गुरुकुल और संयुक्त परिवार की समाप्ति के मूल में नौकर बनने (नौकरी) की इच्छा है।
तथाकथित वैदिक और उत्तर वैदिक काल अर्थात द्वापर युग के प्रारम्भ तक भारत में गुरुकुल में प्रशिक्षित स्नातक अपनी योग्यता और रूचि का व्यवसाय अपनाता था, तब-तक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रही। लेकिन द्वापरयुग के अन्तिम चरण में गुरुकुल का स्थान जब परिवार ने ले लिया तो जातिप्रथा जन्मी।
इसमें धर्मसुत्र रचियताओं नें एक छोटा सा छिद्र छोड़ दिया कि, ब्राह्मण वर्ण के बालकों को गुरुकुल प्रवेश पाँच से आठ वर्ष में, क्षत्रिय बालकों को आठ से बारह वर्ष तक और वेष्यों को तो समावर्तन की वय (सोलह वर्ष) तक गुरुकुल प्रवेश की छूट दे दी। यहीँ से परिवारों की आसक्ति (लगाव) बच्चों में बढ़ती गई और परिणाम स्वरूप जब गुरुकुल में बच्चों को न भेजकर परिवार में बच्चों को पालने की प्रथा बढ़ी तो पहले स्वयम् की कारीगरी वाले पारिवारिक व्यवसाय पनपे। उनने जातिप्रथा को जन्म दिया। और व्यवसाय परिवर्तन के विकल्प छीन लिया। बस यहीं से अव्यवस्था का प्रारम्भ हुआ। घर पर रहकर शास्त्राध्ययन बन्द हो गया। बच्चे एवम् युवक नई तकनीक से परिचित नही हो पाते थे। अस्त्र-शस्त्र निर्माण एवम् युद्ध कला प्रशिक्षण के अभाव में सामन्तों के लठैतों का सैन्य बल जिन्हें सामन्तों द्वारा प्रदत्त कृषि से आजीविका चलाना होती थी, मूलतः ऐसे कृषक लठैतों की पदाति सेना सीमा पार के आक्रांताओं से युद्ध करने भेज दिये जाते थे।
राजाओं की मुख्य सेना बहुत कम थी जो परस्पर लड़ने भिड़ने में ही प्रशिक्षित थी। विदेशी तकनीकी और युद्ध कौशल का ज्ञान नहीं था। अतः परास्त हुए। और पराजित सैनिकों का धर्मान्तरण आसान हो जाता था। गुरुकुलों के अभाव में इन्हें फिर शुद्ध कर घर वापसी का विकल्प समाप्त हो गया था।
विदेशी शासकों ने पहला निशाना ही बचे-खुचे गुरुकुलों को बनाया। जनता को नौकरी का प्रलोभन दिया। दासों (नौकरों) की मानसिकता स्वामी (मालिक) के अनुकूल होना स्वाभाविक ही है। ये है सनातन वैदिक धर्म के पतन के कारण।
श्री मयंक शर्मा (वामपन्थी क्वोरा लेखक) नें भी इसी बात को इन शब्दों में प्रकट किया है।
"हिन्दू धर्म की खासियत ही है 'नियमों में लचीलापन रखना'। मतलब धर्म परिवर्तन के लिए इच्छुक वर्ग की नज़र में जो बात एक प्रमुख आकर्षण है, वह हिन्दू धर्म में है ही नहीं। और जो नियमों में नहीं बंधना चाहता, वह धर्म परिवर्तन करता ही नहीं। उसको क्या फर्क पड़ता है कि वह किस धर्म में गिना जा रहा है। नियम उसको यहाँ भी नहीं मानने, और वहाँ भी नहीं। "धर्म परिवर्तन ज्यादातर वही करते हैं जो नियमों का कड़ाई से पालन करने के इच्छुक और पक्षधर होते हैं। और हिन्दू धर्म में नियमों की कड़ाई को प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, इसलिए धर्म परिवर्तन का इच्छुक वर्ग इस धर्म की तरफ इतना आकर्षित नहीं होता है।""मुझे तो यह एक बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण लगता है। मेरे लिए हिन्दू धर्म का यह सर्वश्रेष्ठ गुण है। पर कन्वर्ट होने वाले ज्यादातर लोगों की मानसिकता ऐसी होती है कि वह पहली दो - तीन पीढ़ी तक "People of the book" बने ही रहते हैं। "इसमें यह बात मुझे भी सत्य लगी कि, वर्तमान में *"हिन्दू धर्म में नियमों की कड़ाई को प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, इसलिए धर्म परिवर्तन का इच्छुक वर्ग इस धर्म की तरफ इतना आकर्षित नहीं होता है।"* बहुत बड़ा कारक (फेक्टर) है।
इसी का परिणाम है कि, आज किसी भी व्यक्ति से बात करो, सभी निर्विवाद रूप से कठोर शासन, कठोर अनुशासन और कठोर प्रशासक ही चाहता है। कोई मिलट्री रूल चाहता है, कोई तानाशाही चाहता है, जिन्हें राजनीतिक समझ कम है वे, और पुराने सावरकर वादी परम्परागत राजतन्त्र की वकालत करते थे। और अभी भी कुछ बचे हैं। जबकि राजतन्त्र में आसानी से सामन्तवाद पनपता है। जो कांग्रेस शासन में नेतातन्त्र के रूप में विकसित हुआ।लेकिन वर्तमान (पर)लोकतन्त्र में किसी की आस्था नही दिखती। कुछेक तो अरब के सख़्त क़ानून की तारीफ में कसीदे पढ़ते नजर आयेंगे। मतलब आतङ्कवादी तक भी सख्त क़ानून चाहते हैं। ये ही सब लोग अप्रत्यक्ष रूप से शरिया कानून के समर्थक हैं। लेकिन स्वयम् नही जानते कि, हम समर्थन किस बात का कर रहे हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि, गुरुकुल शिक्षित व्यक्ति नित्य उत्तर रात्रि में उठकर जलपान, मुखमार्जन, शोच, स्नान, तथा तारों भरी रात में ही सन्ध्या कर, सावित्री (गायत्री) मन्त्र का जप पूर्ण कर, उदयीमान सूर्य को अर्ध्य देकर, सूर्य-नमस्कार, योगासध, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यानाभ्यास कर वेदपाठ कर, अग्निहोत्र कर, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की सेवा सुश्रुषा कर, प्रातः काल में ही दान, अतिथि, ब्रह्मचारी और वानप्रस्थों की सेवा करलेता था। तदुपरान्त अपने धनार्जन, भोजन आदि में लग जाता था।
सायम्काल में भी शोच, स्नान, सन्ध्या, सावित्री (गायत्री) मन्त्र का जप पूर्ण कर, सूर्यास्त के पहले सूर्य को अर्ध्य देता था। रात्रि में धर्म-दर्शन, इतिहास, और गाथाओं का श्रवण करके ही सोता था। अतः जीवन संस्कारित था। अनर्गल विचारों के लिए न अवकाश था न वातावरण था। अतः सभी चरित्रवान थे। अपवाद स्वरूप कोई असांस्कृतिक आचरण करने लगता उसे अनार्य घोषित कर दिया जाता था।
नगरीय व्यवस्था ऐसी थी कि, नैऋत्य कोण में गणपति (जागीरदार); दक्षिण में सेनापति , कोतवाल, क्षत्रिय ; पश्चिम में वैश्य रहते थे, वायव्य में किसान और ग्वाले रहते थे। आग्नेय कोण में विश्वकर्मा (सुनार, धातु के बर्तन बनाने वाले ठठेरे, कुम्हार (कुम्भकार), लोहार, सुतार /बढ़ाई, शिल्पकार /राज मिस्त्री, जुलाहे (तन्तुवाय), दर्जी (सुचिक) आदि) रहते थे। राजन्य, मन्त्री और ब्राह्मण मध्यभाग में रहते थे। उत्तर में गोष्ठ, और पूर्व में शैक्षिक संस्थान होते थे। यह सब व्यवसाय के अनुसार व्यवस्था थी।
मान्साहारी चाण्डालों को केवल कार्यवश ही नगर में प्रवेश अनुमति थी। ये लोग नगर के बाहरी भाग में रहते थे। वानप्रस्थ आश्रम भी नगर के निकट ही होते थे। सन्यासी नगरों में प्रवेश नहीं करते थे।
नगरों के आसपास व्यवसायों से सम्बन्धित वर्ग के कुटुम्ब यथा कृषक, गोपाल, वन से शहद, औषधि, लकड़ी आदि एकत्रित करने वाले सम्बन्धित लोग ग्राम बना कर रहते थे। उनकी अपनी पञ्चायती व्यवस्था होती थी। इसका उदाहरण अयोध्या के निकट नन्दीग्राम जहाँ श्रीराम के वनवास काल में भरत रहे। और कौशल्या का मायका कोशल (गणराज्य/ जागीर) कस्बा। और मथुरा के निकट गोपालकों के ग्राम ब्रज क्षेत्र।
जाति प्रथा के उद्भव में यह व्यवस्था आधार बनी।
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