यदि सुत्त पिटक पढ़ो तो पता लगता है कि, सिद्धार्थ गोतम बुद्ध स्वयम् वेदों और ब्राह्मणों का अत्यधिक आदर करते थे।
चार सौ साल बाद श्रीलंकाई और तत्कालीन ब्रह्म देश म्यांमार के बौद्धों द्वारा संचालित अभिधम्मपिटक में वेद विरुद्ध मत और ब्राह्मण विरोधी मत घुसाए गए।
भगवान श्रीकृष्ण के चचेरे भाई अरिष्टनेमी जो जैनियों के तीर्थंकर हैं तक अष्टाङ्ग योग साधना और सांख्य दर्शन जैसे वेदों के प्रति आसक्ति दर्शन के ही अनुयाई थे।
गुरु ग्रन्थ साहिब में अधिकांश पद कबीरदास जी रचित हैं। और वेदों और ब्राह्मणों के प्रति अतिशय आदर दर्शाया गया है। गुरु नानक देव के पुत्र चन्द्र देव ने उदासीन अखाड़ा की स्थापना की थी, और उदासीन अखाड़ा के साधु सन्त अमृतसर हरि मन्दिर साहिब में यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ और योग साधना करते थे।
वह तो अंग्रेजो ने मास्टर ताराचंद जैसे अपने अनुयायियों के माध्यम से खालसा पन्थ के अनुयायियों को सनातन धर्म से अलग हो कर अल्पसंख्यक कहलाने के लाभ बतलाये और भड़काया।
भगवान श्री कृष्ण के सबसे अधिक भक्त और मन्दिर दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी के वन गमन सम्बन्धित महत्वपूर्ण तीर्थ महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल में है।
महेन्द्र पर्वत के आस-पास भगवान परशुराम जी के द्वारा स्थापित परशुरामेश्वरम मन्दीर केरल में गुरुवायुर, कोझिकोड और कण्णुर क्षेत्र में है। वहाँ श्रीकृष्ण भक्त भी हैं।
उसके बाद सर्वाधिक श्रीकृष्ण भक्त बङ्गाल और उड़ीसा में है।
सौर सम्प्रदाय के मन्दिर गुजरात और उड़ीसा में हैं।
पुरे भारत का प्रत्येक सम्प्रदाय वेदों को सर्वोच्च प्रमाण मानता है।
यह सब मेकाले के मानस पुत्रों को नहीं दिखता।
पूरे विश्व में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भाषा बदल जाती है। फिर भी भारत में संस्कृत मूल और तमिल मूल की भाषाएँ ही प्रचलित है।
ऐसे ही पूरे विश्व में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल पहनावा, वेश-भूषा भी बदलती है। लेकिन मेकाले के मानस पुत्र भाषा भेद और भुषा भेद ही दर्शाकर भारत को विभिन्न संस्कृतियों का गठबंधन सिद्ध करते रहते हैं। और अनेकता में एकता बतला कर भारतियों की प्रशंसा बटोरने में सफल हो जाते हैं।
जबकि छद्म रूप से वे भारत को विभिन्न टुकड़ों में बँटा हुआ सिद्ध करते हैं।
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