1 गुरुमाता के बच्चों को वापस लाकर देना। इसे प्रत्यक्ष चमत्कार कह सकते हैं।
2 द्रोपदी की साड़ी बढ़ाना। लेकिन यह अप्रत्यक्ष चमत्कार था। जानने वाले ही समझ पाये। प्रत्यक्ष में तो द्रोपदी का चमत्कार दिख रहा था।
2 दूसरी बार बार ही प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाना पड़ा जब शान्ति सन्धि प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र की राज सभा में उपस्थित होने पर दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को बान्धने का प्रयत्न किया तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना तन बढ़ना प्रारम्भ किया। और दुर्योधन को चुनौती दी की बान्धकर बता।
3 तीसरी बार जयद्रथ वध के समय कौरव सेना का मुख पूर्व दिशा में था जयद्रथ बार बार पीछे मुड़कर देखता रहता था कि, सूर्यास्त हुआ या नहीं, उसे लगातार सूर्य दिखता रहा लेकिन कौरव सेना को सूर्यास्त होते दिखा और वे अति प्रसन्न होकर उत्सव मनाने लगे। जयद्रथ की सुरक्षा पर से कौरव सेना का ध्यान हट गया क्योंकि अर्जुन ने भी धनुष छोड़ दिया था। जयद्रथ हत्प्रभ होकर सुरक्षा की गुहार करता रहा लेकिन उत्सव के हल्ले में उसकी बात किसी ने नहीं सुनी और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सूर्य दिखाकर बतलाया कि, सूर्यास्त नहीं हुआ है जल्दी से बाण चलाकर जयद्रथ का सिर काट कर तपस्यारत उसके पिता की गोद में डालदे। ताकि जयद्रथ का सिर उसके पिता द्वारा ही भूमि पर गिरकर उनके ही शाप के अनुसार उनका ही सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाए।
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की बात यथावत मान ली। और जैसे ही जयद्रथ का सिर कटा वैसे ही पश्चिम आकाश में सूर्य चमकने लगा। और जयद्रथ के पिता का सिर फटने के बाद सूर्यास्त हो गया।
लेकिन यह भी अ प्रत्यक्ष चमत्कार ही था।
एक प्रत्यक्ष चमत्कार श्रीमद्भागवत पुराण में उल्लेखित है - द्वारिका में यज्ञ पर बैठ श्रीकृष्ण को ब्राह्मण द्वारा अपने आठ पुत्रों के गायब हो जाने पर अनेकानेक अपशब्द कहे। अर्जुन की सुरक्षा व्यवस्था भी असफल हो गई। वचन पालन में अर्जुन आत्मदाह को तत्पर हुआ। लेकिन तभी श्रीकृष्ण का यज्ञ पूर्ण हुआ और वे पश्चिम सागर के मार्ग से पाताल में जाकर भुमा से मिलकर ब्राह्मण बालकों को वापस लेकर आये और उन्हें ब्राह्मण को सोप दिया।
क्योंकि सनातन धर्म में चमत्कार दिखाना निषिद्ध है। और चमत्कार से प्रभावित होकर नमस्कार करना भी निषिद्ध है।
लेकिन मुर्ख हिन्दुओं (दासों) ने सूफियों की जादूगरी से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया और मरने के बाद भी उनकी कबर पूजना प्रारम्भ कर दिया।
यदि मुर्तियाँ/ प्रतिमाएँ चमत्कार करती थी तो
भगवान श्रीकृष्ण के और वेदव्यास जी के समय लगभग 5100 ईसा पूर्व या आधुनिक इतिहासकारों की माने तो भी सिद्धार्थ गोतम बुद्ध के समय अर्थात लगभग 500ईसा पू्व ज़रथ्रुष्ट्र ने ईरान में मग और मीढ संस्कृति की हजारों मूरतियाँ तोड़ी,
सन 622 से 632 ईस्वी के बीच सऊदी अरब,यमन, ओमान, आर्मेनिया, अजर बेजान, टर्की, सीरिया, इराक ईरान, जोर्डन, मिश्र सभी स्थानों की हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियाँ मोह मद और उसके अनुयायियों ने तोड़ दी तब तो एक भी मुर्ती ने कोई चमत्कार नहीं दिखाया। उसके बाद अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, तिब्बत में भी कई हजारों मूर्तियाँ मोह मदन लोंगों ने तोड़ी,
उसके बाद 712 ईस्वी के बाद से आज तक ईराक के खलिफा, तुर्क, कजाक अफगान मुस्लिमों ने पुरे भारत में हजारों प्राण-प्रतिष्ठा की हुई मूर्तियाँ तोड़ दी तब तो एक भी मुर्ती स्वयम् अपनी रक्षा तक नहीं कर पाई!
चार शंकराचार्य, रामानुजाचार्य जी, निम्बार्काचार्य जी के पीठाधीश्वर, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु स्वयम और उनके अनुयायाई, वल्लभाचार्य जी और उनके अनुयाई, रामानुजाचार्य जी और उनके अनुयाई कोई भी इन मूर्तियों की रक्षा नहीं कर पाये, इनके हाथों स्थापित और प्राण-प्रिष्ठित मूर्तियाँ स्वयम अपनी आत्म रक्षा नहीं कर पाई।
इसलिए मुझे ऐसे किसी चमत्कार में कभी भी श्रद्धा नहीं रही।
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