शनिवार, 30 अगस्त 2025

ज्येष्ठा, अलक्ष्मी, निऋति और कनिष्ठा लक्ष्मी।

ज्यैष्ठा देवी की तुलना निऋति या निर्ऋति से कर सकते हैं।
निऋति अधर्म और हिन्सा से उत्पन्न, अव्यवस्था (ऋत का अभाव) स्वरूप, अज्ञान, दारिद्र, (कङ्गाली के स्तर की गरीबी), रोग, वृद्धावस्था, बाँझपन (निस्सन्तानत्व), भय, महाभय (आतङ्क) और मृत्यु तथा नर्कवास प्रदाता, दक्षिण-पश्चिम की अधिष्ठात्री देवी है। जिनका स्वरूप दुर्गासप्तशती की चण्ड-मुण्ड विनाशनी काली देवीबर (चामुण्डा) के समान है। इनका वाहन पुरुष का शव है।
पौराणिक मत में समुद्र मन्थन में लक्ष्मी के ठीक पहले प्रादुर्भाव होने के कारण इन्हें ज्येष्ठा कहा जाता है। इन्हें राक्षसों को सोपा गया। निऋति को राक्षसों का शासक माना जाता है।
भय वश लक्ष्मी पूजा के पहले ज्येष्ठा की पूजा की जाती है।

यथार्थ में पहले अलक्ष्मी निस्तारण (अटाला बाहर) करनें के बाद श्री लक्ष्मी का आव्हान करना चाहिए।
इसलिए दीपावली के पहले साफ सफाई करके ही लक्ष्मी पूजा करते हैं।और बची खुची अलक्ष्मी निस्तारण रात में चार-पांच बजे के बीच पुरानी झाड़ू सहित कर दिया जाता है।

लेकिन आदिवासी दीवाली के दिन न तो झाड़ू लगाते हैं, न नहाते हैं। धोते तो कभी नहीं है। उनका मानना है कि, धोने से घर धुल जाता है। इसलिए पत्थर से पोंछ लेते हैं।😃

जैन लोग भी रुद्र देवता की तिथियों अष्टमी और चतुर्दशी को मूंह तक नहीं धोते हैं। अमावस्या को भी नहीं नहाते हैं।

पौराणिक परम्परा में शंकर जी ने लक्ष्मी को बहन माना है।
लक्ष्मी देवी के बहुत से रूप पुराणों में प्रसिद्ध है।--- 
प्रभविष्णु और श्री तथा लक्ष्मी अर्थात नारायण और नारायणी।
श्रीहरि की शक्ति समुद्र मन्थन से निकली कमलासना लक्ष्मी जिन्हें दो गज स्नान कराते रहते हैं।
महर्षि भृगु की पुत्री लक्ष्मी जिसे शंकर जी ने बहन माना है। सम्भवतः इनका विवाह वामन अवतार से हुआ।

गजलक्ष्मी व्रत की कथा 
पूजा विधि ।
 
धर्मशास्त्रों के अनुसार भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी तक हाथी पर सवार देवी गजलक्ष्मी/ मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है।  
सोलह दिनों तक चलने वाले इस व्रत में निम्न कथा पढ़ी जाती है। गज लक्ष्मी देवी की पूजा तथा कृपा से अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की कामना पूर्ण होती है।  

गजलक्ष्मी व्रत कथा 
 
मान्यतानुसार महाभारत काल में देवी कुंती ने भी यह व्रत किया था। 
एक समय महर्षि श्री वेदव्यास जी हस्तिनापुर पधारे। उनका आगमन सुन महाराज धृतराष्ट्र उनको आदर सहित राजमहल में ले गए। स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर उनका पूजन किया। श्री व्यास जी से माता कुंती तथा गांधारी ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया- हे महामुने! आप त्रिकालदर्शी हैं अत: आपसे हमारी प्रार्थना है कि आप हमको कोई ऐसा सरल व्रत तथा पूजन बताएं जिससे हमारा राज्यलक्ष्मी, सुख-संपत्ति, पुत्र-पोत्रादि व परिवार सुखी रहें।
 
इतना सुन श्री वेद व्यास जी कहने लगे- मैं आप लोगों के समक्ष एक ऐसे व्रत का पूजन व वर्णन करूँगा; जिससे सदा लक्ष्मी जी का निवास होकर सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। 
यह श्री महालक्ष्मी जी का व्रत है, इसे गजलक्ष्मी व्रत भी कहा जाता है। जिसे प्रतिवर्ष अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी को विधिवत किया जाता है।
 
कुन्ती और गान्धारी ने कहा हे महामुने! इस व्रत की विधि हमें विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें। 
तब व्यास जी बोले- 
'हे देवी! यह व्रत ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता है। इस दिन स्नान करके सोलह सूत के धागों का डोरा बनाएं, उसमें सोलह गांठ लगाएं, हल्दी से पीला करें। प्रतिदिन डोरे को सोलह दूब व सोलह गेहूं चढ़ाएं। 
 
अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करें। इस प्रकार श्रद्धा-भक्ति सहित महालक्ष्मी जी का व्रत, पूजन करने से आप लोगों की राज्यलक्ष्मी में सदा अभिवृद्धि होती रहेगी। इस प्रकार व्रत का विधान बताकर श्री वेदव्यास जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।
 
इधर समयानुसार ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से गांधारी तथा कुंती अपने-अपने महलों में नगर की स्‍त्रियों सहित व्रत का आरंभ करने लगीं। इस प्रकार पन्द्रह दिन बीत गए। सोलहवें दिन अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन गांधारी ने नगर की स‍भी प्रतिष्ठित महिलाओं को पूजन के लिए अपने महल में बुलवा लिया। माता कुंती के यहां कोई भी महिला पूजन के लिए नहीं आई। साथ ही माता कुंती को भी गांधारी ने नहीं बुलाया। ऐसा करने से माता कुंती ने अपना बड़ा अपमान समझा। उन्होंने पूजन की कोई तैयारी नहीं की एवं उदास होकर बैठ गईं।
 
जब पांचों पांडव युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव महल में आए तो कुंती को उदास देखकर पूछा- हे माता! आप इस प्रकार उदास क्यों हैं? आपने पूजन की तैयारी क्यों नहीं की?' 
 
तब माता कुंती ने कहा- 'हे पुत्र! आज महालक्ष्मी जी के व्रत का उत्सव गांधारी के महल में मनाया जा रहा है। उन्होंने नगर की समस्त महिलाओं को बुला लिया और उसके सौ पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी बनाया, जिस कारण सभी महिलाएं उस बड़े हाथी का पूजन करने के लिए गांधारी के यहां चली गईं, लेकिन मेरे यहां नहीं आईं। 
 
यह सुनकर अर्जुन ने कहा- 'हे माता! आप पूजन की तैयारी करें और नगर में बुलावा लगवा दें कि हमारे यहां स्वर्ग के ऐरावत हाथी की पूजन होगी। इधर माता कुंती ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और पूजा की विशाल तैयारी होने लगी। उधर अर्जुन ने बाण के द्वारा स्वर्ग से ऐरावत हाथी को बुला लिया। 
इधर सारे नगर में शोर मच गया कि कुंती के महल में स्वर्ग से इंद्र का ऐरावत हाथी पृथ्वी पर उतार कर पूजा जाएगा। 
 
समाचार को सुनकर नगर के सभी नर-नारी, बालक एवं वृद्धों की भीड़ एकत्र होने लगी। 
उधर गांधारी के महल में हलचल मच गई। वहां एकत्र हुईं सभी महिलाएं अपनी-अपनी थालियां लेकर कुंती के महल की ओर जाने लगीं। देखते ही देखते कुंती का सारा महल ठसाठस भर गया। माता कुंती ने ऐरावत को खड़ा करने हेतु अनेक रंगों के चौक पुरवा कर नवीन रेशमी वस्त्र बिछवा दिए। नगरवासी स्वागत की तैयारी में पुष्प माला, अबीर, गुलाल, केशर हाथों में लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। 
 
जब स्वर्ग से ऐरावत हाथी पृथ्‍वी पर उतरने लगा तो उसके आभूषणों की ध्वनि गूंजने लगी। ऐरावत के दर्शन होते ही जय-जयकार के नारे लगने लगे। सायंकाल के समय इन्द्र का भेजा हुआ हाथी ऐरावत माता कुंती के भवन के चौक में उतर आया, तब सब नर-नारियों ने पुष्प-माला, अबीर, गुलाल, केशर आदि सुगंधित पदार्थ चढ़ाकर उसका स्वागत किया। 

राज्य पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करके वेद मंत्रोच्चार द्वारा पूजन किया गया। नगरवासियों ने भी महालक्ष्मी पूजन किया। फिर अनेक प्रकार के पकवान लेकर ऐरावत को खिलाए और यमुना का जल उसे पिलाया गया। राज्य पुरोहित द्वारा स्वस्ति वाचन करके महिलाओं द्वारा महालक्ष्‍मी का पूजन कराया गया। सोलह गांठों वाला डोरा लक्ष्मी जी को चढ़ाकर अपने-अपने हाथों में बांध लिया। ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। दक्षिणा के रूप में स्वर्ण आभूषण, वस्त्र आदि दिया गया। तत्पश्चात महिलाओं ने मिलकर मधुर संगीत लहरियों के साथ भजन-कीर्तन कर संपूर्ण रात्र‍ि महालक्ष्‍मी व्रत का जागरण किया।

दूसरे दिन प्रात: राज्य पुरोहित द्वारा वेद मंत्रोच्चार के साथ जलाशय में महालक्ष्मी जी की मूर्ति का विसर्जन किया गया। फिर ऐरावत को बिदा कर इंद्रलोक को भेज दिया। इस प्रकार जो स्‍त्रियां श्री महालक्ष्मी जी का विधिपूर्वक व्रत एवं पूजन करती हैं, उनके घर धन-धान्य से पूर्ण रहते हैं तथा उनके घर में महालक्ष्मी जी सदा निवास करती हैं। ऐसी इस गजलक्ष्मी व्रत की महिमा है। 
 
पूजन के समय महालक्ष्मी जी की यह स्तुति अवश्य बोलें-
 
महालक्ष्‍मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरि प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।

*महाराष्ट्र में प्रचलित ज्येष्ठा कनिष्ठा महालक्ष्मी व्रत*
 *ज्येष्ठागौरी का आह्वान पूजन और विसर्जन* ---

अग्निपुराण एवं देवी भागवत (स्कंद ९.३८/३९) में ‘यमराज – सावित्री’ संवाद में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, ज्येष्ठा नक्षत्र में ‘महालक्ष्मी / गौरी पूजन’ का उल्लेख है |
कुछ ग्रंथो के अनुसार रजोगुण से युक्त ज्येष्ठा गौरी यह ‘अलक्ष्मी’ है, जिसका पूजन प्रथम किया जाता है | और कनिष्ठा यह ‘लक्ष्मी’ है जिसका पूजन बादमे होता है |
यह शिवपरिवार की देवी है और ‘कनौज’ में इसका महापीठ है |
इसने स्त्रियोंके सौभाग्य का असुरोंसे रक्षण किया, तभीसे ‘महालक्ष्मी गौरी पूजन’ की शुरुवात हुई ऐसा भी बताया जाता है |
चैत्र मासमे भी प्रतिपदा से अक्षय तृतीया तक इसका पूजन किया जाता है |
 ‘संगीत पारिजात’ ग्रन्थ के अनुसार ‘गौरी’ यह माता पार्वतीकी ‘रागिनी’ है जिसको संध्याकाल में गाया जाता है | (इसमे ऋषभ,धैवत कोमल बाकी सब स्वर शुद्ध है |)

*भाद्रपद शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान,अष्टमी तिथियुक्त ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन और मूल नक्षत्र में विसर्जन होता है।*

मैत्रेणावाहये देवीं ज्येष्ठायां तु प्रपूजयेत् | मूले विसर्जये देवीं त्रिदिनं व्रतमुत्तमम् ||
यदाज्येष्ठा द्वितीयदिने मध्यान्हात्पूर्वम् समाप्यते | तदा पूर्वदिनमेव पूजनम् |
परदिने अपराण्हे स्पृशति तदा परैव ||

वैशिष्ट्य
इस उत्सव मे ज्येष्ठा / कनिष्ठा देवी की अपत्यप्राण एकत्रित पूजा की जाती है |
इस पूजा में भी बहुत विविधताए दिखती है |

जैसे मिट्टीके द्वारा बनाए हुए परम्परागत देवियों प्रतिमाओं की पूजा कर आराधना की जाती है जहा आकर्षक आरास (साज-सज्जा) और झांकी (शोभा) बनाई जाती है |
कई बार मटको द्वारा रची आरास (साज-सज्जा) को पोशाक अलंकार आदि पहनाकर उनका पूजन किया जाता है |
दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर यह उत्सव भाद्रपद शुक्ल तृतीया से मनाया जाता है। वहाँ आटे से बनी देवी प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है |
कुछ स्थानों पर धान्य राशि पर रची देवियों की छवि की पूजा की जाती है |
कोकण प्रांत में नदी / तालाब से बालू व कंकर लाकर उनकी स्थापना एवं पूजन किया जाता है |
कोली आदि कुछ समाज गुलतेवड़ी (तेरडा) नामक वनस्पति के पौधे लाकर उनमे देवियोकी स्थापना व पूजन करते हैं |

पूजन क्रम
साधारणतः यह उत्सव तीन दिन मनाया जाता है तथा यह नक्षत्र प्रधान माना जाता है |

प्रथम दिन
इस दिन अनुराधा नक्षत्र को ‘गौरी देवि’ का आवाहन किया जाता है | घर की सौभाग्यवती महिलाए द्वार पर इसे लेकर आती है |
पश्चात उनका दुध से पाद प्रक्षालन किया जाता है और कुमकुम से ‘महालक्ष्मी पदचिन्ह’ बनाकर मङ्गल ध्वनी से उन्हें घरका दर्शन कराया जाता है |
बादमे जहा आरास (साज-सज्जा) रची हो वहा इन्हें स्थापित किया जाता है |
कई बार जहा इन्हें स्थापित किया जाता है वहा (जैसे विवाह में मण्डप में धातु या मिट्टी के मटकों से झांकी सजाते हैं वैसे ही) धान्य से भरी हुई मटके पायली या मटके का उपयोग किया जाता है | (सात सेर अनाज मापने के बर्तन को पायली कहते हैं।) 
बादमे ‘भाजी-भाकरी’ (अम्बाडे की सब्जी) का भोग चढाने का भी रिवाज पाया जाता है |

द्वितीय दिन
ज्येष्ठा नक्षत्र में ‘गौरी पूजन’ सम्पन्न किया जाता है | इसकी पूजन विधि इस प्रकार है –

पूजन विधी
वंदन ---
घरके सभी बड़े व बुजुर्गोको, अपने घरमे स्थापित देवता और कुलदेवता को वंदन करे |
आचमन / प्राणायाम : तीन बार जल प्राशन करते हुए चौथी बार पत्र में छोड़े और प्राणायाम करे |
देवतास्मरण :
कुलदेवताभ्यो नमः| ग्रामदेवताभ्यो नमः| एतत् कर्म प्रधान देवताभ्यो नमः| सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमो नमः|

संकल्प --- 
(हाथसे जल छोड़े )
मम सकुटुंबस्य सपरिवारस्य अलक्ष्मी निरसनपूर्वक धनधान्य पुत्रपौत्र सौभाग्यादि अभिवृद्धिद्वारा श्रीज्येष्ठादेवी प्रीत्यर्थं भाद्रपद शुक्लपक्षे ज्येष्ठा नक्षत्रे यथाज्ञानेन यथाशक्ति यथामिलित उपचार द्रव्यैः षोडशोपचार ज्येष्ठादेवी पूजनं अहं करिष्ये |

तत्रादौ निर्विघ्नता सिध्यर्थं महागणपति स्मरणं शरीर शुध्यर्थं षडङ्गन्यासं पृथ्वी, कलश, शङ्ख, घण्टा पूजनं च करिष्ये |

श्रीगणेश पूजन ---
वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ |निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा || श्रीगणेशाय नमः ||

पृथ्वी पूजन ---
पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता | त्वं च धारय मां देवी पवित्रं कुरु चासनम् || भूम्यै नमः ||

न्यास विधि --- 
विष्णवे नमः | ऐसा १२ बार कहते हुए मस्तक से लेके चरण पर्यंत स्वयं की शरीर शुद्धि करे | 

कलश पूजन --
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः | मूले तत्रस्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः || कलशाय नमः ||

शङ्ख पूजन ---
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे | नमितः सर्व देवैश्च पाञ्चजन्य नमोस्तुते || शङ्खाय नमः ||

घण्टा पूजन ---
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु राक्षसाम् | कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताव्हान लक्षणम् || घण्टायै नमः ||

दीप पूजन ---
भो दीप ब्रह्म रूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः | आरोग्यं देहि पुत्रांश्च सर्वान्कामान्प्रयच्छ मे || दीपदेवताभ्यो नमः ||

आत्मशुद्धि---
स्वयं पर एवं पूजा साहित्य पर शंख जल प्रोक्षण करे |
शङ्खोदकेन पूजाद्रव्याणि संप्रोक्ष्य आत्मानं च प्रोक्षेत् |

प्राणप्रतिष्ठा विधी

आवाहित देवता को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए अग्रिम श्लोको का उच्चारण करे,

अस्यैः प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यैः प्राणाः क्षरन्तु च | अस्यै देवत्वमर्चायै मा महेतिच कच्चन ||
अस्यां मूर्तौ मम प्राण इह प्राणाः | अस्यां मूर्तौ मम जीव इह स्थितः ||

देवता को दर्पण दिखाए तथा अष्टगंध, पुष्प एवं बालभोग (घी-गुड) अर्पण करे |
पात्र में जल छोड़ते हुए बोले,“अनया पूजया अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिका: प्रीयताम् |”
अधिक विस्तृत विधी करने हेतु पुरोहितका मार्गदर्शन ले |

पूर्वपूजन
ध्यान ---
हाथ में अक्षत, पुष्प लेकर आवाहित देवता का इस श्लोक से ध्यान करे और उसे अर्पण करे |

त्रिलोचनां शुक्लदन्तीं बिभ्रतीं काञ्चनीं तनुम् |विरक्ता रत्कनयनां ज्येष्ठां ध्यायामि सुन्दरीम् ||
अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः || ध्यानं समर्पयामि ||

पूर्व उपचार--- 
 तत्पश्चात “अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः ||” ऐसा उच्चारण करते हुए या श्रीसूक्त के हरेक मंत्र से आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृतस्नान, गंधोदक स्नान, मांगलिक स्नान, शुद्धोदक स्नान आदि सभी पूजा उपचार पुष्प से जल सिंचन करते हुए करे |
धूप, दीप, नैवेद्य ---
 बाद में पुर्वपुजन प्रीत्यर्थ भगवान पर फूल चढ़ाए, धुप – दीप और शेष पंचामृत या घी-गुड का भोग चढ़ाए |
पुर्वपूजन समारोप : अब अभिषेक करने हेतु पहले के पुष्प (निर्माल्य) उतारकर नए पुष्प चढ़ाए और कहे.
“अनेन पुर्वाराधनेन अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिका: प्रीयताम् |”
अभिषेक : इस समय श्री देवीस्तुतीपर श्रीसूक्त या देवीस्तोत्र आदिका पठण करे और पुष्प से जलसिंचन करे |
अंग पूजा ---
 प्रत्येक इन्द्रियोपर / प्रत्येक नामके बाद देवीको अक्षत अर्पण करे |
लक्ष्म्यै नमः – पादौ पूजयामि ||, पद्मायै नमः – गुल्फौ पूजयामि ||
कमलायै नमः – जानुनी पूज. ||, क्षिराब्धितनयाय नमः –उरुं पूज.||
इन्दिरायै नमः – कटिं पूज. ||, मन्गलायै नमः – नाभिं पूज. ||
मन्मथवासिन्यै नमः – स्तनौ पूज.||, क्षमायै नमः – हृदयं पूज.||
हरिप्रियाय नमः – कण्ठे पूज. ||, उमायै नमः – नेत्रे पूज. ||
रमायै नमः – शिरं पूज. ||, श्रीमहालक्ष्म्यै नमः – सर्वाङ्गं पूज.||

नामपत्री पूजा --- 
प्रत्येक नाम के साथ उल्लेखित पत्री (ना होने पर अक्षत) अर्पण करे |
श्रीयै नमः – अगस्तीपत्रं समर्पयामि || (अगस्ती वृक्षपान)
श्रीलक्ष्म्यै नमः – केतकीपत्रं समर्प. || (केवड्याचे पान)
श्रीवनमालिकाये नमः – धत्तुरापत्रं समर्प.|| (धोत्र्याचे पान)
बिभिषणायै नमः – तुलसीपत्रं समर्प.|| (तुळशीचे पान)
शाकय नमः – अशोकपत्रं समर्प. || (अशोकाचे पान)
वसुमालिकायै नमः – भृन्गराजपत्रं समर्प. || (माक्याचे पान)
सूर्यायै नमः – किन्वपत्रं समर्प. || (केन्याचे पान)
पन्कजधारिण्यै नमः – पङ्कजपत्रं समर्प. || (कमळाचे पान)
मुक्ता हारसमप्रभायै नमः – दुर्वां समर्प. || (दुर्वा)
पुष्कारिण्यै नमः – जपापत्रं समर्प. || (जास्वंदाचे पान)
पिन्गलिन्यै नमः – बिल्वपत्रं समर्प. || (बेलाचे पान)
हेममालिन्यै नमः – चंपकपत्रं समर्प. || (चाफ्याचे पान)
इन्दिरायै नमः – अपामार्गपत्रं समर्प. || (आघाड्याचे पान)
जमदग्निप्रियाय नमः – ताडपत्रं समर्प. || (ताडाचे पान)
श्रीजगदात्र्यै नमः – नानाविधपत्राणि समर्प. || (इतर सर्व पाने)

उत्तर पूजन

 *अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः |*
 इस श्लोकसे सूती वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, हल्दी – कुमकुम, माला, इत्र – सुगंधी द्रव्य, अलंकार आदी उपचार अर्पण करे |
अपने कुलपरम्परा के अनुसार वस्त्र, सूत्र, धान्य-राशि, पत्री आदि अर्पण करे |
कुछ जगहों पर ‘फुलोरा’ बनाया जाता है तथा कुछ जगहों पर ‘कथली आम्बिल’ पूजन किया जाता है |
इसके बाद में गोद भराई /ओटी / वायन दान दिया जाता है |
नैवेद्य में घावन घाटले / पुरणपोली / आंबील / सोलह सब्जी आदि पदार्थोका भोग चढ़ाया जाता है |
आरती व मंत्रपुष्प ---
बाद में आरती व मंत्रपुष्पांजली, प्रदक्षिणा व नमस्कार अर्पण करे,

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि | तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ||”मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ||

अर्घ्यप्रदान ---
 दाहिने हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, सुपारी, सिक्का लेकर उसपर जल छोड़ते हुए इस श्लोक से अर्घ्य दे |
ज्येष्ठे श्रेष्ठे तपोनिष्ठे ब्रह्ममिष्ठे सत्यवादिनी |इह्येहित्वं महाभागे अर्घ्यं गृह्य सरस्वती ||श्रीज्येष्ठागौर्यै नमः | इदं अर्घ्यं समर्पयामि ||

प्रार्थना ---
हाथ जोड़कर प्रार्थना करे और तदनन्तर ब्राह्मण-सुवासिनी पूजन करे |
त्वं लक्ष्मीस्त्वं महादेवी त्वं ज्येष्ठे सर्वदामरैः |पूजितोsसि मया देवी वरदाभव मे सदा ||

तृतीय दिन

मूल नक्षत्र में आवाहित देवताका विसर्जन किया जाता है |

आवाहित देवता का पंचोपचार पूजन किया जाता है |
कुल परम्परा के अनुसार दहीभात / मुरडपोली इ. का भोग लगाया जाता है |
बादमे पूजा कथा सुनते है और सूत्र को पीले रंगका और सोलह गाठीयोसे बांधा जाता है | इस प्रसादरुपी सूत्र को महिलाए गलेमे धारण कराती है | कई बार यह सूत्र आश्विन पौर्णिमा तक पहना जाता है |  
ग्रामीण भागो में प्राप्त धान्य का ‘राशि भोज’ कराने की प्रथा दिखाई देती है |
इस श्लोक का उच्चारण करते हुए आवाहित देवताका विसर्जन किया जाता है,
ज्येष्ठे देवी समुत्तिष्ठ स्वस्थानं गच्छ पूजिता |ममाभीष्ट पदानार्थं पुनरागमहेतवे ||



*आचार्य कमल नन्दलाल के अनुसार महाकौशल प्रांत में प्रचलित कथा* ⤵️

*संकल्प मंत्र---* 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रत में त्वत्परायणा। तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:॥

 *सोलह बोल की कथा---* अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी॥

 *विशिष्ट मंत्र---
* ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः॥

*सोलह दिनात्मक गजलक्ष्मी व्रत कथा एवम विधि।*

ऋग्वेद में देवी लक्ष्मी को ‘श्री’ व भूमि प्रिय सखी कहा है। लक्ष्मी को चंचला भी कहते हैं अर्थात जो कभी एक स्थान पर रूकती नहीं। 
श्री का अर्थ है व्यक्ति की हैसियत या औकात। 
शब्द “लक्ष्मी” का अर्थ है लक्ष्य को साधना। शास्त्रों में वर्णित लक्ष्मी के आठ स्वरूपों में से गजलक्ष्मी स्वरूप को कलयुग में सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इससे गरीबी दूर होती है। इन्हीं देवी गजलक्ष्मी की साधना का महापर्व है सोलह दिनों तक चलने वाला महालक्ष्मी व्रत।

ज्योतिष के पञ्चाङ्ग खंड अनुसार गजलक्ष्मी महापर्व अर्थात महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र से होगा व इसका समापन अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन होगा। अर्थात राधा अष्टमी से कालाष्टमी तक चलने वाला गजलक्ष्मी महापर्व सूर्य के स्थिति से संबंधित है। जब सूर्य निरयन कन्या राशि में आता है इन्हीं सोलह दिनों में महालक्ष्मी के गजलक्ष्मी स्वरूप की पूजा का विधान है। 
इस व्रत का आरम्भ ज्येष्ठा नक्षत्र के चंद्र से करना चाहिए। इस व्रत में षोडश यानि 16 की संख्या का महत्व है जैस 16 वर्षों हेतु, 16 दिन हेतु, 16 नर-नारियों हेतु, 16 पुष्प-फल 16 धागों व 16 गांठों का डोरा इत्यादि।

 *पूजन विधि---* 
शास्त्रनुसार इस व्रत में 16 दिनों तक हाथी पर विराजित लक्ष्मी की स्थापना सूर्यास्त के बाद दो घण्टे चौबीस मिनट में अर्थात प्रदोष काल में नीचे दिए गए संकल्प मंत्र
*संकल्प मंत्र:* 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रत में त्वत्परायणा। तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:॥ बोलकर संकल्प लेकर करें। 
चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर केसर-चंदन से रंगे अक्षत से अष्टदल बनाकर कलश स्थापित कर मिट्टी से बने 2 हाथियों संग गजलक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित करें। गजलक्ष्मी की 16 उपायों से षोडशुपचार पूजा करें। *गौघ्रत का दीप व सुगंधित धूप करें, रोली, चंदन, ताल, पत्र, दूर्वा, इत्र, सुपारी, नारियल व कमल पुष्प चढ़ाएं। नैवेद्य में गेहूं के आटे से बना मीठा रोट चढ़ाएं व 16 श्रृंगार चढ़ाएं। हल्दी से रंगे 16-16 सूत के 16 सगड़े बनाकर हर सगड़े पर 16 गांठे देकर गजलक्ष्मी पर चढ़ाएं।* 
इस व्रत में 16 बोल की कथा ---
*अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी।* 16 बार कहें ।
कमलगट्टे की माला से इस विशिष्ट मंत्र ---
*ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः।* 
का 16 माला जाप करें। 

*सोलह बोल की कथा---
*अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी।*

 *विशिष्ट मंत्र---
* ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः॥*

सोमवार, 25 अगस्त 2025

सच्चा धर्म दर्शन।

मत और सम्प्रदाय अनेक होते हैं।
धर्म और दर्शन एक ही है जो वैदिक मन्त्र संहिताओं में उल्लेखित है।

ब्राह्मण ग्रन्थों के पूर्व के अध्याय धर्म- व्यवहार और कर्मकाण्ड सम्बन्धित वेद मन्त्रों की व्याख्या करते हैं। इनकी मीमांसा जैमिनी ने पूर्व मीमांसा दर्शन में की है।

उल्लेखनीय है कि, ब्राह्मण ग्रन्थों का अन्तिम भाग आरण्यक कहलाता है। आरण्यकों में वानप्रस्थ आश्रम सम्बन्धित वेद मन्त्रों की व्याख्या की गई है। 
इन्हीं आरण्यकों के प्रायः अन्तिम अध्याय होने से वेदान्त और आत्म विद्या प्रधान होने उपनिषद कहलाते हैं और ब्रह्मविद्या प्रधान होने से श्रीमद्भगवद्गीता में उपनिषदों को ब्रह्म सूत्र कहा गया हैं।
इन आरण्यकों और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण ने उत्तर मीमांसा दर्शन में की है। जिसे शारीरिक सूत्र भी कहते हैं। और ब्रह्मवाद की मीमांसा होने से ब्रह्म सूत्र भी कहते हैं।
वैदिक मन्त्र संहिताओं को समझने में सहायक ग्रन्थों को वेदाङ्ग कहते हैं। जिसमे 
1 उच्चारण की शिक्षा को शिक्षा वेदाङ्ग कहते हैं। 
2 (पाणिनि की अष्टाध्याई व्याकरण, इसपर पतञ्जली का महाभाष्य, इस भाष्य पर व्यास की विश्लेषणात्मक व्याख्या भोज वृत्ति और कात्यायन की आलोचनात्मक व्याख्या वार्तिक इन सब को मिलाकर व्याकरण वेदाङ्ग कहते हैं। 
3 मन्त्र संहिताओं में आये शब्दों की व्युत्पत्ति को (यास्क का ) निरुक्त और (अमरकोश आदि) शब्दकोश को निघण्टू कहते हैं। ये दोनों मिलकर ही निरुक्त वेदाङ्ग कहलाते हैं।
4 वेद मन्त्रों के छन्दों का का व्याकरण (पिङ्गल का छन्द शास्त्र) छन्द वेदाङ्ग कहलाता है।
5 वैदिक मन्त्रों में आये ब्रह्माण्ड विज्ञान और गणित सम्बन्धित मन्त्रों की व्याख्या विशेषकर अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, (नारद संहिता, गर्ग संहिता, लगध) आदि के ग्रन्थ ज्योतिष वेदाङ्ग कहलाता है।
6 कल्प के अन्तर्गत वैदिक संहिताओं में उल्लेखित आचार नियमों पर आधारित विधि-विधान और निषेधों के सूत्र धर्म सूत्र ।
 ब्रह्माण्डो, आकाश गङ्गाओं, सौर मण्डलों आदि के नक्शों के अनुरूप मण्डप और मण्डल और यज्ञ वेदी बनाने की विधि विधान शुल्ब सूत्र।
संस्कार, उत्सव आदि के सम्बन्ध में वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित गृह्यसूत्र।
बड़े-बड़े यज्ञ सत्रों के विधि विधान सम्बन्धित वेद मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित श्रोत सूत्र।
ब्राह्मण ग्रन्थों द्वारा इनकी पुष्टि होती है। ये सब मिलाकर कल्प वेदाङ्ग कहलाता है।

इनके अलावा ऋग्वेद के स्वास्थ्य चर्या सम्बन्धित मन्त्रो पर ग्रन्थ आयुर्वेद नामक उपवेद है।
यजुर्वेद के मन्त्रों पर आधारित युद्ध विद्या, दुर्ग निर्माण और सुरक्षा, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन का विज्ञान धनुर्वेद उपवेद। इसी के साथ राजनीति के ग्रन्थ अर्थशास्त्र कहलाते हैं।
सामवेद के मन्त्रों पर आधारित सङ्गीत के उपकरण निर्माण और रखरखाव, गायन, वादन,, नाट्य में उपयोगी मञ्च निर्माण, व्यवस्था, अभिनय और नृत्य-नाट्य आदि सम्बन्धित मन्त्रों पर आधारित गन्धर्ववेद।
अथर्ववेद में उल्लेखित शिल्प विद्या और वास्तु विज्ञान, भवन निर्माण, सेतु और मार्ग और पथ निर्माण, रखरखाव आदि की विद्या शिल्पवेद या स्थापत्य वेद।

जो अहिन्सा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह, शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को मानने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों पर आधारित आचरण, और तदानुसार पञ्च महायज्ञ ही धर्म है
अर्थात जो धर्म उक्त क्राइटेरिया में फिट बैठता हो बस वही सच्चा धर्म है। 
 और अभेद दर्शन ही दर्शन है। जो 
ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।।
तथा 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत् समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ 
सर्व खल्विदम् ब्रह्म, प्रज्ञानम् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म, तत् त्वम असि और अहम् ब्रह्मास्मि आदि महावाक्यों को सिद्ध करता हो वही सोच-विचार, मान्यता और अनुभव सच्चा दर्शन है।
सांख्य दर्शन में मात्र तत्व मीमांसा है, योग दर्शन में जीवन पद्धति और कर्म मीमांसा है।
जिसके आधार पर श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म मीमांसा की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार स्वयम् को ईश्वरीय कार्य में नियुक्त मानकर, सभी कर्तव्य कर्मों को ईश्वरीय विधान समझकर, शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही निष्काम भाव से कर्म करने को ही सत्य और उचित कर्म कहती है। परम के लिए अर्थात परमार्थ कर्म ही करना अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ करना श्रीमद्भगवद्गीता की कर्म मीमांसा  है।
वैशेषिक दर्शन भौतिक वैज्ञानिक पद्धति दृष्टि से सृष्टि के तत्वों की विवेचना है।
न्याय दर्शन तर्कशास्त्र है, जो बतलाता है कि, निर्णय पर कैसे पहूँचा जाए।
वस्तुतः ये विचारधारा है, सोच-विचार और मान्यताएँ हैं अनुभव नहीं इसलिए ये दर्शन भी नहीं है।

 जो अनादि है वह अनन्त होगा ही। अतः वह सर्वव्यापी होगा।
जब ब्रह्म अनादि, अनन्त सर्वव्यापी है तो अन्य कोई तत्व अनादि नहीं हो सकता।
यदि जीव को भी अनादि अनन्त माने तो जहाँ जीव रहेंगे वहाँ से ब्रह्म हट जाएगा या शुद्ध ब्रह्म नहीं रहेगा। जैसे पानी से लबालब भरे बर्तन में कुछ डालने पर या तो पानी बाहर हो जाएगा। या यदि पानी के अणुओं के बीच में समा भी गया तो पानी के गुण धर्म बदल देगा।
यही स्थिति प्रकृति की है, यदि प्रकृति अनादि अनन्त है तो जीव, ब्रह्म और प्रकृति ये तीनों एक साथ वैसे ही घुल मिल कर रह सकते हैं जैसे पानी में शकर या नमक। लेकिन इस स्थिति में ब्रह्म निर्गुण निराकार और निरञ्जन तो रह ही नहीं सकता। 
यदि तीनों साकार हैं तो उनका आयतन (वॉल्युम) होगा। यदि आयतन है तो एक दुसरे को हटाये बिना रह नहीं सकते।
इसलिए न जीव न प्रकृति अनादि अनन्त हो सकती है।
अतः जीव और प्रकृति को सत्य नहीं कहा जा सकता।

इसलिए जीव को ब्रह्म का आवरण (शरीर) मानने वाला और जगत (प्रकृति) को जीव का शरीर मान कर विशिष्ट अद्वैत कहने वाला रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन असिद्ध हो गया।
ब्रह्म के लोक में और बाहर रहने वाले अनेक श्रेणियों में वर्गीकृत अनेक अनादि जीव और अनादि प्रकृति मानने वाले वल्लभाचार्य जी का शुद्धाद्वैत दर्शन असिद्ध हो जाता है।
ईश्वर जीव और प्रकृति को अनादि अनन्त मानने वाले माध्वाचार्य जी का द्वैत वाद और दयानन्द सरस्वती जी का आर्यसमाजी त्रेत वाद और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन स्वतः असिद्ध हो जाते हैं।
या तो अभेद सत्य हो सकता है या द्वैत/ त्रेत सही हो सकता है। यह भी सही और वह भी सही व्यावहारिक सत्य हो सकता है लेकिन वास्तविक सत्य नहीं हो सकता। अतः निम्बार्काचार्य का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन/ स्वाभाविक द्वैताद्वैत दर्शन और श्रीकृष्ण महाप्रभु का अचिन्त्त्य भेदाभेद दर्शन स्वतः असिद्ध हो जाता है।

शनिवार, 16 अगस्त 2025

श्री कृष्ण चरित्र और भगवान शंकर जी का चरित्र विकृत कर प्रस्तुत करना दोषपूर्ण कृत्य है।

श्री कृष्ण ग्यारह वर्ष बावन दिन की अवस्था में ब्रज छोड़कर मथुरा चले गए थे और फिर कभी वास नहीं लौटे।
कत्थक में श्रीकृष्ण ग्यारह वर्ष से अधिक अवस्था के लग रहे हैं।
योगेश्वर चक्रधर नारायणी सेना के संस्थापक श्रीकृष्ण को केवल माखन चोर, गोपियों के वस्त्र हरण करने वाले और रास रचैया बतलाने वाले जयदेव रचित गीत गोविन्द और ब्रह्म वैवर्त पुराण ने सनातन वैदिक धर्मियों का बहुत चारित्रिक पतन किया।
कत्थक की तुलना में भरत नाट्यम में ये दोष नहीं पाये जाते हैं
यही स्थिति शिव पुराण आदि ग्रन्थों ने विष विज्ञानी, अस्त्र-शस्त्रों के निर्माता, व्याकरण, नाट्यशास्त्र आदि विषयों के मर्मज्ञ महायोगी भगवान शंकर जी को भी गंजेड़ी, भंगेड़ी, धतुरा आदि सेवन कर नशे में धूत होकर पार्वती को नग्न कर नचवाने वाला सिद्ध कर दिया और युवाओं का चरित्र भ्रष्ट कर दिया।
महाभारत में जहाँ दक्ष यज्ञ में भगवान शंकर जी को यज्ञ भाग दिलवा कर पार्वती जी और भगवान शंकर दोनों प्रसन्नता पूर्वक कैलाश लौट जाते हैं, वहीं शिव पुराण में दक्ष पुत्री सती को यज्ञ में ही आत्मदाह कर भस्म हो जाना, सती के भस्मीभूत शव को कन्धे पर टांग कर शंकर जी का विक्षिप्त की भाँति भ्रमण करना, भगवान विष्णु द्वारा चक्र से सती के शव के इक्यावन टुकड़े करने से जहाँ-जहाँ जो टुकड़ा गिरा वहाँ-वहाँ शक्ति पीठ स्थापित होना, हिमाचल और मेना की सन्तान पार्वती के रूप में सती का पुनर्जन्म होना, फिर कठोर तपस्या खर शंकर जी से विवाह करना आदि असत्य घटनाएँ जोड़ कर उमा पार्वती को मरण धर्मा मानवी सिद्ध कर दिया। जबकि केन उपनिषद में हेमावती उमा को ब्रह्मज्ञानी देवी बतलाया है।
ऐसे ही वाल्मीकि रामायण में किष्किन्धाकाण्ड और युद्ध काण्ड में रावण की लङ्का गुजरात के भरूच से दक्षिण में सौ योजन अर्थात 1287 किलोमीटर और केरल के कोझीकोड से पश्चिम में 23 योजन अर्थात 296 किलोमीटर लक्ष्यद्वीप में बतलाई है और विश्वकर्मा पूत्र नल जैसे विश्वकर्म प्रवीण इंजिनियर ने कोझीकोड से किल्तान द्वीप तक 296 किलोमीटर का सेतु बनाया था।
जबकि, कवि कम्बन ने शायद रावण को तमिल सिद्ध करने के चक्कर में सिंहल द्वीप, श्रीलङ्का/ सिलोन को रावण की लंका बतला दिया।रावण का अत्यधिक महिमा मण्डन भी कर दिया।
 और रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना भगवान श्री रामचन्द्र द्वारा होना बतला दिया। जिसे तुलसीदास जी ने खूब प्रचारित कर दिया।

दूध, दही, छाछ-मक्खन, और घी के उदाहरण से शुद्र वर्ण से द्विज फिर विप्र और अन्त में ब्राह्मण बनने की सिद्धि।

जन्मना उक्त सभी दूग्ध उत्पादन है।
संस्कार से दहीं बनते हैं। केवल रङ्ग रोगन करना वाह्य संस्कार है जबकि मूल स्वरूप में ही परिवर्तन ही आन्तरिक और वास्तविक संस्कार है।  दूध में रासायनिक परिवर्तन होकर दही बनता है अब उसे वापस दूध नहीं बना सकते वैसे ही एक जन्म में संस्कारित होने पर दुबारा शुद्र नहीं बनता। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है कर्मयोगी का पतन नहीं होता आगे ही बढ़ता है।
(विचार) मन्थन (स्वाध्याय) से मक्खन (विवेक) और छाँछ (बुद्धि) अलग-अलग होकर (विप्र) बने, तप कर घी (ब्राह्मण) बने।

जन्मना जायते शूद्र:संस्कारात् भवेत् द्विज:। वेद पाठात् भवेत् विप्र: ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मण:।। 
(स्कन्द पुराण:नागर खण्ड:18.6)
 वेदाध्ययन करके द्विज से विप्र (विद्वान) तो हो जाता है, बुद्धि द्वारा विश्लेषण कर विवेक से निष्कर्ष निकालना भी सीख लेता है, लेकिन मनेन्द्रियों पर नियन्त्रण नहीं होने से न चाहकर भी अधर्म में प्रवृत्त होनें से बच नहीं पाता।
इसलिए 
सर्वधर्म पालन में कष्ट सहन कर तितिक्षा के माध्यम से सोते- जागते, हँसते-रोते, ग्रहण-उत्सर्जन करते भी समाधि में लीन रहते हुए तप करके आत्मज्ञानी ब्राह्मण होता है।

तीस अंश भोगांश वाली सायन राशियों को प्रधय कहा जाना उचित होगा। क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण आठ या नौं अंश की नक्षत्र पट्टी में असमान भोग वाले तेरह तारामण्डल को अरे कहा जाना उचित होगा। तीस अंश की बारह निरयन राशियों को राशि ही कहा जाना उचित होगा।

तीस अंश भोगांश वाली सायन राशियों को प्रधय कहा जाना उचित होगा। क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण आठ या नौं अंश की नक्षत्र पट्टी में असमान भोग वाले तेरह तारामण्डल को अरे कहा जाना उचित होगा। तीस अंश की बारह निरयन राशियों को राशि ही कहा जाना उचित होगा।
आचार्य दार्शनेय लोकेश जी के अनुसार 
 *"वेद में 'राशि' शब्द नहीं किन्तु 'प्रधयः' शब्द राशियों के अर्थ में (अथर्ववेद १०/८/४) ही आया है। 'प्रधि' शब्द क्रान्तिवृत्त के १२ भागों के अर्थ में आया है।"* 

अर्थात सायन राशियों के लिए प्रधय शब्द और तारामण्डल के आधार पर तेरह राशियों को आचार्य वराहमिहिर के अनुसार अरे लिखा जाना उचित होगा।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

वैदिक सनातन धर्मियों को इनसे दूर ही रहना चाहिए।

सनातन वैदिक धर्मियों को वेद विरोधी, तामसिक तप करने वाले तान्त्रिकों (जैन), सन्देह वादी (बौद्धों), अश्लील मुद्राएँ बनाने वाले, मदिरा पीकर, मत्स्य और मान्स खाकर, मैथुन कर तान्त्रिक पूजा और होम-हवन करने वाले, चमत्कार दिखा कर आकर्षित करने वाले, सन्देहवाद और सेकुलरिज्म का झूठा पाठ पढ़ाकर अब्राहमिक मत को पोषित करने वाले कोरे तार्किकों और अब्राहमिक बाबाओं से दूर रहना चाहिए।
जो लोग इस श्रेणी में आते हैं उनकी जानकारी दी है।
बाहुबली, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पारसनाथ, वर्धमान महावीर जैसे वेद विरोधी, अनीश्वरवादी, सिद्धार्थ बुद्ध जैसे माध्यमिक, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ आदि वर्णाश्रम व्यवस्था के विरोधी नाथों , महावतार बाबा, श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय उनके तीन प्रमुख शिष्य युक्तेश्वर गिरि, केशवानन्द और प्रणवानन्द तथा युक्तेश्वर गिरि के शिष्य परमहंस योगानन्द; इसी सम्प्रदाय के हेड़ाखान बाबा, रामकृष्ण जैसे मांसाहारी तान्त्रिक और चमत्कारी उनके मान्साहारी, व्यसनी शिष्य विवेकानन्द जैसे सेकुलर, नीम करोली बाबा, अक्कलकोट के स्वामी समर्थ,और उनके शिष्य बालप्पा महाराज, चोलप्पा महाराज, अलंदी के नृसिंह सरस्वती महाराज, वेङ्गुरला के आनन्दनाथ महाराज, मुंबई के स्वामीसुत महाराज, पुणे के शंकर महाराज, पुणे के रामानन्द बीडकर महाराज और उनके अनुयायी गजानन महाराज, खण्डवा के अवधूत बड़े दादा महाराज जी और छोटे दादा महाराज जैसे चमत्कारी सिद्धों और नाथों।
अरविन्द, बौद्ध विचारक जिद्दु कृष्णमूर्ति और जैन विचारक रजनीश जैसे कोरे तार्किक। 
इस्कॉन के प्रभुपाद, कृपालु महाराज, रामपाल, गुरुमित राम रहीम, आशाराम, 

और कसाई बाबा जैसे मुस्लिम फकीरों से दूर रहने में ही भलाई है।

जैन-बौद्ध और नाथ और शैवों, शाक्तों के सम्प्रदाय में वर्णाश्रम का नहीं सीधे संन्यास का महत्व है।

शंकर जी के गण

शंकर जी के गणों में
नन्दी वृषभ (जाति समझ नहीं आई)
श्रङ्गी (जाति पता नही।)
भृङ्गी (जाति पता नही।)
वासुकी नाग, 
पुष्पदन्त गन्धर्व,
मणिभद्र यक्ष,
रावण राक्षस,
विनायक पिशाच 
छत्तीस यक्षिणियाँ।
चौंसठ योगिनियाँ।

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

गुरु और उपनयन

पिता ही सर्वप्रथम उपनयन कर मन्त्र दीक्षा देते हैं।
जो सिद्धान्ततः उचित भी है। प्रथम यज्ञोपवीत के समय उपनीत करने का अधिकार केवल पिता को ही होता है।
पिता के अभाव में माता , वो भी न हो तो बड़ा भाई ऐसा क्रम है।
ब्रह्मचर्य आश्रम में भी जब कर्मकाण्ड की क्रियाएँ की जाती है तब दो जनेऊ धारण की जाती है। इसलिए प्रथम बार दो जनेऊ ही पहनाई जाती है।
लेकिन जब बाद में कोई गुरुकुल में विद्याअध्ययन करने जाता है, तब गुरुकुल का कुलपति आचार्य पुनः उपनयन करवाता है।
उसके बाद और किसी बड़े गुरुकुल में शिक्षा-दीक्षा लेनी हो तो वह गुरु पुनः उपनयन कराता है।
अन्त में जब उपनिषद श्रवण, मनन, निदिध्यासन करवा कर तत्वमस्यादि बोध करवाने वाले सतगुरु से ब्रह्मदीक्षा लेना हो तो वे भी दीक्षा देने के लिए उपनीत करते हैं।
इसलिए एक व्यक्ति के कई गुरु हो सकते हैं।
ऐसे व्यक्ति में साम्प्रदायिक आग्रह नहीं रहता है।
जो योग्य (आत्मज्ञ) गुरु से उपनिषद श्रवण कर निदिध्यासन कर श्रीगुरू मुख से तत्वमस्यादि महावाक्यों का श्रवण कर आत्म ज्ञान प्राप्त करता है वह सहज स्वाभाविक हो जाता है। उसका किसी से भी लगाव नहीं किसी से भी विरोध नहीं होता।
केवल जिज्ञासुओं के प्रति ही शास्त्रोक्त मत प्रकट करते हैं।
जो व्यक्ति उक्त परम्परा का उल्लघङ्घन कर अतिक्रमण कर किसी को भी सतगुरु मान लेता है वही व्यक्ति नैयायिकों की भाँति साम्प्रदायिक वितण्डावाद का आश्रय लेकर सर्वत्र ज्ञान बचारता रहता है।
जो व्यक्ति अन्तिम सतगुरु तक नहीं पहूँच पाता वह पूर्व मीमांसकों (वर्तमान में वरिष्ठ आर्यसमाजियों) की भाँति शास्त्रार्थ करते हुए अपने अहंकार को ही दृढ़ करते फिरते हैं।
लेकिन आत्मज्ञानी गुरु का आश्रय ग्रहण कर समाधान होने के कारण समाधिस्थ रहता है।
उसे जगत प्रभावित ही नहीं करता। उसके लिए तो गुण ही गुणों में व्यवहार रत है। इसलिए वह कोई भी पक्ष-विपक्ष देखता ही नहीं है। और सवस्थ रहता है।

तन्त्र उत्पत्ति और विकास

तन्त्र उत्पत्ति और विकास 

तन्त्र का मतलब वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था से हटकर मनमानी निरंकुश व्यवस्था।

मेने पहले भी लिखा है कि, हिरण्यगर्भ को हम त्वष्टा और उनकी रचना के रूप में जानते हैं। त्वष्टा ने ब्रह्माण्ड के गोलों को सुतार की भांति गड़ा (घड़ा)।
इन त्वष्टा की रचना ब्रह्माण्ड है। इसलिए वैदिक वाङ्मय में त्वष्टा के पुत्र त्रिमुख विश्वरूप बतलाया गया। जिन्हें देवताओं (आदित्यों) ने अपना पुरोहित नियुक्त किया। वे एक मुख से सोमरस पान करते थे और देवताओं के लिए आहुति देते थे। दुसरे मुख से मदिरापान करते थे और असुरों को आहुति देते थे।
इन विश्वरूप की हत्या इन्द्र ने कर दी। इससे रुष्ट होकर त्वष्टा ने वत्रासुर को जन्म दिया। वत्रासुर ने जलों को रोक लिया था और भूमि डुबने लगी थी। और गोएँ चुरा ली थी। तब देवताओं ने परम शैव दधीचि से अस्थियाँ लेकर वज्र बनाकर इन्द्र ने वत्रासुर को मारकर गौओं और जलों को मुक्त किया।
पुराणोल्लेखित हिरण्याक्ष द्वारा भूमि खो रसातल में ले जाना और वराह अवतार द्वारा भूमि को पुनः अपनी कक्षा में स्थापित कर देना।(जो लगभग असम्भव है।), महर्षि कश्यप द्वारा समुद्र पी जाना, भगवान शंकर की जटा में गङ्गा समाना, फिर जह्नु ऋषि के कमण्डलु में गङ्गा समाना, वामन द्वारा तीन पग में त्रिलोकी माप लेना (इसका सत्यापन करने वाला भी त्रिविक्रम विष्णु तुल्य ही होना आवश्यक है।) सब रूपकात्मक वर्णन है। जो उक्त वेद मन्त्रों में उल्लेखित बातों के आधार पर गड़ ली गई।

पुराणों के अनुसार 
बाद में देवताओं ने शुक्राचार्य को भी पुरोहित नियुक्त किया। फिर उनका असुर प्रेम देखकर ब्रहस्पति को पुरोहित बनाया। ब्रहस्पति के नाराज होकर जाने पर पुनः शुक्राचार्य को पुरोहित बनाया। फिर शुक्राचार्य को हटाकर ब्रहस्पति को पुरोहित बनाया।

शुक्राचार्य जी परम शैव थे। अरब प्रायद्वीप और लगे हुए पूर्वी अफ्रीका में उन्होंने ही शैव पन्थ की स्थापना की थी, जो वेदों को अन्तिम सत्य नहीं मानता था और वेदों की मनमानी व्याख्या करता था। तथा वेद मन्त्रों को उल्टा पढ़कर या भिन्न-भिन्न प्रकार के उच्चारण कर तान्त्रिक प्रयोग करने लगे थे।
शैव मत ईरान में भी मीड सम्प्रदाय के रूप में पनपा और शंकर जी को मीढीश कहा जाने लगा।
अब्राहम का अब्राह्म मत शिवाई कहलाता है जिसे अरबी में सबाइन और साबई मत कहते हैं।
इसी सबाइन मत से दाउदी, सुलेमानी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम और वहाबी पन्थ बने।

शुक्राचार्य के पुत्र भी त्वष्टा ने टर्की और युनान के निकट क्रीट द्वीप पर शाक्त पन्थ की नीव रखी। यह शुद्ध तान्त्रिक सम्प्रदाय बना।

भारत भी इससे अछूता नहीं रह पाया। सिन्धु नदी के आसपास मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में तान्त्रिक पद्धति की मूर्तियाँ और प्रतिमाएँ इन्ही शिष्णेदेवाः तान्त्रिकों के प्रमाण है, जिन्हें वेदों में घोर निन्दनीय और बहिष्कृत मत कहा गया है।
इस तन्त्र मत के लोग वर्णाश्रम व्यवस्था नहीं मानते हैं। बचपन से ग्रहत्याग कर प्रथक संघ बनाकर घोर तामसिक तप करते हैं।
कालान्तर में यह श्रमण मत कहलाया जिसके दो रूप आस्तिक (वेदों को अंशतः मानने वाले) और नास्तिक (वेदों को न मानने वाले)
 नास्तिक मत वालों के भी दो रूप वर्तमान में भी पाये जाते हैं। इसमें  नाथ ईश्वरवादी हैं। तथा जैन अनीश्वरवादी हैं। श्रमण सम्प्रदाय के प्रमुख शंकर जी हुए। ईश्वर वादी शंकर जी को अपना इष्ट देवता मानते हैं और जैनों के आदर्श हैं।

इस प्रकार श्रमण सम्प्रदाय में तीन प्रमुख मत हुए ।
1 सिद्ध (नागा) सम्प्रदाय ईश्वर वादी और वेदों के प्रति आस्तिक हो गये। सिद्ध सम्प्रदाय के नागाओं को आद्य शंकराचार्य जी ने अपनी सेना के सैनिक बनाया।
 
2 नाथ सम्प्रदाय जो अ वैदिक ही रहे। लेकिन ईश्वर वादी हुए और भगवान शंकर को अपना इष्ट बनाया।
तथा 
3 जैन सम्प्रदाय जो शुद्ध नास्तिक (वेदों को न मानने वाले) और अनिश्वर वादी होते हैं।
जैन सम्प्रदाय से ही बौद्ध मत निकला। लेकिन कुछ लोग बौद्ध परम्परा को सन्देह वादी स्वतन्त्र मत मानते हैं 
भारत से बाहर ईरान का मीढ सम्प्रदाय लगभग नाथ सम्प्रदाय का ही रूप था। अफगानिस्तान के पिशाच और तुर्किस्तान में भी नाथ ही थे।
तिब्बत में नागाओं का गढ़ हुआ करता था। ये ही बाद में बौद्ध हो गये। सिद्धार्थ गोतम बुद्ध जो जन्मतः श्रमण सम्प्रदाय के प्रति आस्थावान थे। लेकिन उन्हें श्री आलार कलाम ने हठयोग और सांख्य दर्शन में दीक्षित कर दिया। बाद में श्री रुद्रक रामपुत्र से भी शिक्षा ली थी। लेकिन जन्मगत आस्था को भी वे छोड़ नहीं पाये। कुछ समय जैन आचार्यों की सङ्गति में रहकर कठोर तामसिक तप भी किया। और गणधर बुद्ध कहलाये। लेकिन सन्तुष्ट नहीं हो पाये। इसलिए अपना सन्देहवादी माध्यमिक दर्शन के साथ प्रथक मत स्थापित किया।
तान्त्रिक परम्परा के अनुयाई होने के कारण बौद्धों की एक शाखा वज्रयान सम्प्रदाय शुद्ध तान्त्रिक सम्प्रदाय हो गया। तिब्बत के नागालोग वज्रयान सम्प्रदाय के अनुयाई हो गये।
इस बौद्ध तान्त्रिक सम्प्रदाय में यमराज को इष्ट मानने वाला और मृत्यु को ही अन्तिम सत्य मानने वाला सम्प्रदाय भी था। जो उछल-उछल कर साधना करता था।
प्राचीन काल में वैदिक मत में सबसे अन्त में पराकाष्ठा पर पहूँचे ऋषि सप्त ऋषि बन गये।
उनके बाद भगवान श्रीकृष्ण, वेदव्यास जी आदि हुए।
वर्तमान युग में भगवान आद्य शंकराचार्य, सुरेश्वराचार्य आदि हुए। सबसे अन्त में दयानन्द सरस्वती हुए। 
तन्त्र मत में आदिकाल में त्वष्टा पुत्र विश्वरूप पराकाष्ठा पर पहूँचे। जिनका वध इन्द्र को करना पड़ा।
फिर कार्तवीर्य सहस्रार्जुन हुआ, जिसका वध भगवान परशुराम जी को करना पड़ा।
हठयोग में पराकाष्ठा पर रावण पहूँचा जिसका वध भगवान श्री रामचन्द्र जी को करना पड़ा ।
फिर कन्स, शिशुपाल और कालनेमी और जरासंध हुए। कन्स और शिशुपाल वध भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयम् किया और कालनेमी और जरासंध का वध नीतिकौशल से भगवान श्रीकृष्ण ने करवाया। 
तान्त्रिक क्रकच द्वारा भगवान आद्य शंकराचार्य जी की बलि चढ़ाने की कपट योजना का अन्त  उनके शिष्य पद्मपादाचार्य ने नृसिंह आवेश आह्वान कर क्रकच का वध कर किया और कापालिक उग्र भैरव का वध स्वयम भैरव ने कर दिया; भैरव स्वयम् प्रकट होकर कापालिक उग्र भैरव को खा गए।
ऐसी ही एक अन्य कथा के अनुसार अभिचार मन्त्र प्रयोग कर भगवान आद्य शंकराचार्य जी की शिष्य परम्परा के कोई शंकराचार्य जी को भगन्दर रोग पैदा कर मारने के इच्छुक कामरूप असम के तान्त्रिक अभिनव गुप्त का वध भगवान (आद्य शंकराचार्य जी की शिष्य परम्परा में हुए किसी) शंकराचार्य जी के शिष्य पद्मपादाचार्य जी को भगवान नृसिंह का आह्वान कर करवाना पड़ा।
ऐसे ही 
वर्तमान में लाहिड़ी महाशय आदि नाथ लोग हुए। एवम् तिब्बत में स्थित तथाकथित ज्ञानगञ्ज में बैठे कुछ सिद्ध गण हैं, जिनका मत हैकि, सृष्टि सञ्चालन में उनका हस्तक्षेप है।
वर्तमान में श्री भगवतानन्द गुरु के पिता श्री भी यम राज के निग्रह मत के अनुयाई हैं। जिन्होंने श्री भगवतानन्द गुरु को निग्रहाचार्य बनाया।