रविवार, 7 दिसंबर 2025

भूमि पर देवता, गन्धर्व, अप्सरा, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, दानव, सूर, असुर, पिशाचों का स्थान।

इस लेख में बहुत सी जानकारियाँ है। जिन्हें मैरे लेखों में पढ़ा होगा।
कैलाश शिखर के पूर्व में ही देवताओं के वास स्थान स्वर्ग के राजा इन्द्र की राजधानी अमरावती पुरी भी है।
कश्यप ऋषि का तपस्या करने का क्षेत्र कश्यप सागर (केस्पियन सागर) से कश्मीर तक था। केस्पियन सागर से तिब्बत के झिंजियांग क्षेत्र तक था। इस पूरी पट्टी को तुर्किस्तान कहते हैं। इस क्षेत्र में दक्ष द्वितीय की तेरह पुत्रियों से महर्षि कश्यप की सन्तान बसी।
वर्तमान में इस क्षेत्र में टर्की, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और
 झिजियांग क्षेत्र  कहलाता है। वर्तमान में झिजियांग क्षेत्र चीन का स्वायत्त क्षेत्र कहलाता है जहाँ उइगुर मुसलमान रहते हैं।
दक्ष द्वितीय की पुत्री अदिति और कश्यप ऋषि के पुत्र आदित्य देवता कहलाते हैं।

वर्तमान पाकिस्तान में हुंजा घाँटी में बाल्टित शहर जिसे करीमाबाद भी कहा जाता है एक और पुरानी बस्ती गणेश गांव है। किसी समय यह नगर उस क्षेत्र की राजधानी था। इस क्षेत्र के लोगों ने सबसे अन्त मेंं इस्लाम स्वीकारा इस लिए मुस्लिम इसे काफिरिस्तान कहते थे। यहाँ की महिलाएँ अत्यन्त सून्दर और अस्सी वर्ष की अवस्था में भी यूवती लगती है। इन्द्र के दरबार में नर्तकी अप्सराएँ होती थी इसकी तुलना गन्धर्व लोक के गन्धर्वों से करो।



बाल्टित शहर जिसे करीमाबाद के उत्तर में अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर, उत्तर-पूर्व में झिंजियांग ( चीन का स्वायत्त क्षेत्र) और उत्तर-पश्चिम में पामीर की सीमा है।  

ब्रह्मा जी से उत्पन्न हेति और प्रहेति नामक दो राक्षसों ने जल की रक्षा का भार ग्रहण किया।
इन्हीं के साथ यक्ष भी जन्मे थे।

 कैरेबियन सागर और उत्तरी अटलांटिक महासागर के बीच स्थित हैती हिस्पानियोला द्वीप के पश्चिमी एक तिहाई हिस्से पर स्थित है। डोमिनिकन गणराज्य द्वीप के पूर्वी हिस्से में हैती की सीमा बनाता है। हैती के सबसे करीबी पड़ोसियों में पश्चिम में जमैका और उत्तर-पश्चिम में क्यूबा शामिल हैं। मतलब ये नीग्रो जाती के लोग हैं।
हेति में तेज नशा हल्का विष देकर मरा हुआ घोषित कर कबर में दफना कर फिर चुपके से कबर से निकाल कर उसे अपने वश में किया हुआ प्रेत (पिशाच) घोषित कर उसे जाम्बी कहा जाता है। उस जाम्बी से दास (गुलाम) जैसा कार्य लेने की परम्परा थी। अब वहाँ के शासन ने इस परम्परा को समाप्त कर दिया है।
अर्थात राक्षस नीग्रो जाती थी। पुराणों में यक्ष और राक्षस दोनों जातियों का बन्धु-बान्धव कहा गया है। सुकेतु यक्ष की पुत्री ताड़का यक्षिका से राक्षसी बनी। सम्भवतः यक्षिणी ताड़का का विवाह राक्षस जाति में हुआ था।
 कुबेर यक्ष है, और कुबेर की राजधानी अलकापुरी कैलाश पर्वत के उत्तर में तिब्बत में है। कैलाश पति शंकर जी यक्ष कुबेर के मित्र कहे जाते हैं। अर्थात यक्ष लोक  तिब्बत-चीन में है। 
यक्षिणियाँ नट विद्या में प्रवीण होती है। आज भी चीनी लोग जिम्नास्टिक में सबसे आगे हैं।
मतलब तिब्बती लोग यक्ष कहलाते थे।


 

 

 इराक के असीरिया के लोग स्वयम् को आज भी असूर कहते हैं अर्थात इराक की अरबी लोग असुर थे। उनके वंशज असम तरफ रहते हैं जो महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिंका असम की महारानी थी। जिसके वंशज श्रीलंका के सिंहल हैं।

सीरिया के निवासी स्वयम् को सूर कहते हैं।सुरसा के पुत्र नाग (सर्प) हूए। अर्थात आदम को बुद्धि वृक्ष का फल खाने को प्रेरित करने वाला नगाग सीरियाई था। सीरिया को शाम भी कहते हैं जहाँ के राजा यजीद ने कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन को मारा था। इनके वंशज इराक के यजीदी प्राचीन ईरानी मग संस्कृति का अग्निहोत्री धर्म और ईरान के पारसी मत-पन्थ के निकट का मत- पन्थ मानते हैं। अर्थात देवासुर संग्राम सीरिया और असीरिया (इराक) के बीच हुआ युद्ध था।
नाग वंशी पश्चिम एशिया और मध्य एशिया (सीरिया) से आये।
आदम का जन्म दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में हुआ था  और उसे नाग (सर्प) ने यहोवा के विरुद्ध भड़काया था। यह आपको बाइबल पुराना नियम उत्पत्ति नामक पुस्तक में (ओल्ड टेस्टामेंट की जेनिसिस) में मिल जाएगा।
यही नाग सूरसा पुत्र सीरियाई था। जो युफ्रेटिस घाँटि के निकट ही है।

हित्ती साम्राज्य दक्षिण पूर्व टर्की एशिया महाद्वीप में था। हित्ती शब्द आरामी भाषा में लिखित बाइबल पुराना नियम में है। मूलतः राजा खत्तुनस शासित होने के कारण यह क्षेत्र खत्ती साम्राज्य था। यहाँ के निवासी स्वयम् को चन्द्रवंशी क्षत्रिय मानते हैं। भारत में ये लोग स्वयं को खाती और खत्री कहते हैं।
वैवस्वत मनु की पुत्री इला और चन्द्रमा के पौत्र तथा बुध के पुत्र पुरुरवा को एल कहते हैं। याहवेह को भी एल कहते हैं।  
पुरुरवा ने इन्द्र सभा की नर्तकी (अप्सरा), इराक के उर नगर की वासी उर्वशी से अरब में प्रचलित संविदा विवाह ( मुताह विवाह) किया था। संविदा पूर्ण होने के पश्चात गर्भवती उर्वशी अपने मायके लौट गई। और पुत्र आयु को जन्म देकर, स्तनपान का समय पूर्ण होने पर पुरुरवा के पुत्र आयु (आदम) को  पुरुरवा को सोप कर छोड़कर  इन्द्र सभा में अपनी ड्यूटी पर लौट गई थी। पुरुरवा ने  आयु को स्वयम् अकेले पाला था। याहवेह ने आदम को पाला था। पुरुरवा - आयु और याहवेह आदम का सम्बन्ध चन्द्रमा से है। 
इतने सन्दर्भ अलग-अलग होते हैं, इनको जोड़ना पड़ता है।

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