं, यही महाकाल है। जीवात्मा प्रथम साकार तत्व, महा तरङ्गाकार हैं, जीवात्मा प्रकृति जनित गुणों का भोक्ता होने से गुण सङ्गानुसार योनि में जन्मते हैं। जीवात्मा क्षर हैं। पुरुष सूक्त में उल्लेखित विराट यही है।
जीवात्मा को आधिदैविक दृष्टि से अपर ब्रह्म कहते हैं। जीवात्मा अपरब्रह्म वेद वक्ता हैं
जीवात्मा अपरब्रह्म को अपर पुरुष जीव और आयु त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति के रूप में जाना जाता है। जीव अधिकरण है। (दुसरा अधिकरण प्राण अर्थात चेतना अर्थात देही है।)
जीव और आयु को आधिदैविक दृष्टि से नारायण और नारायणी कहते हैं। ये जिष्णु भी कहलाते हैं मतलब स्वाभाविक विजेता या अजेय भी कहते हैं। ये अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं। ये जगदीश्वर कहे जाते हैं इनको शिशुमार चक्र (उर्सा माइनर) में क्षीर सागर में स्थित बतलाया जाता है। ध्यान मन्त्रों के आधार पर चित्रों में नारायण और नारायणी एक ही कमल पर विराजित बतलाते हैं।
जिसकी आयु निश्चित है वह जीव। जिसके देह त्याग पर शरीर की मृत्यु हो जाती है। निर्धारित आयु जीव की ही विशेषता है। मानव आयु की गणना समय में करता है जबकि प्रकृति आयु गणना श्वाँसों की संख्या में करती है। इसी कारण प्राणायाम के फलस्वरूप धृति वृद्धि (प्राण की धारण करने की शक्ति में वृद्धि) होनें से व्यक्ति दीर्घायु (चिरञ्जीवी) हो जाता है। मृत्यु के तत्काल बाद या तो उर्ध्व लोकों मे या अधो लोकों मे या भूमि पर ही नवीन योनि धारण कर लेता है। यात्रा में अधिकतम बारह दिन लग सकते हैं या अधिकतम दस दिनों तक तक जीव मृतदेह के आसपास रह सकता है और बारह दिन तक भूमि पर रह सकता है। इसलिए रुचि प्रजापति और महर्षि भरद्वाज आदि ने मृत्यु उपरान्त दस दिन का अशोच और बारह दिनों तक श्राद्ध कर्म का नियम बनाए।
१४ जीवात्मा (अपरब्रह्म) के रूप में प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म ने स्वयम् को प्रकट किया
१५ सर्वमेधयाजी ने प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को देखा और जाना कि, प्रत्यगात्मा अधिष्ठान है।
प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को आधिदैविक दृष्टि से ब्रह्म कहते हैं। प्रत्यगात्मा (ब्रह्म) विधाता है, ये ही महा-आकाश है। ये अधिदेव हैं, क्षेत्र हैं। प्रत्यगात्मा ब्रह्म प्रथम सगुण तत्व होने से सर्वगुण सम्पन्न हैं, कालातीत हैं, दृष्टा हैं।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, प्रत्यगात्मा ब्रह्म को पुरुष और प्रकृति के स्वरूप में जानते हैं। पुरुष अधिष्ठान है। इन्हें आधिदैविक दृष्टि से सवितृ और सावित्री कहते हैं। लोक में इन्हें श्रीहरि प्रभविष्णु कहते हैं। और कमलासना श्री लक्ष्मी इनकी शक्ति है। ध्यान मन्त्रों के आधार पर इन्हे कमल के अलग-अलग आसन पर विराजित बतलानें की परम्परा है। जबकि कहीं कहीं श्रीहरि लेटे हुए और श्री देवी चँवर डुलाते और लक्ष्मी देवी चरण सेवा करते दिखाया जाता है।
श्रीहरि प्रभविष्णु अजयन्त देव (जन्मजात देवता) हैं। ये महेश्वर कहे जाते हैं।
सुचना - गुण- धर्म, सत्ता, साख, स्थाई सम्पत्ति, भूमि श्री का क्षेत्र है और चल सम्पत्ति रत्न, स्वर्ण, नगदी लक्ष्मी का क्षेत्र है।
व्यक्तिगत स्वरूप प्रत्यगात्मा यानी अन्तरात्मा।
सर्वमेधयाजी ने जाना कि, प्रत्यगात्मा में (जीवभाव के बजाय) केवल प्रज्ञात्म भाव ही रहे तो प्रत्यगात्मा सद्योमुक्त अवस्था में ही आयु पर्यन्त रहते हुए सद्यो मुक्त ही देह त्यागता है। देह धारण कर आयु समाप्त होने पर जीवादि तत्व अपनें कारण प्रत्गात्मा में लय होजाते है। और प्रत्यगात्मा भी अपनें कारण प्रज्ञात्मा में लीन हो जाता है। अतः पूनर्जन्म की परम्परा का लोप हो जाता है।
किन्तु प्रत्गात्मा का झुकाव यदि जीव की ओर हो जाता है तो संचित कर्मों में से कर्म फल भोग हेतु प्रारब्ध का उदय होकर नवीन योनि में जन्म लेना पड़ता है।
विज्ञान की दृष्टि से समझने हेतु उदाहरण है कि, जैसे क्वाण्टा कण और तरङ्ग दोनों व्यवहार करता है। तरङ्ग रूप में रहे तो जीवन-मुक्त है और कण रूप में रहने पर पुनर्जन्म होता है।
१५ सृष्टिकर्म को आगे बड़ने के क्रम में प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) के रूप में प्रज्ञात्मा परब्रह्म ने स्वयम् को प्रकट किया।
१६ सर्वमेधयाजी नें प्रज्ञात्मा को देखा और जाना कि, प्रज्ञात्मा ही शरीरस्थ आत्म तत्व (वास्तविक मैं) है, अधियज्ञ है, सनातन अक्षर है, कुटस्थ है, परम गति है, निर्गुण है, सर्वव्यापी हैं अतः निराकार है, क्षेत्रज्ञ है।
प्रज्ञात्मा को आधिदैविक दृष्टि से परब्रह्म कहते हैं ।
प्रज्ञात्मा परब्रह्म स्वरूप को परम पुरुष और पराप्रकृति के रूप मे जानते/ समझते हैं। आधिदैविक वचनों में परम पुरुष और परा प्रकृति को ही दिव्य पुरुष विष्णु और माया कहते हैं। ये परमेश्वर हैं। ऋग्वेद और एतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में विष्णु को परम पद कहा है। और कहा है कि, देवता भी विष्णु परम पद को देखते रहते हैं।
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ ऋग्वेद 1/22/20
विष्णु लिङ्ग अर्थात विष्णु का प्रतीक चिह्न शालिग्राम शिला है।
विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । ऋग्वेदोक्त 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।) तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।
"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥" ऋग्वेद 01/155/06
यही काल है। (पहले बतलाया जा चुका है कि जीवात्मा अपरब्रह्म को महाकाल कहते हैं। वे यही नियति चक्र हैं।)
सभी तत्वों के कर्म ऋत के अनुसार निर्धारित हैं। वे क्रमानुसार अपने कर्म में प्रवृत्त होते रहते हैं।
प्रज्ञात्मा तो विश्वात्मा में लीन रहती ही है। दृष्टाभाव से प्रत्यगात्मा के साथ रहते हुए भी असङ्ग ही रहती है।
१६ प्रज्ञात्मा परब्रह्म के स्वरूप में विश्वात्मा ॐ ने स्वयम् को प्रकट किया।
१७ सर्वमेधयाजी ने विश्वात्मा को देखा और जाना कि, परमात्मा में सृष्टि का संकल्प हुआ जो विश्वात्मा है। जो ॐ कहलाता है। विश्वात्मा ॐ के बारे में भी कितना ही विचार किया जाए, व्यक्त किया जाए, कहा जाए सब अपूर्ण ही है। नेति-नेति।
१७ परमात्मा में सृष्टि का ॐ संकल्प हुआ जो विश्वात्मा है। जो ॐ कहलाता है।
१८ अन्त में सर्वमेधयाजी ने अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मा को देखा और जाना। सर्वप्रथम केवल परमात्मा ही था। परमात्मा ने ही अपने आप को ही सृष्टि के रूप में सृजित किया।
जो सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ सोचा जा रहा है, व्यक्त किया जा रहा है, व्यक्त नहीं हो पा रहा है, दृष्य है-अदृष्य है, दृष्ट है-अदृष्ट है, हुआ है, हो चुका है, हो रहा है, होगा, सबकुछ परमात्मा ही है। अतः उसके बारे में न कुछ सोचा जा सकता है, न अभिव्यक्ति की जा सकती है, न कुछ किया जा सकता है। इस कारण वेदों में न इति, न इति अर्थात नेति-नेति कहते हैं।
इस प्रकार सर्वमेध यज्ञ पूर्ण हुआ। और सर्वमेधयाजी आत्मस्वरुप में स्थित हो सद्योमुक्त (सदेह मुक्त) होगये।
ॐ तत् सत्। ॐ तत् सत्। ॐ तत् सत्।
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