मनुस्मृति (6/92) के अनुसार धर्म के 10 मुख्य लक्षण हैं,
*धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्॥*
अर्थात
*धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धि), विद्या (ज्ञान), सत्य (सत्यता), और अक्रोध (क्रोध न करना)।*
जो व्यक्तिगत आचरण और नैतिकता को परिभाषित करते हैं।
*महाभारत/अनशासन पर्व। अध्याय 115*: भीष्म पितामह के अनुसार धर्म के 13 लक्षण गिनाए हैं:
*सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्।*
*दमः शमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिर्धृतिः॥* 115.11
*सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, संतोष, सरलता, इन्द्रिय-निग्रह, मन-निग्रह, तप, समता, सहिष्णुता, वैराग्य और धैर्य।*
पतञ्जली के योग दर्शन में भी
*अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह*
ये पाँच यम अर्थात धर्म कहे गए हैं।
और उक्त धर्म पालन मे सहायक और सहयोगी पाँच नियम बतलाये हैं।
*शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।*
इसलिए ही ब्राह्मण ग्रन्थों में
1 *संध्या, वेदाध्ययन और अष्टाङ्गयोग ब्रह्म यज्ञ*
2 *पर्यावरण व्यवस्था और रोगाणु-, जीवाणु-किटाणु नाशक अग्निहोत्र रूपी देव यज्ञ*,
3 *मानव सेवा, ब्रह्मचारी, संन्यासी, बिमार और अशक्तों की सेवा सेवा तथा गुरुकुल, चिकित्सालय, औषधालय आदि की व्यवस्था में सहयोग रूपी नृयज्ञ*,
4 *पशु-पक्षी और वनस्पतियों की सेवा रूपी बलिवैश्वदेव कर्म और भूत यज्ञ* एवम
5 *बुजुर्गो की सेवा, उनकी अतृप्त इच्छाएँ पूरी करने हेतु कुए, बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, सदावृत , पुस्तकालय, वाचनालय आदि के निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन में सहयोग करना रूपी पितृ यज्ञ श्राद्ध कर्म*
करने को नित्य कर्म घोषित किया गया है।
*इसके विधि विधान कर्मकाण्ड भास्कर, ब्रह्म नित्य कर्म समुच्चय, आह्निक सूत्रावली, और सबसे सरलतम गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित नित्य कर्म पूजा प्रकाश में उपलब्ध है।*
और
*श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।*
*लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर अभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।*
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि। न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*
*ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*
अर्थात ---
*"हे बलवान इंद्र!*
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*
शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
*उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।*
*वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।*
*शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र कहता है कि*,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*
अर्थात
*इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।*
*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात
*कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।*
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।
स्पष्ट है कि, *केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें।*
क्योंकि *मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।*
*ब्राह्मण ग्रन्थों में और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।*
अब इसमें *किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।*
*अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।*
*उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था।*
*सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये।* और
*भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।*
*इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ही है।* *दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।*
तथा *ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ, मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा रूपी भूतयज्ञ और बुजुर्गों की सेवा रूपी पितृ यज्ञ ये पाँच महायज्ञ है।*
लेकिन *महाभारत युद्ध के पश्चात जन साधारण इनके बजाय मठ, मन्दिरों में प्रतिष्ठित मूर्तियों या घर पर ही देवालय बना कर उसमे रखी देवी-देवताओं, अवतारों, आचार्यों, गुरु जनों, पितरों की मूर्तियों, प्रतिमाओं या चित्रों की पञ्चोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन करने में अपना कल्याण और श्रेय समझने लगे हैं।*
*उससे उत्पन्न सबसे बड़ा दोष कि, उन मूर्तियों आदि में भगवान की धारणा कर परमात्मा के ईश्वर स्वरूप में भी पूर्ण श्रद्धा भक्ति और समर्पण रहित हो कर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि*,
*हे भगवान, मुझे यह चाहिए/ वह चाहिये और इसके लिए आप ऐसा- ऐसा कर दीजिए। ताकि, मुझे सफलता पूर्वक वाञ्छित भोग प्राप्त हो सके।*
*मतलब भगवान को निरा अज्ञानी मूर्ख समझकर उसे अपनी वैध/ अवैध माँगे मनवाने के लिए स्वयम् द्वारा सुझाए गए उपायों का पालन करने की सलाह देकर उसके बदले उपास/ उपवास समझकर लङ्घन करने, कोई स्तुति - स्तोत्र पाठ करने, मन्त्र जप करने, मन्दिर में कोई मूल्यवान भेंट चढ़ा कर, या भागवत कथा, या वायु पुराण का एक भाग शिव पुराण पाठ- प्रवचन आदि का आयोजन करवा कर शिवपुराणोक्त टोटके करके स्वयम् को महान आस्तिक, सच्चा ईश्वर वादी और परम भक्त सिद्ध करते हैं।*
*दुसरी हानि यह हुई कि, मन्दिर परिसर या मूर्ति में ही ईश्वर हैं बाहर ईश्वर नहीं है। सर्वव्यापी को सिमीत एकदेशीय मान लिया।*
*तीसरा दोष माता-पिता, आचार्य -गुरुजन, योग्य अतिथि के प्रति पूज्यभाव समाप्त हो गया।*
आजकल कुछ लोग नानी बाई का मायरा का पाठ करवाते हैं, लेकिन न, करने वाला; न, करवाने वाला और न ही, श्रोतागण कोई भी *श्रीकृष्ण के प्रति पुत्र भाव रखने वाले भक्त नरसिंह मेहता का अपने इष्ट के प्रति विश्वास पर ध्यान नहीं देते हैं।*
*सबको केवल अपने द्वारा किए गए टोटकों, छल-कपट, षड़यन्त्रों, और सकाम आराधना के नाम पर किये गए कर्मों से ही परिणाम प्राप्ति का विश्वास रहता है।*
*मेने ऐसा किया इस लिए ऐसा हो गया। मेने ऐसा नहीं किया वरना ऐसा हो जाता। मैं नहीं होता तो ऐसा नहीं हो पाता, मैं नहीं रहूँगा तो दुनिया रुक जाएगी। मरते दम तक इसी भ्रम में जीते हैं।*
जबकि यह नहीं देखते समझते कि, *जब मैं नहीं जन्मा था तब भी विश्व सुचारू रूप से चल रहा था, विकास कर रहा था। और जहाँ मैं नहीं हूँ वहाँ भी जगत सुचारू रूप से चल रहा है।*
इसलिए मेरा होना या न होना दोनों से विश्व में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है।
यही स्थिति घर गृहस्थी की भी है। *जब नहीं थे तब भी गृहस्थी चल रही थी जब मैं नहीं रहूँगा तब भी गृहस्थी ऐसे ही चलेगी।*
क्योंकि *सञ्चालक तो परमात्मा का ईश्वरीय स्वरूप है। कोई व्यक्ति या समूह नहीं।*
मूर्ति पूजा के ऐसे परिणाम जानने के कारण ही वेदों में मूर्ति पूजा निषिद्ध की गई है।
मुझे ज्ञात है कि, मूर्ति पूजा के पक्षधर सगुण सर्वव्यापी विष्णु, सगुण कूटाकृति प्रभविष्णु, सगुण साकार नारायण श्रीहरि, प्रथम पूर्ण साकार हिरण्यगर्भ, प्रथम सावयव प्रजापति के वर्णन के आधार पर साकार देवों और सावयव प्रजापति आदि देवताओं का प्रमाण देकर मूर्ति पूजा सिद्ध करने का कुतर्क देंगे। उनसे सविनय एक ही अनुरोध है कि, आप स्वयम् भी सावयव हैं, आपका सिर मुख, हाथ- पेर सब है तो क्या कोई आपकी मूर्ति बनाकर पूजता है ऐसी कोई जानकारी है आपको? मतलब देवताओं के मुखादि अङ्ग होने से उनकी मूर्ति बनाकर कोई पूजता था यह प्रमाणित नहीं होता।
दूसरा कुतर्क का खण्डन मैं पहले ही वाल्मीकि रामायण में देवों के स्थान होने लेकिन उन स्थानों पर किसी आकृति वाली मूर्ति का उल्लेख नहीं होने, जैसे यज्ञ में मण्डप में मण्डल बनाकर उसपर देवों और देवताओं का आह्वान किया जाता है, और हम लोग मण्डप में मण्डल पर उन देवताओं की पूजा आदि करते हैं, वैसे ही जनकपुरी में श्री सीताजी का भगवती उमा की पूजा करने जाने का वर्णन है। कहीं किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जी द्वारा अयोध्या काण्ड में युवराज पद पर अभिषेक के पहले जाने के वर्णन में भी भगवान विष्णु के स्थान पर किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
ठीक इसी प्रकार विदर्भ राजकमारी श्री रुक्मिणी जी के विदर्भ की राजधानी के निकट ही अम्बिका देवी के स्थान पर पूजा करने जाना भी समझना चाहिए। ध्यान रखें महाराष्ट्र के विदर्भ (नागपुर क्षेत्र) से मध्यप्रदेश के धार जिले के अमझेरा की अम्बिका मन्दिर में रुक्मिणी जी का पूजा करने आना शुद्ध काल्पनिक है।
1178 में रचित एवम 1185 में प्रकाशित
तमिल कवि कम्बन की ईरामावतारम् महाकाव्य और 1574 से 1577 ईस्वी के बीच अवधि कवि भक्त तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस में भगवान श्रीरामचन्द्र जी द्वारा तमिलनाडु में रामेश्वरम शिवलिङ्ग की स्थापना का प्रमाण न दें। क्योंकि ये रचनाएं अत्यधिक आधुनिक काल की रचना है अतः कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार ब्रह्माण्ड पुराण का भाग अध्यात्म रामायण ईस्चौवी की दहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। और आनन्द रामायण भी ईस्वी की पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। इसलिए इतिहास के विषय में ये भी कोई प्रामाणिक ग्रन्थ नहीं है।
दूसरी बात श्री रामचन्द्र जी केरल के कोझीकोड और कन्नूर होते हुए लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप में स्थित रावण की लङ्का गये थे। श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं।
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