(1) वसन्त सम्पात आधारित सायन सौर काल दर्शक -- यह वैदिक काल से प्रचलित है। तब कल्प संवत्सर के नाम से प्रचलित था। अब इसे कलियुग संवत या युग संवत कहते हैं।
कलियुग संवत 5127 का प्रारम्भ सायन मेष संक्रान्ति 20 मार्च 2026 शुक्रवार को 20:17 बजे से होगा।
वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाले सायन सौर वर्ष जो राष्ट्रीय केलेण्डर के चैत्र मास के प्रथम दिन के एक दिन पहले और ग्रेगरी केलेण्डर के 21 मार्च से प्रारम्भ होता है।
ईरान में भी वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति से जमशेदी नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
पारसी मतावलम्बी भी वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति से जमशेदी नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
(2) तारों में भूमि और सूर्य को दर्शाने वाला नक्षत्रिय संवत अर्थात निरयन सौर संवत -- विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रेल 2026 मङ्गलवार को प्रातः 09:31 बजे से प्रारम्भ होगा।
जब सूर्य का परिभ्रमण करते हुए जब भूमि चित्रा तारे के सम्मुख होती है और भूमि से सूर्य चित्रा तारे से 180 अंश पर अर्थात अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर दिखता है। उस समय से प्रारम्भ होने वाला निरयन सौर संवत राष्ट्रीय केलेण्डर के चैत्र मास के प्रथम दिन के 24 वें दिन और ग्रेगरी केलेण्डर के 14 अप्रेल से प्रारम्भ होता है। जिसे पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में निरयन मेष संक्रमण से विक्रम संवत का प्रारम्भ वैशाखी नाम से किया जाता है।
बङ्गाल, त्रिपुरा और बाङ्ग्लादेश मे निरयन मेष संक्रमण से बोंगलाब्द / बांग्ला सोन (बाङ्ला संवत) पोहेला बोइशाख (पहला वैशाख) से नोबो बोर्शो (नव वर्ष) प्रारम्भ करते हैं ।
और उड़ीसा मे निरयन मेष संक्रमण से ओडिशा संवत *अनला संवत* नाम से प्रारम्भ होता है। यह ओडिशा का अनला संवत 1176 ईस्वी से प्रारम्भ हुआ।
असम में निरयन मेष संक्रमण से बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
असम के समान ही भूटान, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम और मेघालय में भी निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
तमिल नाडु और पुडुचेरी में निरयन मेष संक्रमण से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।
केरल में निरयन मेष संक्रमण से विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।
इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।
(3) शुद्ध चान्द्र वर्ष अर्थात अमावस्या से अमावस्या तक बारह चान्द्र मास का शुद्ध चान्द्र वर्ष का प्रारम्भ 26 जून 2025 से हुआ था। अब आगामी 15 जून 2026 से होगा।
भारत में शुद्ध चान्द्र वर्ष बोहरा समाज मनाता है। सऊदी अरब आदि मुस्लिम देशों में भी इसी दिन स्थानीय सूर्यास्त समय से मनाते हैं।
लेकिन
भारत में मुस्लिम लोग एक दिन बाद एक दिन बाद चन्द्र दर्शन के बाद मनाते हैं।
भारत में इसके अतिरिक्त दो *सौर- चान्द्र संवत (लूनि सोलर केलेण्डर Luni Solar Calendar) और भी प्रचलित है ।*
(4) *निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र शक संवत शकाब्द 1948 प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार को प्रातः 06:53 बजे से वर्ष प्रतिपदा या गुड़ी पड़वा को शकाब्द 1948 प्रारम्भ होगा।*
निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र शक संवत उत्तर भारत में मथुरा विजय के उपलक्ष्य में शकों और कूषाणों द्वारा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ किया गया।
इसका प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड के कुछ भागों में, बिहार, झारखण्ड के कुछ भागों में, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान है। यहाँ पूर्णिमान्त मास प्रचलित है।
तथा
दक्षिण भारत में सातवाहन राजाओं ने महाराष्ट्र में नासिक के पास पैठण विजय के उपलक्ष्य में प्रारम्भ किया गया। जिसका प्रभाव क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोआ, तेलङ्गाना और आन्ध्र प्रदेश में है। यहाँ अमान्त मास प्रचलित है।
इसके अलावा गुजरात में विक्रम संवत के साथ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से सौर चान्द्र संवत प्रचलित है।
और
कम्बोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैण्ड, श्रीलंका के बौद्धों में भी निरयन सौर चान्द्र संवत प्रचलित है। यहाँ भी प्रायः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
(5) सायन सौर चान्द्र संवत् ---
सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र शक संवत 1948 के प्रथम मास का प्रारम्भ भी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार 06:53 बजे से प्रारम्भ होगा।
वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित दृक्सिद्ध पंचांग के रचयिता बापूदेव शास्त्री (नृसिंह) ने विश्व में पहली बार सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित सायन सौर चान्द्र पञ्चाङ्ग की अवधारणा प्रस्तुत की।
महाराष्ट्र के अहमदनगर में गोदावरी नदी के किनारे 'टोंके' नामक गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में शक सं 1743 में जन्मे बापूदेव शास्त्री (नृसिंह) की आरम्भिक शिक्षा नागपुर के मराठी विद्यालय में हुई ।
ये प्रयाग तथा कलकत्ता विश्वविद्यालयों के परिषद तथा आयरलैंड और ग्रेट ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी के सम्मानित सदस्य थे।
इनके अलावा
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के आचार्य श्री दार्शनेय लोकेश नोएडा से श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम संवत 2064,शके 1929से अर्थात सन 2007 ईस्वी से आज तक प्रकाशित कर रहे है़ं। आचार्य श्री दार्शनेय लोकेश ने राष्ट्रीय शक केलेण्डर पर आधारित मासों को वैदिक मधु-माधव आदि नाम से और दिनांकों को गते के नाम से प्रचलित किया है।सायन सौर चान्द्र संवत शक के अलावा असमान विस्तार वाले अलग-अलग भोगांश के अट्ठाईस नक्षत्र
इस पञ्चाङ्ग की विशेषता है।
वर्तमान में महाराष्ट्र और आर्यसमाज में इस पञ्चाङ्ग को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है।
मुझे उक्त पाँच प्रकार के वर्ष गणनाओं में से वैदिक काल से प्रचलित एक तो वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाले शुद्ध सायन सौर संवत और संकल्पादि में और व्यवहार में 21 मार्च 2026 से लागू होने वाला कलियुग संवत 5126 मधुमास दिनांक 01 ही पूर्णतः स्वीकार्य है।
दुसरे क्रम पर चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु, निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य होने के समय से प्रारम्भ नक्षत्रिय विक्रम संवत 2083 वैशाखी, दिनांक 14 अप्रेल 2026 से प्रारम्भ होगा यह भी स्वीकार्य है।
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