भगवान आद्य शंकराचार्य जी सहित सभी दक्षिण भारतिय आचार्यों, सन्तों और वेदान्तियों में यह परम्परागत भ्रम है कि, संन्यासी को निरग्नि होकर यज्ञ नहीं करना चाहिए।
वास्तव में तो संन्यासी को वनवासी ही रहना चाहिए, एक स्थान पर दुसरे रात्रि नही रहना चाहिए, अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए, केवल बिना तोड़े, बिना उखाड़े, बिना खोदे, जो पत्र, फल, कन्द- मूल भूमि पर पड़े मिल जाए या बिना मांगे कोई कुछ खाद्य वस्त्रादि दे दे वही ग्रहण करना चाहिए। वस्त्र भी फटकर गिरजाए तो दिगम्बर ही रहे। खाद्य न मिलने पर भूखा ही रहे। शय्या त्याग तो वानप्रस्थ के अन्तिम चरण में ही कर देते हैं।लेकिन इन नियमों की अवहेलना कर दी। और अग्निहोत्र का त्याग कर दिया।
इस भ्रम के पीछे रहस्य यह है कि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अर्धनारीश्वर एक रुद्र और सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन अग्निहोत्र देवयज्ञ नहीं करते थे।
तो उसका उत्तर पुरुष सूक्त में यज्ञ के वर्णन में ही है।
जब न कोई सामग्री थी, न कोई देवता था, न विधि थी तो यज्ञ होने का प्रश्न ही नहीं। तब तक तो वस्त्र भी नहीं थे। ये लोग प्रथम साकार रचना थे। इसके पहल हिरण्यगर्भ ब्रह्मा तक तो सब निराकार, या तरङ्गाकार या आकाश या वायु या सूर्य के समान आकृति वाले थे, जिन्हें वस्त्र या आसन की आवश्यकता ही नहीं होती।
ब्रह्म यज्ञ,देवयज्ञ, नृ यज्ञ, भूत यज्ञ और पित्र यज्ञ (श्राद्ध नहीं) नामक पञ्च महायज्ञ, संस्कार और अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ आदि की विधि-विधान और निषेध तो प्रजापति के पुत्र दक्ष प्रथम और प्रसुति ने की। पितृ श्राद्ध के विधि-विधान और निषेध की व्यवस्था प्रजापति के पुत्र रुचि प्रजापति और आकुति ने की। तथा योग जिसे अध्यात्म नाम से जाना जाता है, उसके विधि-विधान-निषेध प्रजापति के पुत्र कर्दम प्रजापति और देवहुति ने की। और महर्षि कपिल को सिखाया।
अद्वैत वेदान्तियों का यह तर्क दमदार है कि, देव यज्ञ में इदम् विष्णवे न मम् बोलना होता है जो द्वैत/ त्रेत की पुष्टि करता है। एक तरफ उपनिषद श्रवण पश्चात महावाक्यों के श्रवण, चिन्तन मनन से अद्वैत सिद्धि का प्रयत्न और दुसरी तरफ द्वैत स्वीकारना दोनों एक साथ सम्भव नहीं है।
इसका उत्तर यह है कि, केवल महावाक्य श्रवण, चिन्तन, मनन, निदिध्यासन के समय ही देव यज्ञ न करें बस उसके पहले तो सबको पञ्च महायज्ञ और वर्णाश्रम धर्म पालन अवश्य करणीय कार्य (कर्तव्य) कर्म है।
मीमांसा - श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि, विद्वत् ज्ञानी महाजनों का अनुसरण जन सामान्य करता है। यदि ये महाजन यज्ञ न करेंगे तो सबलोग यज्ञ धर्म त्याग देंगे। और वही हुआ भी। इस लिए श्री कृष्ण ने कहा मेरे लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं होते हुभी मैं कार्य कर्म करता हूँ।
दुसरा बादरायण ने शारीरिक सूत्र में लिखा है कि, ना विशेषात। अर्थात ज्ञानी संन्यासी के लिए कोई विशेष विधि-निषेध नहीं है। वे यथा परिस्थिति जो उचित समझें वही करें। क्योंकि वे किसी आदेश से परे हैं।
इसलिए ऋषभदेव जी और भरत मुनि जैसे कुछ संन्यासियों ने ज्ञान प्राप्ति के बाद भी यज्ञादि कर्मों का त्याग जारी रखा। जबकि दक्ष प्रजापति और विदेह जनक जैसे ज्ञानियों ने ज्ञान प्राप्ति पश्चात भी वर्णाश्रम व्यवस्था अनुसार यज्ञ जारी रखे।
अद्वैत वेदान्तियों का विरोध करने वाले महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी भगवान आद्य शंकराचार्य जी के पहले से दक्षिण भारत में प्रचलित प्रचलित संन्यास परम्परा को ही मान्य किया।
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