परम्परागत उत्तरायण और वैदिक उत्तर तोयन तो 21/22 दिसम्बर से प्रारम्भ होता है। यह पृथ्वी पर छाया देखने से स्पष्ट समझ आता है। आकाश में देखने पर समझ नहीं आयेगा।
20/21 मार्च, 22 जून, 22/23 सितम्बर और 22 दिसम्बर और पुनः 21 मार्च को मध्याह्न में छत या या मैदान में शंकु या बिजली के खम्भे की छाया पर निशान लगा कर देखने से स्पष्ट हो जाएगा कि, 21 सितम्बर से 22 दिसम्बर तक सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहा है। और 22 दिसम्बर से 21 मार्च तक दक्षिण से उत्तर की ओर जा रहा है।
मतलब 22 दिसम्बर को सूर्य सर्वाधिक दक्षिण में था।
इससे उलट 21 मार्च से 22 जून तक सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर जाता दिखेगा। फिर 22 जून से 21/22 सितम्बर तक सूर्य उत्तर से दक्षिण में जाता दिखेगा। अर्थात 22 जून को सूर्य सर्वाधिक उत्तर में रहता है।
इसी प्रकार 21 मार्च और 22 सितम्बर को दिन-रात बराबर रहते हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य ठीक पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। यही वास्तविक पूर्व और पश्चिम दिशा होती है। अतः प्रातः और सायं काल की छाया की के चिह्न को मिलाकर एक रेखा खीच लो, ये आपके स्थान की ठीक-ठीक पूर्व और पश्चिम दिशा बतलाएगी।
ऐसे ही उज्जैन में प्रति वर्ष 22 जून को मध्याह्न में बिजली के खम्भे की छाया नहीं बनती । ऐसे ही भारत में उज्जैन से दक्षिण में स्थित किसी भी ग्राम या नगर में 08 जून से 23 जून के बीच किसी एक दिन मध्याह्न में बिजली के खम्भे की छाया नहीं बनती है।
जबकि
निरयन संक्रमण केवल आकाश में चित्रा तारे को देखकर ही जाना जा सकता है।
निरयन मकर संक्रमण को सूर्यास्त पश्चात देखने पर चित्रा तारा ठीक सिर पर दिखता है। इससे स्पष्ट हो जाएगा। कि आज मकर संक्रमण है।
और
कर्क संक्रमण के दिन सूर्योदय के पहले चित्रा तारा ठीक सिर पर दिखता है। यह कर्क संक्रमण की पहचान है।
निरयन मेष संक्रमण के दिन सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा ठीक पश्चिम में दिखेगा। और निरयन तुला संक्रमण के दिन सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा ठीक पूर्व में दिखता है।
यह नक्षत्रिय सौर पद्धति और निरयन सौर पद्धति का खगोलीय प्रमाण है। इसे आकाश में ही देखा जा सकता है लेकिन भूमि पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता है। अर्थात इसे वेधशाला में भी देखा जा सकता है। हमारे देश के तो पुराने किसानों तक को यह जानकारी रहती है।*
*लेकिन कुछ सनातन धर्मी लोग भी और विदेशी तथा अब्राहमिक मतावलम्बी सनातन धर्म के मुख्य ग्रन्थ वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्य सूत्रों तथा ग्रह गणित के भारतीय सिद्धान्त ग्रन्थों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत के मध्य में अर्थात क्रान्तिवृत के 180° पर होने के उल्लेख को प्रमाण नहीं मानते हैं, बल्कि काल्पनिक मानते हैं; उन लोगों के लिए यह कोई प्रमाण नहीं है।*
और
इसी प्रकार जो भारतीय सनातन धर्मी केवल विदेशियों और अब्राहमिक मतावलम्बियों के कथन को ही ब्रह्मवाक्य मानने हैं; उन दास मानसिकता के हिन्दुओं के लिए भी कोई प्रमाण है ही नहीं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें