सरस्वती नदी का मूल उद्गम स्थल भारत के उत्तराखण्ड राज्य में चमोली जिले मे बद्रीनाथ के निकट माणा गांव से तीन किलोमीटर दूर रूपण नाम के हिमनद (ग्लेशियर) से होता था। रूपण ग्लेशियर को अब सरस्वती ग्लेशियर भी कहा जाने लगा है। नैतवार में आकर यह हिमनद जल में परिवर्तित हो जाता था, फिर जलधार के रूप में आदिबद्री तक सरस्वती बहकर आती थी। यहाँ से निकल कर वर्तमान में केशव प्रयाग में सरस्वती और अलकनंदा का संगम होता है। फिर हिमाचल के सिरमौर क्षेत्र के दक्षिणी में उत्तराखण्ड सीमा से, पंजाब, हरियाणा मे घघ्घर-हकरा नदी प्रणाली के साथ बहती हुई, पश्चिम राजस्थान मे अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में बहती हुई, बीकानेर से होते हुए और गुजरात से होते हुए कच्छ के रण में अरब सागर में मिलती थी। अब घग्घर नदी सूख चुकी है जो पाकिस्तान में हकरा कहलाती है। राजस्थान की मरुभूमि में हनुमानगढ़ के पास रेत में लुप्त हो जाती है और कच्छ के रण में भूमि में समाकर अन्दर ही अन्दर बहते हुए अरब सागर में मिलती है।
सतलुज तथा यमुना की कुछ धाराएं सरस्वती नदी में आ कर मिलती थीं। इसके अतिरिक्त दो अन्य लुप्त हुई नदियाँ दृष्टावदी और हिरण्यवती भी सरस्वती की सहायक नदियां थीं। लगभग 1900 ईसा पूर्व इस क्षेत्र में भीषण भूकम्प आए, जिसके कारण जमीन के नीचे के पहाड़ ऊपर उठ गए भूगर्भी बदलाव के कारण घग्घर का पानी यमुना में चला गया। यमुना, सतलुज ने अपना रास्ता बदल दिया तथा दृष्टावदी नदी हरियाणा से हो कर बहती थी। उत्तर और पूर्व की ओर बहने लगी यमुना पहले चम्बल की सहायक नदी थी। लेकिन अब चम्बल नदी यमुना की सहायक नदी है दृष्टावदी नदी का पानी मिलने से दृष्टावदी नदी भी यमुना ही बनकर रह गई। इसी समय सरस्वती का जल भी यमुना में मिल गया। बहुत बाद में यमुना प्रयागराज में गंगा से जाकर मिली। दृष्टावदी नदी के 2600 ईसा पूर्व सूख जाने के कारण सरस्वती नदी का जल पीछे की ओर चला गया और सरस्वती नदी भी लुप्त हो गयी।
जब वैदिक काल में सरस्वती नदी को सबसे प्रमुख और पवित्र नदी माना जाता था। सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता के 2335 गाँवों में विकसित हुई और 265 गाँव ही सिन्धु तट पर पाकिस्तान में हैं।
लगभग 4000 से 3000 ईसा पूर्व में भूकम्प के कारण हरियाणा राजस्थान के कुछ क्षेत्र ऊंचे हो गये । इस कारण सरस्वती की सहायक नदियों यमुना और सतलुज में सरस्वती नदी का पानी चला गया। सरस्वती नदी के अवशेष आज भी भूमिगत रूप से बहते माने जाते हैं और पौराणिक कथाओं में इसका ज्ञान और वाणी की देवी के रूप में भी वर्णन है।
वैदिक काल में यह एक विशाल, बारहमासी नदी थी, जो गंगा जितनी ही महत्वपूर्ण थी, और इसके किनारे वैदिक सभ्यता फली-फूली।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अन्य शोधों के अनुसार, यह नदी आज भी थार रेगिस्तान के नीचे भूमिगत रूप से बह रही है, जिसके निशान सैटेलाइट इमेजरी में देखे गए हैं।
ऋग्वेद में इसे 'नदीतमा' (सर्वश्रेष्ठ नदी) कहा गया है और यह ज्ञान की देवी का प्रतीक है, जो भगवान प्रजापति ब्रह्मा की पत्नी हैं।
सरस्वती के पानी के यमुना में मिलने के कारण प्रयागराज में गंगा, यमुना के साथ सरस्वती का संगम (त्रिवेणी) की पौराणिक मान्यता का है।
महाभारत युद्ध के समय बलराम ने सरस्वती नदी के किनारे के तीर्थों की यात्रा की थी और सरस्वती नदी में कई तीर्थस्थलों का उल्लेख मिलता है।
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