गुरुवार, 14 मई 2026

हिन्दू शब्द के अर्थ में मतभिन्नता पर मीमांसा।

क्या ऐसे सभी उदाहरण देखने के बाद भी यह स्वीकारना उचित होगा कि, तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा, लिङ्गायत को सनातन वैदिक धर्मी माना जाए।
सिन्धु नदी के पूर्व में बसे गेहुंआ रङ्ग के लोगों के लिए ईरान के पारसियों के धर्मग्रन्थ जेन्द अवेस्ता में पारसियों के आचार्य जरुथ्रुस्ट द्वारा श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास जी (भगवान वेदव्यास जी) से हुए संवाद के प्रकरण में वेदव्यास जी के काले रङ्ग को देख कर पारसी भाषा में उन्हें हिन्दू कहा था। जैसे युरोपीय लोग भारतियों, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ब्लेक कहते हैं।
इस आधार पर ईरानी पारसी भारतियों को हिन्दू कहते थे। इसलिए अरबी जातियों के इस्लामी आक्रांताओं ने भी भारतियों को हिन्दू कहा।
संविधान ने गत तीन हजार वर्षों से भारत में निवास करने वाली सभी जातियों को हिन्दू कहा है। जिसमें टर्की से आकर बसे चन्द्रवंशी पुरु, यदु, तुर्वसु, अनु और दृह्यु की सन्तान, ईरानी परशु (पर्शियन), तिब्बती शक, कुषाण और मङ्गोलियाई हूण सम्मिलित हैं। फिर चाहे वे भारत में जन्मे तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा या लिङ्गायत किसी भी पन्थ के अनुयाई हो; सभी को हिन्दू माना है। यहाँ हिन्दू से तात्पर्य दीर्घावधि से भारतीय भूमि में निवासरत और भारतीय मत, पन्थ और संस्कृति को अपना चुकी जनता से है।
जबकि, इस्लामी आक्रांताओं से बचकर भारत में बसे जरुथ्रुस्ट के अनुयाई पारसी, और अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, मुस्लिम और बहाई पन्थ के लोगों को गैर हिन्दू कहा है।
तात्पर्य यह कि, भारतीय संविधान में हिन्दू शब्द मत, पन्थ, सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। बल्कि मूल भारतीय जन के अर्थ में प्रयोग किया है।
जबकि सावरकर और हेडगॉवार, मुञ्जे, गोल वर्कर के अनुयाई हिन्दू महासभा, रा.स्व.से. संघ और उसके अनुशंङ्गी संगठन जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरङ्ग दल, भा. ज.पा. आदि सभी सङ्गठन विभाजन पश्चात वर्तमान भारत में रह रहे सभी भारतवासियों को हिन्दू कहते हैं।
रा. स्व. से. संघ का हिन्दू यथार्थवादी किसी भी सिद्धान्त से मैल नहीं खाता है। बल्कि शुद्ध काल्पनिक अवधारणा है।
किसी के कुछ भी मान लेने मात्र से सत्य नहीं बदल जाता।

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