शनिवार, 13 दिसंबर 2025

भारत की दासता का इतिहास।

वर्ष 550 ईसा पूर्व में पारसी मतावलम्बी करूष ने अफगानिस्तान और सिन्ध पर आक्रमण किया। और यहाँ पारसी मत का प्रचार-प्रसार किया। अफगानिस्तान बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, सिन्ध और पञ्जाब में इनका प्रभाव आज तक है।

326 ईसापूर्व में अलेक्ज़ेण्डर यूनानी ने इरान, अफगानिस्तान बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, सिन्ध और पञ्जाब पर आक्रमण किया और अपने क्षत्रपों को उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, बलुचिस्तान क्षेत्र में क्षत्रपों को शासक बनाया।
और युनानी मत और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया । अफगानिस्तान, बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, सिन्ध और पञ्जाब में इसका प्रभाव आज तक भी है। बाद में ये भी भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए और श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

तुर्क - शक- 120 ईसा पूर्व से 388 ईस्वी तक शकों चष्टान, रुद्रदामा ने सिन्ध पर आक्रमण किया और जीत कर शासन किया। पहले ये बौद्ध थे पर बाद में उत्तर भारत में शैव मत तथा उत्तर भारत में प्रचलित प्रायः अट्ठाईस से बत्तीस चान्द्रमासों के बाद एक अधिक मास वाला और 19 वर्षों, 122 वर्षों और 141 वर्षों में एक क्षय मास और क्षय मास के पहले और बाद में एक-एक अधिक मास वाला तिथि पत्रक का प्रचार-प्रसार किया। जो बाद में दक्षिण भारत में सातवाहन वंशीय राजाओं ने शालिवाहन शक और उत्तर भारत में कुषाण वंशीय क्षत्रपों ने शकाब्द के रूप में प्रचलित किया।

तुर्क - कुषाणों 60 ईस्वी से 240 ईस्वी तक कुषाणों ने आक्रमण कर मथुरा को राजधानी बनाकर मध्य भारत तक शासन किया। पहले ये भी पारसी और बौद्ध थे तथा बाद में श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

तुर्क - हूण - हुणों ने युरोप में बहुत मारकाट मचाई। फिर तुरमानशाह और मिहिरगुल ने  ईरान, अफगानिस्तान होते हुए उज्जैन तक आक्रमण कर उत्तर भारत में नाथ पन्थ-शैव मत का प्रचार-प्रसार किया।
उक्त युनानी, शक-कुषाण और हुणों को भारतियों ने अपना लिया और भारतीय करण कर दिया और इन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय और शैव सम्प्रदाय अपना लिया।इसलिए लोग इन्हें प्रायः भूल गए।
लेकिन 
इराक-अरब, तुर्क, अफ़ग़ान के गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, लोदी, मुस्लिम आक्रांताओं ने अरबी संस्कृति, तुर्की, अरबी और फारसी भाषा को कभी नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि, मंगोलिया से कजाकिस्तान में बसे चंगेज खान जो मंगोलिया का तन्त्र मतावलम्बी था, उसके वंशज तेमुर लङ्ग ने इस्लाम अपना कर और तुर्कों के मिश्रण से बने मुगल वंश के बाबर, हिमायु, अकबर, जहाङ्गीर, शाहजहाँ, ओरङ्जेब, और बहादुर शाह जफर तथा बङ्गाल तथा अवध के नबाब और दक्षिण के बहमनी वंश, हैदराबाद के निजाम, कर्नाटक मेसुर के हेदर अली और टीपू सुल्तान भी इस्लामी कट्टरवाद के अनुयाई रहे। मुस्लिमों ने कभी भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति और भारतीय धर्म नहीं अपनाया।
इसलिए ये भारत में रहकर भी स्वयम् को अरबी ही समझते हैं। यहाँ तक कि, मुस्लिमों ने जिन भारतिय कलाकारों, किसानों, कारिगरो को जजिया लगाकर कर मुस्लिम बनाया, सम्पन्न लोगों को लूटकर मुस्लिम बनाया, महिलाओं का बलात्कार करके मुस्लिम बनाया, सूफियों ने छल-कपट पूर्ण तन्त्र का चमत्कार बतलाकर किसी भी प्रकार से जबरन मुसलमान बनाया उन भारतीय मुसलमानों ने भी अपने आप को सच्चा अरबी सिद्ध करने का प्रयत्न किया। और जो वापसी चाहते थे, उन्हें सनातन धर्मियों ने नहीं अपनाया।
 इस्लाम की इस प्रवृत्ति के कारण मुस्लिम पुरे विश्व में सदैव अलग-थलग रहे।
इसका लाभ पुर्तगीज, डच, फ्रेंच और ब्रिटिश लोगों ने लिया। युरोपीयों ने समझ लिया कि, भारतियों में मतों, पन्थों, सम्प्रदायों और राजाओं में अत्यधिक फूट है।
उक्त सभी युरोपियों ने 1498 से 1857 तक युरोपीय व्यापारिक कम्पनियों और 1857 के बाद भी मुख्यतः ब्रिटिश साम्राज्य और कुछ पुर्तगाल, फ्रांस और डचों के अधिकृत छोटे-छोटे राज्यों में यही क्रम जारी रहा।
युरोपीयों ने भारतियों को युरोपीय संस्कृति और ईसाईयत अपनाने के लिए भारत के गुरुकुल तो बन्द करा दिए लेकिन मदरसे चलने दिये। पारसियों को मान-सम्मान दिया, मुस्लिमों को विश्वास में लिया और बौद्धों और खालसाओं के विलगाव को बढ़ावा दिया। 
जैनों पर शायद इनका ध्यान नहीं गया और सनातनियों को ईसाई बनाने के लिए जातिप्रथा का लाभ लेकर फूट डाल कर, कृषको पर लगा बढ़ाकर और अपनी पसन्द की नील, सेब आदि व्यावसायिक फसलें लगवा कर, जमिदारों से भूमि छिन कर, राजाओं आपस में लड़वाकर फिर बन्दर बाट के माध्यम से दोनों पक्ष के राजाओं को आधीन कर, सन्धी से जोड़कर, गोद लेने का अधिकार छीन कर, ब्रिटिश मिलों का सस्ता कपड़े बेंच कर, सूत और रेशम के वस्त्रोद्योग पर प्रतिबन्ध लगा कर बन्द कर दिए।
आधुनिक मशनरियों के कारण बड़ई (सुथार) , लोहार, सोनार (सुनार) आदि विश्वकर्माओं को बेरोजगार कर दिया। फिर लोगों को अफ्रीका ले जाकर दास बना दिया। विश्वयुद्धों में जबरन सैनिक बना दिया। सभी प्रकार के प्रयास करके सनातन धर्मियों की जनसंख्या कम कर गये।

लेकिन 
1857 मे अधिकांश मुस्लिम रियासतों ने मुगल बादशाह बहादुर के नेतृत्व में कुछ क्षेत्रीय और छोटी-मोटी सनातनी रियासतों ने मिलकर इस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध युद्ध छेड़ा जिसमें पञ्जाब के महाराजा रणजीत सिंह (खालसा रियासत), सिन्धियाँ की ग्वालियर रियासत जैसी मराठी रियासतों ने भाग नहीं लिया। उसके बाद स्थानीय स्तर पर छुट-पुट संघर्ष चलते रहे।
तभी अफ्रीका से लौटे गांधी जी ने 
1917 में गांधी जी का नील किसानों के अधिकारों के लिए चंपारण में भारत का पहला सफल सत्याग्रह किया और 
1918 गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों के समर्थन में दुसरा सफल सत्याग्रह  किया। 
1920-22 में असहयोग आंदोलन; ब्रिटिश सरकार के साथ किसी भी सहयोग से इनकार करना, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी पर जोर शामिल था इससे गांधी जी लगभग जन नेता बन गए। लेकिन गांधी जी गलती यह कर गये कि, चौरी-चौरा घटना के बाद इसे स्थगित कर दिया गया। इससे देशबन्धु चितरञ्जन दास जैसे वरिष्ठ नेता रुष्ट होकर अलग हो गये।
1930-34 में सविनय अवज्ञा आंदोलन , नमक कानून तोड़ने के लिए 'दांडी मार्च' से शुरू हुआ, इसने ब्रिटिश कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया.
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन; "करो या मरो" के नारे के साथ, इसने ब्रिटिश शासन को तुरंत समाप्त करने की मांग की। जिसे अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
इन आंदोलनों ने समाज के सभी वर्गों, समुदायों और क्षेत्रों के लोगों - किसानों, मजदूरों, महिलाओं और छात्रों - को एक साथ स्वतंत्रता के एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट कर ब्रिटिश शासन पर दबाव बनाया। लेकिन गांधी जी गलती यह कर गये कि, विश्वयुद्ध में फंसे ब्रिटेन का सहयोग कर उनसे तदनुसार सहयोग की आशा की और  आन्दोलन ही स्थगित नहीं किया अपितु भारतियों को सेना में भर्ती होने का आह्वान किया। लेकिन मुस्लिमों ने गांधी जी की बात नहीं मानी।

खुदीराम बोस और महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्रद्धानन्द जी से प्रेरित उस काल के आर्यसमाजी लाला लाजपतराय के अनुयाई सचिंद्रनाथ सान्याल द्वारा स्थापित नें साम्यवादी भारतीय क्रांतिकारी संगठन -- हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का गठन किया। 

 पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, श्री राजगुरु, श्री अशफाक उल्ला खाँ जैसे लोगों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सदस्य के रूप में अंग्रेजी सरकार को बहुत परेशान कर दिया था।
श्री चन्द्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एचआरए ) का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया। अर्थात नाम में सोशलिस्ट जोड़ दिया।
लेकिन 
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, सुखदेव थापर, श्री शिवराम राजगुरु  के बलिदान के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन सङ्गठन की गतिविधियाँ लगभग ठप हो गई। राष्ट्रीय आन्दोलन कमजोर होने लगा।
( एचएसआरए ) नामक संगठन समाप्त होने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने अलग कर एक नवीन राजनीतिक दल फारवर्ड ब्लाक खड़ा किया। और बाद में जापान जाकर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की।

गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस ---
उल्लेखनीय है कि, 
कोलकाता के स्वतन्त्रता सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर श्री सुभाष चन्द्र बोस श्री बाबू  चितरञ्जन दास के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने बाबू चितरञ्जन दास को पत्र लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। भारत वापस आने पर रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार श्री  सुभाषचन्द्र बोस    सर्वप्रथम मुम्बई गये और महात्मा गांधी से मिले।
गांधी द्वारा 5 फरवरी 1922 को चौरी चौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन बंद कर दिया गया जिसके कारण 1922 में बाबू चितरञ्जन दास ने कांग्रेस के अन्तर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की।
सुभाष चन्द्र बोस ने भी जवाहरलाल नेहरू के साथ कांग्रेस के अन्तर्गत युवकों की इण्डिपेण्डेंस लीग शुरू की।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 3 मई 1939 को कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद गांधी जी ने सुभाष को कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गयी। इस प्रकार हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के बाद पुनः एक क्रांतिकारी दल का उदय हुआ।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी कर उन्होंने निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभ कामनाएँ मांगी।

सार्वदेशक हिन्दू सभा ---
लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा सार्वदेशक हिन्दू सभा सङ्गठन की स्थापना हरिद्वार में 1907 में की।
फिर 
राजनितिक दल के रूप में हरिद्वार में सर्वदेशक हिन्दू सभा की स्थापना 1915 लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई।

सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष ---
1915 से 1921 तक पण्डित मदन मोहन मालवीय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे।

1921 से 1931 तक 
लाला लाजपत राय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष रहे ।

1931 से 1937 तक
बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे अध्यक्ष रहे।

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा
1937 से 1943 तक अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर  रहे। 
विनायक दामोदर सावरकर ने सार्वदेशिक हिन्दू सभाका नाम हिन्दू महासभा नाम कर के इटली के फासिस्ट दल का अनुयाई बना दिया दिया।

1945 से 1946 तक डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे।
डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसङ्घ की स्थापना की और जो 06 अप्रैल 1980 से भारतीय जनता पार्टी कहलाती है।

 बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे जो सार्वदेशिक हिन्दू सभा के 1931 – 37 तक अध्यक्ष रहे वे केशव बलराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई थे। लेकिन उसी समय केशव बलराम हेडगेवार आखिल भारतीय हिन्दू महासभा के उपसभापति रहे। 
केशव बलिराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई बालकृष्ण शिवराम मुंजे का योगदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बनवाने में  बहुत अधिक रहा। संघ के संस्थापक और बालकृष्ण शिवराम मुंजे के राजनितिक गुरु  डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने शिष्य बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे को इटली के फासिस्ट दल के अनुसार सङ्गठन बनाने का प्रशिक्षण लेने इटली  भेजा। जब मुञ्जे दल का सञ्चालन का और शाखा लगाने का
प्रशिक्षण ले कर लौटे तब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में 27 सितम्बर 1925 ईस्वी में भारत में वैसा ही सङ्गठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक सङ्घ की स्थापना की।
लेकिन 
सावरकर की हिन्दू महासभा गांधी जी जैसा जन आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाई। यह टीस सावरकर और उसके अनुयायियों को सदैव खलती रहती है। इसलिए विनायक दामोदर सावरकर सदैव से ही गांधी जी का विरोध करते रहे।

 भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त जब महात्मा गांधी की हत्या हुई तब इसके बहुत से कार्यकर्ता इसे छोड़कर भारतीय जनसंघ में भर्ती हो गये। 


अखिल भारतीय हिन्दू महासभा को आम चुनाव में लोकसभा में 

1951 मे प्रथम लोकसभा में 4 सीटे मिली।
जनसंघ को 3 सीटें मिली।

1957 में दुसरी लोकसभा में 2 सीटे मिली।
जनसंघ को 4 सीटें मिली।

1962 में तीसरी लोकसभा में 1 सीटे मिली।
जनसंघ को 14 सीटें मिली।

1967 में चौथी लोकसभा में 1 सीटे मिली।
जनसंघ को 35 सीटें मिली।

1971 में पाँचवी लोकसभा में 1 सीटे मिली।
जनसंघ को 22 सीटें मिली।


1989 में नौवीं लोकसभा में 1 सीटे मिली।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें