*शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥*
अर्थ ---
*शेषनाग को अनन्त कहते हैं। मतलब प्रकृति - प्रलय काल मे जब गुण साम्यावस्था में प्रकृति ही शेष रहती है,*
*जिसे एकार्णव अनन्त सागर भी कहते हैं प्रलय उपरान्त भी शेष बची नार नामक प्रकृति के अनन्त सागर रूपी एकार्णव में कमल के समान नाभि (केन्द्र) और कमल की पङ्खुड़ियों के समान नयन वाले, वाले शान्त स्वरूप में स्थित, समस्त धन ऐश्वर्य के स्वामी लक्ष्मी पति, प्रजापति , इन्द्र, द्वादश आदित्य और एकादश रुद्र नामक देवताओं के भी शासक (ऋग्वेद 1/22/20 एवम् ऋग्वेद 01/155/06 के अनुसार चक्रधारी विष्णु परमपद को उक्त देव गण भी टकटकी लगाकर देखते रहते हैं), सम्पूर्ण जगत रूपी शुभ अङ्गो वाले समस्त ब्रह्माण्डों सहित सम्पूर्ण विश्व सृष्टि के आधार घनश्याम आकाश के समान सर्वव्यापी जन्म, मृत्यु , जरा, व्याधि, पीड़ा रूपी कर्म बन्धन के भव भय को हरण करने वाले भगवान नारायण का सर्वव्यापी विष्णु स्वरूप योगियों के ध्यान से कभी हटता ही नहीं। अर्थात सर्वव्यापी विष्णु योगियों के ध्यान में सतत् बने ही रहते हैं।*
यह श्लोक वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में रामायण महाभारत या पुराणों में नहीं मिलता है।
लेकिन महाभारत का अनुशासन पर्व, अध्याय 149 (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद) में उल्लेखित विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से पूर्व पढ़ा जाने वाला ध्यान श्लोक के रूप में सर्वप्रिय विष्णु स्तुति है।
ऐसा अनुमान है कि, किसी ध्यान योगी ने निम्नांकित वर्णनों को ध्यान में रखते हुए शान्ताकारम भुजगशयन विष्णु स्तुति की रचना की है।* ⤵️
*ऋग्वेद ऋग्वेद 1/22/20 और एतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में विष्णु को परम पद कहा है।और कहा है कि, देवता भी विष्णु परम पद को (टकटकी लगाकर) देखते हैं।*
*तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥* ऋग्वेद 1/22/20 ।
तथा
ऋग्वेद 01/155/06 में वर्णित ---
*विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।) तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।*
*"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥*
" ऋग्वेद 01/155/06
तथा
*महाभारत, वनपर्व /मार्कण्डेयसमास्यापर्व अध्याय 188, श्लोक 128-134* ।
या
*महाभारत, वनपर्व 3.188.128-134*।
और
*श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 12 अध्याय 9, श्लोक 29-34*।
या
*श्रीमद्भागवत 12.9.29-34*।
*महाभारत वनपर्व 3.188.128-134 में वर्णित चिरञजीवी महर्षि मार्कण्डेय जी के द्वारा समाधि अवस्था में प्रलयान्तकाल में वटपत्रशायी भगवान के दर्शन दर्शन के आधार पर रचा है।*
1 *महाभारत, वनपर्व 3.188.128-134* । का अर्थ
*मार्कण्डेय जी कहते हैं - मैंने वहाँ*
अर्थ
*महाशाखाओं वाला वटवृक्ष (न्यग्रोध) देखा। उसकी शाखा के दिव्य सुशोभन पत्र पर एक बालक लेटा था। वह श्रीमान्, कमल-नयन, दिव्य लक्षणों से युक्त था। उसने मुझे देखकर कहा - "मार्कण्डेय, तुम थके हो, यहाँ विश्राम करो"। फिर उस अचिन्त्य बालक ने सहसा मुझे ग्रस लिया। उसके उदर में मैंने सम्पूर्ण जगत् देखा। बाद में वह शय्या (पर्यङ्क) पर लेटा बालक अपने पैर का अंगूठा मुख में लिए मुस्कुराता हुआ स्थित था। वह देवदेव जनार्दन था।*
*श्रीमद्भागवत 12.9.29-34*
का अर्थ
*मार्कण्डेय जी ने वट के शुभ पत्र पर लेटे हुए एक बालक* को देखा जो *अपने मुख से अपने चरणकमल को चाट रहा था। उसके उदर में चौदहों भुवन देखकर मुनि विस्मित हो गए। वह साक्षात् अनन्त अच्युत हरि थे। भगवान ने कहा - "हे वत्स मार्कण्डेय, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ, वर माँगो"।*
*मूल वर्णन---*
*महाभारत, वनपर्व /मार्कण्डेयसमास्यापर्वअध्याय 188, श्लोक 128-134*।
*न्यग्रोधं च महाशाखं तत्रापश्यं महाद्युतिम्।* *शाखायां तस्य वृक्षस्य पत्रे दिव्ये सुशोभने॥* 128॥
*उपविष्टं महाराज बालं पर्यङ्कशायिनम्।* *श्रीमन्तं पद्मपत्राक्षं दिव्यलक्षणलक्षितम्॥ 129॥*
*स मामालोक्य नयनैर्विशालैः पुरुषोत्तमः।* *उवाच श्लक्ष्णया वाचा प्रीणयन्निव भारत॥ 130॥* *मार्कण्डेय भवान् ज्ञातः क्लान्तः शरणमिच्छसि।* *विश्राम्यतां भवानेह यावदिच्छसि भारत॥ 131॥*
*इत्युक्तोऽहं तदा तेन बालेनेन्दीवरत्विषा।*
*अचिन्त्येनाप्रमेयेण विस्मयं परमं गतः॥ 132॥*
*ततः स बालः सहसा मुखं कृत्वा सुनिर्मलम्।*
*मां ग्रसित्वा ततः श्रीमानन्तर्धानमितो गतः॥ 133॥*
*अङ्गुष्ठं स्वं मुखे कृत्वा बालः पर्यङ्कशायिनः।* *आस्ते स्मितमुखः श्रीमान् देवदेवो जनार्दनः॥ 134॥* *महाभारत, वनपर्व 3.188.128-134*
*2. श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 12 अध्याय 9, श्लोक 29-34*--- *तत्रैकदारकं शयानं वटपत्रपुटे शुभे।लिहन्तं पादकमलं मुखेन स्वेन पश्यतः॥ 29॥*
*निलीनं तस्य जठरे भुवनानि चतुर्दश। वीक्ष्य विस्मितहृदयो मुनिर्विस्मयमाययौ॥ 30॥*
*तं वीक्ष्य बालकं दृष्ट्वा मुनिः परमविस्मितः।अनन्तमच्युतं साक्षात् प्रपेदे शरणं हरिम्॥ 31॥*
*श्रीभगवानुवाच* *भो भो वत्स महाभाग मार्कण्डेय महामुने।* *तोषितोऽहं भवद्भक्त्या वरं वरय सुव्रत॥ 34॥*
इसमें प्रायः अधिकांश लोग "योगिभिर्ध्यानगम्य्म" का सही उच्चारण नहीं कर पाते हैं।
सही उच्चारण के लिए अन्वय करके सीख सकते हैं।
*योगिभिर्ध्यानगम्य्म् ।*
*योगिभिः ध्यान गम्यम्।*
*योगिभि र् ध्यान गम्यम्।*
शान्ताकारम् भुजग शयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगन सदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम्
योगिभि र् ध्यान गम्यम् वन्दे विष्णुम्
भवभय हरम् सर्वलोक एक नाथम्॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें