मंगलवार, 28 नवंबर 2023

आकाश, दिक, काल,और अन्तरिक्ष, समय और अवकाश (शुन्य)।

वैदिक तत्व मीमांसा दर्शन के अनुसार ---
१ (क) प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म को महाकाश कहा जाता है। 
(ख) पुरुष (सवितृ/ श्रीहरि) को आकाश कहते हैं। प्रकृति (सावित्री/ कमला) को शब्द कहते हैं।
(ग) अणुरात्मा ब्रहस्पति को ख कहते हैं।
(घ) स्वाहा (भारती)/ वैकारिक स्वभाव को भी स्काय कहते हैं। 
(ङ) स्व के भूतादिक स्वभाव (स्वधा) ) से अधिभूत हुआ जिसे हम पञ्च तन्मात्रा और पञ्च महाभूत के रूप में जानते हैं। इसमे शब्द तन्मात्रा से आकाश हुआ। यह तो है आकाश। 

२ (क) जीवात्मा (अपर ब्रह्म) को महाकाल कहते हैं।
(ख) अपर पुरुष (नारायण) को काल कहते हैं।
(ग) त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति, (श्री लक्ष्मी) को समय कहते हैं।
(घ) वषट / तेजस स्वभाव (सरस्वती) को समय (Time) कहते हैं।

३ (क) भूतात्मा (हिरण्यगर्भ) को महादिक कहते हैं। (हिरण्यगर्भ की शक्ति वाणी है।)
 (ख) प्राण/ देही (त्वष्टा) को दिक कहते हैं। धारयित्व/ धृति/ अवस्था (रचना) को दिशाएँ कहते हैं।
(ग) स्वधा भूतादिक स्वभाव (इळा), को स्पेस (Space) कहते हैं।

बौद्ध दर्शन के निकट होने के कारण आधूनिक विज्ञान वेत्ता वैशेषिक दर्शन को अधिमान्य करते हैं।
वैदिक तत्त्वमीमांसा के निकट होने के कारण वेदान्ती सांख्य दर्शन की तत्त्वमीमांसा को अधिक निकट पाते हैं।
सांख्य का आकाश और वैदिक आकाश की उत्पत्ति का वर्णन उपर हो चुका है।---
 स्व के भूतादिक स्वभाव (स्वधा) ) से अधिभूत हुआ जिसे हम पञ्च तन्मात्रा और पञ्च महाभूत के रूप में जानते हैं। इसमे शब्द तन्मात्रा से आकाश हुआ। यह तो है आकाश। 
यहाँ ध्यातव्य है कि, शब्द का अर्थ ध्वनि से नहीं समझा जाए। शब्द की तुलना आधुनिक विज्ञान की ब्लेक इनर्जी से की जा सकती है। इसी प्रकार नील गगन आकाश नही है। आकाश की तुलना ब्लेक मटेरियल से हो सकती है। आकाश ही समस्त आकारों/ आकृतियों का जनक है। मतलब सभी आयाम आकाश से ही व्युत्पन्न है। यहाँ तक कि, समय भी आकाश से व्युत्पन्न है और दिक भी आकाश से ही व्युत्पन्न है। 
बाइबल पुराना नियम में भी कहा गया है कि, पहले केवल शब्द ही था। शब्द जल के उपर डोलता था।

यहाँ मैनें समय शब्द का उपयोग किया है, काल का नही। काल दीर्घवृत्तीय गोल में गतिशील होता है। जबकि समय समरेखिक है। समय में हम आगे पीछे चलते हैं।
काल के अन्तर्गत ही कलन होता है। अर्थात काल में ही गणना होती है। काल स्वयम् दीर्घवृत्तीय गोल में सतत गतिशील होता है। कभी स्थिर नहीं रहता। इसलिए काल को पकड़ा नहीं जा सकता। काल के आधिदैविक रूप को अर्जुन को महाभारत युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने दिखाया था। सभी घटनाएँ काल में ही घटित होती है।
दिक का वर्णन वैशेषिक दर्शन में है। जिसे हम आकाश और दिशाओं के मध्य का तत्व के रूप में समझ सकते हैं।
सभी तरह के ब्रह्मांडों के लिए स्थान तो लगेगा ही वही स्थान दिक है, सूक्ष्मतम परमाणु या क्वांटा या क्वार्क इन सभी की भीतरी संरचना में स्पेस दिक है। क्योंकि वह स्थान भी रिक्त या शुन्य नहीं है। अतः वह अवकाश नहीं है।
जबकि शुन्य या अवकाश सम अवस्था है। जहाँ जहाँ भी सम है, वहीँ शुन्य या अवकाश है। क्योंकि यही वह अवस्था है जहाँ दुसरा कुछ भी नहीं हो सकता। कुछ भी आया कि विचलन होगा और शुन्य नहीं रहा। कुछ भी हटाया नहीं जा सकता। जब कुछ है ही नहीं तो क्या हटाओगे? यह वैसा ही कथन है जैसे कम प्रकाश और अधिक प्रकाश। आधा ग्लास भरा ही सत्य कथन है आधा ग्लास खाली गलत कथन है। क्योंकि वास्तव में सही बात तो यह है कि, ग्लास भरा है। ऐसे ही शुन्य में कुछ भी जोड़ा जाए तो वह शुन्य नही रहता लेकिन शुन्य में से कुछ निकल नहीं सकता। 
और व्यवहार में समुद्र तल से 100 किलो मीटर या 62 मील की ऊंचाई से अंतरिक्ष या स्पेस आरम्भ हो जाता है इसे karman line कारमन रेखा कहते हैं। 
इस आकाश और अन्तरिक्ष के बीच जो है वही दिक है। जिसे स्पेस कहा जाता है।

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