बुधवार, 8 अप्रैल 2026

भारत पर विदेशी शासन का संक्षिप्त इतिहास।

धर्म की रक्षा करने से धर्म भी रक्षा करता है।
वैदिक वर्णश्रम धर्म छोड़कर जाति प्रथा अपनाई, पञ्च महायज्ञ छोड़कर जैनों और बौद्धों की नकल कर मठ, मन्दिर में मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी तो देश से अफगानिस्तान, तध्य और पूर्वी तुर्किस्तान, तिब्बत, म्यांमार, श्री लङ्का सब कट गये। और अन्त में 1947 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बाङ्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान कट गये।
सर्वप्रथम दिवोदास और सुदासद के समय टर्की (तुर्किये) से चन्द्र वंशी और सीरिया से नाग वंशी आये और दशराज युद्ध के समय उत्तर में तुर्किस्तान (ब्रह्मावर्त) भारत से कट गया।
 महाभारत काल में ही इराक के असूर धर्म से संस्कारित जरुथ्रुस्ट ने ईरान मे पारसी मत चलाकर सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को हानि पहूँचाई। ईरान में पारसी मत ने सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को समाप्त कर दिया। और ईरान भारत से कट गया।
श्रमण मत के जैन पन्थ और 1857 ईसा पूर्व में बौद्ध पन्थ का उदय हुआ। उन्होंने सनातन वर्णाश्रम वैदिक धर्म का नाश किया। मङ्गोलिया भारत से कट गया। और तिब्बत भी लगभग-लगभग कट ही गया।
भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने के लिए यमन से काल यमन को आमन्त्रित करने वाला जरासन्ध चन्द्रवंशी यादव था।
जब 550 ईसापूर्व में पारसी (कुरेश)का आक्रमण हुआ, अफगानिस्तान तक पारसी धर्म फैल गया। 
फिर भारत खण्ड-खण्ब होने लगै।
326 ईस्वी पूर्व सिकन्दर के आक्रम से उत्तर पश्चिम प्रान्त कट गया। पश्चिम को भारत की फूट परस्ती पता चल गई।
123 ई.पू. से 200 ई. तक शको ने भारत पर आक्रमण किया।
60 से 240ई.तक कुषाणो ने भारत पर आक्रमण किया।।
और 425ई. से 500ईस्वी तक हूणो ने भारत पर आक्रमण किया। 

1200 ईस्वी पूर्व मूसा के समय और 2000 वर्ष पहले यीशु के साथ कश्मीर और त्रिपुरा में यहुदी बस गए और भारत में अब्राहमिक मत का प्रारम्भ हुआ। फिर यीशु के शिष्य सेंट थॉमस (थोमा) ने 52 ईस्वी में केरल के कोडुंगल्लूर (मुज़िरिस) के पास मल्यान्कारा (Maliankara) में भारत के पहले चर्च की स्थापना की थी। उन्होंने केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में कुल सात और आधे चर्च (एझरा पल्ली) स्थापित किए, जिनमें से पलयार, कोट्टाकावू, और निरनम प्रमुख हैं।
सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म पर हमले बढ़ गये।
सन 622 में सऊदी अरब में इस्लाम की स्थापना के समय से मोहमद ने अपने अनुयायियों को गजवा ए हिन्द का लक्ष्य दिया। और इराक के खलिफा ने गजवा ए हिन्द के लक्ष्य प्राप्ति के लिए सन 638 से 711 के 74 वर्षा में इराक के नौ खलिफाओं ने 15 बार सिन्ध पर आक्रमण किया। 
24 जून 1206 को दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस्लामी सत्ता स्थापित की।
20 मई 1498 से केरलम के कोळीकोट बन्दरगाह पर पुर्तगाली (वास्को डी गामा) के द्वारा युरोपीयन का आक्रमण प्रारम्भ हुआ।
1605 से 1885 तक नीदरलैंड्स के डचों का प्रभुत्व रहा।
1664 में फ्रेंच भारत आये 1668 में पहली फैक्ट्री खोली, और 1673 से पाण्डु चेरी में शासन करने लगे।
1600 में अंग्रेज भारत आये और 1665 से राज करने लगे।
 इस समय न गांधी न कम्युनिस्ट और न कांग्रेस का जन्म हुआ था।
तब हमारी राष्ट्रियता को किसने क्षति पहूँचाई थी?

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

पौराणिकों के झूठ।

पौराणिकों पर अब्राहमिक मत विशेषकर ईस लाम का कितना प्रभाव था यह इस बात से स्पष्ट होता है कि, याहवेह किसी लोक विशेष में रहता है और मूसा को दस नियम (कानून) लिखित शिलालेख देने नीचे उतरा था।
ऐसे ही अल्लाह से मिलने येरुशलम से बुर्राक नामक गधी पर बैठ कर मोह मद गया था।
चार फ़रिश्ते अल्लाह का सिंहासन उठाये रहते हैं।
फिर वह एकदेशीय जीव निराकार कैसे हो सकता है।
लेकिन अब्राहमिक मतावलम्बी उसे निराकार कहते हैं।
ऐसी ही बुद्धी हीनता पौराणिकों ने दर्शाई।
सर्वव्यापी विष्णु, नार (प्रकृति या जल) पर अयन करने वाले एक देशी नारायण को एक ही व्यक्ति बतला दिया।
वत्रासुर, शम्भर आदि अनेक असुरों, दैत्यों का वध करने वाले इन्द्र को सदा पराजित होने वाला बतला दिया। और परेशान देवताओं की सहायतार्थ श्री हरि को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। वह भी एक छोटे से क्षेत्र लङ्का द्वीप/ लङ्का पुरी, मथुरा के राजाओं को मारने के लिए!
पञ्च मुखी (अण्डाकार) हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा को एक बतलाने के लिए रुद्र के हाथों ब्रह्मा का सिर कटवा दिया।
उसके पीछे भी अनेक कारण जोड़ लिए।
1 वाणी-हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती। अर्थात प्रजापति की शक्ति सरस्वती।
सरस्वती को देख कर प्रजापति कामुक हो गये और (उषा के पीछे-पीछे सूर्य के रूपक से) सरस्वती के पीछे प्रजापति ब्रह्मा दौड़े। इस लिए रुद्र ने एक सिर काट डाला।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का ऊपरी सिरा वेद विरुद्ध असुरों के हित में मन्त्रोच्चार कर रहा था इसलिए तन्त्र रचियता रुद्र ने तान्त्रिक क्रिया करने के आरोप में ब्रह्मा का ऊपरी सिर काट डाला।
ज्योतिर्लिङ्ग का सिरा नहीं खोज पाने के बाद भी खोज लिया कहकर झूठ बोलने वाला सिर काट डाला।
अपराधी को दण्ड देने से रुद्र को ब्रह्म हत्या का पाप के रूप में वह ब्रह्मशिर चिपक गया।
इतनी बे-सिर-पैर की कल्पना सनातन वैदिक धर्म में घुसा दी। इन पौराणिकों से बड़ा पापी और कौन हो सकता है।
जिन्होंने सती के आत्मदाह की झूठी कहानी गढ़ी। देवी देवता अमर होते हैं तो सती मर कैसे गई?
महा विशविज्ञानी भगवान शंकरजी सती की मृत्यु से विक्षिप्त कैसे हो सकते है?
शंकर जी ने सती की भस्मीभूत देह का शव कन्धे पर कैसे लटकाया?
शंकर जी के कन्धे पर टंगी सड़ी गली लाश के इक्कावन टूकड़े क्यों करना पड़े? वो भी भगवान विष्णु को!
शंकर जी को तब तक भी होंश नहीं आना भी आश्चर्य जनक है।
देवी सती का पुनर्जन्म भी हुआ!
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र कामदेव को भी भस्म कर दिया!
कामदेव का भी पुनर्जन्म हुआ। 
पतिव्रता नारी रतिदेवी ने कामदेव के दुसरे जन्म वाले स्वरूप को भी अपना पति मान लिया!
शंकर भगवान को नशेड़ी बतला दिया।
वैरागी भगवान शंकरजी और योगेश्वर श्रीकृष्ण को कामुक बतला दिया। ब्रह्मचारी हनुमानजी का गुरु की पुत्री से विवाह करवा दिया और पसीने से मछली को गर्भवती होना भी बतला दिया। और मकर ध्वज को पुत्र बतला दिया।

इतने झूठ तो कोई बड़ा अपराधी भी नहीं बोलता होगा।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

महाभारत के अनुसार दक्ष द्वितीय के यज्ञ मे सती ने आत्मदाह नहीं किया। बल्कि शंकर-पार्वती दक्ष यज्ञ में साथ में गये थे और साथ में ही सहर्ष लौट आये।

*प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*यदि दक्ष यज्ञ में सती आत्मदाह करती, सती का पुनर्जन्म होता और पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह होता तो वाल्मीकि भी रामायण में कुछ तो उल्लेख करते ही।*
*कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ देखें।*
*महाभारत में  उल्लेखित दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा के अनुसार प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय  द्वारा किए गए यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को बुलाया लेकिन शंकर पार्वती को नहीं बुलाया।*
*देवताओं को समुह में जाते देख पार्वती ने शंकर जी से पुछा, तब शंकर जी ने पार्वती को बतलाया कि, दक्ष (द्वितीय) यज्ञ कर रहे हैं, उसमें उनके निमन्त्रण / आह्वान पर देवता यज्ञभाग लेने जा रहे हैं।*
*पार्वती द्वारा यह आपत्ति जताई कि, आप रुद्र को यज्ञभाग लेने हेतु क्यों आमन्त्रित नहीं किया गया।*
*तब शंकर जी बतलाते हैं कि, इसमें दक्ष का कोई दोष नहीं है। सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने रुद्र को यज्ञभाग न देने का विधान किया गया था। इसलिए मुझे नहीं बुलाया।*
*दक्ष द्वारा यज्ञ में न बुलाने और यज्ञभाग न देने की जानकारी से रुष्ट पार्वती (न कि, सती) को साथ लेकर स्वयम् शंकर जी दक्ष यज्ञ स्थल पर गये। वहाँ पार्वती अपनी नाराज़गी प्रकट करती है। केवल दधीचि पार्वती का समर्थन करते हैं। शेष सब मौन ही रहते हैं। दक्ष पर पार्वती के रोष का कोई प्रभाव न देखकर पार्वती जी और रुष्ट हो गई। इसे देखकर शंकरजी ने वीरभद्र और भद्रकाली का आह्वान किया। और वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस कर दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया। और देवताओं को भी प्रताड़ित किया।*
*फिर प्रजापति ब्रह्मा ने नियमों में संशोधन कर भविष्य में रुद्र को यज्ञभाग देने का नियम बना दिया तब, शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को पुनर्जीवित किया। और सहर्ष पार्वती जी को लेकर वापस लौट गए।*
*क्या महाभारत ग्रन्थ गलत है?  यदि शिव पुराण सही है तो महाभारत गलत है। शिव पुराण गलत है।*
*शिवपुराण जो वस्तूतः वायु पुराण की रुद्र संहिता नामक अध्याय है, गलत है।* 
 *क्योंकि वायु पुराण में महाभारत के पश्चात आधुनिक काल की रचना है। वायु पुराण में आधुनिक काल तक के भारत के अधिकांश राजवंशों और राजाओं का इतिहास दिया है। मतलब अत्यधिक नवीनतम रचना है।* अतः 
*वरीयता तो प्राचीन ग्रन्थ महाभारत की ही रहेगी।*
*अतः महाभारत में वर्णित तथ्य ही सही है कि,प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*इसलिए सती की भस्मीभूत देह को लेकर शंकर जी द्वारा विक्षिप्त होकर पूरे भारत वर्ष में भ्रमण करना भी गलत ही है। भगवान विष्णु द्वारा शंकर भगवान के कन्धे पर लटकी सती की भस्मीभूत देह के इक्कावन टूकड़े करना भी गलत है। सती के भस्मीभूत देह के टुकड़े भारत भूमि पर जहाँ- जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बनना भी गलत है।*
*पौराणिकों ने देवी सती की मृत्यु होना बतला दिया, जबकि शंकर-पार्वती देवता हैं अतः एक मन्वन्तर आयु वाले हैं। अर्थात अमर हैं।*
*यदि सती जलकर भस्म हो गई थी तो उनकी मृत देह कहाँ से आ गई?*
 *पौराणिकों ने भगवान शंकर को विक्षिप्त होना बतला दिया। जबकि वे महान विश विज्ञानी और वितरागी/ वैराग्यवान हैं। उन्हें कैसा शौक और कैसा मोह।*
*पौराणिकों ने भगवान विष्णु द्वारा मृत देह के इक्कावन टूकड़े करने वाला बतला दिया।*
क्या ऐसा पुराण और पौराणिक कथा सही हो सकती है? या केवल सनातन वैदिक धर्म के देवी देवताओं का अपमान करने के उद्देश्य से रची गई बौद्ध रचना है?*
*ध्यान रखें बौद्ध मत की वज्रयान शाखा के तान्त्रिक बौद्धों में ऐसी ही कथा/ कहानियाँ और मठ- मन्दिर पाये जाते हैं। वैदिक धर्म में नहीं।* 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

मानव योनि श्रेष्ठतम है।

वाल्मीकि रामायण में बाली, सुग्रीव, हनुमान जी, अङ्गद आदि ने कई बार स्वयम् को मानवों से निम्नतर योनि कहा है।
मानवों से उच्चतर केवल देवताओं को ही माना गया है।
गन्धर्व भी मूलतः मानव जाति के ही थे। इनमेऔ कुछ देवताओं की सन्निधि पाकर देव गन्धर्व कहलाये। जैसे मानवों में भी कई ऋषि, राजन आदि देवताओं के निकटतम सम्पर्क में ही नहीं थे अपितु भ्रगु जैसे ऋषिगण तो देवताओं को छोड़ों देवों को भी दण्डित करते थे।
महाराजा रैवत तो पुत्री को भी ब्रह्मा जी के लोक में ले गए थे। मान्धाता, दीलिप, रघु, दशरथ, महाराज मुचुकुंद आदि देवासुर संग्राम में देवताओं के पक्ष में लड़ते थे।
यक्षों (मङ्गोल) और राक्षसों (निग्रो) को बन्धु (भाई) माना जाता है। लेकिन यक्षराज मणिभद्र और शंकरजी के मित्र कुबेर जैसे कुछ यक्ष देवयक्ष कहलाते हैं। लेकिन ये अपवाद ही होते हैं।
यों तो हम (नागपाल, नागरथ सरनेम वाले कालबेलिया) नागों की भी पूजा करते हैं। गो माता की भी पूजा करते हैं। पीपल आदि वृक्षों की भी पूजा करते हैं। लेकिन इन सब योनियों से मानव योनि श्रेष्ठतम है।