रविवार, 11 जनवरी 2026

मेरे सिद्धान्त (थ्योरी) और उनकी खोज का समय।

सृष्टि उत्पत्ति के उर्ध्वमूलम अधः शाखम का वृक्ष का वर्तमान स्वरूप समझ में आया था। जिसके पीछे में 1968 के आस-पास से पड़ा था जब पहली बार नालछा में नाना जी के घर कल्याण के जनवरी (वार्षिक) अंक में श्रष्टि उत्पत्ति की पौराणिक कथा पढ़ी थी।
आलिराजपुर में था तब 1991 में सर्वटे बस स्टैंड के सामने बजरङ्ग लॉज में रुका था तब स्पेक्ट्रम में दो पट्टी और होना चाहिए।
और
                        परमात्मा 
                             !
                           ॐ
                             !
                         परब्रह्म
                            /\
                  विष्णु         माया  
                              !
                            ब्रह्म 
                             /\
     सवितृ प्रभविष्णु       श्री लक्ष्मी सावित्री 
                               !
                        अपर ब्रह्म 
                              /\
      नारायण श्री हरि      नारायणी कमलासना 
                                !
                          हिरण्यगर्भ 
                                 /\
                         त्वष्टा       रचना 
                                   !
                              प्रजापति 
                                 /।\ 
   दक्ष-प्रसुति,    रुचि-आकुति,    कर्दम-देवहुति 
                                    !
                             वाचस्पति 
                                   /\
                             इन्द्र     शचि
         
ऐसे 101 तत्व हैं। इस प्रकार 
सृष्टि उत्पत्ति वाले ब्लॉग में विस्तार से समझाया है।

कोई गेलेक्सी का आवर्तकाल (केन्द्र का परिभ्रमण समय) मिल्की-वे (आकाश गङ्गा) से कम हो और उसमें कोई तारे का गेलेक्सी के केन्द्र के परिभ्रमण का समय (आवर्तकाल) भी कम हो और उस तारे के ग्रह का आवर्तकाल सब मिलकर भूमि के आवर्तकाल से 360 गुणा अधिक हो तो वहाँ का एक वर्ष हमारे 360 वर्ष के बराबर होगा। उनका अहोरात्र हमारे एक वर्ष के बराबर होगा।उनका दिनमान और रात्रिमान उत्तरायण और दक्षिणायन के बराबर होगा। अर्थात स्वर्ग।

ऐसे ग्रह की खोज कर स्वर्ग और ब्रह्म लोक की खोजा जा सकता है।
ऐसे ही छोटा सप्तर्षि मण्डल (शिशुमार चक्र) में वैकुंठ की खोज भी हो सकती है।
यह विचार पुराणों मे वर्णित ग्रह नक्षत्र, ध्रुव और शिशुमार चक्र के वर्णन पढ़ कर आया। तब 1974-75 में हम धार में धोबी बाखल वाले मकान में रहतेथे।

उसी समय स्पेक्ट्रम में रेडियो वेव के पहले दो वेव और होना चाहिए ता कि, तरङ्ग दैर्ध्य अनन्त तक और आवृत्ति 00 तक हो सके।

मङ्गल और बृहस्पति के बीच दो ग्रह होना चाहिए यह बात भी उसी मकान में सूझी थी। उसी आधार पर मेने राशियों के स्वामी निर्धारित किए थे।
उसका विकसित रूप भेज चुका हूँ।
लेकिन बाद में पता चला कि, दोनों ग्रह टूट कर बिखर गए या ये दोनों अभी ग्रह नहीं बन ही पाये और वर्तमान में अवान्तर ग्रहों की दो पट्टियाँ है।

फिर नये सिरे से नक्षत्र देवताओं के आधार पर निरयन राशियों और नक्षत्रों के स्वामी ग्रह, दिशा, वर्ण, देवता, लिङ्ग, तत्व आदि का चार्ट बनाया और अंक विद्या और वास्तु से सम्बन्ध 1986-87 की है। जब में हासलपुर में था।

ये सब मेने मेरे ब्लॉग में लिखा है और मेरी डायरी में नोट इन सब की फोटो मेने श्री शिशिर भागवत को दे रखी है ताकि, इनका विकास हो सके।

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