फिर उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर के सूर्यवंशी अयोध्या में बसाये गए। और टर्की से आये चन्द्र वंशियों तथा सीरिया से आये नागों को उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर में बसाया गया। लेकिन वे भी चन्द्र वंशियों के सामने नहीं टिक पाये। और प्रयागराज तथा बिहार, झारखण्ड में बस गये।
ईराक के असुरों ने सेवन सिस्टर्स के असम मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड तथा श्री लङ्का आदि में फैल गये। अफ्रीका से आये राक्षस लक्ष्यद्वीप में बस गये।
दास-दस्यु (दृविड़) तमिलनाडु में बस गये। चोर (चोल) कर्नाटक में और आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र बस गये।
ब्रह्मर्षियों की सन्तान जो हरियाणा में बसी थी और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत सन्तान जो पञ्जाब, सिन्ध, बलुचिस्तान और अफगानिस्तान में बसी थी। जिन्हें मनुर्भरत कहा जाता था। तथा उत्तानपादासन और ध्रुव की सन्तान ईरान में बसी थी वे सब चारों ओर से ययाति के पाँचो पुत्रों (चन्द्रवंशियों) और नागों से घिर गए।
जब वैदिक काल के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल से सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल त्रेतायुग में ही यह हाल था तो अब तो कलियुग में समय ही उनका है।
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