शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

अध्यात्म ज्योतिष तत्व

अध्यात्म ज्योतिष में ग्रहों में 
सूर्य को आत्मकारक या वैदिक अन्तरात्मा/ प्रत्गात्मा का कारक माना है। सूर्य अहंकार का शत्रु, अहंकार नाशक और आत्मविश्वास प्रदायक है। सूर्य सिर (मस्तिष्क और मस्तिष्क का), नेत्रों का और व्यक्तित्व का कारक भी है।

बृहस्पति को वैदिक जीवात्मा का कारक माना जाता है।, पौराणिक भी ब्रहस्पति को जीव कारक ही कहते हैं। ब्रहस्पति का नाम जीव भी है। ब्रह्मणस्पति ज्ञान का कारक भी है।
शनि को भूतात्मा देही (प्राण) का कारक माना जाता है।, पौराणिक भी शनि को धृति (धारयित्व/ धारण शक्ति/ और धैर्य) का कारक मानते है। प्राण की शक्ति धृति अर्थात धारणशक्ति है जिससे प्राण शरीर को धारण करता है।
पाराशरी मे शनि को सर्वोच्च मारकता लगती है, दूसरे क्रम पर ब्रहस्पति (जीव) आता है। अर्थात शनि यदि द्वितीय भाव और सप्तम भाव का कारक हो अथवा तृतीय भाव, पष्ट भाव और सप्तम भाव का कारक हो और अष्टम और द्वादश भाव से सम्बद्ध हो तो शनि की महादशा, अन्तर्दशा में ही मृत्यु ओगी। शनि मारक न हो और गुरु ब्रहस्पति मारक हो तो गुरु ब्रहस्पति की महादशा, अन्तर्दशा में ही मृत्यु ओगी। शनि, युरेनस और नेपच्यून को पैरों का कारक भी माना जाता है।
शुक्र ओज का कारक है।, (शुक्र/ वीर्य से ओजस्वी होने का घनिष्ठ सम्बन्ध है।)
मङ्गल तेज कारक, 
पौराणिक मंगल को जठराग्नि/ अग्नि और विद्युत दोनों का कारक मानते हैं। (वैदिक में तेज की शक्ति विद्युत है।)
नेपच्यून चित्त का कारक, चित्त वृतियों का, आस्था का संकेत नेपच्यून से ही मिलता है। श्रद्धा और विश्वास का सम्बन्ध भी नेपच्यून से ही है। फिर भी वैचारिक नवीनता एवम् परम्परा की सही दिशा में/ मूल दिशा में नव्य विचार का कारक भी नेपच्यून है।
यदि आप पात (नोड्स) को मानें तो दक्षिण पात जिसे केतु कहा जाता है को मानना पड़ेगा।
बुध बुद्धि कारक,
युरेनस अहंकार का कारक है। जड़त्व, दम्भ, अडिग निर्णय, उठापटक, व्यवस्था विरोधी भृमित मानसिकता का कारक है।
यदि आप पात (नोड्स) को मानें तो उत्तर पात जिसे राहु कहा जाता है को मानना पड़ेगा।
चन्द्रमा मन का कारक, चन्द्रमा मन से उत्पन्न वैदिक मत है।
दशम भाव आकाश का,
नवम भाव अन्तरिक्ष का,
चतुर्थ भाव पाताल का,
लग्न पूर्व क्षितिज और देह का,
सप्तम पश्चिम क्षितिज और व्यवहार तथा पार्टनर का कारक होता है।

लग्न जातक के व्यक्तित्व, देहयष्टि, तन और सिर का कारक होता है।
द्वितीय भाव जातक के गुणों का, वाणी का, मुख का, दाहिनी आँख (द्वादश बाँयी आँख का) का कारक होता है।
तृतीय भाव जातक के कण्ठ का, (दाहिने कान एकादश बाँये कान का) कानों का, गरदन का, हाथों का, (दाहिने हाथ का), पराक्रम का कारक होता है।
चतुर्थ भाव जातक के वक्ष/ छाती/ सीने का, हृदय का, फेंफड़ों का, (श्वसन तन्त्र और परिसंचारी तन्त्र का) कारक है। दशम पीठ का कारक होता है।
पञ्चम भाव उदर का, पाचन तन्त्र का, गर्भाशय का, ( एकादश भाव कमर का), कारक होता है।
षष्ट भाव रोग का, दाहिनी जाँघ का (अष्टम बाँयी जाँघ का), लिङ्ग का (अष्टम गुदा का), कारक होता है।
सप्तम भाव शरीर के अन्त का (द्वादश भाव भी), पेरों का, (द्वादश भाव भी), घुटनों का कारक होता है।
अष्टम भाव पिण्डलियों का, गुप्तांगों का, पाइल्स- भगन्दर रोग, केन्सर रोग, मृत्यु के समय की अवस्था/ स्थिति का कारक होता है।
नवम भाव कमर का कारक होता है।
दशम भाव वक्षस्थल, पीठ का, धड़ का कारक होता है।
एकादश भाव गरदन, कन्धे, बाँये कान का कारक होता है।
द्वादश भाव सिरों का, शीर्ष का, बाँयी आँख का कारक होता है।
तदनुसार निरयन मेषादि द्वादश राशियों को भी समझना चाहिए।
इसी प्रकार नक्षत्रों को और भी सुक्ष्मता से समझना चाहिए।

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