शनिवार, 31 जनवरी 2026

हरि कृपा कैसे होगी?

हम कितने मुर्ख है! इस बात को आरती में स्वीकार भी किया गया है। कि, 
 *मैं मुरख खल कामी। कृपा करो भर्ता।* 
लेकिन वैदिक शास्त्रीय मत स्पष्ट है कि,
भगवान कृपा तब करेंगे जब श्वसन भी सावधानी पूर्वक हो। हर स्वासप्रश्वास पर भी आपका नियन्त्रण हो। इसीलिए सन्ध्या और जप भी प्राणायाम पूर्वक करने का विधान है।
प्राणायाम करने के लिए यम (धर्म) का  सतर्कता पूर्वक नियमित पालन हो।  (अर्थात यम- नियम पालन हो।) फिर दैहिक स्थैर्य और इन्द्रियों पर नियन्त्रण हेतु आसन सिद्ध हो तब प्राणायाम किया जा सकता है।
इसके बाद ही प्रत्याहार द्वारा मन पर नियन्त्रण किया जा सकता है। तब ही सही ढङ्ग से (धारणा-ध्यान-समाधि)अन्तरङ्ग योग सधेगा।
फिर आप यज्ञ में जब इन्दम् इन्द्राय न मम् बोलोगे, तो आपका भाव भी यही रहेगा कि, यह इन्द्र का है, मेरा नहीं।
तब समर्पण बन पाएगा। और हर समय यह ध्यान रह पाएगा कि,न यह जगत मेरा है न मैं इस जगत का हूँ बल्कि यह सब परमात्मा का है, मैं भी केवल परमात्मा का ही हूँ। 
अर्थात पूर्ण समर्पण होगा तब देव (विष्णु) की कृपा होगी।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

सायन संक्रान्तियाँ दिन में शंकु की छाया देखकर और निरयन संक्रमण आकाश में चित्रा तारे को देखकर समझा जा सकता है।

परम्परागत उत्तरायण और वैदिक उत्तर तोयन तो 21/22 दिसम्बर से प्रारम्भ होता है। यह पृथ्वी पर छाया देखने से स्पष्ट समझ आता है। आकाश में देखने पर समझ नहीं आयेगा। 
20/21 मार्च, 22 जून, 22/23 सितम्बर और 22 दिसम्बर और पुनः 21 मार्च को मध्याह्न में छत या  या मैदान में शंकु या बिजली के खम्भे की छाया पर निशान लगा कर देखने से स्पष्ट हो जाएगा कि, 21 सितम्बर से 22 दिसम्बर तक सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहा है। और 22 दिसम्बर से 21 मार्च तक दक्षिण से उत्तर की ओर जा रहा है।
मतलब 22 दिसम्बर को सूर्य सर्वाधिक दक्षिण में था।
इससे उलट 21 मार्च से 22 जून तक सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर जाता दिखेगा। फिर 22 जून से 21/22 सितम्बर तक सूर्य उत्तर से दक्षिण में जाता दिखेगा। अर्थात 22 जून को सूर्य सर्वाधिक उत्तर में रहता है।
इसी प्रकार 21 मार्च और 22 सितम्बर को दिन-रात बराबर रहते हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य ठीक पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। यही वास्तविक पूर्व और पश्चिम दिशा होती है। अतः प्रातः और सायं काल की छाया की के चिह्न को मिलाकर एक रेखा खीच लो, ये आपके स्थान की ठीक-ठीक पूर्व और पश्चिम दिशा बतलाएगी।
 ऐसे ही उज्जैन में प्रति वर्ष 22 जून को मध्याह्न में बिजली के खम्भे की छाया नहीं बनती । ऐसे ही भारत में उज्जैन से दक्षिण में स्थित किसी भी ग्राम या नगर में 08 जून से 23 जून के बीच किसी एक दिन मध्याह्न में बिजली के खम्भे की छाया नहीं बनती है।
जबकि 
निरयन संक्रमण केवल आकाश में चित्रा तारे को देखकर ही जाना जा सकता है।
निरयन मकर संक्रमण को  सूर्यास्त पश्चात देखने पर चित्रा तारा ठीक सिर पर दिखता है। इससे स्पष्ट हो जाएगा। कि आज मकर संक्रमण है।
और 
कर्क संक्रमण के दिन सूर्योदय के पहले चित्रा तारा ठीक सिर पर दिखता है। यह कर्क संक्रमण की पहचान है।
निरयन मेष संक्रमण के दिन सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा ठीक पश्चिम में दिखेगा। और निरयन तुला संक्रमण के दिन सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा ठीक पूर्व में दिखता है।

यह नक्षत्रिय सौर पद्धति और निरयन सौर पद्धति का खगोलीय प्रमाण है। इसे आकाश में ही देखा जा सकता है लेकिन भूमि पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता है। अर्थात इसे वेधशाला में भी देखा जा सकता है। हमारे देश के तो पुराने किसानों तक को यह जानकारी रहती है।*

*लेकिन कुछ सनातन धर्मी लोग भी और विदेशी तथा अब्राहमिक मतावलम्बी सनातन धर्म के मुख्य ग्रन्थ वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्य सूत्रों तथा ग्रह गणित के भारतीय सिद्धान्त ग्रन्थों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत के मध्य में अर्थात क्रान्तिवृत के 180° पर होने के उल्लेख को प्रमाण नहीं मानते हैं, बल्कि काल्पनिक मानते हैं; उन लोगों के लिए यह कोई प्रमाण नहीं है।*
और
इसी प्रकार जो भारतीय सनातन धर्मी केवल विदेशियों और अब्राहमिक मतावलम्बियों के कथन को ही ब्रह्मवाक्य मानने हैं; उन दास मानसिकता के हिन्दुओं के लिए भी कोई प्रमाण है ही नहीं।

निरयन मकर संक्रमण क अर्था क्या है ? क्यों मनाया जाता है?

जिज्ञासा ---
 *वैदिक दक्षिणायनान्त दिवस, अर्थात शीतान् के छः मासों की समाप्ति और और उष्णान की छः मासी प्रारम्भ दिवस, वैदिक सहस्य मास प्रारम्भ दिवस, पूरी भूमि पर सबसे छोटा दिन सबसे और बड़ी रात वाला दिन उत्तरी ध्रुव पर मध्यरात्रि, दक्षिण ध्रुव पर मध्याह्न वाला दिन, दसवीं सायन संक्रान्ति जिसे महाभारत काल से उत्तरायण प्रारम्भ दिवस कहा जाने लगा है 21 दिसम्बर 2025 रविवार को रात्रि 08:33 बजे हो चुकी है। जिसे भूमि पर देखा जा सकता है। तो; फिर* 
 *दिनांक 14 जनवरी 2026 बुधवार को दोपहर 03 बजकर 08 मिनट पर निरयन सौर धनुर्मास समाप्ति अर्थात सूर्य का निरयन धनु राशि से निकलकर कर निरयन मकर राशि में संक्रमण का पर्व या निरयन मकर संक्रमण क्यों कहा जाता है?* 
 *इस समय ऐसा क्या होता है जिस कारण भारत के आस-पास के लगभग सभी देशों सहित पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है?* 
उत्तर --
 *निरयन मकर संक्रमण वास्तव में आकाशीय घटना है। सूर्य का परिभ्रमण भूमि जिस मार्ग से करती है उसे क्रान्तिवृत कहते हैं।*
*वेदों में चित्रा तारे को इस क्रान्तिवृत का मध्य बिन्दु अर्थात 180° कहा गया है।* 
*क्रान्तिवृत में चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु है। जिसे अश्विन्यादि बिन्दु अर्थात अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु कहते हैं।*
*क्रान्तिवृत में चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु को वर्तमान में निरयन मेषादि बिन्दु भी कहा जाता है।*
लेकिन *चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु जिसे निरयन मेषादि बिन्दु कहते हैं उस बिन्दु पर वर्तमान में कोई तारा नही है।*  
*जिस समय उक्त निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य और भूमि का 270° का कोण बनता है तो उस घटना को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।*
प्रकारान्तर से 

*जिस समय चित्रा तारे पर भूमि और सूर्य के बीच 90° का कोण बनता है उस समय को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।*
*यही घटना दिनांक 14 जनवरी 2026 बुधवार को दोपहर 03 बजकर 08 मिनट पर घटि।*
*आकाश और नक्षत्रों को पहचानने वाले किसान तक इस घटना को देख सकते हैं।* 
 
*देवताओं और स्वर्गादि लोकों को मानने वाले समस्त सनातन धर्मी, जैन, बौद्ध और खालसा सब हर्षोल्लास के साथ सूर्य के निरयन मकर संक्रमण का पर्व मनाते हैं।*

रविवार, 11 जनवरी 2026

मेरे सिद्धान्त (थ्योरी) और उनकी खोज का समय।

सृष्टि उत्पत्ति के उर्ध्वमूलम अधः शाखम का वृक्ष का वर्तमान स्वरूप समझ में आया था। जिसके पीछे में 1968 के आस-पास से पड़ा था जब पहली बार नालछा में नाना जी के घर कल्याण के जनवरी (वार्षिक) अंक में श्रष्टि उत्पत्ति की पौराणिक कथा पढ़ी थी।
आलिराजपुर में था तब 1991 में सर्वटे बस स्टैंड के सामने बजरङ्ग लॉज में रुका था तब स्पेक्ट्रम में दो पट्टी और होना चाहिए।
और
                        परमात्मा 
                             !
                           ॐ
                             !
                         परब्रह्म
                            /\
                  विष्णु         माया  
                              !
                            ब्रह्म 
                             /\
     सवितृ प्रभविष्णु       श्री लक्ष्मी सावित्री 
                               !
                        अपर ब्रह्म 
                              /\
      नारायण श्री हरि      नारायणी कमलासना 
                                !
                          हिरण्यगर्भ 
                                 /\
                         त्वष्टा       रचना 
                                   !
                              प्रजापति 
                                 /।\ 
   दक्ष-प्रसुति,    रुचि-आकुति,    कर्दम-देवहुति 
                                    !
                             वाचस्पति 
                                   /\
                             इन्द्र     शचि
         
ऐसे 101 तत्व हैं। इस प्रकार 
सृष्टि उत्पत्ति वाले ब्लॉग में विस्तार से समझाया है।

कोई गेलेक्सी का आवर्तकाल (केन्द्र का परिभ्रमण समय) मिल्की-वे (आकाश गङ्गा) से कम हो और उसमें कोई तारे का गेलेक्सी के केन्द्र के परिभ्रमण का समय (आवर्तकाल) भी कम हो और उस तारे के ग्रह का आवर्तकाल सब मिलकर भूमि के आवर्तकाल से 360 गुणा अधिक हो तो वहाँ का एक वर्ष हमारे 360 वर्ष के बराबर होगा। उनका अहोरात्र हमारे एक वर्ष के बराबर होगा।उनका दिनमान और रात्रिमान उत्तरायण और दक्षिणायन के बराबर होगा। अर्थात स्वर्ग।

ऐसे ग्रह की खोज कर स्वर्ग और ब्रह्म लोक की खोजा जा सकता है।
ऐसे ही छोटा सप्तर्षि मण्डल (शिशुमार चक्र) में वैकुंठ की खोज भी हो सकती है।
यह विचार पुराणों मे वर्णित ग्रह नक्षत्र, ध्रुव और शिशुमार चक्र के वर्णन पढ़ कर आया। तब 1974-75 में हम धार में धोबी बाखल वाले मकान में रहतेथे।

उसी समय स्पेक्ट्रम में रेडियो वेव के पहले दो वेव और होना चाहिए ता कि, तरङ्ग दैर्ध्य अनन्त तक और आवृत्ति 00 तक हो सके।

मङ्गल और बृहस्पति के बीच दो ग्रह होना चाहिए यह बात भी उसी मकान में सूझी थी। उसी आधार पर मेने राशियों के स्वामी निर्धारित किए थे।
उसका विकसित रूप भेज चुका हूँ।
लेकिन बाद में पता चला कि, दोनों ग्रह टूट कर बिखर गए या ये दोनों अभी ग्रह नहीं बन ही पाये और वर्तमान में अवान्तर ग्रहों की दो पट्टियाँ है।

फिर नये सिरे से नक्षत्र देवताओं के आधार पर निरयन राशियों और नक्षत्रों के स्वामी ग्रह, दिशा, वर्ण, देवता, लिङ्ग, तत्व आदि का चार्ट बनाया और अंक विद्या और वास्तु से सम्बन्ध 1986-87 की है। जब में हासलपुर में था।

ये सब मेने मेरे ब्लॉग में लिखा है और मेरी डायरी में नोट इन सब की फोटो मेने श्री शिशिर भागवत को दे रखी है ताकि, इनका विकास हो सके।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

चमत्कार कथाओं और मूर्ति पूजा में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने बहुत कम चमत्कार दिखाये। जबकि, महर्षि सान्दिपनि से उन्होंने बत्तीस विद्याएँ और चौसठ कलाओं में इन्द्रजाल (जादू) भी सीखा था।
1 गुरुमाता के बच्चों को वापस लाकर देना। इसे प्रत्यक्ष चमत्कार कह सकते हैं।
2 द्रोपदी की साड़ी बढ़ाना। लेकिन यह अप्रत्यक्ष चमत्कार था। जानने वाले ही समझ पाये। प्रत्यक्ष में तो द्रोपदी का चमत्कार दिख रहा था।
2 दूसरी बार बार ही प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाना पड़ा जब शान्ति सन्धि प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र की राज सभा में उपस्थित होने पर दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को बान्धने का प्रयत्न किया तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना तन बढ़ना प्रारम्भ किया। और दुर्योधन को चुनौती दी की बान्धकर बता।
3 तीसरी बार जयद्रथ वध के समय कौरव सेना का मुख पूर्व दिशा में था जयद्रथ बार बार पीछे मुड़कर देखता रहता था कि, सूर्यास्त हुआ या नहीं, उसे लगातार सूर्य दिखता रहा लेकिन कौरव सेना को सूर्यास्त होते दिखा और वे अति प्रसन्न होकर उत्सव मनाने लगे। जयद्रथ की सुरक्षा पर से कौरव सेना का ध्यान हट गया क्योंकि अर्जुन ने भी धनुष छोड़ दिया था। जयद्रथ हत्प्रभ होकर सुरक्षा की गुहार करता रहा लेकिन उत्सव के हल्ले में उसकी बात किसी ने नहीं सुनी और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सूर्य दिखाकर बतलाया कि, सूर्यास्त नहीं हुआ है जल्दी से बाण चलाकर जयद्रथ का सिर काट कर तपस्यारत उसके पिता की गोद में डालदे। ताकि जयद्रथ का सिर उसके पिता द्वारा ही भूमि पर गिरकर उनके ही शाप के अनुसार उनका ही सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाए।
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की बात यथावत मान ली। और जैसे ही जयद्रथ का सिर कटा वैसे ही पश्चिम आकाश में सूर्य चमकने लगा। और जयद्रथ के पिता का सिर फटने के बाद सूर्यास्त हो गया।
लेकिन यह भी अ प्रत्यक्ष चमत्कार ही था।
एक प्रत्यक्ष चमत्कार श्रीमद्भागवत पुराण में उल्लेखित है - द्वारिका में यज्ञ पर बैठ श्रीकृष्ण को ब्राह्मण द्वारा अपने आठ पुत्रों के गायब हो जाने पर अनेकानेक अपशब्द कहे। अर्जुन की सुरक्षा व्यवस्था भी असफल हो गई। वचन पालन में अर्जुन आत्मदाह को तत्पर हुआ। लेकिन तभी श्रीकृष्ण का यज्ञ पूर्ण हुआ और वे पश्चिम सागर के मार्ग से पाताल में जाकर भुमा से मिलकर ब्राह्मण बालकों को वापस लेकर आये और उन्हें ब्राह्मण को सोप दिया।

क्योंकि सनातन धर्म में चमत्कार दिखाना निषिद्ध है। और चमत्कार से प्रभावित होकर नमस्कार करना भी निषिद्ध है।
लेकिन मुर्ख हिन्दुओं (दासों) ने सूफियों की जादूगरी से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया और मरने के बाद भी उनकी कबर पूजना प्रारम्भ कर दिया।

यदि मुर्तियाँ/ प्रतिमाएँ चमत्कार करती थी तो
भगवान श्रीकृष्ण के और वेदव्यास जी के समय लगभग 5100 ईसा पूर्व या आधुनिक इतिहासकारों की माने तो भी सिद्धार्थ गोतम बुद्ध के समय अर्थात लगभग 500ईसा पू्व ज़रथ्रुष्ट्र ने ईरान में मग और मीढ संस्कृति की हजारों मूरतियाँ तोड़ी,
 सन 622 से 632 ईस्वी के बीच सऊदी अरब,यमन, ओमान, आर्मेनिया, अजर बेजान, टर्की, सीरिया, इराक ईरान, जोर्डन, मिश्र सभी स्थानों की हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियाँ मोह मद और उसके अनुयायियों ने तोड़ दी तब तो एक भी मुर्ती ने कोई चमत्कार नहीं दिखाया। उसके बाद अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, तिब्बत में भी कई हजारों मूर्तियाँ मोह मदन लोंगों ने तोड़ी, 
उसके बाद 712 ईस्वी के बाद से आज तक ईराक के खलिफा, तुर्क, कजाक अफगान मुस्लिमों ने पुरे भारत में हजारों प्राण-प्रतिष्ठा की हुई मूर्तियाँ तोड़ दी तब तो एक भी मुर्ती स्वयम् अपनी रक्षा तक नहीं कर पाई!
चार शंकराचार्य, रामानुजाचार्य जी, निम्बार्काचार्य जी के पीठाधीश्वर, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु स्वयम और उनके अनुयायाई, वल्लभाचार्य जी और उनके अनुयाई, रामानुजाचार्य जी और उनके अनुयाई कोई भी इन मूर्तियों की रक्षा नहीं कर पाये, इनके हाथों स्थापित और प्राण-प्रिष्ठित मूर्तियाँ स्वयम अपनी आत्म रक्षा नहीं कर पाई। 
इसलिए मुझे ऐसे किसी चमत्कार में कभी भी श्रद्धा नहीं रही।

रविवार, 4 जनवरी 2026

सायन सौर वैदिक संवत्सर और 360 दिनों का सावन वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए 3840 सायन सौर वर्ष का युग।

1 संवत्सर - संवत्सर 360 दिन का होता है। प्रथम द्वितीय, तृतीय चतुर्थ, षष्ठ, सप्तम, अष्टम और नवम वर्ष संवत्सर कहलाता है।

2 परिवत्सर - 5 से विभाज्य प्रत्येक (पाँचवा) वर्ष परिवत्सर होता है जो 390 दिन का होता है।  परिवत्सर मे वर्षान्त में 30 दिन का एक अधिक मास जोड़ देते थे। इस प्रकार परिवत्सर 13 माह का वर्ष होता है।

लेकिन अपवाद स्वरूप प्रत्येक 40 वाँ इदावत्सर वर्ष 360 दिन का ही होता है। ऐसे ही 3835 वाँ वर्ष अनुवत्सर भी 360 दिन का होता है। और 3840 वाँ वर्ष इद्वत्सर भी 360 दिन का ही होता है। 40 वाँ वर्ष इदावत्सर, 3835 वाँ वर्ष अनुवत्सर और 840 वाँ वर्ष इद्वत्सर भी बारह महीने के ही वर्ष होते हैं।

3 इदावत्सर - 40 से विभाज्य प्रत्येक (40 वाँ वर्ष)  इदावत्सर कहलाता है जो 360 दिन का होता है।
इसी प्रकार प्रत्येक 3840 वाँ वर्ष इद्वत्सर भी 360 दिन का ही है, अन्तर केवल इतना है कि, इसके  पहले 3835 वाँ वर्ष अनुवत्सर भी 360 दिन का ही होता है। 

4 अनुवत्सर - 3835 वाँ वर्ष अनुवत्सर कहलाता है जो 360 दिन का होता है। जबकि यह वर्ष भी परिवत्सर के समान 5 से विभाजित होने के कारण 390 दिन का होना चाहिए लेकिन 3835 वाँ वर्ष अनुवत्सर भी 360 दिन का ही होता है।

5 इद्वत्सर - प्रत्येक  3840 वाँ वर्ष इद्वत्सर 360 दिन का होता है।
इद्वत्सर 3840 वाँ वर्ष होता है जो पाँच से विभाजित होने पर भी 390 दिन का नहीं होता है। और 40 से विभाजित होने के कारण 360 दिन का ही है लेकिन इसके पहले पाँच से भाज्य 3835 वाँ वर्ष अनुवत्सर भी 360 दिन का ही होता है। इसलिए 3840वें वर्ष को  इदावत्सर के स्थान पर इद्वत्सर कहते हैं।

3840 सायन सौर वर्ष के अन्त में और 3841 वें सायन सौर वर्ष के प्रारम्भ में 365.24219 दिन का सायन सौर वर्ष और 360 दिन का सावन वर्ष एक साथ वसन्त सम्पात पर आ जाते हैं।

भारत वर्ष में सायन सौर संवत्सर, नक्षत्रिय सौर संवत्सर और निरयन सौर मास आधारित चान्द्र वर्ष की उत्पत्ति।

वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र प्रजापति ब्रह्मा हुए जिनकी पत्नी सरस्वती है।
प्रजापति की के पुत्र दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति भूमि पर प्रजापति हुए। और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भूमि के शासक हुए। लेकिन स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भी दक्ष प्रजापति (प्रथम) के द्वारा स्थापित धर्म व्यवस्था के परिपालक थे। दक्ष (प्रथम) द्वारा निर्धारित धर्म व्यवस्था के अनुरूप स्वायम्भुव मनु ने मानव धर्म शास्त्र के नाम से भूमि के लिए विधान लागू किया।
दक्ष (प्रथम) द्वारा निर्धारित धर्म व्यवस्था के अनुसार वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाला संवत्सर लागु किया। जो कल्प संवत, सृष्टि संवत और युग संवत के नाम से प्रचलित हुआ। स्वायम्भुव मनु ने इसी सायन सौर युग संवत को लागू किया।
भूमध्य रेखा पर दो सूर्योदय के बीच की औसत अवधि सावन दिन कहलाती है। यह अवधि तीस मुहूर्त अर्थात साठ घटि यानी 24 घण्टे होती है।
वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाला सायन सौर वर्ष 365.24219 सावन दिन का होता है। 
इस सायन सौर वर्ष में ही उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु, तथा दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती है।
सूर्य की उत्तर परम क्रान्ति से उत्तर तोयन और दक्षिण परम क्रान्ति से दक्षिण तोयन होता है।
वसन्त ऋतु में मधु-माधव मास, ग्रीष्म ऋतु में शुक्र- शचि मास, वर्षा ऋतु में नभः, नभस्य मास, शरद ऋतु में ईष-उर्ज मास, हेमन्त ऋतु में सहस् - सहस्य मास, और शिशिर ऋतु में तपः, तपस्त मास होते हैं।
उक्त बारह मास क्रान्तिवृत को तीस-तीस अंशों के बारह प्रधेय से सम्बन्धित हैं।
मास के तीस अंश या सायन सूर्य की संक्रान्ति से गत दिवस में दर्शाया जा सकता है। या मधु माधवादि सौर मास और चन्द्रमा की नक्षत्र में स्थिति से भी दर्शाया जाता है। वाल्मीकि रामायण में यह उल्लेख मिलता है। वर्तमान में दक्षिण भारत में निरयन सौर मास और चन्द्रमा को 13°20' के नक्षत्रों से दर्शाते हैं। जैसे निरयन सिंह के सूर्य में रोहिणी नक्षत्र के दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और श्रवण नक्षत्र के दिन वामन जयन्ती ओणम मनाते हैं।


प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीची की पत्नी सम्भूति से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ। दक्ष की पुत्री अदिति से महर्षि कश्यप के पुत्र आदित्य हुए। विवस्वान आदित्य के पुत्र श्राद्ध देव जो सप्तम मन्वन्तर के वैवस्वत मनु कहलाये। इन्हीं श्राद्ध देव के समय जल प्रलय हुआ था। जल प्रलय से जीवों , जन्तुओं और वनस्पतियों की जिन -जिन प्रजातियों को बचा लिया गया उन्ही से सप्तम मन्वन्तर प्रारम्भ हुआ। 
श्राद्ध देव की पत्नी श्रद्धा को भी शतरुपा कहा जाने लगा। इन्हीं वैवस्वत मनु की सन्तान सूर्य वंशी हुए। सूर्यवंशियों में कौशिक वंश में उत्पन्न राजा विश्वावसु महर्षि वशिष्ठ से पराजित होकर घोर तपस्या करने और महर्षि वशिष्ठ के मुख से अपने तप की प्रशंसा सूनकर से अन्तःकरण शुद्ध होने से ब्राह्मण हो गये। और विश्वामित्र कहलाये।
तपस्या के समय महर्षि विश्वामित्र ने नक्षत्रिय पद्धति की खोज की। नक्षत्रिय पद्धति में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत के मध्य में अर्थात 180 अंश पर माना जाता है। तदनुसार चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र का आदि बिन्दु माना जाता है।
यही नक्षत्रिय पद्धति आचार्य वराहमिहिर के समय निरयन पद्धति कहलाई।‌ निरयन पद्धति में अश्विन्यादि बिन्दु को निरयन मेषादि बिन्दु कहते हैं। पश्चिम टर्की, मिश्र और इराक के बेबीलोन में प्रचलित मेष- वृषभादि राशियों को नक्षत्रिय पद्धति में समायोजित करने का कार्य भी आचार्य वराहमिहिर के समय हुआ।
जब सूर्य के केन्द्र से भू केन्द्र चित्रा तारे के सामने होता है उसी समय सापेक्ष से भू केन्द्र से सूर्य का केन्द्र चित्रा तारे से 180° पर दिखता है।जब सूर्य चित्रा तारे से 180° पर होता है ठीक इसी समय नक्षत्रिय सौर वर्ष प्रारम्भ होता है।
नक्षत्रिय सौर वर्ष के प्रारम्भ को निरयन सौर नव वर्ष भी कहते हैं। भारत के मध्य भाग जिसमें शकों-कुषाणों और सातवाहन राजाओं का शासन रहा था उतने भाग को छोड़कर शेष भारत और नेपाल में नक्षत्रिय सौर संवत ही प्रचलित है।
पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में निरयन मेष संक्रमण से विक्रम संवत का प्रारम्भ वैशाखी नाम से किया जाता है। 

बङ्गाल, त्रिपुरा और बाङ्ग्लादेश मे निरयन मेष संक्रमण से बोंगलाब्द / बांग्ला सोन (बाङ्ला संवत) पोहेला बोइशाख (पहला वैशाख) से नोबो बोर्शो (नव वर्ष) प्रारम्भ करते हैं ‌।

 और उड़ीसा मे निरयन मेष संक्रमण से ओडिशा संवत *अनला संवत* नाम से प्रारम्भ होता है। यह ओडिशा का अनला संवत 1176 ईस्वी से प्रारम्भ हुआ।

असम में निरयन मेष संक्रमण से बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
असम के समान ही भूटान, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम और मेघालय में भी निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।

तमिल नाडु और पुडुचेरी में निरयन मेष संक्रमण से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।

केरल में निरयन मेष संक्रमण से विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।

इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।

ऋग्वेद में पवित्रादि चौबीस पक्षों का उल्लेख है। लेकिन वेदों में तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।
प्रजापति के मानस पुत्र (महाराष्ट्र के नासिक में  निवास करने वाले) महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसुया (दक्ष पुत्री) से तीन पुत्र  1 सोम (चन्द्रमा), 2 तन्त्र गुरु दत्तात्रेय और 3 महाक्रोधी मुनि दुर्वासा हुए।
चन्द्रमा ने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण कर लिया। बृहस्पति की पत्नी तारा से चन्द्रमा के पुत्र बुध हुए। 
प्रजापति के मानस पुत्र महर्षि मरीचि की पत्नी सम्भूति से महर्षि कश्यप हुए। दक्ष पुत्री अदिति से महर्षि कश्यप के पुत्र आदित्य हुए। आदित्य विवस्वान से श्राद्ध देव हुए जो सप्तम मन्वन्तर अर्थात वैवस्वत मन्वन्तर के मनु कहलाये।
श्राद्ध देव के समय ही महा जल प्रलय हुआ था। महामत्स्य की सहायता से श्राद्ध देव जन्तु-वनस्पतियों की जितनी प्रजातियाँ नौका में समेट पाये उन्ही से सातवाँ वैवस्वत मन्वन्तर चला।
वैवस्वत मनु के पुत्र सुद्युम्न हुए। जो शंकर-पार्वती के शाप से स्त्री हो जाया करते थे। पुरुष रूप मे वे इल कहलाते थे और स्त्री रूप में इला कहलाते थे।

वैवस्वत मनु की पुत्री इला से बुध के पुत्र एल पुरुरवा हुए। कैलाश शिखर के पूर्व में इन्द्र की राजधानी अमरावती में इन्द्र की नर्तकी इराक के उर नगर वासी उर्वशी अप्सरा से एल पुरुरवा ने अल्प कालिन सशर्त संविदा विवाह (मुताह विवाह) किया। गर्भवती होने पर उर्वशी इराक के नगर उर में अपने मायके चली गई। एल पुरुरवा के पुत्र आयु को जन्म दे कर स्तनपान की अवधि पूर्ण होने पर उर्वशी आयु को लेकर एल पुरुरवा को सोप कर इन्द्र सभा में लौट गई।
 आयु का लालन-पालन अकेले एल पुरुरवा ने एल पुरुरवा ने आयु को दक्षिण-पूर्व टर्की के तोरोत पर्वत के दक्षिण पूर्व में दजला (टाइग्रिस),फरात (युफ्रेटिस, हिद्दिकेत और पीशोन (गीहोन) ये चार नदियोंके उद्गम युफ्रेटस घाटी में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था। फिर हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका और असम के राजा विप्रचित्ति के पुत्र स्वर्भानु (राहु) की पुत्री प्रभा को आयु के मनोरञ्जन के लिए आयु के साथ रख दिया। समय-समय पर एल पुरुरवा आयु और प्रभा से मिलने आता रहता था। एल पुरुरवा ने आयु को अदन वाटिका में बुध और इला द्वारा रोपे दो वृक्षों के फल पकने तक तोड़ने और खाने से रोक रखा था। उन वृक्षों को एल पुरुरवा जीवन वृक्ष और बुद्धि का वृक्ष कहता था। 
 
लेकिन सीरिया वासी सुरसा के पुत्र नाग वंशी ने आयु को पुरुरवा के आदेश के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष के अधपके फल को खा लेने के लिए भड़काया।  जब एल पुरुरवा आया तो बुद्धि वृक्ष का फल नहीं दिखा।  पित्र आज्ञा उल्लंघन कर बुद्धि वृक्ष का फल खाने के कारण भयभीत हो कर आयु छुप गया। इधर बुद्धि वृक्ष का फल नहीं देखकर एल पुरुरवा समझ गया कि, आयु ने ही फल खाया है इसलिए डर रहा है।
एल पुरुरवा ने रुष्ट होकर आयु को अदन वाटिका के पूर्वी द्वार से निकाल दिया। आयु किसी व्यापारिक जहाज से प्रभा की दादी सिंहिका ( होलिका) के क्षेत्र सिंहल द्वीप (श्री लंका) पर श्रीपाद पर्वत पर पहूँच गया।
फिर समय बीतने पर सिंहल द्वीप से केरल होते हुए ओमान पहूँचा। ओमान से सऊदी अरब, इराक होते हुए अदन वाटिका लौटा।
राहु की पुत्री प्रभा से आयु के पुत्र नहुष हुए।
 शंकर -पार्वती की पुत्री अशोक सुन्दरी से नहुष का पुत्र ययाति हुआ ।
 ययाति को शुक्राचार्य जी की पुत्री देवयानी से  यदु, तुर्वसु दो पुत्र प्राप्त हुए। यदुवंश में श्रीकृष्ण हुए। तुर्वसु के नाम पर ही तुर्किस्तान का नाम पड़ा।और देवयानी की दासी दानवराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र पुरु, अनु और द्रुह्यु हुए। 
पुरु वंश में ही दुश्यन्त और शकुन्तला पुत्र राजा भरत हुए।भारत वर्ष में  इन भरत द्वारा शासित क्षेत्र का नाम पर भरतखण्ड है। इस भरत वंश में कुरु वंश हुआ जिसमें भीष्म, और कौरव- पाण्डव हुए।
चन्द्र वंशी पुरु, अनु और द्रुह्यु यदु और तुर्वसु  के परिचय हेतु उक्त विवरण दिया गया।

ऋग्वेद में वर्णित महर्षि वशिष्ठ के पौरोहित्य और इन्द्र के संरक्षण में मनुर्भरतों के तृत्सु वंश के सृंजय कुल के पिजवन/देववत के पुत्र दिवोदास और पौत्र सुदास के नेतृत्व मे मनुर्भरतों और सूर्य वंशियों से महर्षि विश्वामित्र जी के पौरोहित्य मे पूर्वी टर्की से आये ययाति के पुत्र, पुरु, अनु, द्रुह्यु, यदु और तुर्वसु,  आदि चन्द्रवंशियों और सीरिया से आये नाग वंशियों के साथ हुए शतवर्षीय दशराज युद्ध हुआ था। अर्थात भारत की ओर स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के वंशज भरत चक्रवर्ती के वंशज मनुर्भरत और सूर्यवंशी थे और पश्चिम एशिया और उत्तर की ओर पुरु, अनु, द्रुह्यु, यदु और तुर्वसु, आदि चन्द्रवंशी तथा सीरिया से आये नाग वंशी थे। युद्ध की समाप्ति के बाद सूर्य वंशियों को अयोध्या में बसाया गया, टर्की से आये चन्द्रवंशियों को प्रयागराज में बसाया गया और सीरिया से आये नाग वंशियों को कश्मीर में बसाया गया। मनुर्भरत हरियाणा और पञ्जाब में बसे रहे।
चन्द्रवंशियों के पुरोहित महर्षि विश्वामित्र जी के प्रभाव से चन्द्रवंशियों ने नक्षत्रिय सौर मास पर आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्रमास चलाये।

शकों-कुषाणो राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड के कुछ भागों में, बिहार, झारखण्ड के कुछ भागों में, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में निरयन सौर संक्रमण आधारित पूर्णिमान्त मास के साथ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाला शकाब्द प्रचलित हैं। और सातवाहन राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोआ, तेलङ्गाना और आन्ध्र प्रदेश मे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाला निरयन सौर संक्रमण आधारित अमान्त चान्द्र मास के साथ शालिवाहन शक प्रचलित है।
इसके अलावा गुजरात में  कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाला निरयन सौर संक्रमण आधारित अमान्त चान्द्र मास के साथ विक्रम संवत प्रचलित है।
और 
कम्बोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैण्ड, श्रीलंका के बौद्धों में भी निरयन सौर चान्द्र संवत प्रचलित है। यहाँ भी प्रायः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

खगोल विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) पर आधारित भारत में प्रचलित पाँच प्रकार के संवत्।

एस्ट्रोनॉमी के आधार पर तीन प्रकार के शुद्ध काल दर्शक (केलेण्डर) होते हैं। ---

(1) वसन्त सम्पात आधारित सायन सौर काल दर्शक -- यह वैदिक काल से प्रचलित है। तब कल्प संवत्सर के नाम से प्रचलित था। अब इसे कलियुग संवत या युग संवत कहते हैं।
कलियुग संवत 5127 का प्रारम्भ सायन मेष संक्रान्ति 20 मार्च 2026 शुक्रवार को 20:17 बजे से होगा।
वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाले सायन सौर वर्ष जो राष्ट्रीय केलेण्डर के चैत्र मास के प्रथम दिन के एक दिन पहले और ग्रेगरी केलेण्डर के 21 मार्च से प्रारम्भ होता है।
ईरान में भी वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति से जमशेदी नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
पारसी मतावलम्बी भी वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति से जमशेदी नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।

(2) तारों में भूमि और सूर्य को दर्शाने वाला नक्षत्रिय संवत अर्थात निरयन सौर संवत -- विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रेल 2026 मङ्गलवार को प्रातः 09:31 बजे से प्रारम्भ होगा।

जब सूर्य का परिभ्रमण करते हुए जब भूमि चित्रा तारे के सम्मुख होती है और भूमि से सूर्य चित्रा तारे से 180 अंश पर अर्थात अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर दिखता है। उस समय से प्रारम्भ होने वाला निरयन सौर संवत राष्ट्रीय केलेण्डर के चैत्र मास के प्रथम दिन के 24 वें दिन और ग्रेगरी केलेण्डर के 14 अप्रेल से प्रारम्भ होता है। जिसे पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में निरयन मेष संक्रमण से विक्रम संवत का प्रारम्भ वैशाखी नाम से किया जाता है। 
बङ्गाल, त्रिपुरा और बाङ्ग्लादेश मे निरयन मेष संक्रमण से बोंगलाब्द / बांग्ला सोन (बाङ्ला संवत) पोहेला बोइशाख (पहला वैशाख) से नोबो बोर्शो (नव वर्ष) प्रारम्भ करते हैं ‌।

 और उड़ीसा मे निरयन मेष संक्रमण से ओडिशा संवत *अनला संवत* नाम से प्रारम्भ होता है। यह ओडिशा का अनला संवत 1176 ईस्वी से प्रारम्भ हुआ।

असम में निरयन मेष संक्रमण से बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।
असम के समान ही भूटान, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम और मेघालय में भी निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।

तमिल नाडु और पुडुचेरी में निरयन मेष संक्रमण से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।

केरल में निरयन मेष संक्रमण से विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।

इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।

(3) शुद्ध चान्द्र वर्ष अर्थात अमावस्या से अमावस्या तक बारह चान्द्र मास का शुद्ध चान्द्र वर्ष का प्रारम्भ 26 जून 2025 से हुआ था। अब आगामी 15 जून 2026 से होगा।
भारत में शुद्ध चान्द्र वर्ष बोहरा समाज मनाता है। सऊदी अरब आदि मुस्लिम देशों में भी इसी दिन स्थानीय सूर्यास्त समय से मनाते हैं।
लेकिन 
भारत में मुस्लिम लोग एक दिन बाद एक दिन बाद चन्द्र दर्शन के बाद मनाते हैं।


भारत में इसके अतिरिक्त दो *सौर- चान्द्र संवत (लूनि सोलर केलेण्डर Luni Solar Calendar) और भी प्रचलित है ।* 


(4) *निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र शक संवत शकाब्द 1948 प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार को प्रातः 06:53 बजे से वर्ष प्रतिपदा या गुड़ी पड़वा को शकाब्द 1948 प्रारम्भ होगा।* 

 निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र शक संवत उत्तर भारत में मथुरा विजय के उपलक्ष्य में शकों और कूषाणों द्वारा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ किया गया। 
इसका प्रभाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड के कुछ भागों में, बिहार, झारखण्ड के कुछ भागों में, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान है। यहाँ पूर्णिमान्त मास प्रचलित है।
तथा 
दक्षिण भारत में सातवाहन राजाओं ने महाराष्ट्र में नासिक के पास पैठण विजय के उपलक्ष्य में प्रारम्भ किया गया। जिसका प्रभाव क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोआ, तेलङ्गाना और आन्ध्र प्रदेश में है। यहाँ अमान्त मास प्रचलित है।
इसके अलावा गुजरात में विक्रम संवत के साथ कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से सौर चान्द्र संवत प्रचलित है।
और 
कम्बोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैण्ड, श्रीलंका के बौद्धों में भी निरयन सौर चान्द्र संवत प्रचलित है। यहाँ भी प्रायः चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नव वर्ष प्रारम्भ करते हैं।

(5) सायन सौर चान्द्र संवत् ---
सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र शक संवत 1948 के प्रथम मास का प्रारम्भ भी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा 19 मार्च 2026 गुरुवार 06:53 बजे से प्रारम्भ होगा।

वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित दृक्सिद्ध पंचांग के रचयिता बापूदेव शास्त्री (नृसिंह) ने विश्व में पहली बार सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित सायन सौर चान्द्र पञ्चाङ्ग की अवधारणा प्रस्तुत की।

महाराष्ट्र के अहमदनगर में गोदावरी नदी के किनारे 'टोंके' नामक गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में शक सं 1743 में जन्मे बापूदेव शास्त्री (नृसिंह) की आरम्भिक शिक्षा नागपुर के मराठी विद्यालय में हुई ।
ये प्रयाग तथा कलकत्ता विश्वविद्यालयों के परिषद तथा आयरलैंड और ग्रेट ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी के सम्मानित सदस्य थे।
इनके अलावा 
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के आचार्य श्री दार्शनेय लोकेश नोएडा से श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम संवत 2064,शके 1929से अर्थात सन 2007 ईस्वी से आज तक प्रकाशित कर रहे है़ं। आचार्य श्री दार्शनेय लोकेश ने राष्ट्रीय शक केलेण्डर पर आधारित मासों को वैदिक मधु-माधव आदि नाम से और दिनांकों को गते के नाम से प्रचलित किया है।सायन सौर चान्द्र संवत शक के अलावा असमान विस्तार वाले अलग-अलग भोगांश के अट्ठाईस नक्षत्र
इस पञ्चाङ्ग की विशेषता है।
वर्तमान में महाराष्ट्र और आर्यसमाज में इस पञ्चाङ्ग को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है।


मुझे उक्त पाँच प्रकार के वर्ष गणनाओं में से वैदिक काल से प्रचलित एक तो वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाले शुद्ध सायन सौर संवत और संकल्पादि में और व्यवहार में 21 मार्च 2026 से लागू होने वाला कलियुग संवत 5126 मधुमास दिनांक 01 ही पूर्णतः स्वीकार्य है।
दुसरे क्रम पर चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु, निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य होने के समय से प्रारम्भ नक्षत्रिय विक्रम संवत 2083 वैशाखी, दिनांक 14 अप्रेल 2026 से प्रारम्भ होगा यह भी स्वीकार्य है।

भारत और पड़ोसी देशों में नक्षत्रिय नव संवत्सर।

निरयन मेष संक्रमण 13 उपरान्त 14 अप्रैल रविवार (Monday) को उत्तर रात्रि 03:22 बजे होगा।
महा पुण्यकाल 14 अप्रैल सोमवार को प्रातः 06:08 बजे से 08:15 बजे तक रहेगा। पुण्यकाल 12:27 बजे तक रहेगा।
विक्रम संवत 2082 का प्रारम्भ होगा। जो धार्मिक प्रयोजन और व्यवहार में वैशाखी 14 अप्रैल सोमवार को सूर्योदय से लागू होगा। इन्दौर में सूर्योदय समय 06:08 बजे होगा ‌।

वैशाखी 14 अप्रैल सोमवार को है।

ब्राह्मण ग्रंथों और श्रोत सूत्र -गृह्य सूत्र ग्रन्थों में चित्रा तारे को भूमि द्वारा सूर्य के परिभ्रमण पथ क्रान्ति व्रत के ठीक मध्य में अर्थात 180° पर माना जाता है। इसलिए चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु अर्थात अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु होता है। इसे निरयन मेषादि बिन्दु पर भी कहते हैं।*

निरयन मेष संक्रमण/ वैशाखी (14 अप्रैल) को ऐसा नव वर्ष होगा, जिसे आकाश में देखा जा सकेगा। लेकिन इसे आकाश का नित्य अवलोकन करने वाले किसान आदि और तारों (Star's) को पहचानने वाले खगोल शास्त्री ही समझ पाएंगे।

सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा पश्चिम में अस्त हो रहा होगा । और सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा पूर्व में उदय हो रहा होगा। यही इस नव संवत्सर प्रारम्भ होने की पहचान है।

पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और नेपाल में जिन दो सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होता है उसी दिन अर्थात 13 अप्रैल 2025 को सूर्योदय के समय वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। इसी दिन यहाँ विक्रम संवत 2082 का प्रारम्भ होगा।

बङ्गाल में जिन दो मध्यरात्रियों के बीच निरयन मेष संक्रमण होता है उसके आधार पर नववर्ष प्रारम्भ करते हैं। चुंकि, 13 उपरान्त 14 अप्रैल 2025 रविवार Monday को मध्यरात्रि के बाद मेष संक्रमण होगा इसलिए बङ्गाल में नबा वर्ष पाहेला बोईशाख अगले दिन के भी अगले दिन अर्थात 15 अप्रैल 2025 से प्रारम्भ होगा। बङ्गाल में लोग परस्पर सुभो नोबो बोरशो कह कर बधाई देते हैं।

उड़ीसा में (मध्यरात्रि के बाद निरयन मेष संक्रमण होने के कारण) दुसरे दिन 14 अप्रैल से पणा संक्रान्ति या महा बिशुबा के रूप में नव वर्ष मनाएंगे।

त्रिपुरा में भी निरयन मेष संक्रान्ति से ही नव वर्ष प्रारम्भ होता है।

असम में निरयन मेष संक्रान्ति से ही बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष मनाएंगे। बोहाग बिहु का प्रथम दिन गोरू बिहू कहलाता है।

तमिल नाडु में निरयन मेष संक्रमण सूर्यास्त के बाद होने के कारण 14 अप्रैल 2025 से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।
पुडुचेरी में भी तमिलनाडु के समान ही निरयन मेष संक्रमण दिवस से ही नव वर्ष मनाते हैं।

केरल में सूर्योदय पश्चात 18 घटि अर्थात 07 घणटे 12 मिनट के बाद निरयन मेष संक्रमण होने से 14 अप्रैल को विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।

इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रान्ति से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।