मूलतः श्राद्ध भोजन सप्त पितरः और दस विश्वेदेवाः के निमित्त किया जाता है।
सृष्टि उत्पत्ति क्रम में -- सबसे पहले के वल परमात्मा ही था परमात्मा - परम आत्मा - परम आत्म अर्थात परम मैं, वास्तविक मैं, सबका वास्तविक स्वरूप।
परमात्मा के कल्याणमय ॐ सञ्कल्प से परब्रह्म (ब्रह्म से भी परे) परमेश्वर सर्वव्यापी विष्णु और उनकी शक्ति माया हुए। विष्णु के गुण - सत (अस्तित्व अर्थात है पन अर्थ है), चित (ज्ञान स्वरूप), आनन्द और सर्ववयापकता तथा निरन्तर विस्तार होते रहना, जो सबसे बड़े से भी सबसे बड़ा होने से परब्रह्म कहलाता है।
परमात्मा के उसी ॐ सञ्कल्प से आगे और विस्तार होकर ब्रह्म सवितृ और उनकी शक्ति सावित्री। गायत्री मन्त्र इन्हीं सवितृ की उपासना है।
ब्रह्म मतलब बड़े से महा या महा से भीई बड़ा। सवितृ के गुण हैं - वे सृष्टि के जन्मदाता जनक हैं, प्रेरित करने वाले प्रेरक हैं, और रक्षक हैं। इन्हीं को प्रभविष्णु और उनकी शक्ति श्री और लक्ष्मी कहलातीं हैं। भू-भव मतलब होना, प्रभ मतलब जो हुआ और जिससे सब-कुछ हुआ। विष्णु मतलब सर्वव्याप्त। प्रभविष्णु मतलब सर्वत्र विद्यमान रहने वाला जिससे सब-कुछ हुआ है।
श्री मतलब सत्ता, अधिकार, आधिपत्य (राज्य, शासन, जायदाद, अचल सम्पत्ति, गुण- विशेषताएँ) और लक्ष्मी मतलब दृश्यमान सम्पत्ति (चल सम्पत्ति, मुल्यवान रत्न, स्वर्ण आदि),
ब्रह्म प्रभविष्णु-श्री लक्ष्मी (सवितृ-सावित्री) से अपर ब्रह्म (ब्रह्म से छोटे) नारायण श्रीहरि और उनकी शक्ति नारायणी कमलासना गण सेविता लक्ष्मी प्रकट हुए।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में जिस विश्वरूप को कालोऽस्मि कहा है वह नारायण ही हैं। अर्थात अब पहली बार काल अस्तित्व में आया। इसलिए इनकी और इनके पहले प्रकट हुए स्वरूपों की काल गणना आयु अवस्था (वय Age) नहीं बतलाई जा सकती।
अपरब्रह्म नारायण श्रीहरि के सञ्कल्प से नारायण के केन्द्र (नाभि) में अण्डाकार (पाँच मुखी) हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुए।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की शक्ति वाणी है। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ही वेदों (ज्ञान) को प्रकट करने वाले वक्ता हैं। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ही विश्व रचियता विश्वकर्मा हैं। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को त्वष्टा और उनकी शक्ति रचना के रूप में जाना जाता है। ऋग्वेद के अनुसार त्वष्टा ने सृष्टि के बड़े बड़े नक्षत्र (तारे) और ग्रहों उपग्रहों आदि के गोले सुतार (बढ़ई) की भाँति गढ़ा (घड़ा)।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की आयु 31 नील, 10 खरब, 40 अरब मानव वर्ष है। उसमें से आधी आयु पूर्ण कर चुके हैं। जब ये अपर ब्रह्म नारायण में लीन हो जाएँगे तब प्राकृत प्रलय हो जाएगा। नारायण श्रीहरि और नारायणी कमलासना गज सेविता लक्ष्मी ही रह जाएँगे।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के द्वारा अर्धनारीश्वर एक रुद्र, सनक सनन्दन सनत्कुमार और सनातन तथा नारद, धर्म और उनकी शक्ति धृति (धारण शक्ति/ धैर्य) और कामदेव एवम् उनकी शक्ति रति हुए।
वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के सञ्कल्प से चारों ओर मुख वाले (गोलाकार) प्रजापति ब्रह्मा हुए। प्रजापति ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती है।
प्रजापति ब्रह्मा की आयु चार अरब, बत्तीस करोड़ मानव वर्ष है। ये भी अपनी आधी से अधिक अवस्था (वय) 01 अरब, 97 करोड, 29 लाख, 49 हजार 127 मानव वर्ष पूरी कर चुके हैं। जब ये वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में लीन हो जाएँगे तब नैमित्तिक प्रलय हो जाएगा। केवल आकाश, अन्तरिक्ष, सूर्यादि तारे ही बचेंगे और महर्लोक निवासी ब्रह्मर्षि गण बचेंगे।
सरस्वती हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस पुत्री मानी जाती है। और प्रजापति ब्रह्मा की पत्नी हैं।
इन्हीं ने मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ की।
प्रजापति ब्रह्मा के कहने पर अर्धनारीश्वर एक रुद्र स्वयम् शंकर और उमा के स्वरूप में प्रकट हुए। प्रजापति ब्रह्मा के बाद तैंतीस देवताओं में सबसे बड़े होने के कारण महादेव कहलाते हैं।
प्रजापति ब्रह्मा से
*(1) दक्ष प्रजापति (प्रथम)-प्रसुति, (2) रुचि प्रजापति-आकुति और (3) कर्दम प्रजापति-देवहूति। 4 *स्वायम्भुव मनु-शतरूपा ये चारों भूस्थानी प्रजापति हुए।
प्रसुति, आकुति और देवहूति भी ब्रह्मा की मानस सन्तान है किन्तु इन्हे स्वायम्भुव मनु-शतरूपा की पुत्री भी कहा जाता है।
प्रजापति ब्रह्मा के इन मानस पुत्रों के अलावा ग्यारह मानस पुत्र और भी हैं। जिनमें से दो देवस्थानी प्रजापति (1) इन्द्र - शचि और (2) अग्नि - स्वाहा एवम् एक (3) सप्त पितर - स्वधा।
प्रजापति ब्रह्मा के पौत्र और वाचस्पति के पुत्र आठ भूस्थानी प्रजापति ये हैं (4) मरीची-सम्भूति, (5) भृगु-ख्याति, (6) अङ्गिरा-स्मृति, (7) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (8) अत्रि-अनसुया, (9) पुलह-क्षमा, (10) पुलस्य-प्रीति, (11) कृतु-सन्तति। ये सभी ब्रह्मर्षि भूस्थानी प्रजापति हुए। ये सभी ब्रह्मज्ञानी हैं और इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और उनकी पत्नी प्रसुति की पुत्रियाँ थी। इन *ब्रह्मर्षियों का वासस्थान ब्रह्मर्षि देश कहलाता है। (ब्रह्मर्षि देश यानी हरियाणा में गोड़ देश अर्थात कुरुक्षेत्र के आसपास का क्षेत्र) एवम इनकी सन्तान ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण हुए।*
इन्द्र - शचि और अग्नि - स्वाहा और नारद जी के अलावा निम्नलिखित स्वर्गस्थानी देवगण हुए
(12) रुद्र- रौद्री (शंकर - सति पार्वती) - रुद्र मूलतः अन्तरिक्ष स्थानी देवता है लेकिन भूलोक में हिमालय में शंकरजी कैलाश वासी भी हैं।
(13) धर्म - और उनकी तेरह पत्नियाँ । (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) ये देवस्थानी प्रजापति हैं। इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और प्रसुति की कन्याएँ थी । धर्म द्युलोक का अर्थात स्वर्गस्थानी देवता है। लेकिन भूमि पर कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहाजाता है। इनके अलावा (14) पितरः - स्वधा अन्तरिक्ष स्थानी प्रजापति हुए। पितरः ने स्वयम् सप्त पितरों और उनकी शक्ति (पत्नी) को में प्रकट किया। जिनमें से *(१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं।*
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद बाल ब्रह्मचारी ही रहे। अतः प्रजापति के स्थान पर मुनि और देवर्षि ही कहे जाते हैं।
*श्राद्ध में स्वधा बोलते हुए इन्ही सात पितरों को कव्यभाग अर्पित कर तृप्त किया जाता है। (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं। इसलिए श्राद्ध में सात ब्राह्मण को और स्वधा के निमित्त इन ब्राह्मणों से अलग परिवार की एक विदुषी ब्राह्मणी को भोजन करवाया जाता है।*
*इनके साथ ही दस विश्वैदेवाः (1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान को भी कव्य भाग अर्पित करते हैं।*
*इसलिए गुरुकुल के आचार्य सात वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ कुछ लोग गुरुकुल के दस बटुक (विप्र ब्रह्मचारियों) को भी भोजन करवाते हैं।*
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