शनिवार, 6 मार्च 2021

ज्ञान वहीं जो आचरण में झलके। ज्ञानी वहीं जिसका ज्ञान वाणी या लेखनी में ही नहीं आचरण में भी झलके।

ज्ञान वहीं जो आचरण में  झलकता है। ज्ञानी वहीं जिसका ज्ञान आचरण में भी झलके।

शास्त्री और ज्ञानी में आकाश पाताल का अन्तर है। विद्वान शास्त्री नोकरी करते हैं जबकि शस्त्रधारी वीर योद्धा और धनवान शासन करते हैं। जैसे अमेरिका का प्रभुत्व पूरे विश्व में है और भारतीय प्रतिभावान वहाँ नोकरी करते हैं।
सभी भौतिक विज्ञान, गणित, ब्रह्माण्ड विज्ञान, मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र,भाषाशास्त्र,  वाणिज्य का कितना ही बड़ा निष्णान्त विद्वान हो जो ललित कलाओं में पारङ्गत हो, सभी प्रकार के खेलों में प्रवीण हो धनवान हो, दानी हो, बड़े बड़े यज्ञ सत्र आयोजित करता हो, घोर तपस्वी हो  किन्तु मिथ्या भाषी हो, कामी, क्रोधी, लोभी हो, दुसरों का -धन सम्पत्ति दुसरों के कृतित्व अपनें नाम करलेता हो क्या कोई उसे ज्ञानी, महात्मा कहेगा? 
रावण और दुर्योधन,  इसी श्रेणी के लोग थे। श्रीराम और श्रीकृष्ण  को लोग सश्रद्धा स्मरण करते हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण को पूजते हैं।  कारण उनका ज्ञान उनके आचरण में झलकता था।

सबको अपने समान प्रेम करो।
सदा सद्भावना रखो, सद्विचार ही करो, सत्य वचन ही बोलो, प्रिय और मधुर भाषण करो, सत्कर्म ही करो, सदाचारी बनो  
किसी के धन का लोभ मत करो। सब वस्तुएँ परमात्मा की है, सब पर सबका समान अधिकार है,
पर नारी के प्रति मातृवत भाव रखें
 न अनावश्यक भोग करें, न अनावश्यक भोग सामग्री  संग्रहित करें। वस्तुएँ सिमित है सबके उपयोग में आनेदें।
तन, मन और धन को सदा स्वच्छ, शुद्ध और पवित्र रखें।
ईश्वर के दिये और अपनै प्रति दुसरों के उपकारों और सेवाओं से सदा सन्तुष्ट रहैं।  स्वयम् के द्वारा की गई सेवाओं, अध्ययन, ईश्वरोपासन, सदाचरण को कभी पर्याप्त न मानें इनमें उत्तरोत्तर सुधार करते रहें और वृद्धि करते रहें।
स्वधर्म पालन हेतु कष्ट सहिष्णु बनें, शितोष्ण, सुख-दुख सहन कर धृतिवान बने, धैर्य धारण करें। अपनें सही और उचित निर्णय पर दृढ़ रहें। सदैव सीखने को तत्पर रहें। स्वाध्याय रत रहें। ईश्वरोपासन  में लगे रहें। स्वयम् को  ईश्वरार्पण करदें।
नित्य अष्टाङ्गयोगाभ्यास करें, नित्य पञ्च महायज्ञ करें।
 उक्त कथन उक्त वचन, उक्त जानकारियाँ हम सब प्रवचन में  बाल्यावस्था से सुनते आये हैं, समाचार पत्रों में, कोर्स बुक्स में, धार्मिक पुस्तकों में पढ़ते आते, प्रवचनों में, रेडियो और ऑडियो में सुनते आते हैं, विडियो में देखते सुनते आते हैं।
ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें ये जानकारी नहीं है? जानते सब हैं पर मानते नहीं। अतः इन सब जानकारियाँ होनें  के कारण कोई ज्ञानी नही कहलाता। ज्ञानी वहीं कहलाता है जो इन जानकारियों को मानले। इन्हें आचरण में उतारले वहीं ज्ञानी है। उसे ही सभी ज्ञानी महात्मा कहते हैं।

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