प्रजापति की के पुत्र दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति भूमि पर प्रजापति हुए। और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भूमि के शासक हुए। लेकिन स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भी दक्ष प्रजापति (प्रथम) के द्वारा स्थापित धर्म व्यवस्था के परिपालक थे। दक्ष (प्रथम) द्वारा निर्धारित धर्म व्यवस्था के अनुरूप स्वायम्भुव मनु ने मानव धर्म शास्त्र के नाम से भूमि के लिए विधान लागू किया।
दक्ष (प्रथम) द्वारा निर्धारित धर्म व्यवस्था के अनुसार वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाला संवत्सर लागु किया। जो कल्प संवत, सृष्टि संवत और युग संवत के नाम से प्रचलित हुआ। स्वायम्भुव मनु ने इसी सायन सौर युग संवत को लागू किया।
भूमध्य रेखा पर दो सूर्योदय के बीच की औसत अवधि सावन दिन कहलाती है। यह अवधि तीस मुहूर्त अर्थात साठ घटि यानी 24 घण्टे होती है।
वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाला सायन सौर वर्ष 365.24219 सावन दिन का होता है।
इस सायन सौर वर्ष में ही उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु, तथा दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती है।
सूर्य की उत्तर परम क्रान्ति से उत्तर तोयन और दक्षिण परम क्रान्ति से दक्षिण तोयन होता है।
वसन्त ऋतु में मधु-माधव मास, ग्रीष्म ऋतु में शुक्र- शचि मास, वर्षा ऋतु में नभः, नभस्य मास, शरद ऋतु में ईष-उर्ज मास, हेमन्त ऋतु में सहस् - सहस्य मास, और शिशिर ऋतु में तपः, तपस्त मास होते हैं।
उक्त बारह मास क्रान्तिवृत को तीस-तीस अंशों के बारह प्रधेय से सम्बन्धित हैं।
मास के तीस अंश या सायन सूर्य की संक्रान्ति से गत दिवस में दर्शाया जा सकता है। या मधु माधवादि सौर मास और चन्द्रमा की नक्षत्र में स्थिति से भी दर्शाया जाता है। वाल्मीकि रामायण में यह उल्लेख मिलता है। वर्तमान में दक्षिण भारत में निरयन सौर मास और चन्द्रमा को 13°20' के नक्षत्रों से दर्शाते हैं। जैसे निरयन सिंह के सूर्य में रोहिणी नक्षत्र के दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और श्रवण नक्षत्र के दिन वामन जयन्ती ओणम मनाते हैं।
प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीची की पत्नी सम्भूति से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ। दक्ष की पुत्री अदिति से महर्षि कश्यप के पुत्र आदित्य हुए। विवस्वान आदित्य के पुत्र श्राद्ध देव जो सप्तम मन्वन्तर के वैवस्वत मनु कहलाये। इन्हीं श्राद्ध देव के समय जल प्रलय हुआ था। जल प्रलय से जीवों , जन्तुओं और वनस्पतियों की जिन -जिन प्रजातियों को बचा लिया गया उन्ही से सप्तम मन्वन्तर प्रारम्भ हुआ।
श्राद्ध देव की पत्नी श्रद्धा को भी शतरुपा कहा जाने लगा। इन्हीं वैवस्वत मनु की सन्तान सूर्य वंशी हुए। सूर्यवंशियों में कौशिक वंश में उत्पन्न राजा विश्वावसु महर्षि वशिष्ठ से पराजित होकर घोर तपस्या करने और महर्षि वशिष्ठ के मुख से अपने तप की प्रशंसा सूनकर से अन्तःकरण शुद्ध होने से ब्राह्मण हो गये। और विश्वामित्र कहलाये।
तपस्या के समय महर्षि विश्वामित्र ने नक्षत्रिय पद्धति की खोज की। नक्षत्रिय पद्धति में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत के मध्य में अर्थात 180 अंश पर माना जाता है। तदनुसार चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र का आदि बिन्दु माना जाता है।
यही नक्षत्रिय पद्धति आचार्य वराहमिहिर के समय निरयन पद्धति कहलाई। निरयन पद्धति में अश्विन्यादि बिन्दु को निरयन मेषादि बिन्दु कहते हैं। पश्चिम टर्की, मिश्र और इराक के बेबीलोन में प्रचलित मेष- वृषभादि राशियों को नक्षत्रिय पद्धति में समायोजित करने का कार्य भी आचार्य वराहमिहिर के समय हुआ।
जब सूर्य के केन्द्र से भू केन्द्र चित्रा तारे के सामने होता है उसी समय सापेक्ष से भू केन्द्र से सूर्य का केन्द्र चित्रा तारे से 180° पर दिखता है।जब सूर्य चित्रा तारे से 180° पर होता है ठीक इसी समय नक्षत्रिय सौर वर्ष प्रारम्भ होता है।
नक्षत्रिय सौर वर्ष के प्रारम्भ को निरयन सौर नव वर्ष भी कहते हैं। भारत के मध्य भाग जिसमें शकों-कुषाणों और सातवाहन राजाओं का शासन रहा था उतने भाग को छोड़कर शेष भारत और नेपाल में नक्षत्रिय सौर संवत ही प्रचलित है।
पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में निरयन मेष संक्रमण से विक्रम संवत का प्रारम्भ वैशाखी नाम से किया जाता है।
बङ्गाल, त्रिपुरा और बाङ्ग्लादेश मे निरयन मेष संक्रमण से बोंगलाब्द / बांग्ला सोन (बाङ्ला संवत) पोहेला बोइशाख (पहला वैशाख) से नोबो बोर्शो (नव वर्ष) प्रारम्भ करते हैं ।
और उड़ीसा मे निरयन मेष संक्रमण से ओडिशा संवत *अनला संवत* नाम से प्रारम्भ होता है। यह ओडिशा का अनला संवत 1176 ईस्वी से प्रारम्भ हुआ।
असम में निरयन मेष संक्रमण से बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
असम के समान ही भूटान, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम और मेघालय में भी निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
तमिल नाडु और पुडुचेरी में निरयन मेष संक्रमण से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।
केरल में निरयन मेष संक्रमण से विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।
इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।
ऋग्वेद में पवित्रादि चौबीस पक्षों का उल्लेख है। लेकिन वेदों में तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।
प्रजापति के मानस पुत्र (महाराष्ट्र के नासिक में निवास करने वाले) महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसुया (दक्ष पुत्री) से तीन पुत्र 1 सोम (चन्द्रमा), 2 तन्त्र गुरु दत्तात्रेय और 3 महाक्रोधी मुनि दुर्वासा हुए।
चन्द्रमा ने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण कर लिया। बृहस्पति की पत्नी तारा से चन्द्रमा के पुत्र बुध हुए।
प्रजापति के मानस पुत्र महर्षि मरीचि की पत्नी सम्भूति से महर्षि कश्यप हुए। दक्ष पुत्री अदिति से महर्षि कश्यप के पुत्र आदित्य हुए। आदित्य विवस्वान से श्राद्ध देव हुए जो सप्तम मन्वन्तर अर्थात वैवस्वत मन्वन्तर के मनु कहलाये।
श्राद्ध देव के समय ही महा जल प्रलय हुआ था। महामत्स्य की सहायता से श्राद्ध देव जन्तु-वनस्पतियों की जितनी प्रजातियाँ नौका में समेट पाये उन्ही से सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चला।
वैवस्वत मनु के पुत्र सुद्युम्न हुए। जो शंकर-पार्वती के शाप से स्त्री हो जाया करते थे। पुरुष रूप मे वे इल कहलाते थे और स्त्री रूप में इला कहलाते थे।
वैवस्वत मनु की पुत्री इला से बुध के पुत्र एल पुरुरवा हुए। कैलाश शिखर के पूर्व में इन्द्र की राजधानी अमरावती में इन्द्र की नर्तकी इराक के उर नगर वासी उर्वशी अप्सरा से एल पुरुरवा ने अल्प कालिन सशर्त संविदा विवाह (मुताह विवाह) किया। गर्भवती होने पर उर्वशी इराक के नगर उर में अपने मायके चली गई। एल पुरुरवा के पुत्र आयु को जन्म दे कर स्तनपान की अवधि पूर्ण होने पर उर्वशी आयु को लेकर एल पुरुरवा को सोप कर इन्द्र सभा में लौट गई।
आयु का लालन-पालन अकेले एल पुरुरवा ने एल पुरुरवा ने आयु को दक्षिण-पूर्व टर्की के तोरोत पर्वत के दक्षिण पूर्व में दजला (टाइग्रिस),फरात (युफ्रेटिस, हिद्दिकेत और पीशोन (गीहोन) ये चार नदियोंके उद्गम युफ्रेटस घाटी में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था। फिर हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका और असम के राजा विप्रचित्ति के पुत्र स्वर्भानु (राहु) की पुत्री प्रभा को आयु के मनोरञ्जन के लिए आयु के साथ रख दिया। समय-समय पर एल पुरुरवा आयु और प्रभा से मिलने आता रहता था। एल पुरुरवा ने आयु को अदन वाटिका में बुध और इला द्वारा रोपे दो वृक्षों के फल पकने तक तोड़ने और खाने से रोक रखा था। उन वृक्षों को एल पुरुरवा जीवन वृक्ष और बुद्धि का वृक्ष कहता था।
लेकिन सीरिया वासी सुरसा के पुत्र नाग वंशी ने आयु को पुरुरवा के आदेश के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष के अधपके फल को खा लेने के लिए भड़काया। जब एल पुरुरवा आया तो बुद्धि वृक्ष का फल नहीं दिखा। पित्र आज्ञा उल्लंघन कर बुद्धि वृक्ष का फल खाने के कारण भयभीत हो कर आयु छुप गया। इधर बुद्धि वृक्ष का फल नहीं देखकर एल पुरुरवा समझ गया कि, आयु ने ही फल खाया है इसलिए डर रहा है।
एल पुरुरवा ने रुष्ट होकर आयु को अदन वाटिका के पूर्वी द्वार से निकाल दिया। आयु किसी व्यापारिक जहाज से प्रभा की दादी सिंहिका ( होलिका) के क्षेत्र सिंहल द्वीप (श्री लंका) पर श्रीपाद पर्वत पर पहूँच गया।
फिर समय बीतने पर सिंहल द्वीप से केरल होते हुए ओमान पहूँचा। ओमान से सऊदी अरब, इराक होते हुए अदन वाटिका लौटा।
राहु की पुत्री प्रभा से आयु के पुत्र नहुष हुए।
शंकर -पार्वती की पुत्री अशोक सुन्दरी से नहुष का पुत्र ययाति हुआ ।
ययाति को शुक्राचार्य जी की पुत्री देवयानी से यदु, तुर्वसु दो पुत्र प्राप्त हुए। यदुवंश में श्रीकृष्ण हुए। तुर्वसु के नाम पर ही तुर्किस्तान का नाम पड़ा।और देवयानी की दासी दानवराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र पुरु, अनु और द्रुह्यु हुए।
पुरु वंश में ही दुश्यन्त और शकुन्तला पुत्र राजा भरत हुए।भारत वर्ष में इन भरत द्वारा शासित क्षेत्र का नाम पर भरतखण्ड है। इस भरत वंश में कुरु वंश हुआ जिसमें भीष्म, और कौरव- पाण्डव हुए।
चन्द्र वंशी पुरु, अनु और द्रुह्यु यदु और तुर्वसु के परिचय हेतु उक्त विवरण दिया गया।
ऋग्वेद में वर्णित महर्षि वशिष्ठ के पौरोहित्य और इन्द्र के संरक्षण में मनुर्भरतों के तृत्सु वंश के सृंजय कुल के पिजवन/देववत के पुत्र दिवोदास और पौत्र सुदास के नेतृत्व मे मनुर्भरतों और सूर्य वंशियों से महर्षि विश्वामित्र जी के पौरोहित्य मे पूर्वी टर्की से आये ययाति के पुत्र, पुरु, अनु, द्रुह्यु, यदु और तुर्वसु, आदि चन्द्रवंशियों और सीरिया से आये नाग वंशियों के साथ हुए शतवर्षीय दशराज युद्ध हुआ था। अर्थात भारत की ओर स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के वंशज भरत चक्रवर्ती के वंशज मनुर्भरत और सूर्यवंशी थे और पश्चिम एशिया और उत्तर की ओर पुरु, अनु, द्रुह्यु, यदु और तुर्वसु, आदि चन्द्रवंशी तथा सीरिया से आये नाग वंशी थे। युद्ध की समाप्ति के बाद सूर्य वंशियों को अयोध्या में बसाया गया, टर्की से आये चन्द्रवंशियों को प्रयागराज में बसाया गया और सीरिया से आये नाग वंशियों को कश्मीर में बसाया गया। मनुर्भरत हरियाणा और पञ्जाब में बसे रहे।
चन्द्रवंशियों के पुरोहित महर्षि विश्वामित्र जी के प्रभाव से चन्द्रवंशियों ने नक्षत्रिय सौर मास पर आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्रमास चलाये।
शकों-कुषाणो राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड के कुछ भागों में, बिहार, झारखण्ड के कुछ भागों में, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में निरयन सौर संक्रमण आधारित पूर्णिमान्त मास के साथ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाला शकाब्द प्रचलित हैं। और सातवाहन राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोआ, तेलङ्गाना और आन्ध्र प्रदेश मे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाला निरयन सौर संक्रमण आधारित अमान्त चान्द्र मास के साथ शालिवाहन शक प्रचलित है।
इसके अलावा गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाला निरयन सौर संक्रमण आधारित अमान्त चान्द्र मास के साथ विक्रम संवत प्रचलित है।
और
कम्बोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैण्ड, श्रीलंका के बौद्धों में भी निरयन सौर चान्द्र संवत प्रचलित है। यहाँ भी प्रायः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
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